Wednesday, September 30, 2009

Say-ओए-होए, होह-होए











1 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कलाई पूरी तरह से घुमती है। घुटने को नीचे झुकाकर बल्लेबाज बाहर जाती हुई गेंद को स्वाक्यर कट लगाता है। विकेटकीपर सूने ग्ल्बस् को अपनी पेट की ओर खींचता है। दोनों पैर हवा में हैं और निगाहें घास पर फिसलती गेंद पर जो सीमा रेखा के बाहर जा रही है - चार रन।

इस तरह, बल्ले का संपर्क छूटते ही गेंद मैदान पकड़ती और एक पर एक क्लासिकल किताबी चौका लगता जाता। `अमित का ऑफ साइड बहुत मजबूत है` अहाते से सनग्लासेज लगाए आती-जाती लड़कियां मुस्कान फेंकती है और मुलायम ताली बजाती हैं जिससे ताली की आवाज नहीं आती लेकिन वो उत्साहवर्धन और `बेटा तू लिस्ट में है` का भ्रम देती है। प्रत्युत्तर में बल्लेबाज भी पसीना पोंछने के बहाने हेलमेट उतारता है और मुस्कान बिखेरता है। मैदान के सारे क्षेत्ररक्षक पलटकर गैलरी की तरफ देखते हैं और ओवरकांफिडेट होकर अपना कॉलर चढ़ाते हुए अगली गेंद पर जान की जानी लगा देने वाली फििल्डंग का जज्बा लिए बल्लेबाज की तरफ बढ़ते हैं। उधर गेंदबाज़ अजीत अगरकर की तरह अगली गेंद फेंकने के लिए अपनी सांसें बटोर रहा है। बल्लेबाज फिर हेलमेट लगाता है, बल्ला हवा में घुमाता है फिर ज़मीन पर ठोंकता है। गेंदबाज गोली की रफ्तार सा अम्पायर के पास से गुज़र...

कट टू :
2 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कैमरा कॉलेज के प्रवेश द्वारा पर के जंग लगे साइनबोर्ड को दिखाता हुआ ढ़लते सूरज को फ्रेम में लेता हुआ नीचे आता है जहां सूर्य की किरणें सीधे ज़मीन पर नहीं आ रहीं। सूरज की लाल-पीली रोशनी छितरा रही है। और उसे रोक रहे हैं जींस-कुरते में घुसते हुए कुछ छात्र जिनके हाथों में हॉकी स्टिक हैं। शोर-शराबे के साथ गालियां देते हुए वो अंदर आते हैं। वो उस प्रोफेसर का समर्थन कर रहे हैं जिन्हें कल कॉलेज से निकाला जा रहा है। उन छात्रों में वो लड़का भी है जिस पर निहायत ही पढ़ाकू होने का मुहर भी लगा है।

कट टू :
3 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

कैमरा फिर 180 डिग्री घुमता हुआ जमीन से गर्द उठता दिखाता है। कुछ मोटरसाइकल सवार तेज़ गति से आते हुए अपनी बाइक बीच पिच पर रोकते हैं। ब्रेक की खतरनाक आवा़जें आती हैं। सभी खिलाड़ी सहमते हैं। पहले गाली-गलौज और फिर मार-पीट होती है। जिस कोच के देखरेख में खेल हो रहा है उसकी लक्षित पिटाई भी होती है। मामला प्रिंसीपल रूम तक जाता है। कॉलेज प्रशासन स्थिति गंभीर भांप कर फोन घुमाता है।

कट टू :
4 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान

एक के बाद एक पुलिस की कई गाड़ियां सायरन बजाती कैम्पस में दाखिल होती है। छात्रों और पुलिस में घमासान मच जाता है। हवा में कई हाथ उठते हैं जो तोड़ दिए जाते हैं। पिच की दरार खून से भर जाती है और अचानक स्पीनरर्स से तेज गति के गेंदबाज लायक बनती जाती है...

कट टू :
5 अंदर/दिन/यूनिवर्सिटी-कांफ्रेंस रूम
(कांफ्रेस रूम का लांग शॉट)

वाइस प्रिंसिपल : आप पर आरोप है कि आपने कक्षा में कुछ ऐसी बातें बताई जो पाठ्यक्रम में नहीं है, जिससे अनुशासन हनन होता है एवं राज्य की राजनीति प्रभावित होती है। आप इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि इस राज्य में पहले से ही प्रजातंत्र है फिर ऐसी बातें पढ़ाने का क्या औचित्य है?

(प्रोफेसर के चेहरे का क्लोज शॉट वो दार्शनिक बने हुए हॉल का आकाश देख रहा है)

कट टू :
/फ्लैशबैक/

6 अंदर/दिन/स्कूल ...

सटाक्!

(कच्चे हरे बांस लचकती हुई बेहद पतली छड़ी एक के बाद उसके पैर पर बरसती है और निशान छोड़ते हुए उठती है)

आग लगाएगा ?

सटाक्...

(क्लासरूम में सन्नाटा)

हरामजादे... भड़काएगा?

सटाक्...

(सभी विद्यार्थी अवाक्)

बोल... (मारता है) बोल ना (मारता है) (फिर मारता है)

लड़का तमतमा जाता है, झुक कर पैरों पर लगे चोट को सहलना चाहता है। उस का विश्वास है कि अगर वह एक बार उस चोट खाए हुए जगह को सहला लेगा तो उसका दर्द कम हो जाएगा और वह मास्टर की ज्यादा छड़िया खा सकेगा।

सटाक्...

/फ्लैशबैक खत्म/

प्रोफेसर एक नज़र छात्रों को देखकर हड़बड़ा कर निकल जाता है।

कट टू :
7 अंदर /रात/चलती ट्रेन का दृश्य

(प्रोफेसर अपनी डायरी लिख रहा है)

``बरसों से यह प्रोफेसर आग लगा रहा है कई चीज़ों के खिलाफ। कॉलेज भी सोच रहा होगा कि मेरे जाते ही मामला ठंडा पड़ जाएगा पर नहीं विरासत ऐसे ही छोड़ी जाती है। विद्यार्थियों को एक संबल को मिल ही गया जो आगे जीवन में काम आएगा। यह आग धूप में जलती दियासलाई जैसी जरूर है जो बुझने का भ्रम देती है लेकिन जलती रहती है....``

Thursday, September 10, 2009

सायलेंस..... एक्शन



"ऐसा क्यों होता है कि कभी मन कुछ नहीं करने का करता है, जिस चीज़ का इंतज़ार बरसों के करते रहते है वो मिल जाने पर उतनी ख़ुशी नहीं रहती?.. ऐसा क्यों होता है की कभी- कभी हर चीज़ से उब जाते है हम... बेवज़ह की थकन क्यों रहती है... मन बहलाने घर से निकलो तो क्यों सर दर्द वापस लिए लौटते हैं... क्यों ऐसा होता है की कोई कितना भी उकसाए उठकर चलने का हौसला नहीं होता... क्यों लगता है कभी-कभी की जो है वो बीता जा रहा है और उसका मुझे कोई मलाल नहीं है,"
... अंजू यह दार्शनिकता भरी बात शून्य में निर्विकार, अपलक देखते कहती है... "तुमने कभी किसी को बर्बाद होते देखा है ? मैं खामोश हूँ...

"जानते हो! मैं जिंदगी में अच्छा कर सकती थी पर एक मोड़ पर मैंने ऐसा महसूस किया जितना बेहतर मैं बर्बाद हो सकती हूँ शायद बन नहीं सकती... तुम जिंदगी के ऐसे ही मोड़ पर मिले; जहाँ मैंने तुम्हारा साथ सिर्फ इसलिए पड़का क्योंकि तुम बिछड़ने वालों के कतार में सबसे अव्वल नज़र आते हो..."

" बह जाने दो ना यह दुनिया, भाड़ में जाए, एक पल में यह झंझट ख़तम... जिसे यह इत्मीनान हो, जो अपने सारे चीजों से संतोष कर ले, फिर भी बेबस ना हो इस स्थिति को को क्या कहते हैं सागर ? कभी समझा है की इस छोटे से गुल्लक को जितनी जतन से धीरे-धीरे हम भरते हैं, कभी कितना विच्छिन्न होकर तोड़ देते हैं..."

कंधे पर सर रख्खे अंजू मुझसे कहती है... बाल, तेल से तर हैं... और मालिश के बाइस मांग का पता नहीं चल रहा... कॉटन के कुरते की ३ बटन खुली हुई है. सुनहला रंग का लोकेट जो पानी से मुसलसल भीगने के बाइस धूसर हो चली है गले में कुरते के बाहर झूल रही है... यदा-कदा अपना सर उठा कर फिर से वो सर मेरे कंधे पर रख देती है, इससे लोकेट के झूलने की रफ्तार बढ़ जाती है, जिसमें मेरे बचपन का फोटो लगा है, जो मुझे उस वक़्त झूला झूलने का आभाष देता है... जिसके सहारे मैं वहां से सरकता हुआ अपने बचपन में चला जाता हूँ... अकेले झूला झूलने वाले दिनों में... ... वो बात का रुख पलटती है... या शायद जोड़ती है ...
"बचपन में, नहीं बचपन में नहीं आज तक... जब में पानी में अपनी बनायीं हुई जहाज़ डालती हूँ तो वो ज्यादा देर नहीं तैर पाता... उसकी बुनियाद में कोई खोट है मुझे ऐसा नहीं लगता लेकिन वो पलट जाती है... तुम्हें पाता नहीं है अपने जहाज़ को संतोष से डूबता देखने सा सुख... उस वक़्त लगता है जैसे यह जहाज सिर्फ एक लाश हो और मेरे बदन को ढो कर ले जा रहा हो... और में पूरे होशो-हवास में ऐसा होने देर रही हूँ... शायद उस पार कोई ठौर हो जो शाश्वत हो... "

झूले की गति धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है, लेकिन वो अपने पूरे रौ में बहे जा रही है... उसके बालों में लगा तेल मेरे कुरते को दागदार कर चुका है... साथ ही एक अदृश्य लेकिन सूनी पगडण्डी पर अनुसाशित आंसू निर्विकार बहे जा रहे हैं जहाँ न कोई आवेग है, ना किसी बात की खीझ, किसी बात का ग़म नहीं... मेरा सीना उस तेल से दागदार हो गया है, साथ ही, उसके आंसू मिलकर एक जुदा सी महक बिखेर रही है... वह उस वक़्त वैसे ही बोल रही है जैसे किसी महात्मा को बरसों की तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो... या फिर उस प्रेमी की तरह जिसे यह अहसास हो गया हो कि मैं इस लड़की के साथ ज़ुल्म कर रहा हूँ, यह मेरे बिना ज्यादा खुश रहेगी... इसकी दुनिया कहीं और है लेकिन बस किसी वादे को पूरा करने के लिए यह मेरे साथ बनी हुई है...

सूरज अपना सोना पिघलाकर अँधेरे कि ओट में जा चुका है... वो सिमट कर मेरे और करीब आना चाहती है... लेकिन मेरा शरीर बीच में आड़े जाता है... वो कहती है-

"मैं एक आत्मा हूँ, तुम भी बन जाओ; मैं तुमसे आज तक नहीं मिली... पर मिलना चाहती हूँ... तुमसे... तुमसे... सागर, तुम समझते हो ना तुमसे मिलने का अर्थ क्या हो सकता है... चलो वहां मिलते है आज रात जहाँ शरीर बाधक नहीं बनता हो...

मैं उसके सर पर हौले से थपकियाँ देता हूँ वह मेरे कंधे से सर उठाती है फिर बुरी तरह से फट पड़ती है... नारियल के पत्ते जो बराबर दूरी पर जो ब्लेड से कतरे हुए लगते हैं.. उनसे चाँद झांक रहा है... एक शीतल पवन छू कर गुज़रती है... वो पत्तों का झुंड एक साथ टकराता है... बारिश जैसी आवाज़ आती है उससे... मेरा पसीना टपकता है... उजले बादल आकाश के एक कोने से उठने लगते हैं... मैं सोच रहा हूँ...

... उफ़! कितना कुछ घटता रहता है एक साथ... सायलेंस... एक्शन!

Friends

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