Friday, April 30, 2010

It happens only in office यार...








ज़रा कल्पना कीजिये, आप अपने दफ्तर के केबिन में बैठे हों और जीमेल पर बहुत दिनों बाद आपकी 'शोना' (कामिनी, सिर्फ आपकी शोनाएक्सक्लूसिव फॉर यू) आपको ऑनलाइन दिख जाये तो आप सब काम छोडकर चैट करने में मशगूल हो जाते हैंबातों का सिरा कुछ यूँ होता है:-
me : Hello !
(इसलिए की पिछली बार आपने स्वीटहार्ट बोलकर पंगा मोल ले लिया था और वो नाराज़ होकर लोगआउट हो गयी थीअबकी आप अच्छी छवि के साथ सामने आते हैं)

shona : (कामिनी)  : hieeeee !!!!!
(आपने मेल में भी उसका नामकरण शोना ही कर दिया है, (आप आई की मात्रलंबी देख उसके मूड का अनुमान गर्मजोशी भरा मानते हैं )
me : J
shona : J
me : kaisi ho madam ?
(आप मूड चेक करने के लिए यह लिखते हैंसम्हाऊ 'मैडमका इस्तेमाल तो इसीलिए किया गया है )

shona : achchhi hoon, tum batao
me : so how is life going ? 
(पर्सनल लाइफ में झाँकने की पहली चाल शुरू करते हुए)

shona : enjoying honeymoon in honolulu ! its amazing... 
(आप यकीन करना पड़ता है क्योंकि कल ही आपने उसके फेसबुक पर उसकी होली डे की तस्वीरें देखी हैं और उसे देख कर यह सोचा था कि साला हम यहाँ ऑफिस में .... घिस रहे हैं और तू वहाँ मस्ती कर रही है.)

me : oh great ! enjoy J 
(सच यह है कि आप थोडा दुखी होते हैं पर 'हनीमूनऔर 'होनोलूलूजैसे शब्द आपको उत्साहित करता हैकिन्तु आप अभी अपने दुःख के बारे में सोचना पसंद नहीं करतेआपके दिल की धड़कने सुरीली (क्योंकि इससे पहले यू ट्यूब पर गाने सुन रहे थे) होते हुए कामुक ख्याल बुनते हुए तेज हो जाती है )

shona :  thanx J
me : welcome, soooooo....... taking sun bath ! J 
(यही से बात खोलने की कोशिश करते हुए)

(इतने में आपके केबिन में बॉस आपको पीछे से टोकते हुए आ जाते हैं. आप अपने को ठगा हुआ महसूस करते हैंहलक सूख जाती हैऔर मूविंग चेयर होते हुए भी आप पलटने की कोशिश नहीं कर पा रहे हैंआप पूरा का पूरा जीमेल वाला पेज बंद करने कि कोशिश करते हैं पर समहाऊ वो 'टनके आवाज़ के साथ बंद होने से इनकार कर देता है. अब आपने  अपने बचाव में बस इतना किया है कि चैट वाली विंडो बंद कर दी हैपर तब तक शोना का मेसेज आने से वो विंडो लाल होकर फिर से अवतरित हो जाता हैअब आपकी धड़कने फिर से तेज हो गयी हैं.... पर इस बार खौफनाक रूप से)

आप पूरा जी मेल वाला पेज ही मिनीमाईज़ कर देते हैं

अब आपके बगल में बॉस आपसे मुखातिब हैआप भोले बनने की कोशिश करते हैंगरमागरम बातों से गुलाबी मुस्कान लिए आपका लाल चेहरा संयत होने में जरा टाइम तो लेगा ही. आप शारीरिक भाषा भी सुधारते हैं पर अफ़सोस बॉस आपको यह सब करते देख रहे हैं और उन्होंने आपको चैट करते भी देखा है.

अब आप प्रोफेशनल लुक में आ चुके हैं और सीरिअस बनते हुए बॉस से बातें करना शुरू करते हैं... पर बात इतनी सी नहीं रहती... स्क्कीन पर मिनीमाईज़ किया हुआ बॉक्स बार-बार : शोना says : लिखा हुआ (ब्लिंक करता हुआ) दिखा रहा है... बॉस भी यह देख रहे हैं... आप बॉस को उस सोच से भटकाते हुए कुछ ऑफिसियल बात करने की कोशिश करते हैं पर बॉस भी इस कारगुजारियों को सोचने में इतना मशगूल हो चुके हैं की वो जिस काम से आये थे वो भूल चुके हैं...

वो बिना कुछ कहे चले जाते हैंआप oh shit ! जैसा एक्सप्रेशन देते हुए अपने किस्मत को कोसते हैं...

अगले ही पल आपको ख्याल आता है दूसरा मौका क्यों जाने दे. इस दौरान आप पिछली बार कहाँ तक हॉट बातें छोड़ी थी वो याद करते हैं और अपने को फिर से तैयार करते हुए  आप चैट बॉक्स मैक्सिमाईज़ करते हैं

shona :    lol ! nope, just fun man!
                you tell me, whtz going on ...?
____________________________________________  7 minutes

shona  hey, kahan chale gaye ???
               off-off ! it seems that you have gone !!!
               o.k., see you, next time
               take care 
               n yes, say hieeee to vimla J
               bbye

............................. और आप इत्ता सा मुंह लेकर रह जाते हैंसब अंग्रेजी चैटिंग भूल कर गांव का एक देहाती कहावत याद आतl है जातो गंवाए भातो ना खाए” ):


* * * * *

चलते-चलते




यह पोस्ट कुश को समर्पित है. इस ब्लॉग की साज-सज्जा का जिम्मा उन्ही का है... तो यह जो ब्लॉग पर चटक-मटक देख रहे हैं ना आप... इन सब के पीछे इन्ही का हाथ है.

Thursday, April 29, 2010

कोमल...



कोमल को ओए होय होय होय होय बोलने की आदत है और मेरा शब्द जादू करते हैं कहने की. हम कह सकते हैं की यह दोनों हमारे तकिया कलाम है जो वक्त- बेवक्त हम दोनों दोहराते रहते हैं. पर बहुत फर्क है हम दोनों में. कोमल जो की मेरी बेटी है जी. वो जब ओए होय होय होय होय बोलती है तो कई भाव में बोलती है... हैरानी में, शरमा कर, जब किसी पे प्यार आये तब. वो 15 साल की हो चुकी है पर पिछले 3 साल से खुद को 12 से आगे नहीं मानने को तैयार नहीं. सही भी है क्योंकि यह बदमाशी और मासूमियत ही है जो उसे 12 का बनाये हुए है...


मैं उसकी बात थोडा कम ध्यान से सुना करता हूँ क्योंकि उस वक्त भी मैं उसे दुआएं देता रहता हूँ...

वो जब भी ओए होय होय होय होय बोलती है तो उसके होंठ गोल हो जाते हैं और मुझे बेतहाशा अपनी गर्लफ्रेंड का सिगरेट पीकर उसका धुंआ मेरे मुंह पर फैंकने का दृश्य उभर जाता है. कोमल की आँखें ऊपर की ओर चढ जाती है और वो भी गोल होकर थिरकने लगती है. फिर मुझे लगता है सारी कायनात में कंपन होने लगी है. वो यह बोलते समय हर शब्द पर रूकती है जैसे अपना बोला हुआ सुनना चाहती हो. वो कहती है जब में यह बोलूं तो वातावरण में इक्को जैसा माहौल हो जाये पर मामला यहीं तक नहीं रुकता.

पिछली बार इतनी गहराई से यह मैंने तब परखा था जब अपार्टमेंट की सीढियों के निचले पायदान पर गौरव उससे यह कह रहा था की कोमल तुम बहुत खूबसूरत हो सहसा उसके मुंह से ओए होय होय होय होय निकल पड़ा था.  वो मुझे यह बात बताने आती है. मैं दोहराता हूँ की कोमल तुम वाकई बहुत खूबसूरत हो. वो बताती है की मैं भी कोई लड़की अपने लिए देख लूँ जिससे फ्लर्ट कर सकूँ.

आज वो मुझसे अपने लिए एक पायल मांगने आई है. मैं उससे पूछता हूँ तुम्हारी आवाज़ की खनक तो ऐसे ही पूरे घर में कुछ खोजती हुई लगती है, तुम्हें पायल की क्या जरुरत ?

कोमल : (हँसते हुए) ओए होय होय होय होय

छः साल बाद

उसकी शादी की तैयारियां जोरों पर हैं. मैं और कोमल अभी भी सबकुछ ताक पर रख कर बातें करते हैं. वो संजीदा हो कर कहती है. पापा अपने हाथों की झुर्रियाँ मुझे दो.

मैं  : ओए होय होय होय होय

कोमल : पापा एक बार और बोलो ना

मैं : क्यों ?

कोमल : शब्द जादू करते हैं ना पापा. इसलिए.

*****

(एक ओए होय होय होय होय यहाँ भी है. देखिये)


Monday, April 26, 2010

समानांतर सिनेमा


            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है. युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने बिराज बहू, देवदास, सुजाता और बंदिनी जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं. दो बीघा ज़मीन को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात है.


            समानांतर सिनेमा की इस धारा को बाद में सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों में आगे बढ़ाया. सत्यजीत राय ने 1955 में अपनी पहली फिल्म बनाई पlथेर पांचाली. विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म ने सत्यजीत राय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित कर दिया. पथेर पांचाली का प्रथम प्रदर्शन हमारे देश में ना होकर न्यूयोर्क में किया गया था. बाद में इसे फ्रांस के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाया गया. फ्रांस के समीक्षक आंद्रे बाजां ने इस फिल्म पर सटीक टिपण्णी लिखी, जिसे पढकर फिल्म समारोह की जूरी ने इसे फिर से देखा और बाद में इस फिल्म को सर्वोत्तम मानवीय दस्तावेज का दर्ज़ा देकर पुरुस्कृत किया गया. बाद के वर्षों में सत्यजीत राय ने अपराजिता (1956), अपूर संसार (1959), तीन कन्या (1969), शतरंज के खिलाडी (1977) और सदगति (1980) जैसी उत्कृष्ट फिल्में बनाई. 1984 में सत्यजीत राय को सिनेमा के सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरूस्कार दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया. सिनेमा के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए 1991 में उन्हें विशेष ऑस्कर अवार्ड भी दिया गया.

            मृणाल सेन ने भुवन शोम से हिंदी सिनेमा में एक सर्वथा नयी रचना प्रक्रिया का शुभारंभ किया. भवन शोम ने समानांतर सिनेमा की धारा को एक नयी गति प्रदान की. 1956 में अपनी पहली फिल्म रात-भोर बनाने वाले मृणाल सेन की अपनी अलग पहचान बनी बैशेय श्रावन (1960) से. इसके बाद बनी आकाश कुसुम को भी उनकी उल्लेखनीय कृति माना जाता है. 1965 में मृणाल सेन भुवन शोम लेकर आये, जिसने विचारों के सिनेमा को एक नया अर्थ प्रदान किया भुवन शोम ने दर्शकों को न सिर्फ झकझोरा, बल्कि उन्हें उत्तेजित भी किया और यह सोचने पर मजबूर किया की अथाह दलदल से बाहर निकलने का रास्ता आखिर क्या है?

            मृणाल सेन के बाद मणि कॉल, बासु चटर्जी, अडूर गोपालकृष्णन, कुमार साहनी, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, अवतार कौल, गिरीश कर्नाड, प्रकाश झा और सई परांजपे जैसे संवेदनशील फिल्मकारों ने लीक से हटकर यथार्थवादी सिनेमा का निर्माण किया. इन फिल्मकारों की फिल्मों ने विचारों के संसार को एक नयी दिशा प्रदान की. जीवन से सीधे जुड़े विषयों पर विचारोत्तेजक फ़िल्में बनाकर इन फिल्मकारों ने सिनेमा के सृजन शिल्प का अनूठा प्रयोग किया. इनमें से कुछ फिल्मकार आज भी सार्थक सिनेमा की मशाल थामे आगे बढ़ रहे हैं. 

           सार्थक सिनेमा के प्रमुख हस्ताक्षर श्याम बेनेगल ने अपने फिल्म करियर की शुरुआत विज्ञापन फिल्मों से की. 1973 में उन्होंने पहली फीचर फिल्म बनाई अंकुर, गांवों में शहरी घुसपैठ के बुरे नतीजों पर आधारित यह फिल्म बेहद कामयाब रही. अंकुर ने कुल 42 पुरूस्कार जीते, जिनमें तीन राष्ट्रीय पुरस्कार ही शामिल है. इसके बाद श्याम बेनेगल ने निशांत (1975) और मंथन (1976) का निर्माण किया. मंथन को राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित किया गया. श्याम बेनेगल की मंडी, सुस्मन, कलियुग और जुनून जैसी फ़िल्में भी बेहद चर्चित रही. 

           1974 में श्याम बेनेगल के साथ जुड़े गोविन्द निहलानी ने भी बेनेगल के रास्ते पर आगे चलते हुए कई उम्दा फिल्में बनाई. निहलानी की पहली फिल्म आक्रोश (1981) आदिवासियों के जीवन पर आधारित थी. इस फिल्म को बेहद पसंद किया गया. बाद में निहलानी ने पुलिस की विवशता पर अर्ध्यसत्य, वायुसेना पर विजेता, मालिक-मजदूर संघर्ष पर आघात, नवधनाढ्य वर्ग के खोखलेपन पर पार्टी और आतंकवाद पर द्रोहकाल जैसी विचारोत्तेजक फ़िल्में बनाई.

Friday, April 23, 2010

... is not responding. Please dial after sometime



फिर से शाम होने को आई ... और उसने अब तक फोन नहीं किया.. कहीं कोई पता नहीं है. चाँद निकल आया है और मेरे पलकें झपकाते-झपकाते यकायक घना अँधेरा डबडबा कर उतर आया है. कहाँ ??? हाँ दोनों तरफ.

चांद ऐसे निकला है जैसे आकाश ने टीका लगाकर फिर मिटा दिया हो... एक मिटी और छुटी सी निशान बांकी हैं पर मैं इसी उधेड़बुन में हूँ कि उसने फोन क्यों नहीं उठाया ?

हाँ उसने फोन क्यों नहीं उठाया ? बात तो छोटी सी है मगर उसने फोन क्यों नहीं उठाया ? आखिर  सीन क्या है बॉस... उसके मन में क्या है ? वह चाहती तो यह भी कह सकती थी कि बाद में बात करती हूँ,  अभी बिजी हूँ या फिर अगर मुझसे कोई समस्या थी तो कहना चाहिए था उसको. वो अगर मुझसे बात नहीं करना चाहती थी तो उसे यह बात भी फोन उठाकर कह देनी चाहिए थी

लेकिन उसने मेरा फोन नहीं उठाया. दैटस् ईट.

उसने परसों भी मेरा फोन नहीं उठाया था. पिछले शनिवार को भी नहीं, आमवस्या को भी नहीं और एक महीने पहले एकादशी को भी नहीं.

आखिर बात क्या है ? उसने मेरा फोन क्यों नहीं उठाया ?

अह! हो सकता है वो अपने बच्चे को ढूध पिला रही हो या फिर बाज़ार में सब्जी खरीद रही हो, बाथरूम में हो या अपने पति को प्यार कर रही हो, शायद पूजा-पाठ ही कर रही हो.
पर वह  फोन उठाकर कम से कम  १० मिनट बात बात करती हूँ कह सकती थी ना

लेकिन उसने मेरा फोन नहीं उठाया...

मैं उसकी आदतों से वाकिफ हूँ, चिढ़ी हुई सी बात करती है, बात खत्म होते है फोन एकदम से काट देती है, सिर्फ काम की बातें करती है, बात करते हुए कई काम निपटती है... यह सब उसके फोन पर ही करने की आदत है.

क्या दिन भर अगर कुछ काम नहीं हो या काम न लगे, कोई ब्रेकिंग न्यूज़ जैसी खबर न हो तो हम बात नहीं कर सकते ? क्या केवल वो फैसला करेगी कि हमें कब और क्या बात करनी है ?

आखिर उसने मेरा फोन क्यों नहीं उठाया ?

मैं उससे कोई बहस तो नहीं करता, ना कर सकता हूँ, उसमें प्रबल आत्मविश्वास है, गरिमापूर्ण चेहरा है तो इसका क्या मतलब है वो मेरा फोन नहीं उठाएगी ?

वो आज फोन उठा सकती थी लेकिन नहीं उठाई.

वो एक बार कह देती मैं व्यस्त हूँ बाद में बात करती हूँ, ट्रैफिक में हूँ, सो रही हूँ. कोई बहाना ही बना देती, कौन सा पहाड टूट जाता ? क्या मैं उसे फांसी दे देता ?

लेकिन फिर भी उसने मेरा फोन नहीं उठाया, क्यों नहीं उठाया ?

अभी पता नहीं कब अपने शर्तों पर मिलेगी तो सबसे पहले मुस्कुरा कर अपने तुरुप का इक्का फेंकेंगी जिससे कि मैं कुछ ना कह सकूँ और फिर उसका मेरे पास होने भर के एहसास से मेरे सारे शिकायतें काफूर हो जाएँगी... जहां रात दिन का उठाना-बैठना मुश्किल है कैसे एक पल में कोई समस्या उसके तरफ से नहीं दिखती

वो मुझे पागल तो नहीं समझती ? क्या वो  नहीं जानती कि साइकोलोजी ऑफ वुमेन मैं बखूबी पढ़ लेता हूँ और एक बार इशारे से उसे बताया था कि औरत एक ऐसी बन्दर होती है जो पहला कमजोर डाल तब तक नहीं छोड़ती जब तक कि उसे कोई दूसरा मजबूत डाल नहीं मिल जाता... 

मेरी उससे इस बात पर कई बार बहस हो चुकी है कि अगर आदत लगाई जाये तो आपूर्ति निर्बाध रूप से होती रहनी चाहिए फिर ऐसे में मनुष्य अपने सुविधानुसार ऐसे कदम क्यों कर लेता है ?

लेकिन उसने मेरा फोन नहीं उठाया ... अब नहीं उठाया तो नहीं उठाया. फिनिश मामला. क्या कर सकते हैं ऐसे में ?

वो जानती है मैं इस समय पागल हो रहा होऊंगा. उसको पता होगा उसके फोन नहीं उठाने से मैंने घुटन हो रही होगी, मैं परेशान हो रहा होऊंगा, मेरे मन में दस तरह की नकारात्मक ख्याल आ रही होंगी,  सिर में दर्द उठ चुका होगा, मन खट्टा हो गया होगा, सिर पर अमृतांजन मल रहा होऊंगा,  तीन सिगरेट पी कर,  किताबें बिस्तर से फैंक कर तकिये में मुंह छुपा कर रो रहा होऊंगा ...

सब पता होगा स्साली को फिर भी नाटक करती है...

बात तो छोटी सी थी     

वो मेरा फोन उठा सकती थी... पर आखिर उसने मेरा फोन क्यों नहीं नहीं उठाया ?

Wednesday, April 21, 2010

सिनेमा में ध्वनि का आगमन


मूक सिनेमा के दौर में भी फिल्मों की आशातीत सफलता से उत्साहित होकर कुछ कल्पनाशील लोग सिनेमा को आवाज़ देने के प्रयासों में जुट गए थे. 1930 के आसपास सिनेमा में ध्वनि जोड़ने के प्रयास होने लगे हालाँकि तब यह एक अत्यंत महंगा सौदा था. मुंबई में आर्देशिर ईरानी की इम्पीरियल फिल्म कम्पनी और कलकत्ता में जमशेदजी मदन का मदन थियेटर्स बोलती फिल्म बनाने की कोशिश में जी-जान से जुटा था. पहली कामयाबी मिली आर्देशिर ईरानी को, जिन्होंने देश की प्रथम सवाक फिल्म आलमआरा बनायीं. 14 मार्च, 1931 को मुंबई के मैजिस्टिक सिनेमाघर में आलमआराका प्रदर्शन किया गया. मास्टर विट्ठल, जुबैदा और पृथ्वी राज कपूर इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे. निर्देशन में आर्देशिर ईरानी के सहयोगी थे रुस्तम भरुचा, पेसी करानी और मोटी गिडवानी. 1932 में ही इम्पीरियल फिल्म कम्पनी ने आलमआरा के बाद चार और सवाक फिल्मों का निर्माण किया था. उधर कलकत्ता में मदन थियेटर भी सवाक फिल्मों के प्रदर्शन में कामयाब हुआ. मदन थियेटर की जमाई षष्ठी दूसरी ऐसी सवाक फिल्म है जो आलमआरा के बाद प्रदर्शित हुई थी. 1932 में मदन थियेटर्स ने चौबीस फ़िल्में बना कर इम्पीरियल फिल्म कम्पनी को काफी पीछे छोड़ दिया.

फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद भी मूक फ़िल्में बनती रहीं, हालांकि उनकी संख्या में निरंतर गिरावट आती रहीं. सवाक फिल्मों के प्रदर्शन से ठीक पहले 1930 में कुल 130 फिल्मों का निर्माण हुआ था. 1931 में जहाँ कुल 27 सवाक फिल्में बनी, वहीँ 207 मूक फिल्मों का निर्माण भी हुआ. 1934 में सिर्फ 7 मूक फिल्मों का निर्माण हुआ और इसके बाद मूक फिल्मों का अध्याय समाप्त हो गया.

आर्देशिर ईरानी का सिनेमाई दौर:
पहली सवाक फिल्म बनाने वाले आर्देशिर ईरानी (1885-1960) पहले पुलिस में कार्यरत थे. 1905 में वे अमेरिका की यूनिवर्सल फिल्म कम्पनी की फिल्मों के भारतीय वितरक बने. 1914 में उन्होंने मुंबई में अलेक्जेंड्रा सिनेमाघर ख़रीदा और 1922 में फिल्म निर्माण में कूद पड़े. इसी साल उन्होंने अपनी पहले मूक फिल्म वीर अभिमन्यु बनायीं. अब्दुल अली के साथ मिलकर 1926 में उन्होंने मुंबई में इम्पीरियल फिल्म कम्पनी की स्थापना की और आलमआरा के निर्माण से पहले वे कुल 130 मूक फिल्मों का निर्माण कर चुके थे. जेबुन्निसा, रूबी मेयर्स, मजहर खां, याकूब खां और जाल मर्चेंट आदि कलाकार ईरानी की इम्पीरियल फिल्म कम्पनी की ही देन हैं.

फिल्मों में ध्वनि आने के बाद सवाक फिल्मों का सिलसिला चल निकला. संवाद और गीत-संगीत भारतीय सिनेमा के अनिवार्य अंग बन गए. 1932 में बनी इन्द्रसभा में 70 गाने थे. इससे साबित हो जाता है की सिनेमा में ध्वनि के आगमन को लेकर भारतीय फिल्मकार कितने उत्साहित थे. अब तक सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत  नहीं हुई थे. न्यू थियेटर्स की धूपछांव (1936) ने यह शुरुआत भी कर दी. 1936 में ही बाम्बे टॉकिज की अछूत कन्याप्रदर्शित हुई, जिसमें सरस्वती देवी का संगीत था. सरस्वती देवी को प्रथम महिला संगीतकार होने का श्रेय हासिल है. इसी दौड में कई फिल्म कंपनियां स्थापित हुई, जिनमें प्रभात, न्यू थियेटर्स, बाम्बे टॉकिज आदि महत्वपूर्ण हैं. न्यू थियेटर्स के वीरेन्द्रनाथ सरकार इंग्लैंड से इंजीनियरिंग की पढाई करके लौटे थे. कलकत्ता में आकर उन्होंने अपनी फिल्म कम्पनी शुरू की और टैगोर एवं शरत के उपन्यासों पर फ़िल्में बनायीं. प्रभात में वी. शांताराम सामाजिक संघर्ष का बिगुल बजा रहे थे तो न्यू थियेटर्स की फ़िल्में जीवन में प्यार-मुहब्बत का सन्देश दे रही थी. उधर हिमांशु राय और देविका रानी ने बाम्बे टॉकिज की नींव रखी. 1935 से 1939 में चार वर्षों में बनी बाम्बे टॉकिज की 16 फिल्मों का निर्देशन एक जर्मन नागरिक फ्रांस आस्टिन ने किया था. इस तरह, 1913 से 1940 तक से सत्ताईस साल के सफर में भारतीय सिनेमा काफी परिपक्व हो चला था और अब उसने एक उन्मुक्त आकाश की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था.




* (आभार :दृश्य-श्रव्य जनसंचार प्रविधि)

Monday, April 19, 2010

रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें



दादी, 


मेरे पास दारु पीने को कितने बहाने हैं ! आज शाम उदास है इसलिए पी लेता हूँ, आज 'एलियन'  बहुत याद आ रही है इसलिए पी रहा हूँ, आज नौकरी नहीं मिली इसलिए... तो आज तुम मेरे साथ नहीं हो इसलिए...

अब तो दिल करता है अपना ऊपर ब्लेड ही चला लूँ  और अपना ही खून पीउं, वैसे भी इतने दिनों में खून शराब में तब्दील नहीं हुई होगी क्या ?  

नशे में जब माथा घूमता है तो लगता है पूरा शहर मेरे साथ घूम रहा है... सारी सृष्टि मेरे साथ नाच रही है. 
जिस्म के अन्दर जो तट है उसके वहां मजधार से आती कितने सुनामी हैं... यह आती हैं और बसे-बसाये सभी झोपड़ियों को तहस-नहस कर देती हैं... दादी, लगता है जैसे यह धोबी है और मुझे कपडे जैसे पटक-पटक के धो रही है तभी इतना बेरंग हुआ हूँ कि अब कोई रंग मुझ पर नहीं चढ़ता... 

ये बेरंगी उसी मजधार से आई है. हाँ - हाँ ! वही मजधार जहाँ उसने मुझे छोड़ा था.

कोई कितना नशे में है यह उसने पैर के अंगूठे पर खड़े रह कर कांपने से सिखलाया था... 
अभी बीती सर्दी में मैं लिहाफ ओढ़कर लोन में नंगे पाँव चलता था... मस्जिद की सीढियाँ अभी भी मैं उन्ही कांपते पैरों से अपराधी की तरह चढ़ता हूँ... 
सोने के लिए मैं जम कर कसरत करता हूँ, एक एक बाल से पसीने का सोता बहता  है;  नींद फिर भी गायब है, लगातार तीन सिगरेट पीने पर हलक सूख गयी है पर...


मैं पार्क में बच्चों के साथ लगातार चार चक्कर लगा लेता हूँ.. इसे अब नशा मापने का पैमाना क्यों नहीं माना जाता ?

तो अब मेरा ख्याल है उसने नशा मापने का पैमाना बदल दिया होगा. मेरा दोस्त कहता है अब मोटे पर्स में नशा होता है ? नहीं-नहीं दादी मैं अब भी मान नहीं पाता... "है इसी में प्यार की आबरू, वो ज़फा करें मैं वफ़ा करूँ"

फ्रिज में पड़े शराब की बोतलों पर कुछ ठंढी बूंदें ठहरी हैं, प्यास वाले वो दिन खत्म हो गए... फिलहाल यह रेड वाइन ही प्यास भरी नज़रों से मुझे देखती है, देखो! हाँ हाँ देखो-देखो तुमको भी इसमें तैरता एक खलनायक दिखेगा... दिखा ? दिखा ना ?? ओह मैं भूल गया था दादी तुम्हें दिखना अब बंद हो गया है... मैं सोचता हूँ आज इस ग़म में मैं पी लूँ... पर ऐसे ही अब मुझे यह पी जाएगी.

लगता है वो अभी-अभी उठ कर गयी हो... मेरे कुर्ते पर उसके खाए हुए बादाम के छिलके बिलकुल ताज़े हैं... शराब फिलहाल मुझे उसके बालों की फीते की याद दिला रही  है... इस  मौसम में जब मैं अपने सूखते होंठों पर जीभ फेरता हूँ तो मुझे उसके  मोज़े उतारे हुए गुलाबी पैर याद आते हैं...

... और सुनामी फिर से आ रही है.

Saturday, April 17, 2010

मूक फिल्में और सेंसरशिप



सन 1917 तक सेंसरशिप जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी. कौन सी फिल्म प्रदर्शनयोग्य है, कौन सी नहीं, यह तय करने का अधिकार पुलिस अफसरों को होता था. आम तौर पर वे फ़िल्में आसानी से प्रदर्शन कि इजाजत दे देते थे, जब तक कि राजनीतिक लिहाज़ से कोई आपत्तिजनक  बात किसी फिल्म में न हो. होलीवुड के असर के कारण उन्ही दिनों मूक फिल्मों के दौड में भी चुंबन, आलिंगन और प्रणय के दृश्य फिल्मों में रखे जाते थे. उस ज़माने की एक फिल्म में ललिता पवार को बेझिझक नायक के होंठो को चूमते देखा जा सकता है. न तो दर्शकों को और ना ही नेताओं को ऐसे दृश्यों में नैतिक दृष्टि से कुछ आपत्तिजनक लगता था. फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम समझते हुए ऐसे दृश्यों को सहजता से ही लिया जाता था. 

मगर 1917 में ब्रिटिश हुकूमत ने ब्रिटेन का सेंसरशिप अधिनियम हमारे यहाँ भी लागू कर दिया. इस अधिनियम को लागू करने के पीछे मुख्य मकसद भारत के अर्धशिक्षित लोगों के सामने पश्चिमी सभ्यता के गलत तस्वीर पेश करने वाली अमेरिकी फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगाना था. भारत के फिल्मकारों ने सेंसरशिप लागू करने का कड़ा विरोध भी किया, क्योंकि सेंसरशिप में भी भेदभाव बरता जाता था. एक क्षेत्र में तो फिल्मों को प्रदर्शन की इज़ाज़त दे दी जाती और अन्यत्र या तो उसे प्रदर्शन की इज़ाज़त नहीं दी जाती अथवा व्यापक काट-छांट के बाद प्रदर्शन कि अनुमति दी जाती. नियम तो यह था कि फिल्मों में नग्नता, बलात्कार, हिंसा और वेश्यावृत्ति के दृश्य नहीं दिखाए जानेंगे मगर राजनीतिक लिहाज़ से फिल्मों में कांट-छांट कि जाती थी. ब्रिटिश सरकार कि किन्हीं नीतियों की आलोचना करने वाली फिल्मों को आसानी से प्रदर्शन कि इजाज़त नहीं दी जाती थी. किसी फिल्म का शीर्षक भी अगर महात्मा हो तो इसे प्रदर्शन कि अनुमति नहीं दी जाती थी क्योंकि इसे गाँधी जी के समर्थन का षड्यन्त्र समझा जाता. कहने का आशय यह कि भारतीय सिनेमा पिछले अस्सी वर्षों से सेंसर के कोप का शिकार बनी, उनमें कोहिनूर, फिल्म कम्पनी की भक्त विदुर, भालजी और बाबुराव पेंढारकर की वन्देमातरम आश्रम और प्रभात फिल्म कम्पनी की स्वराज्य तोरण प्रमुख है.

Tuesday, April 13, 2010

चेक एंड मेट




अपने घर का ख्याल करो, एकलौते हो तुम

कहा ना “पत्ते मत फेंकिये”...

क्या सवार हुआ है तुमपर ?

अक्ल आ गयी है

अच्छा, तो हम लोग सब बेअक्ल हैं ?

नहीं, पर नजरिया अलग हो चुका है हमारा

यह सब तुम्हारे किताबों की देन है, कोर्स की किताबों से ज्यादा तुम इधर-उधर की किताब पढते हो...

क्या आश्चर्य की बात नहीं है की पढ़ना और जीना दो अलग-अलग चीजें हैं, हमने इसमें भी अपनी मक्कारी मिला रखी है, मैं इधर उधर की नहीं, लेलिन की, भगत सिंह की...

तो साहेबजादे के नंबर इसलिए कम आते हैं ?

कोर्स की किताबों में क्या है ? कायरता के गुणसूत्र हैं वहाँ....

क्या कह रहे हो ? वहाँ स्वस्थ जीवन शैली के तरीके हैं, एक सभ्य- शिक्षित समाज है, सपना है, तरक्की है, समानता है, सामजिक न्या...

मार्केटिंग जुबान मत बोलिए, दिख रहा है सामाजिक न्याय, रख लीजिए इसे झोले में, रात में बर्गर के साथ खाइएगा, आई पी एल देखते हुए....

तुम्हारे मन में क्या है ?

मुझसे संतोष कर लीजिए

(अवाक् होकर) क्यों ?

हम दोनों एक दूसरे के लायक नहीं हैं ?

फिर ?

फिर क्या ? संतोष कर लीजिए मुझ से, हमेशा के लिए

इसी दिन के लिए पैदा किया था ?

हाँ. इसी दिन के लिए...

तुम्हारे मन में क्रांति-व्रांति की बातें तो नहीं हैं ? होश में तो हो ? भारत आज़ाद देश है फॉर योर काईंड इनफोर्मेशन, मुझे लगता है तुम कन्फ्यूज्ड हो ?

वर्चस्व बनाने के लिए सबसे पहले लोग यही कहते हैं, और भारत से मुझे भी मुहब्बत है दिस इज फॉर योर काईंड इनफोर्मेशन.

अच्छा और किस्से मुहब्बत है, इश्क किया है कभी ?

हाँ.

जवाब बड़ा छोटा दिया !

क्योंकि दूसरा मसला बड़ा लगने लगा पापा

माँ-बाप से प्यार नहीं करते हो ?

बहुत करता हूँ, पर इतना काफी नहीं होगा...

आगे कुछ सोचा है ?

हाँ पर अभी से मुझसे उम्मीदें... सही रास्ते पर रहूँगा, वर्ना आइकन बनने के चक्कर में मर जाऊंगा...

सर पर छत का मतलब नहीं जानते तुम शायद

जानता हूँ पर पहले पाँव के नीचे जमीन तो हो

अभी किस पर खड़े हो ?

भरम पर, वहम पर

तुम जो तेवर आज लिए हुए हो वो पांच साल के बाद नहीं रहेगा

जानता हूँ, इसी बात का डर है, आदमी को समय रहते मर जाना चाहिए... मेरी बुद्धि बदल रही है, हमारे तकरार बढते ही जायेंगे, मैं आप पर बोझ बन कर नहीं रहना चाहता इसलिए घर छोड़ने का फैसला किया है

इसका मतलब जानते हो ?

हाँ, मेरे रास्ते में होगी, भूख, प्यास, परेशानी...

कहीं सुना हुआ लगता है!!!

सुभाष चंद्र बोस ने कहा था.

वो दौर खतम हो गया बेटा

युवाओं के लिए आज भी है.

यही सन्देश दे कर जा रह हो समाज को ?

हाँ, जिनमें कलेजा होगा वो भी इसे चुनेंगे या फिर पागल कह देना और मरने के बाद बागी... वैसे बांकियों से मुझे शिकायत भी नहीं है...

और हमारा बुढ़ापा ?

तो इसी का इंतज़ार है ?... खैर ... काट लोगे आप.

*****
(... और वो घर छोड़ कर चला गया, आगे का नहीं पता... पर लेखक उसके समर्थन में यही कहना चाहता है अगर घर छोड़ने का आधार यही था तो वो यहाँ तक सही था...)

*****

चलते-चलते...

आज जलियाँवाला बाग हत्याकांड की 91वीं सालगिरह है... दिस इज फॉर योर काईंड इनफोर्मेशन



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