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Showing posts from January, 2010

बुखार के दिन

बुखार के यही दिन थे।
उस पल दोनों कमज़ोर हो गए थे। भूल गए थे अपने होने के पीछे का वजूद। अपनी निम्नवर्गीय परिवार पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर रवि का भाईयों में सबसे बड़ा होना और उधर हुस्ना पर मर्यादा की मार। तुर्रा ये दोनों एक परिपक्व प्रेम के बारे में साहित्य में पढ़ रहे थे। होनहार थे तो जाहिर है पढ़कर सिहरते भी और रोते भी। लेकिन उस वक्त शायद एक रंग में रंग गए थे। एक के ख्याल दूसरे को अपने लगने लगे थे। यहां सोचने समझने की ऐसी परत तैयार हो गयी थी कि दोनों अलग-अलग हैं ही नहीं। बुखार से तपते रवि ने पागलों जैसे ढ़ेर सारी बातें करने के बाद हुस्ना के गले पर अपनी तपती छाप क्या छोड़ी। हुस्ना पिघलती गई। दोनों को खुद से ही प्यार होने लगा था और वो अपनी ही परछाई में छुप जाना चाहते थे। छिप जाना चाहते थे मानों ठण्ड में बारिश हुई हो और गली का कुत्ता थोड़ा सा भींग कर किसी छज्जे के बित्ते भर खोदी गई जगह में दुबक रहा हो। हुस्ना और रवि में तब फर्क करना मुश्किल हो चला था। रवि ने अपना थोड़ा सा बुखार हुस्ना को दे दिया था। उधर हुस्ना के मन में बाज़ार का गीत गूंज रहा था - आओ अच्छी तरह से कर लो प्यार, कि निकल जा…

दूसरा सिरा कहाँ है !!!

राजू और पिंकी एक नदी के मुहाने पर खड़े हैं जहां से नदी करवट लेती है मतलब कि एक बड़ी घुमावदार मोड़ लेती है। नदी अब तक अपने साथ लाई हुई सारी मिट्टी यहीं छोड़कर आगे दरिया में मिल जाती है। इस कारण यहां डेल्टा बना हुआ है।
नदी के इस फितरत को दार्शनिक अन्दाज से पिंकी निहार रही है। विशाल जलराशि गाद में गिर रही है। पानी ऐसे शोर मचा रही है मानो कोई महागाथा गा रही हो और उसके मुहाने पर खड़ी पिंकी के चेहरे पर कई भाव हैं एक ही पल में जैसे वह उफनते दरिया की हैसियत भी नाप रही है और दूसरे पल प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश भी कर रही है। सम्भव है वो इसे जीवन से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हो।
राजू आदतन पानी में बड़े-बड़े पत्थर मार रहा है। हवा तेज बह रही है। इसके कारण दोनों के बाल हवा में उड़ रहे हैं। एक दूसरे को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ रहा है। वो मौन है मगर राजू उसकी चुप्पी अपने बड़बोलेपन से बार-बार तोड़ रहा है। राजू और पिंकी एक दूसरे से दस कदम के फासले पर समानान्तर खड़े हैं.

राजू : (जोर से) तुम भी दरिया में पत्थर फेंको।
(पिंकी नहीं सुनती)
राजू : (और जोर से) पिंकी, उठाओ पत्थर
पिंकी : (जैसे महफि…

चांदी के चमचे से चटनी चटायी

स्टेज सज-धज कर तैयार है। उस पर नीली-पीली लाल गुलाबी हर रंग की लाइटें पड़ रहीं हैं। प्रोग्राम शुरू होता है, एंकर अजीब सी शक्लो सूरत लिए और विचित्र सा पहनावा लिए अवतरित होता है। अपने आवाज़ में जोश भरने की कोिशश करते हुए वो गायकों से परिचय करवाता है। सामने न्यायाधीश बैठे हुए हैं हर गुरू के अपने चेले-चपाटी हैं। चेला आता है जी भर चिल्लाता है अर्थात् गाता है सभी गुरू सिरियस मूड में बैठे हैं जैसे अलग अलग खिड़की से उसे जांच रहे हों। चेले ने बड़े ध्यान से गाना चुना है वो जिसमें वो सबसे बेहतरीन नकल उतारता है। वो गाना जिसे सुनकर उसे घर वाले और यार दोस्त डिट्टो ओरिजनल गायक जैसा बताते हैं। चेला अंतिम सांस तक अपना बेस्ट देता है बीच-बीच में लड़कियों को प्रोपोज भी कर देता है और शुभचिंतकों को सांत्वना देता रहता है। पब्लिक मदहोश है वो हाथ हिलाते रहते हैं, चिल्लाते हैं, उन्होंने आज से पहले वैसा गाना नहीं सुना था ये भरम हर गाने पर होता है... चेला यह जान गया है कि वो जमाना गया जब शो जीतने के लिए क्लासिकल गाना पड़ता था जो जितना धा-धा- धिन्ना और मन्ना डे की तरह लागा चुनरी में दाग गा सकेगा वो विजेता होगा। गु…