Friday, November 27, 2009

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सांसों के फनगट में, दुनिया के जमघट में, ये कौन सा राग-विहाग है। दो है चार है, साला चमाड़ है। उमड़ता जज्बात है, उगलता आग है। कैसा पक्षपात है! उमड़ता है, घुमड़ता है, बरसता है, और तौबा फिर भी यही ग़म के बैठा है कि साला ठीक से नहीं बरसा। वरना ये कील कहां चुभता रहता! कुछो बाकी रह गया है। दिन है तो रातो होगा, दु सौ सवालो होगा। ये जो रस्ता है, पता नहीं कैसा बस्ता है, सब कुछ कूल है फिर भी शुल है, जीवन है कि भूल है। सांसा आधा अंदर है उफनता समंदर है। भुल है, भुलैया है, जिंदगी की गलियां है। वक्त का पहिया है, बेलौस बहैया है। भेड़ बनाकर हांकता है। कमीने मुंह किसका ताकता है। भगाने पर भी नहीं भागता है। क्या कोई कपड़े रखवा लिया है ! देखो तो कैसा आग है। अबे आग है कि झाग है। जिलेबी रस्ता है, मीठा है, छोटा है। इन सब को ढ़ोता है। अयाल है-ख्याल है फैला जंजाल है, बोलना बवाल है तो जीना मुहाल है, चंद सवाल है पर कितना बदहाल है ! होता भी हूं, रोता भी हूं, करता भी हूं, मरता भी हूं। आदत नहीं बनती, सांस नहीं थमती। बिचार है कि सदी के गर्म कपड़े जैसा दोपहर में यहां-वहां उतारा हुआ है ! सबके साथ दिन काटा जा सकता है। पर क्या इसे ही चाटा जा सकता है र्षोर्षो न कमर न करम सोझ है पता नहीं कितना बोझ है। सूझ है तो बूझ नहीं फेर ऐतने वाइस वरसा। दिमाग अनुमानी है। दिल अभिमानी है। खाका मिथ्याभिमानी है। बात तो वही पुरानी है। दर्द में कसम है वैसने ठसक है, न पुराना होता चमक है, मर रहा ललक है। छोटी-छोटी सांसे हैं। बीती बातें हैं। बाहर कितना धुंध है, अंदर कितना भीड़ है। साला पूरा मामला गंभीर है। ऊहा है, पोह भी, पांव पसारे मोह भी। निरा निपट है, छल है, कपट है। मार दो का शोर है, गीला काहे आंख का कोर है ! जीवन क्या है ! चूक है, भूख है ! फिर भी पूरा परिदृश्य मूक है। मन हैरान है ! कैसा विधान है, फैला सामान है, कभी तेज़ जुबान है, तो कभी चुप रहना ही ज्ञान है। कैसी तो बस्ती है, कुछ की मस्ती है, गरीबों की पस्ती है, खानापरस्ती है, जूझते लोगों की हालत खस्ती है, खुद हमारा जीवन क्या नहीं सस्ती है। चोट हरा है अभी मुंह झांपे पड़ा है। दायरा कितना सिमटा है, चुनाव है कि चिमटा है। शाम का बेरा है, मदिरा का फेरा है। उलझन कितना घेरा है! वही सवेरा है। कैसी बीमारी है, न मरने की तैयारी है, मन क्यों भारी है, अवसाद तारी है, जांच करवाओ क्या महामारी है ! उलझनों से जीना है, चक मारता सीना है, मुंह बाए आगे कई महीना है, बदन में कहां ज़ीना है ! माथे पर पसीना है, छुपा हुआ नगीना है। खेत से किसी ने गाय को हड़का दिया है। सागर-ओ-मीना पीकर लुढ़का दिया है।

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