Tuesday, March 30, 2010

सिनेमा के कार्य-व्यापार का फ्लैशबैक





1910 में, मुम्बई में, अमेरिका-इण्डिया पिक्चर पैलेस में मैंने एक फिल्म `द लाइफ ऑफ क्राइस्ट´ (ईसा मसीह की जीवन गाथा) देखी। इसके पूर्व मैंने कई अवसरों पर अपने मित्रों और परिवार-जनों के साथ फिल्में देखी थीं, लेकिन वह दिन, क्रिसमस के दिनों का वह शनिवार, वही मेरे जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन की शुरूआत का दिन था। वो दिन ही भारत वर्ष में एक उद्योग की स्थापना का स्मृति चिन्ह है कि बड़े-छोटे सभी व्यवसाय जो आज विद्यमान हैं उसमें उसका पांचवां स्थान बन गया है और यह सब मुझ जैसे एक गरीब ब्राह्मण के द्वारा सम्भव हो पाया। ईसा मसीह के जीवन की महान घटनाओं को देखते हुए जब मैं सुध-बुध खोया हुआ ताली बजा रहा था तब मुझे विचित्र अवर्णनीय भाव की अनुभूति हुई। जब ईसा मसीह का जीवन मेरे दृश्य पटल पर तेजी से घुमड़ रहा था, उसी वक्त मैं श्रीकृष्ण भगवान और श्री रामचन्द्र भगवान् को और गोकुल एवं मैंने महसूस किया कि मेरी कल्पना पर्दे पर रूप ग्रहण कर रही है। क्या वास्तव में हो सकता है ? क्या हम भारत-पुत्र पर्दे पर भारतीय बिम्बों को कभी भी देख पाएंगे ? समूची रात इसी मानसिक उहापोह में बीती। उसके बाद के दो महीनों तक मैं बिल्कुल भी आराम से नहीं बैठा और मैंने बम्बई में दिखाई जा रही सभी फिल्मों को देखा। इसी पूरी अवधि भर मैं हरेक फिल्म की व्याख्या करने में लगातार रहा और यही सोचता रहा कि क्या यहां भी फिल्में बनाई जा सकती हैं?
भारत में इस व्यवसाय की उपयोग और इस उद्योग के महत्व पर मुझे कोई सन्देह नहीं था। लेकिन मैं यही नहीं समझ पा रहा था कि यह सब मैं कैसे हासिल करूं। सौभाग्यवश, यह बात मेरे मन में किसी गम्भीर समस्या की तरह नहीं जमी, ओर मैंने आत्मविश्वास धारण किया कि ईश्वर मेरा साथ देगा और मैं निश्चय ही सफलता प्राप्त करूंगा। मेरे आत्मविश्वास को इस बात से ज्यादा बल मिला कि मैंने तो ड्राइंग, पेंटिंग वास्तु-शिल्प, फोटोग्राफी, रंचमंच और जादू-खेल में बहुत कुछ सीख रखा है और ये सब फिल्म-निर्माण में सहायक हैं। यहां तक कि मैंने तो सोने-चान्दी के मेडल में इन कला-कौशल में जीते हैं। इन्हीं शिल्पों का आरम्भिक प्रशिक्षण मेरी फिल्म को सफलता प्रदान कर दर्शक को स्वीकार होगी। लेकिन यह सब मैं कैसे रूपाकृत करूं ?
सफलता के लिए अपने उत्साह और विश्वास के बावजूद, मुझे मालूम था कि जब तक मेरे पास कुछ-न-कुछ ठोस आकर्षक चीज नहीं होगी तब तक कोई भी मेरे लिए पूंजी का बन्दोबस्त नहीं करेगा। सो, मैंने खुद अपने पास जो कुछ था वह सब गिरवी रखा और अपना सारा प्रयास फिल्म के काम की ओर लगा दिया। अत: मैं विशाल आकाश में उड़ने लगा, और मुझे ज़रा भी होश नहीं रहा कि मैं धरती पर किस जगह गिरूंगा। मेरे दोस्तों ने तो सोचा कि मैं बावला हो गया हूं और मुझे पागलखाने में भर्ती कर दिया जाना चाहिए। मैं दीवाना था, मैं अपने संपत्ति को गिरवी रखता गया। इन छ: महीनों में मैं सिर्फ तीन घंटा प्रतिदिन ही सो सका। लगातार फिल्में देखती हुई, उनीन्दी मेरी आंखें दिमागी तनाव और निरन्तर प्रयोगकर्म के कारण, दुखने लगती थीं। अपने परिवार को सम्भालना, और फिर सम्बंधियों के लगातार तिरस्कृत होना, और इन सबके ऊपर अपनी योजना के असफल हो जाने का भय, इन सबने मिलकर मुझ पर इतना दवाब डाला कि मैं उन दिनों अंधा सा हो गया।
मेरी आंखों को कोर्निया का रोग हो गया। मैं डॉ0 प्रभाकर का अत्यन्त आभारी हूं कि उनके किए गए समयोचित इलाज ने मेरे दृश्टव्य संसार को पुन: कायम कर दिया और मैं, तीन या चार जोड़ी चश्मों के सहारे, अपनी गतिविधियों को जारी रख पाया। लेकिन सबसे बड़ी दवाई तो आशा ही थी।
`यह स्वदेशी आन्दोलनों का वक्त था और इस विषय के बाबत ढेर सारी बातें और भाषण होते रहते थे। मेरे लिए, व्यक्तिगत तौर पर, मेरी सुविधाजनक शासकीय नौकरी से इस्तीफा देने का भी यही सबब था और उसी कारण मैंने स्वतन्त्र व्यवसाय पसन्द किया था। इस अवसर पर सिनेमा के विषय पर मैंने अपने विचार दोस्तों एवं स्वदेशी आन्दोलन के नेताओं को भी बताए। लेकिन मेरे सभी दोस्तों ने, यहां तक कि पन्द्रह वर्ष पुराने दोस्तों ने भी मेरे विचारों को अव्यावहारिक बताया और वे सब मुझे पर हंसे
अन्तत: मेरा एक दोस्त जो करीब दस वर्ष से मरे साथ था और मेरे व्यवहार रूपए-पैसों के लेनदेन की ईमानदारी तथा व्यवसाय के प्रति मेरी लगन और महनत पर यकीन रखा, वो मेरे प्रस्ताव पर सहानुभूतिपूर्वक सोच-विचार करने को राजी हुआ। मैंने उसे अपनी योजना बताई और उसे भरोसा दिलाया। यह व्यक्ति पच्चीस हजार रूपयों की व्यवस्था करने की क्षमता रखता था। वास्तव में तो फ़्रांस और अन्य अमरीकी, यूरोपीय कंपनियों में लगे हुए सात करोड़ रूपयों की तुलना में ये पच्चीस हजार रूपए कुछ भी नहीं थे। मेरे स्टूडियो के लिए यह धन बिल्कुल अपर्याप्त था। बहरहाल, किसी स्वतन्त्र उद्यम के लिए पूंजी की व्यवस्था कर लेने उन कमीशन एजेंटों के इस देश में बड़ी उत्साहजनक बात थी जिनकी एकमात्र आकांक्षा केवल विदेशी माल का प्रदर्शन करना और बेचना होता था। यहां तक कि फिलम निर्माण के उपकरण के सूची-पत्रों का मंगाना तक उन्हें नहीं भाता था। काम करने के लिए सहकारिता के सिद्धान्त से किसी को कोई मतलब नहीं था। इससे मेरे उत्साह को धक्का लगता था। बहरहाल, यह निश्चय है कि यदि मैंने थोड़ी ज्यादा पूंजी हासिल करने का प्रयास किया होता तो मुझे घोर निराशा मिलती और मेरे सारे ख्यालात धरे रह जाते। मेरा यह विश्वास है कि पच्ची स हजार रूपयों की पूंजी उस आरम्भ के लिए और जनता की दिलचस्पी बनाने के लिए पर्याप्त होगी कि जिसके आधार पर मेरे विश्वास को सिद्ध किया। मैंने ठीक ही आशा की थी कि तीन या चार फिल्मों से हासिल की गई आमदनी के आधार पर मेरा स्टूडियो स्वयं विकसित हो जाएगा। बाद में, मेरा दोस्त ज्यादा बड़ी पूंजी लगाने को राजी हो जाएगा या कोई अन्य धनी आमदमी इस उन्नतिशील व्यवसाय में शामिल होने के लिए आगे बढे़गा। और आखिर में, मैंने यह भी सोचा कि आम भारतीय ऊपर उठकर मेरे काम को पूरा करने में मुझसे सहयोग करने लगेगा।
इस बात का मुझे दर्प है कि मैं अपने काम में कभी भी उतावला नहीं हूं, मैंने इसीलिए, इतनी बड़ी पूंजी इस व्यवसाय में लगाने के पूर्व, विदेश जाकर आश्वस्त होना चाहा कि मेरी कल्पना और फिल्म-निर्माण के वास्तविक काम के बीच क्या अन्तर है ? विदेश जाने के लिए मुझे बहुत थोड़े से धन की ही जरूरत थी ताकि मैं सिनेमा के उपकरण खरीद सकूं जो कि इसीलिए जरूरी था ताकि मैं पूंजी लगाने वाले अपने दोस्त को कह सकूं कि इस कला (सिनेमा) में मैं दक्ष हूं और कि अब पूंजी अलाना जोखिम भरी बात नहीं है। लेकिन वह साधारण धनराशि बहुत ज्यादा भारी ब्याज पर ही मुझे मिली और मैंने सहर्ष उस इकरारनामे पर दस्तखत कर दिए जो कि साहूकार के बहुत पक्ष में था। इस प्रकार, अत्यन्त अल्प पूंजी से मैंने इतने विशाल व्यवसाय की नींव डाली जो कि वास्तव में तो किसी चाय दुकान या नाई-दुकान के लिए भी कम थी। लेकिन, ऐसा इसीलिए हो पाया क्यों मुझमें अपने काम के प्रति बड़ा लगाव था और मुझमें बड़ा आत्मविश्वास था कि मैं निश्चय ही इस नए व्यवसाय को सारे व्यवधान के बावजूद खड़ा करके ही दम लूंगा।
फरवरी, 1912 की पहली तारीख को मैं मुम्बई से इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुआ। यह मेरी दूसरी विदेशी यात्रा थीं इसमें मुझे मेरे काम के बाबत आश्वस्त किया क्योंकि फिल्म निर्माण बाबत मेरी कल्पना और विचार उस वास्तविक फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से मेल खाते थे जो मैंने वहां देखी थी। मैंने कुछ उपकरण खरीदे और अत्यन्त मुश्किल से वहां के एक प्रख्यात् स्टूडियो को देख पाया। 10-15 दिनों के अन्दर फिल्म निर्माण के सारे प्रक्रम को देखने और कुछ फिल्मी काम को स्वयं अपने हाथ से करने के बाद मैं वापस लौट आया। विदेश से वापस लौटने के एक महीने के भीतर-भीतर मैंने अपने साहूकार मित्र की आश्वस्ति के लिए कोई 100-200 फुट लम्बी फिल्म तैयार की। यह फिल्म मैंने अपनी पत्नी और बच्चों की मदद से बनाई। लेकिन, मुझे व्यावसायिक अभिनेताओं को काम पर लाने के लिए पूंजी की बहुत सख्त जरूरत थी। एक साहूकार को मैंने इन फिल्मी टुकड़ों को दिखाकर मनवाया कि इन्हें सफलता मिल सकती है, तो वह मुझे आवश्यक धन समुचित गारंटी पर उधार देने को राजी हो गया। मैंने विज्ञापन देकर अपने शिष्यों (कलाकारों) और अन्य कर्मियों को अपने साथ किया। मैंने उन्हें खूब प्रशक्षित किया और सिर्फ छह महीनों के भीतर राजा हरिश्चन्द्र को मैंने पर्दे पर उतार दिया। इस फिल्म की महज एक प्रिंट से ही मुझे आश्चर्यजनक लाभ मिला। एकदम से इसकी दर्जन भर प्रिंट की मांग आ गई। लेकिन मुझे लगा कि एक फिल्म की आमदनी ज्यादा दिन नहीं चल सकती जैसा कि स्वदेशी आन्दोलन की गति बनी थी - और सिर्फ इसके आधार पर स्थायी आमदनी का आधार नहीं बन सकता है। इन विचारों के साथ, मैंने दूसरी फिल्म `मोहिनी भस्मासुर` बनायी। मैंने वर्षा के दो-तीन महीनों भर अपना काम बन्द रखा और 3 अक्टूबर, 1913 को अपना स्टूडियो मुम्बई से नासिक ले गया। यह कई वजह से सुविधाजनक थी। वहीं पर मैंने `मोहिनी भस्मासुर` बनाई। सौभाग्यवश इस फिल्म से भी मुझे पर्याप्त लाभ मिला। इस कारण मुझे बहुत प्रेरणा मिली। मैंने अपनी तीसरी फिल्म `सावित्री सत्यवान`का निर्माण किया । इस फिल्म ने भी प्रथम और द्वितीय फिल्मों की तरह ही सफलता पाई।
मैंने सारी आमदनी को अपने स्टूडियो को टिपटाप करने में लगाया। साथ ही साथ मुझे मेरे सम्पन्न मित्र से भी आर्थिक मदद मिलनी शुरू हो गई क्योंकि वह जब आश्वस्त हो चुका था कि मेरी फिल्म की एक अकेली प्रिंट ही बड़ी आमदनी कर सकती थी। यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि उपयुक्त तीन फिल्मों की महज एक-एक प्रिंट ने मुझे इतनी आमदनी कराई कि मैंने स्टूडियो के निर्माण में जो कर्ज लिया था वह निपट गया।
इस वक्त तक मुझे विदेशों में भी ख्याति मिल गई । भारतवर्ष में वितरण की समूची एजेंसी लेने को राजी हो गए, क्योंकि यहां के पांस-सात सौ थियेटरों, सभी में, मेरी फिल्मों की मांग बढ़ गई। अत: मैंने सोचा कि अब मुझे पच्चीस-तीस हजार रूपया लगाकर विद्युत-चलित मशीनरी खरीद लेनी चाहिए। अभी तक हाथ से खींचीं जाने वाली मशीनरी से काम चलाया जा रहा था जो कि अत्यन्त सुस्त थी। मैं एक छोटा-सा स्टूडियो भी बनाकर इस उद्योग को, कम से कम भारतवर्ष में, लाभदायक बनाया जा सकता है,क्योंकि काफी लोग अब प्रिशक्षित हो गए हैं। अत: मैं फिर विदेश गया ताकि नए उपकरण देखकर खरीद लूं, मेरे साथ फिल्में `मोहिनी भस्मासुर` और `सावित्री सत्यवान` आदि भी थी, और मैं इनके ज़रिए विदेश में अपनी भावी सफलता को परखना चाहता था। यह मेरी तीसरी विदेश यात्रा थी।
इस प्रकार मैं उस उद्यम को दो वर्ष तक चलाता रहा, और मैंने फिल्म निर्माण की विभिन्न शाखाओं में लोगों को इतना बढ़िया प्रशिक्षित कर दिया कि उनके काम को देख इंग्लैण्ड और अमरीका में उन्हें जगह मिल सकती थी। ये फिल्में जिनकी कि सिर्फ एक-एक प्रति किसी को लखपति बना सकती थी, वो केवल आठ महीनों में तैयार थीं, और वे भी महज हाथ से चलने वाली मशीनों के द्वारा, और बिन किसी उपयुक्त स्टूडियो के सहारे, और उन कारीगरों के द्वारा जो कि बिल्कुल नए और अनुभवहीन थे कि जिन्हें सिनेमा शब्द के हिज्जे लिखना भी नहीं आता था। यह बिल्कुल आश्चर्यजनक था कि इन तकनीशयनों के द्वारा निर्मित फिल्में विदेशों में संसाधनयुक्त स्टूडियो में कार्यरत निपुण विशेषज्ञों द्वारा सराही गई। अपने स्टूडियो में नियुक्त तकनीशयनों के लिए विदेशी फिल्म पत्रिका में इस टिप्पणी को देखकर कौन खुश नहीं होगा कि ----- "तकनीकी दृष्टि से ये फिल्में आश्चर्यजनक रूप से बेहतरीन हैं।"
एक नज़र:
पूरा नाम : धुण्डीराज गोविन्द फालके
जन्मदिवस : 30 अप्रैल, 1870
जन्म : नासिक से तीस किलोमीटर दूर त्रयम्बक नामक स्थान पर
प्रथम फिल्म प्रदर्शन : 21 अप्रैल, 1913 मुम्बई के आलंपिया सिनेमा में
नियमित प्रदर्शन : 3 मई, 1913 से
तत्कालीन रिकार्ड : कोरोनेशन थिएटर में लगातार तेईस दिनों तक प्रदर्शन।
1903 : भारत सरकार के पुरातत्व विभाग में ड्राफ्ट्समैन और फोटोग्राफर का पद ग्रहण।
1909 : अपना अलग छापखाना स्थापित करना।
1917 : फालके फिल्म्स का समावेश हिन्दुस्तान फिल्म कंपनी में
चार फिल्मों सहित हिन्दुस्तान फिल्म कंपनी ने 97 कथाचित्र और 26 लघुचित्र (सेंसर की रिपोर्ट के अनुसार)
अन्तिम मूकचित्र : सेतुबंध
1934 : कोल्हापुर सिनेटोन के लिए `गंगावतरण` का निर्माण
भविष्यवाणी : गंगावतरण मेरा अन्तिम चित्र हो सकता है...
और भविष्यवाणी सच : 16 फरवरी, 1944.

(नवयुग के फरवरी, 1918 के अंक में फालके ने सिनेमा के कार्य व्यापार को समझाने के लिए लेखमाला लिखी थी,जिसमें उन्होंने सिनेमा की तरफ अपने आकर्षण और बाद में पेश आने वाली परिस्थितियों का जिक्र किया है)


Friday, March 26, 2010

तुम आये



अरे, क्यों रूठे हो ? क्या हुआ ? चलो हंस दो. अच्छा चलो मुस्कुरा ही दो. गुदगुदी लगाऊ क्या ? देखो ! पेड़ की छालों से उसका चोकलेटी रंग कैसे उतर रहा है तुम्हारे लिए. तुम जब नहीं थे मेरे आसपास तुम्हारी याद छत पर पसारे हुए रंगीन कपड़ों की तरह उडती थी. अच्छा! मैं तुम्हारे लिए नृत्य कि कुछ मुद्राएँ बनाती हूँ.? कुछ और उपाय करूँ. एक अनजान सुने धरती के आखिरी कोने तक दौड के बादल पुकार दूँ ? या आनंदातिरेक होकर थिरकते हुए अपने एडियों से बात कर लूँ ? तुम्हारी कुछ अदाओं की नक़ल करूँ ? अपने चेहरे की जमीं सर्द मत करो, कहो तो हथेली रगड कर तुम्हारे मसामों पर रख दूँ... बची हुई गर्मी इन वादियों में घोल देना, धूप का पीलापन मैं इन बादल से घिरी फिजाओं में भी घोलना चाहती हूँ... हाथ रखो ना मेरे सीने पर... तुम्हें पता चलेगा कि दिल कि मानचित्र पर धडकनें चारो दिशाओं के उच्चतम बिंदुओं पर जा पहुचे हैं... ना-ना, वहाँ हाथ मत रखना तब आखिर में गिर पड़ेंगी वहाँ से... वहाँ से नीचे बड़ी गहरी खाई है... और इतने ऊंचाई पर बड़े दिनों बाद पहुंची हूँ... डर है, कहीं ऑक्सीजन की कमी ना हो जाये... हाय ! मुझे तो अपने कपड़ों का भी होश ना रहा...

क्या कहते हो, अपनी नीली घूँघट काढ लूँ ? तुम्हारे मान सिर पर बिठाये मैं कहाँ कहाँ दौड लगाऊ.. बहुत हिम्मत करके एक बात कहती हूँ मुझे पकड़ कर चूम ही लो अब तभी मैं शायद संयत हो सकूँ... या खुदा ! मुहब्बत आया है मेरा या तुम खुद उतर आये हो उसका रूप धर कर. मदहोशी कि रो में मेरा दिल तानाशाह तो नहीं हो रहा ... कहीं मैं तुम्हें शुकराना अदा करते-करते अपने आँचल से चाभियों कि तरह बाँध कर आँगन आँगन ना फिरने लगूं... अगर इस वक्त कोई निर्देशक मुझे देखे तो इसे शायद सदी से सर्वश्रेठ भाव-भंगिमा करार दे.. मेरी पलकों पर तुम्हारे आमद कि खबर ऐसी लिपटी है कि पोर मुलायम हो उठी है.

मुझे आवाज़ लगाओ ना दुनिया! मैं पीछे पलट कर तुम्हें ठुकराना चाहती हूँ... यह ख्वाहिश भी जोड़ती हूँ कि तुम कहना दीवानी थी, चली गयी देखो, मुझे रुसवा ना करना. ठीक है ?

ऐ क्षितिज ! तू अब अपने लाल पर्दें गिरा दे... मैं इन अँधेरे कि रौशनी के आगोश में ज़ज्ब होना चाहती हूँ... अपने श्रृंगार को आजमाना चाहती हूँ... अपनी लाज को चुनौती देना चाहती हूँ... अपने प्रियतम से मिलना चाहती हूँ तो विशाल कटे सायेदार पेड़ों कि तरह झुलाओ ना अपनी बाजू प्रियतम.






{शुक्रिया शायदा जी (http://janekyon.blogspot.com/2010/03/blog-post.html) आपकी पोस्ट ने मुझे यह लिखने को प्रेरित किया. शुक्रिया PD का भी जिसने ये BUZZ किया, वरना चूक जाता}



प्रस्तुतकर्ता सागर पर Friday, March 26, 2010

Monday, March 22, 2010

मनहूस लम्हा...



मैं इसे अवसाद क्यों कहूँ ... इसमें रहने कि लत लग गयी है अब और बेशर्मी से कबूलता हूँ कि अच्छा भी लग रहा है. चौथा दिन है आज, कहने को कुछ भी नहीं बच रहा है. इन सारे पलों में सिर में एक दर्द तारी रहा. जितनी पी सकता था उस हद तक पी पर नशा हावी नहीं हो सका.

मैं कहाँ गया, जा रहा हूँ या जाऊंगा अब यह सब कुछ मायने नहीं रखता. दिमाग में गुंथी हुई मेरी सारी नसें झनझनाती हुई कुछ भी तो नहीं कह रही है.

वो जो मेरे अंदर शायर था इन्हीं गलियों में खो गया है. हाथ में अब बस एक खाली गिलास बची है और देर से सरकती हुई आखिरी बूँद अपनी जीभ पर लेने को आतुर हूँ.

हाथ की लकीरें अब यहाँ से आगे नहीं दिखती. साथ निकली सारी रेखाएं मुख्तलिफ हिस्सों में अकेले-अकेले बढ़ कर तनहा खत्म हो गए.

जिन सवालों को लिए आज मैं मरने वाला हूँ वो परसों भी जिंदा रहेंगी और कल तलक तुम या तो उनका जवाब खोजते रहोगे या फिर तगाफुल ही बेहतर रास्ता होगा.

ओ री दुनिया ! तुम्हें मैं कोई रास्ता बताते नहीं जा रहा हूँ.

अपने मुताल्लिक मैंने तुम्हारा मुस्तकबिल जान लिया है. लोगों ने तो एक शब्द खोज लिया था पलायनवाद पर इसके सिवा रास्ता भी क्या था. मैं कोई बहस नहीं पैदा करना चाहता.


(गुरुदत्त के लिए...)


प्रस्तुतकर्ता सागर पर Monday, March, 22, 2010

Tuesday, March 16, 2010

Monday, March 15, 2010

चोर नज़र





घर की देहरी पर बच्चा माँ की गोद में घुसा जा रहा था...

दिन भर धूप में खेल कर लाल हो गया है बच्चा. शाम को माँ को देखते ही अचानक प्यार उमड़ पड़ा है बच्चे का. वो जानता है यहाँ शरण मिल गयी तो घर में भी मिल जायेगी और खाना भी मिल जायेगा. आसपास की औरतों से घिरी माँ ने तो दिन भर बहुत कुछ सोच रखा था की घर नहीं घुसने दूंगी, भूखा रखूंगी ... नज़ारा बिलकुल उलट था... माँ महसूस करती है भूखी तो मैं हूँ.

बच्चा माँ के साडी से बार बार उलझ जाता है. वो तो बस कलेजे में घुस जाना चाहता है... अपने पीछे दिन भर की हार-जीत को वो कोसों छोड़ आया है... माँ नाक पे गुस्सा लेकर बैठी अपनी सहेलियों को सुना रही है... सहेलियों को सांत्वना देने के लिए वो बच्चे की हर कोशिश को नाकाम कर रही है... उसका क्रोध पहले चिल्लाने में टूटता है फिर बार-बार अपने हाथ से उसे वो झटक देती है. एकबारगी बच्चे की सूरत में उसे अपना मर्द दिखाई देने लगता है... पर माँ नाम से संबोधन में उसके प्रतिकार का वेग उत्तरोत्तर कम होता जाता है.

बच्चा मर कर पनाह चाहता है... ताकि कल खेलने जा जाना पड़े, वो हार-जीत के बंधन से मुक्त हो जाये... माँ हर बार उसे खेलने के लिए तैयार कर गोद से उतरती रहती है.

सामने गौशाला में शाम की दूध का वक्त हुआ है. बछड़े की रस्सी को खोला गया, वो छलांग लगाता गाय के पास पहुंचा है. ढूध भरे हुए स्तनों में बछड़ा जोर जोर से चोट करता है. बछड़े का समर्पण उस खेलते बच्चे सा है... दोनों माँ चोट बर्दाश्त कर रही है. वात्सल्य आँखों से बह रहा है.

गाय अपने बच्चे को जीभ के चाट रही है इधर माँ अपने बच्चे को प्यार कर रही है.

मेरे दिल में एक ख्याल उमड़ आया है -

कृष्ण के बाद अर्जुन की सारी शक्ति क्षीण हो गयी थी, गीता का ज्ञान निरर्थक हो गया था........




प्रस्तुतकर्ता सागर पर Monday, March, 15, 2010

Thursday, March 11, 2010

एक दृश्य !!!!!




रवि भरपूर नींद सो कर उठा है. बीती रात वो बहुत तनाव में सोया था, ढेर सारी बातें अपने मन में लिए. उसे उम्मीद थी की आज उसे नींद नहीं आएगी... यों वो पहले एक आध फिल्म देख कर सोना चाहता था पर ऐसा हो ना सका... रात ग्यारह बजे से सुबह के दस बजे तक सोता रहा. उठते ही पिछली रात को याद किया... उफ्फ्फ्फ़ पूरे ग्यारह घंटे....

लेकिन अब एक अजीब शांति है. मन में कोई बात नहीं और किसी चीज़ को वो ना सोच काफी चुप-चुप सा अच्छा महसूस कर रहा है.

उसने फैसला किया है आज कोई काम नहीं करेगा... वो टहलने मरीन ड्राइव पर निकल जाता है.

घडी की सुइयों की आवाज़ उसे अभी भी सुनाई दे रही है. लग रहा है उसने अपनी जिंदगी को दो हिस्सों में बाँट दिया है. एक, आज का दिन जो शांत है, निर्विकार है और जिसे योगीजन परम ध्यानमग्न अवस्था का नाम देते हैं और एक भीड़-भाड़ और शोर-गुल वाली आम दिन वाली जिंदगी.

शाम होने को आई पर उसके ब्रह्मांड में एक शून्य घूम रहा है, नहीं, आज तो पछताने की भी मूड में नहीं है. वो अभी तक एकांत में ही है... लगता है यह बादल आज बरसेंगे. वो नंगे पांव पत्थरों पर चलते-चलते काफी दूर चला आया है. अंधरे में सारी धरती हिल रही है. प्रकृति का यह रूप देखकर वो विह्वल है. आज अपने चाल में उसने वो उछाल भी नहीं दी है. आहट में ना कोई अर्थ भी नहीं. मंथर चाल से बस ... चला जा रहा है.

जिंदगी का यह कोना कितना अच्छा है. ओह ! मैं इसे कोना क्यों कह रहा हूँ यहाँ तो विशालता है. आज जब इसके करीब जा रहा हूँ तो लग रहा है यह मुझे लील ही लेगा. ढेर सारे दृश्य रवि के दिमाग में आने लगे जैसे हिमालय पर संस्कृत भाषा में कोई समूह गान हो रहा हो. वह चाहता है सतयुग में चला जाये, पेड़, पौधों व नदियों को वो कोई नया संबोधन दे.

बहुत सोचकर वो धीरे से पुकारता है प्रिये !

बलखाया दरिया तमाम गुबार लिए उमड़ पड़ता है.


शोर्ट फ्रीज़ हो जाता है.

प्रस्तुतकर्ता सागर पर Thursday, March 11, 2010

Wednesday, March 3, 2010

सन्नाटे... बोलते हैं


सीने के दोनों दरवाजे खुलते हैं, वो 16 x 12 का एक कमरा होता है... लेकिन खाली. वहां कोई सेट लगा है, किनारे सीढियाँ हैं वो कहाँ तक जाती हैं, नहीं मालूम. मैं उस स्टेज पर अकेला खड़ा परफोर्म कर रहा हूँ. या तो वो बिलकुल खोखला है इतना की मुझे पलकें झपकने तक की आवाज़ सुनाई देती है और संवाद बोलने के लिए खोले गए होंठ की भी (ऐसा मेरा भ्रम है) . मुझे हमेशा लगता है की अब उस सीढ़ी से कोई उतरेगा और मेरा साथ देगा या कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा. मैं निरुद्देश्य...इस कोने से उस कोने तक घूमता हूँ.

दरअसल मैं इन दिनों एक बीमारी का शिकार हो गया हूँ. मेरा अंदेशा इतना मजबूत हो चला है की मुझे सीढियों के मध्य हर 2-3 मिनट बाद देखने की आदत हो गयी है. डॉक्टर इसे एहसास या ज़ज्बात जैसी किसी मनोविज्ञान से जोड़ देते हैं.

इसका मतलब मैं थोडा-थोडा पागल हो रहा हूँ. मेरी ऐसी आदतों के कारण मैं किसी चीज़ पर एकाग्र नहीं हो पा रहा.

मैं थोड़ी-थोड़ी देर बाद स्टेज पर टहलता हुए कुछ सोचता रहता हूँ. असल में इन दिनों मैं सिर्फ सोचता हूँ और 24 घंटे के दौरान सिर्फ सोच कर थक जाता हूँ. सोचते-सोचते मुझे गर्मी लगने लगती है. मुझे लगता है मैंने भरी गर्मी की दोपहर में भूनी हुई मछली खाई है और उसके कांटे मेरे पीठ पर उग आये हैं.

मुझे इन दिनों किसी मीठे हमसफ़र की भी जरुरत महसूस होती है जो सधी हुई भाषा बोले और मेरे पीठ पर अपने हाथ फेरे जिससे मेरे पीठ पर के सारे कांटे मुलायम हो जाएँ और मैं बिस्तर से लग कर चैन से 2 घंटे सो सकूँ. मैं उस हैरानी को महसूस करना चाहता हूँ की कांटे गायब होने पर कैसा लगता है. मुझे लगता है तब मेरा डर खत्म हो जायेगा और तब मैं एवरेस्ट से उल्टा कूद सकूंगा.

... पता नहीं यह सब सोचने के दौरान मैंने कितनी बात अँधेरे से आती सीढियों के मध्य देखा होगा!!!

बस बार-बार देख ही रहा हूँ, आ कोई नहीं रहा.

मेरी सांस पर कोई बड़ा सा पत्थर रखा है . मुझे बार-बार आकाश देखने की भी आदत हो गयी है. मेरे दिमाग में मोटी-मोटी गिरहों वाली कई गांठें हो गई हैं. ये बहुत शोर करती है और खलल डालती हैं.

मुझे लगता है मैं आत्मघाती हूँ. मुझे लगता है मौत मेरा गिरेबान पकड़ कर ...मैं अपने अंदर कोई बम लिए घूम रहा हूँ जिसके फटने का समय फिक्स कर दिया गया है लेकिन मुझे बताया नहीं गया है. ये घडी मुझे जोर-जोर बजती सुनाई देती है. हरेक टिक-टिक मुझे इतिहास में आधी रात के समय राजाओं के द्वार पर न्याय के गुहार के लिए बजाया गया घंटा लगता है. कभी भी... मेरे चीथड़े उड़ सकते हैं.

हो सकता है मैं किसी दिन आप सब के बीच से बातें करते हुए गायब हो जाऊं.

क्या मेरा तब कोई अवशेष बचेगा ?...

क्या मैं अपने अंदर समाधि नहीं ले सकता ?

सीढियों से अब भी कोई उतरने वाला है.

...

..

. पर अब तक कोई नहीं आया.

Tuesday, March 2, 2010

एग्रीमेंट


जीने के लिए वो उतनी ही जरुरी थी, जितनी असफलता ग़ालिब के जीवन में थी. हम इसे जीवन के प्रति वितृष्णा किसी कीमत पर नहीं कह सकते बल्कि यूँ कहें की यह एक जिजीविषा थी उसे चाहने की. पाने जैसी तो कोई शर्त ही नहीं थी यहाँ... आसमानी मुहब्बत थी मानो ज़ज्बाती नहीं, रूहानी लगाव था.

उसे खूब देखने का मन करता, भूख प्यास तज के देखता रहता... अगर अध्यात्म नाम का कोई रास्ता भरी जवानी में होता था तो वो भी वहीँ से होकर जाता. उसे देखने की कोई शर्त नहीं थी बस देखते रहना शर्त था... एक अलिखित समझौता, पर ट्विस्ट यह की हस्ताक्षर के बाद निब तोड़ने के बजाय संभाल कर रख ली गयी थी.

उसके आने की आहट दिमाग की सीढियों पर उतरती तो लगता किसी झील के तल में कुछ दिए जल उठे हो. वो पाँव डुबाती ना थी बस शांत पानी को छेड दिया करती वो जानती थी- झील इतने से ही असंयत हो उठता है.

वो उस हद तक खूबसूरत थी जहाँ से बस यह कमजोरी निकाली जा सकती थी की वो अद्भुत है... सलीका उसके कंधे में था, अदब पलकों में, पीठ थोड़ी सी अल्हड थी और ऊपर और नीचे के होंठ शोला और शबनम नाम से शब्दों के अर्थ लिए बंटे हुए थे. वह जो चिकनी सतह थी वो बात करने से पहले चेताती कि यहाँ से कला काला होने लगती है

यों तो उसे ज़हीन लोगों के देखने के लिए बनाया गया था पर खुदा ने नज़र की पाबंदी नहीं लगायी थी तो आवारे भी देख लिया करते. वह दूर से क़यामत थी, पास से कायनात थी, आँखें बंद करने पर कातिल थी और खोलने पर मयखाना...

उसे देखते रहने पर लगता वो स्त्री में तब्दील हो गया है और मातृत्व सुख का आनंद ले रहा है.

वो कपड़ों में लिपटी थी तो गज़ल थी, खिसकते कपड़ों में बला... जब आखिरी बार निर्वस्त्र देखा तो बदसूरत हो उठी.

अब अदृश्य समझौता-पत्र के चिथड़े हो चुके थे उधर लेखनी की निब भी जाती रही.

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