Wednesday, August 25, 2010

आँखें जैसे कि...


क्षितिज पर शाम का सूरज लाल हुआ जाता है और उसकी लालिमा इन आँखों में उतर आई है. उधर सूरज उतरता जाता है इधर पीने की ख्वाहिश जवां हुई जाती है... ये शराब मांगती लाल आँखें हैं. कई हलकों में कई रात से जागी हुई. इनमें बसे सपनों को गर दरकिनार कर दिया जाये तो एक हथेली नींद भरी है जो किसी भी वक्त पूरे बदन को अपने गिरफ्त में ले उसे दुनिया से पल भर में जुदा कर सकती है.


बुरी तरह से थके हुए इस जिस्म में थकान, टूटन, बुखार और दहशत एक साथ तारी है मानो पुलिस द्वारा रात भर दौड़ाया गया हो और अब जबकि थकान में चूर होकर शरीर ने जवाब दे दिया है तो ऐसे में कमर नीचे की ओर झुक आती है और दोनों हाथ बरबस घुटनों पर आसरा पाते हैं.

ये लाल-लाल आँखें मानो रम का रंग घुल आया हो इनमें और ऐसे में चेहरा ऐसा जैसे दो बरस बाद किसी अपमान को सोचते हुए लाल पपीते का जमीन पर गिरना, किसी हत्या का गवाह होना जैसे श्मशान में पिछली रात जल कर ख़ाक हुए शव की राख कुरेदते परछाई.

आँखें जैसे बदहवास पोरों से बुखार से तपते पलकों पर वर्जिश के बहाने रूह तलाशने की कोशिश, एक एकमुश्त मुहब्बत, जैसे बोरे में भर कर सील ली गई हो अमानत...

क्षमा करें श्रीमान,

            यह किसी माशूका की आँखें नहीं हैं, यह मुझ जैसे एक आवारे की मुसलसल चलती, दौड़ती, रेंगती, चढती (सकारात्मकता) और उतरती (निराशावादी, अवसादग्रस्त और हथियार डालती) कैमरे की मानिंद आँखें हैं जिसके पलकें झपकने की दर तेज है और इन दौरान उन दृश्यों को दिमाग में सेव कर लेने आदत है जो बरसों बाद आपको काउन्टर नम्बर्स के साथ पूरी लिस्ट दे सकने का माद्दा रखती है, ना यह बिजली से चलती है ना किसी बैटरी से. अपने चलने की वजेह ढूंढती यह आँखें प्रकाश डालकर रौशनी खोजती है.

इन आँखों से बातें ऑफ द रिकोर्ड होती हैं....

मदोन्मत्त आँखें कहती हैं :

ऐ खुदा ! हम संजीदगी से आवारागर्दी कर रहे हैं

Friday, August 13, 2010

गुफ़्तगू



me: हाय सुचित्रा
  क्या हाल
  ऑफिस में हैं ?

SUCHITRA: हाय  सागर
4:12 PM ठीक  ठाक  ऑफिस  में  ही हूँ
  और  आप  ?

me: ऑफिस  में 

SUCHITRA: so कहाँ काम करते हैं आप  ?

me: दिल्ली 
  थोडा mod  बन  के  कहूँ  तो 
  डेल्ही

SUCHITRA: इन  व्हिच कंपनी ?

4:13 PM me: हे हे   
  आपके जैसा  MNC में  नहीं  हूँ 
  बस दिहाड़ी  मजदूर  हैं 

4:14 PM SUCHITRA: ओ. के.  ...आपको  कैसे  मालूम  हमारी कंपनी MNC  है ?

me: देखने वाले चील की नज़र रखते हैं :P

4:15 PM SUCHITRA: Wow..क्या thekha hai IM ke throught 
  through

 me: हा हा 
  आप बताइए 
  अगर डिस्टर्ब कर रहा  हूँ तो.... 
  बता दें 
  शरमायें नही
4:16 PM प्लीज़ 

SUCHITRA: शरमायें नहीं मतलब ?
  मतलब  ?

me: मतलब  हिचकिचाएं नहीं 

SUCHITRA: अब ये सही शब्द है 

me: कई  बार  कुछ  सीधे -सीखे  कहना 
  मुश्किल होता है 
4:17 PM ना इसलिए

SUCHITRA: आप तो  राइटर  जैसे बात करते हैं 

me: हूँ, ही 
  क्या करें 
  धर्म निभाना पड़ता है 

SUCHITRA: हम लिखते ज़रूर हैं ....लेकिन इंसान प्रक्टिकल हैं 
  निभाते रहिये 

4:18 PM me: जानता हूँ 
  कि आप प्रक्टिकल हैं 
  वो हर्फों  में  चेहरा  नुमाया होता  है 
  होता जाता है 
  फिर तस्वीर बन जाती है 

4:19 PM SUCHITRA: wow....नॉर्मली ऐसे ही  बात करते  हैं  क्या आप  ?

 me: हाँ  
  क्यों 

SUCHITRA: हर्फ़, चेहरा, नुमाया और तस्वीर 

me: कोई खराबी है !
4:20 PM जी 
  यही तो मिलकियत है अपनी 

SUCHITRA: नहीं .....
  दुर्लभ जीव हैं फिर  :-)

me: अच्छा !
  कमाल है 
4:21 PM क्या हुआ 
  रुक क्यों  गयी ?

SUCHITRA: चले ही  कब  थे ?

4:22 PM me: अभी तक  तो  चल रहे थे 
  फिर चल पड़े  हैं 

SUCHITRA: हा हा  हा ....कमाल है 

me: कितना ?
  
SUCHITRA: चलिए आप  यूँ  ही  चलते  रहिये 
  फिर  हम  चलते हैं 

me: यह जाने का लक्षण  था 
  चलिए से ही समझ गया था

4:23 PM SUCHITRA: ये अंदाज़ था ....आगाज़ किया था हमने 
 me: अंजाम का !
  ?

SUCHITRA: अंजाम यही कि  जा  रहे  हैं 
4:24 PM चलो bye
  have a nice time ahead

me: शब्बा खैर ..

SUCHITRA: :-) 


          ***
{सुचित्रा (बदला हुआ नाम) और यहाँ उनकी अनुमति से; आभार.}

Tuesday, August 10, 2010

हरारत


रजिया बड़े सधे क़दमों से नंगे पाँव दरगाह की सीढियां चढ रही है, शांत मन, आँखों में तेज और माथे पर करीने से लपेटा हुआ फेरैन है.

दोपहर की तेज धूप में फर्श पर पाँव पकते थे. उसने मन्नत वाले जगह पर रोशनदान सरीखे आकृति पर धागा बाँधा. यह जगह, उसी आहाते में दरगाह से थोडा हटकर था. पीछे खुला पहाड था जहां पश्चिम से आती हवा के तेज झोंके गर्मी कम करती थी, रजिया को लगा जैसे पीर बाबा खुद नेमत बरसा रहे हों. ऐसे में उसे अपनी मांगी हुई दुआ कबूल सी लगी और इसी सोच में रजिया का चेहरे पर नूर छा गया. उसने जमीन पर घुटने, तलवे और एडियाँ जोड़े और सजदे में झुकी, उठी और अपने दोनों हाथों की हथेलियों को सटाया. ऊपर ने दोनों रेखायों के चाँद बनाया जिसके ठीक ऊपर हारून का चेहरा उग आया. रजिया हौले से मुस्कुराई हथेलियों को अपने पलकों से लगाया फिर से नीचे झुकी, आँखें खोली और सामने पड़े मोबाईल पर हारून का नाम चमक उठा.

उधर हारून के आने की दस्तक हो चुकी थी और इधर रजिया के इबादत में खलल पैदा हो गई. दिल की सारी संयत धड़कनों ने अपना क्रम तोड़ दिया. मन चंचल हो उठा. साँसें तेज और बेतरतीब से छोटे-बड़े होकर चलने लगे. अंदर उठापटक, शोर और कोलाहल छा गया. ना उसके मन में अब खुदा की तस्वीर बन पा रही थी ना ही उसके पाँव दरगाह की फर्श पर टिक रहे थे. आँखें जो सादगी, पवित्रता, श्रद्धा और निश्चलता में डूबी थी उनमें सपनों की नाव डोलने लगे.

उसने हारून को मूर्त रूप में सोच कर अमूर्त हरारत को महसूस किया. 24 साला एक परिपक्व लड़की, चंचल लड़की के रूप में ढल गई थी. एकबारगी उसे ख्याल आया कि पीर बाबा भी यह सब देख रहे होंगे पर हालत उसके काबू में नहीं थे और इसे बेकाबू होता देखा उसने अपनी चंचलता का प्रमाण जीभ निकालकर, आसमान की ओर देख, आँखें छोटी कर, हलके इनकार में गर्दन डुलाते हुए 'सॉरी' बोलकर दिया और दौड पड़ी दरगाह के बाहर.

दिलों में ढेर सारा ईंधन लिए हारून और रजिया एक दूसरे के तरफ दौड़ते हुए आये. पार्क के ठीक मुहाने पर बायीं तरफ दोनों ट्रेनों में जोरदार टक्कर हुई. शुक्र है, कोई हताहत नहीं हुआ उलटे कई ज़ख्म भर गए. टक्कर जबरदस्त थी, एक दूसरे में समा जाने वाला जैसा उनका प्लान था. पर जिस्म हमेशा अलग ही होते हैं.

स्लीवलेस सूट पहनी रजिया जब हारून से अलग हुई तो हारून ने बरबस उसकी गुदाज़ बाहों को थाम लिया. लेकिन उस अनछुई, निचली चिकनी त्वचा पर हारून का हाथ देर तक ना रह सका और फिसल कर उसकी कोहनी पर आ रुका. एक पल के लिए हारून को रजिया की बाहें अपेक्षाकृत छोटी लगी पर हकीकत का ख्याल आते ही दोनों एक-दूसरे में खो गए..

...और दोनों अभी भी खोये हैं.


Tuesday, August 3, 2010

तोहफ़ा



कविता : समय की अदालत में

कवि :
अपूर्व शुक्ल



फरमाइश /आइडिया : कुश वैष्णव

तकनीकी सहयोग : पूजा उपाध्याय, कुश वैष्णव एवं प्रशान्त प्रियदर्शी

वोइस ओवर आर्टिस्ट : बाबला कोचर
(बबला कोचर दिल्ली के मशहूर एंकर/वोइस ओवर आर्टिस्ट हैं)


निर्देशन : सागर


साउंड रिकार्डिस्ट : चंकी


प्रस्तुति : सागर


नोट: कविता बिना पूछे/धमकाए ही ली गयी है. कवि अगर मुकदमा ठोकना चाहे तो स्वागत है.

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