Thursday, January 28, 2010

बुखार के दिन


बुखार के यही दिन थे।

उस पल दोनों कमज़ोर हो गए थे। भूल गए थे अपने होने के पीछे का वजूद। अपनी निम्नवर्गीय परिवार पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर रवि का भाईयों में सबसे बड़ा होना और उधर हुस्ना पर मर्यादा की मार। तुर्रा ये दोनों एक परिपक्व प्रेम के बारे में साहित्य में पढ़ रहे थे। होनहार थे तो जाहिर है पढ़कर सिहरते भी और रोते भी। लेकिन उस वक्त शायद एक रंग में रंग गए थे। एक के ख्याल दूसरे को अपने लगने लगे थे। यहां सोचने समझने की ऐसी परत तैयार हो गयी थी कि दोनों अलग-अलग हैं ही नहीं। बुखार से तपते रवि ने पागलों जैसे ढ़ेर सारी बातें करने के बाद हुस्ना के गले पर अपनी तपती छाप क्या छोड़ी। हुस्ना पिघलती गई। दोनों को खुद से ही प्यार होने लगा था और वो अपनी ही परछाई में छुप जाना चाहते थे। छिप जाना चाहते थे मानों ठण्ड में बारिश हुई हो और गली का कुत्ता थोड़ा सा भींग कर किसी छज्जे के बित्ते भर खोदी गई जगह में दुबक रहा हो। हुस्ना और रवि में तब फर्क करना मुश्किल हो चला था। रवि ने अपना थोड़ा सा बुखार हुस्ना को दे दिया था। उधर हुस्ना के मन में बाज़ार का गीत गूंज रहा था - आओ अच्छी तरह से कर लो प्यार, कि निकल जाए कुछ दिल का बुखार.... कमज़ोर कहाँ, दोनों तो उस पल मजबूत हो गए थे... ज़ज्बात से हालात तक

चार साल बाद,
बुखार के यही दिन हैं।

प्रेशर कुकर में चौथी सीटी की आवाज़ सुनकर रवि तकिए से सिर उठाता है। दीवार पर की घड़ी तो चार बता रही है लेकिन उम्र तो उसी सदी में अटका हुआ है मानों हुस्ना अभी-अभी गई हो। बदन पसीने से तर है और बाल बेतरतीबी से बिखरे हैं, पसीने से माथे पर चिपक गए हैं। वह अपनी हथेली आखों के सामने कर उसे देखता है। अभी तो हुस्ना यहीं थी इसी हथेली के पोरों से मैंने महसूस किया है उसको... खिड़की से धूप वापस जा रही है। रोशनदान से गर्द की एक लम्बी परत फर्श को छू रही है जिसमें कई धूलकण हैं। रवि का हर कण के साथ एक रिश्ता लगता है। सबकी अपनी कहानी है... पांचवी सीटी लगते ही वह हिम्मत करके उठने की कोशिश करता है। कमर तो जैसे टूट ही चुकी है और कमजोरी ने सिरिंज लगाकर जिस्म से जैसे सारा खून निकाल लिया है। चौकी से उतरते ही पैर गिलास में लगता है और उसमें पड़ा दूध ज़मीन से बातें करने लगता है। अगला पैर ब्रेड के पैकेट में लगता है। किसी तरह दरवाज़े का सहारा लेते हुए वह किचन तक जाता है। गैस बन्द करते हुए उसका अन्देशा सही होता है। चुल्हे से उतारकर वह कुकर पर दो मग पानी डालता है फिर ढ़क्कन उतारकर देखता है खिचड़ी तो जल चुकी है।

खिचड़ी का ही दिन था, यानि शनिवार । तब भी खिचड़ी जली थी पर उनमें स्वाद था, आज भी जली है पर इसमें हुस्ना नहीं है। खाली पेट रवि दो ग्लास ठण्डा पानी पीता है। उसका हांफना कम होता है। दो मिनट पेट में कचोट सी उठती है। उसे लगता है कि हर चीज होकर रहेगी नियम से बस मेरी जिन्दगी में वो नहीं होगा। सबकुछ से ऊबा हुआ रवि वापस बिस्तर पर चला जाता है। अभी कुछ देर में सांझ भी हो जाएगी।

बुखार के यही दिन हैं।
*(विशेष आभार : पूजा उपाध्याय)

Friday, January 22, 2010

दूसरा सिरा कहाँ है !!!


राजू और पिंकी एक नदी के मुहाने पर खड़े हैं जहां से नदी करवट लेती है मतलब कि एक बड़ी घुमावदार मोड़ लेती है। नदी अब तक अपने साथ लाई हुई सारी मिट्टी यहीं छोड़कर आगे दरिया में मिल जाती है। इस कारण यहां डेल्टा बना हुआ है।

नदी के इस फितरत को दार्शनिक अन्दाज से पिंकी निहार रही है। विशाल जलराशि गाद में गिर रही है। पानी ऐसे शोर मचा रही है मानो कोई महागाथा गा रही हो और उसके मुहाने पर खड़ी पिंकी के चेहरे पर कई भाव हैं एक ही पल में जैसे वह उफनते दरिया की हैसियत भी नाप रही है और दूसरे पल प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश भी कर रही है। सम्भव है वो इसे जीवन से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हो।

राजू आदतन पानी में बड़े-बड़े पत्थर मार रहा है। हवा तेज बह रही है। इसके कारण दोनों के बाल हवा में उड़ रहे हैं। एक दूसरे को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ रहा है। वो मौन है मगर राजू उसकी चुप्पी अपने बड़बोलेपन से बार-बार तोड़ रहा है। राजू और पिंकी एक दूसरे से दस कदम के फासले पर समानान्तर खड़े हैं.


राजू : (जोर से) तुम भी दरिया में पत्थर फेंको।

(पिंकी नहीं सुनती)

राजू : (और जोर से) पिंकी, उठाओ पत्थर

पिंकी : (जैसे महफिल में किसी ने खलल डाला हो) मैं बेकार की बात नहीं सुनती।

राजू : (ताना मारते हुए) अच्छा तो फिर सोचती रहो खड़ी-खड़ी कविता के लिए कोई नया मैटर

(पिंकी कोई जवाब नहीं देती)

पृश्ठभूमि में दरिया का शोर बढ़ता है। मैं पत्थरों के बड़े-बड़े टूकड़ों पर कूद रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे पैरों के निशान उस पर कूदने से सुनाई दें लेकिन आवाज़ नहीं आते। हवा हूम-हूम कर रही है और नदी लगता है जैसे उसके साथ डूऐट गा रही हो।

(थोड़ी देर बाद)

राजू नदी की ओर पैर करके एक पत्थर पर लेटा है। पिंकी के बारे में सोच रहा है कि इसका कुछ नहीं हो सकता। लड़कियां इतनी सोचती क्यों हैं और सोच कर यह क्या कर लेगी फिर घर जाएगी, पढ़ेगी-लिखेगी और खाना पकाएगी...

"राजू ये नदी हमें खुद पार करनी पड़ेगी"!

पहले राजू को लगता है पिंकी उसके ख्यालों में बोल रही है

पिंकी : (चीख कर) हमें ये नदी खुद पार करनी पड़ेगी

राजू डर कर उठ बैठता है

राजू : तो फिर इतनी विशाल जलराशि .. ये जो है... ये किसलिए है

(राजू लगातार बोलता जाता है )

क्या है इसका औचित्य, क्यों है ये, ये नहीं होती तो कितना अच्छा था, ये शोर नहीं होता, सुनो! देखो! कितना परेशान किए हुए है ये हमें बात नहीं करने देती हमारे बीच व्यावधान उत्पन्न करती है। कोई काम नहीं करने देती। उल्टे जब हम किसी बड़े मिशन के लिए तैयार होते हैं तो न साथ देती है न चुप रहती है सिर्फ समस्याएं पैदा करती हैं। क्यों है ये, क्यों है ये आखिर हमारे बीच

पिंकी : ये भीड़ है। बहुत समझदार होती है यह। कुचल कर चलना जानती है और अगर सफल हुए तो माथे पर बिठाना भी। इस बीच यह सिर्फ बोलती है, मुश्किलें खड़ी करती है। यह तुम्हारे साथ रहती दिखती है... जब तक तुम्हारे साथ खतरा ना हो, खरते का अंदेशा होते ही यह ...

(पिंकी का ध्यान टूटता है)

राजू देखो उस पार कितनी शांति है।

...राजू और पिंकी स्वर्ग को अपनी आंखों से देखने लगते हैं।

Friday, January 8, 2010

चांदी के चमचे से चटनी चटायी

स्टेज सज-धज कर तैयार है। उस पर नीली-पीली लाल गुलाबी हर रंग की लाइटें पड़ रहीं हैं। प्रोग्राम शुरू होता है, एंकर अजीब सी शक्लो सूरत लिए और विचित्र सा पहनावा लिए अवतरित होता है। अपने आवाज़ में जोश भरने की कोिशश करते हुए वो गायकों से परिचय करवाता है। सामने न्यायाधीश बैठे हुए हैं हर गुरू के अपने चेले-चपाटी हैं। चेला आता है जी भर चिल्लाता है अर्थात् गाता है सभी गुरू सिरियस मूड में बैठे हैं जैसे अलग अलग खिड़की से उसे जांच रहे हों। चेले ने बड़े ध्यान से गाना चुना है वो जिसमें वो सबसे बेहतरीन नकल उतारता है। वो गाना जिसे सुनकर उसे घर वाले और यार दोस्त डिट्टो ओरिजनल गायक जैसा बताते हैं। चेला अंतिम सांस तक अपना बेस्ट देता है बीच-बीच में लड़कियों को प्रोपोज भी कर देता है और शुभचिंतकों को सांत्वना देता रहता है। पब्लिक मदहोश है वो हाथ हिलाते रहते हैं, चिल्लाते हैं, उन्होंने आज से पहले वैसा गाना नहीं सुना था ये भरम हर गाने पर होता है... चेला यह जान गया है कि वो जमाना गया जब शो जीतने के लिए क्लासिकल गाना पड़ता था जो जितना धा-धा- धिन्ना और मन्ना डे की तरह लागा चुनरी में दाग गा सकेगा वो विजेता होगा। गुरू भी बदल गए हैं जो जानते हैं गाना मतलब हुंकार मारना, ऐसा गाना जो आप कान बंद कर लें फिर भी वो चीख आपके कलेजे को हिला दे इससे इसलिए वो आतिफ और के के तक के बेहतरीन कलेक्शन पर हाथ आजमाते हैं।

लम्बी तान से उनकी तन्द्रा टूटती है। एंकर प्रगट होता है। तारीफ के हवाई पुल बांधता है। गायक विनम्र बनता है। गुरू खड़े होते हैं हर बार। गायक पैर छूता है। आखों में आंसू आते हैं। कैमरा वाले उसे क्लोज शॉट में कवर करते हैं। दशZक शो से और जुड़ जाते हैं। उन्हें अपने पर शंका होती है अच्छा तो नहीं गाया था लेकिन गुरू ने सर पर हाथ रखा है तो एस एम एस करना ही होगा। एंकर चिल्लाता है- एस एम एस करने का टाइम शुरू होता है अब। धमाकेदार बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ कैमरा लांग शॉट से क्लोज होता है सबके मोबाइल पर पब्लिक को एस एम एस करते हुए कवर करता है। आपके दिल में एक साथ जोश और हूक उठती है। आप तड़ाके से मोबाइल उठाते हैं। छक के 5 मैसेज दाग देते हैं। आपको चैन आना शुरू हो गया है। फिर 15 मिनट विज्ञापन आता है। आप उठ कर टॉयलेट जाते हैं। प्रेशर धीरे-धीरे कम होता है। आप भी अनायास गुनगुनाते लगते हैं। आपको भी अपने अंदर संभावना नज़र आने लगती है।

विज्ञापन खत्म होता है।

एंकर प्रगट होता है। स्टेज चमचमा रहा होता है, इसे देखकर आप कतई नहीं जान सकते कि भारत में कोई स्लम भी है। अलबत्ता बीच बीच में किसी चेले का संघशZ की कहानी इस तरह दिखाई जाएगी कि आप महसूस करेंगे कि अब इससे बड़ा दु:ख कोई और नहीं हो सकता। इधर आपके आंखों में आंसू आएंगे उधर विज्ञापनों का रेट बढ़ेगा।


आपका ध्यान फिर टूटता है किससे? एक सिलेब्रटी के आवाज़ से जो समंदर किनारे चलते हुए लम्बी - लम्बी हांक रहा होता है।

कैमरा वापस स्टेज की ओर रूख करता है।

एंकर फिर से चिल्लाता है। अबकी चेली की बारी है। चेली भी समझदार हो चुकी है वो जानती है कि प्रेम भरे समर्पित गीत गाने से काम नहीं बनता। एस एम एस पाने हैं तो कोई कामुक गीत उठाना होगा। वो रिंग - रिंग - रिंगा चुनती है। आततायी साज बजते हैं, चेली को साथ में कमर का ठुमका भी लगाना होता है। वक्त के साथ गायकों का कार्यक्षेत्र भी बढ़ गया है। ठुमरे के बीच हाय-उफ मार डाला से आप मदहोश हो जाते हैं। चेली इस वक्त चाहती है उसकी आवाज़ इस समय बिल्कुल ईला अरूण या सपना अवस्थी जैसी हो जाए। गीत खत्म होता है। जनता गश खाकर गिर पड़ते हैं। गुरू खड़ा होता है। चेली पैर छूती है। आंखें में आंसू आते हैं।

आप एस एम एस करते हैं।

एंकर चिल्लाता है - हालात कुछ ऐसे बने हैं कि दोनों टीमों से नंबर बराबर हो गए हैं। अब दोनों टीमों के गुरू भिड़ेंगे।

काला चश्मा लगाए मीका उठते हैं। जनता सुख से सराबोर हो जाती है। मीका रैप गाते हैं। फ्यूजन गाते हैं, गाने को मिक्स करके गाते हैं। आप हैरान हो जाते हैं कितनी प्रतिभा। वाह। वो अंत में आपको जो बोले सो निहाल का मंत्र सुनाकर यह बताना नहीं भूलते कि आप पंजाबी हो और सिंह इज किंग। यहां तो मियंा आप ये बात भूल ही बैठे थे जैसे ही आपको याद आता है। आप 10 एस एम एस और करते हैं। नाजो अंदाज से मीका अपने सीट पर विराजते हैं।

एंकर चिल्लाता है - अब आपके सामने आएंगे शंकर महादेवन

शंकर शुरू करते हैं। उन्हें भावुकता का लंबा अनुभव है। पर यहां सवाल जीत का है। वो आपकी दुखती रग छेड़ते हैं। वो शास्त्रीय के साथ आधुनिक गीत गाते हैं लेकिन फिर पैंतरा बदलते हुए मैं कभी बतलाता नहीं पर अंधेर से डरता हूं मैं मां भी गाते हैं। आप स्थिर हो जाते हैं एकदम स्तब्ध। "असंभव"

शेर आखिर हुंकार भरता है। अचानक सुनो गौर से दुनिया वालों वाला गीत दहाड़ते हैं। मीका ने आपको पंजाबी होने की याद दिलाई है तो शंकर आपको हिन्दुस्तानी होना सिखाते हैं। आपको अपनी भूल का एहसास होता है। आप आप अपने स्वार्थ को झाड़ते हैं और हिन्दुस्तानी वाला चोला धारण करते हैं। आप पल में हिंदुस्तानी हो जाते हैं। अब आप अपने कंधे पर तिरंगा पाते हैं। गर्व से आपकी छाती फूल गई है। आप बिस्तर पर ही जोश में आ जाते हैं।

आपके सारे इमोशंस कवर कर लिए गए हैं। अब इनका काम खत्म होता है। आप अब तक कुल 100 एस एम एस कर अपना पैसा खर्च कर चुके है। प्रोग्राम के अंत में शंकर विजेता घोशित किए जाते हैं। वो हवा में हाथ लहराते हैं आपको लगता है आपको हाय कर रहे हों। आपके दिल पर मरहम लगता है। आप सुकून महसूस करते हैं। वो कप उठाते हैं। आप अपनी सीट पर मुस्कुराते हैं।

एंकर हंसी मिलाकर चिल्लाता है, स्टेज पर लड़ने वाले फिर से साथ हो जाते हैं। संगीत की जय होती है। चौकोर रंगीन कागजों के टूकड़े उड़ते हैं। गुब्बारे फूटते हैं। वो विदा होते हैं आप चंद खुशनुमा क्षण सहेजे दूसरा प्रोग्राम देखने के लिए चैनल बदलते हैं।

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