Friday, October 29, 2010

एक बूढ़े की डायरी


अचानक से उम्र और ज्यादा लगने लगी है. चाय पीने के बाद भी चाय पीने की तलब लगी रहती है... खून की कमी से चिडचिडापन बढ़ने लगा है, हर बात का जवाब देने लगा हूँ.. सहनशीलता ख़त्म हो रही है. यादाश्त भी पहले सी नहीं रही ... किसी बस स्टॉप पर रख कर भूल जाता हूँ... हँसते हुए मुंह तो खुलता है पर बंद नहीं हो पाता... चश्मा पहनकर आईने में देखता हूँ अपनी ही पांच-छह आँखें दिखाई देती है... हाथों में स्पर्श देर से पता चलता है. थरथराहट लगी रहती है.. 


रोज़ सुबह उठकर देख लेता हूँ मेरी पत्नी जिंदा तो है ! वो भी मुझे शायद नींद में चेक कर लेती होगी. हमारे बीच एक अबोला सा डर दाखिल हुए कुछ महीने हो गए हैं... यह डर हम प्रेम की आड़ में वैसे ही अनदेखा करते हैं जैसे बच्चे और समाज हमें कर रहे हैं.. यों कभी-कभी कुछ समाचारपत्र वाले आते हैं जो अपने खाली जगहों को भरने के लिए सबसे नीरस पन्नो पर हमारे भावनाओं को "बुजुर्ग चाहे आपका साथ" या "बड़ों को सम्मान करिए"जैसे दयनीय शीर्षक लिए हमारी शिकायतों से कुछ वाक्य कोट कर लेते हैं. ये सब भी घरों में उब की हद तक अलसाए दोपहरी में गर्भवती महिलायें ही पढ़ती हैं जो उस समय में पति के दफ्तर और परिवार के अन्य सदस्यों के घर से बाहर या इधर उधर रहने से खुद को हमारी तरह अकेला पाती हैं ... दोपहर की उबन इस दौरान उन पर इस कदर हावी होती है की उस वक्त ना तो हेल्दी पोस्टर वाला बच्चा उनको उत्साहित करता है ना ही टी वी पर आता सास बहू का सिरिअल.

अकेलापन कुछ ऐसा है कि साथ चलते हुए सब कुछ खामोश लगता है. मेरी छड़ी, मेरी घडी, कलाई पर के पके बाल, कपडे यहाँ तक की मेरी धड़कन भी मरी हुई चाल चलती है. खुद मेरी पत्नी भी चुप-चुप मुझे नोटिस करती रहती है... क्या वो नहीं जानती की वो खुद भी बूढी हो रही है लेकिन मेरी हर आदत को गौर से देख कर बाद में किसी बक -बक वाले वक्त में मुझे नैतिक शिक्षा देती रहती है.

मैं अपने बेटे को जब कहता हूँ कि अखबार में "आज से पचास साल पहले" वाले कोलम में क्या छपा है तो वो खीझ जाता है. उसे अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने, दफ्तर सँभालने और सारी सुविधाओं के बीच खीझ आती है हालांकि वो थोड़ी देर के लिए मुकेश अम्बानी, अमिताभ बच्चन, अब्दुल कलाम, सचिन तेंदुलकर को टी वी स्क्रीन पर देख कर जोश में आ जाता है, उनकी कहानियां उसे बहुत प्रेरित करती है (बेटे, यह प्रेरणा भी हमेशा के लिए होती तो मुझे संतोष होता) लेकिन जब मैं उसे बताता हूँ की प्रभात फेरियों में तक़रीर करने के बाद हम मोहल्ले के कूड़े कचड़े साफ़ करते थे, रात में पढने से पहले सुबह खेतों में कुदाल चला कर उगाये हुए लाल साग मण्डी में बेचकर बचाए हुए पैसे (पैसों नहीं, तब यह विकसित भारत इतना मंहगा कहाँ था) से किरासन तेल खरीदने से लेकर लालटेन साफ़ करने तक का सफ़र उसे प्रेरित नहीं कर पाते... 

आज बिस्तर से उठ कर  रिमोट खोजने में वो खीझ जाता है. हमेशा झल्लाए हुए बात करता है. दुनिया कितनी आगे चली गयी है ? ऐसा क्या है जो वो (वो ही क्यों) लोग या दुनिया आखिर ऐसा क्या कर रही है जो यह हालत है ? ऐसा क्या है, क्या घट रहा है जो मैं नहीं समझ पा रहा हूँ ? 

पिछले कुछ बरस से लगातार मैंने खुद को "ज़माना बदल गया है' जैसे यथार्थ पूर्ण वाक्य दोहराकर इस बदली दुनिया से तालमेल बिठाने का प्रयास कर रहा हूँ... लेकिन सफल नहीं हो पा रहा. हम (मैं और मेरी पत्नी) दोनों एक दूसरे को दिन में सात से आठ बार याद दिलाना नहीं भूलते की दुनिया बदल चुकी है और तुम्हारी मानसिकता से यह नहीं चलेगी. 

लेकिन हर बार यही लगता है यह लाइन हमारी बातचीत का निष्कर्ष भर है और जो पहले बोल दे वो जीत जाएगा. 

घर के लोग कहते हैं हम दोनों बच्चों से लड़ते हैं जबकि हम परिपक्व बहस करना चाहते हैं. अपने बच्चों के मुंह के अपने को बच्चा सुनना क्या कम अपमानजनक है? दिखने में भले हम किसी होम स्वीट होम में नहीं रहते हों लेकिन गाहे बगाहे घर के लोग अपमान का एहसास दिला ही देते हैं.

साहित्य में झंडे गाड़ने वाली मेरी बेटी अक्सर मेरा हाथ सूंघ कर कहती है बाबा आपका हाथ चूल्हे से उठते धुंए सा महकता है. ऐसी कमाल की उपमाएं देने वाले नस्ल (जिनको दुनिया हैरत की नज़र से देखती है) साक्षात्कार के दौरान अपनी ओबजर्वेशन को महान बताती है जबकि उसकी कई कहानियों, जुमलों, शब्दों के प्रेरणाश्रोत हमीं रहे हैं लेकिन तब हमें परदे के पीछे धकेल दिया जाता है... आजकल भावुकता भी अति सम्मान देने पर ही उभरती है जैसे मेरी बेटी रेड कारपेट पर भावुक हो जाती है और मेरा बेटा अपने बेटे को एयर कंडीशंड स्कूल में दाखिल करा कर...

उपरोक्त बातें जब मैं अपनी पत्नी से कहता हूँ तो उसके जवाब में वो अपने घिसे - टूटे दाँतों के बल जोर लगा कर कहती है "तुम भी बदल रहे हो, अब क्रेडिट लेने की चाह तुममे भी आ रही है" 

मैं उसे समझाना चाहता हूँ कि नहीं ऐसा नहीं है, मेरी बातों को समझने की... (लेकिन) ...

"सचमुच ज़माना बदल रहा है"

इस तरह, सहमति से निकलने वाले इस निष्कर्ष को वो एक बार फिर से पहले कह कर इस बहस (मेरे लिए अभी का सबसे बड़ा जद्दोजेहद) को जीत लेती है.

Tuesday, October 26, 2010

तब मैं आता दिखूंगा



पहाड़ से जब धुएं वाली गंगा उतरती होगी तुम बड़े से पत्थर पर अपनी गुडिया लिए उधर ही देखना मैं आता दिखूंगा. झरने से कोई बूंद छिटका करेगी. तुम बाल बांधोगी और कोई बाल बंधने से रह जायेगा और जब भी हुमक के इतराओगी आइना देखकर कि मैंने सबको बाँध लिया किसी किनारे के उड़ता, फडफडाता कोई अकेला तिनका तुम्हें चिढ़ता हुआ मिलेगा. यह सब करते हुए आईने में देखना तब मैं आता हुआ दिखूंगा. 

दिन के किसी बेहद ठुकराए हुए पल जो दर्ज करने लायक ना हो, जब अपने दांतों पर जीभ फेरना और महसूस करना कि सुबह दातुन करते हुए अमुक-अमुक मसूड़े में चोट लगी है और वो उभर आया है, तुम्हारे पैर के अंगूठे में जब किसी रोज़ सुबह-सुबह चोट लगे और शाम तक वहीँ ठोकर लग लग के लहुलुहान हो जाये तो अनुमान लगाना कि कम ऑक्सीजन वाले उचाई पर चूल्हे में जलावन अब तक घट चुका होगा तब मैं आता दिखूंगा.

तुम्हें तो पूरे सहूलियत और करीने से ख़त लिखता हूँ. फिर भी कोई अगर खोल कर उसे पढ़ ले तो चिंता मत करना. महीने के आखिरी दिनों में शहर से चीनी का टिन भेज पूरे परिवार को खुश कर दूंगा. 

यहाँ फेक्ट्री में कभी कभार हथौरी ऊँगली पर ही बरज जाती है पर यह काम उतना चुनौतीपूर्ण नहीं है तुम आँखें छोटी कर मुझसे यूँ बातें करना जैसे कोई चुनौतीपूर्ण काम हो या मेरी कुव्वत नाप रही हो. जब तुम्हारे सूजे हुए गालों पर महीन लकीरें अनुभव से उग आई हों तब मैं आता दिखूंगा.

गीली मिटटी से पर खड़े दीवार वाली गली से आता दिखूंगा सातों केस जीतता हुआ. तुम खेत में अगली सुबह रस्सी लटका देना और मुन्ने को एक छोटी सी लकड़ी से स्टील वाली चक्की बाँध कर दे देना, छू से भागेगा गली में तो गुलाबी पैर के प्यार टपकेगा आगे वाले हर झगडे ख़तम हो जायेंगे, उसके माथे का टीका और गले का चाँद चमकेगा तो अंतिम चेतावनी देती इंटरसिटी सुकून से पकड़ सकूँगा. 

सही मायने में तभी आता दिखूंगा.

Monday, October 25, 2010

इनकार



...और घोड़े ने यकायक अगले दोनों पैर उठाये और वापस वहीँ का वहीँ रख  दिया. जो बाल उसकी गर्दन पर लहरा रहे थे उनमें सुस्ती आ गयी. पैर नीचे करते ही उसने अनिक्षा से अपना मुंह फेर लिया. फिर क्या था एक इंच भी टस से मस नहीं. एकदम से से चुप्पी साध लिया, जंकर सा ब्रेक लगना भी नहीं के घिसट के थोडा आगे चले गए. यों के जैसे बेतहाशा दौड़ते हुए किसी ने बड़ी गहरी खाई सामने प्लांट कर दी हो. दोनों पैरों के खुर पड़ने से ज़मीं चोटिल जरूर हो गयी  पर रुकना - एकदम फुल स्टॉप की तरह. तत्क्षण. गज़ब का सामंजस्य. और संयम.

वेग से दौड़ते घोड़े पर उन्मत्त घुड़सवार ने आगे चलने के लिए क्या कुछ नहीं किया. उकसाने वाली आवाज़े निकाली. अपनी भार से घोड़े को यों उत्साहित करने की कोशिश की जैसे बचपन में गिल्ली डंडा खेलते वक़्त गिल्ली से नीचे हलकी सी ज़मीन में जगह बने जाती है ताकि गिल्ली को डंडे से हवा में लहराया जा सके. इस असफल प्रयास से उबकर उसे माँ -बहन से अलंकृत गालियाँ दी गयीं गोया घोडा उसके सारे शब्दों के भावार्थ समझ रहा हो. हालांकि घोडा घुड़सवार के स्पर्श, बोल और आँखों की भाषा से वाकिफ था.

पुचकारने का सिलसिला भी चला तो चाबुक ने भी दरियादिली दिखाते हुए जम कर उसके जिस्म को प्यार किया. इस प्यार से उसके शरीर पर कई लम्बी लम्बी धारियां निकल आयीं. एकदम ताज़ा, लाल-भूरे रंग में. जिस्म गोरा नहीं था अतः नील पड़ने की सम्भावना क्षीण थी. घोडा ने चाबुक योँ खाई मानो पेशेवर मार खाने वाला हो. इस दौरान रकाब से पांव निकल घुड़सवार ने उसके पेट, गले और पैर और जिस्म से जोड़ पर भी ताकत आजमाई.

घोडा कोई बात कहना चाहता था. तीव्र गति से दौड़ने से उसके नथुने सूज रहे थे, उथल पुथल से नाक से पसीने के रूप में कुछ फेन सा निकल रहा था... (नहीं नहीं. घोडा स्वस्थ था. फेन से कोई और मतलब ना निकालिए)  घुड़सवार को उससे कोई लेना -देना ना था. वो तो सैर करना चाहता था. प्यार तो अस्तबल में होता है या सैर के बाद पर काम के वक्त घोड़े का यूँ कदम पीछे खिंच लेना अपमानजनक था. मूड पर पानी फिरने जैसा. हवाखोरी के नशे में व्यवधान पड़ना था. ऐसे में गुस्सा प्यार पर हावी हो गया. सो सवार ने खल खिंच लेने की धमकी देते हुए भरपूर ताकत लगाकर कुछ चाबुक बरसाए. हाँफते हुए थोडा सा सोचा भी क्या यह वही घोड़ा है  जिसकी तंदरुस्ती पर फ़िदा हुए थे ? जिसके आँखों में जूनून की हद तक नशा समाया था ? जिसे दुलार करते तो भी वो मुझसे आँख मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता था ? 

तो इतना तो पक्का था इस राह और आगे बढ़ने से अनिक्षा दर्शाने पर घोड़ा कुछ कहना जरूर चाहता था. 

घोडा क्या कहना चाहता था मुझे भी नहीं मालूम.  मैं जानवरों की भाषा नहीं जानता. जिंदगी में इतना सकारात्मक भी नहीं की मुझे घुडसवार कहा जा सके क्योंकि इंसान के तौर पर मैं भी घोड़ा ही हूँ और मेरी सवारी भी कोई और करता है.

इसी तरह दौड़ते - हाँफते कुछ गली के मुहाने पर मैं भी कदम खींच लेता हूँ. चाबुक पड़ती जाती है मार खाए जाता हूँ.

Saturday, October 23, 2010

देखता, दिखाता भी



देखता, देखना चाहता था, थोडा सा अब भी देखना चाहता हूँ और दिखाता भी. 

चौड़े पलग पर तुम्हारी सर के हर कोने को खोल कर देखता. सभी नसों की हरकतों को देखता. प्रयोगशाला में तरह-तरह से जांच कर देखता, किसी स्टूडियो में तत्क्षण तुम्हारी प्रतिक्रिया की ऑडियो तरगों का ग्राफ देखता, किसी काठ की कुर्सी पर करेंट लगते जिस्म के काठ हो जाने की हद तक कठुवाए से तुम्हारे चेहरे को देखता और साइकाईट्रिस्ट की तरह नोट करता अपनी मन की डायरी में ... कोई चिप ही लगा कर हर जिस्मो-जां में उठते हर तरंगों को जानने की कोशिश करता... देखता.

देखता कि माथे की नसें कैसी फटती हैं. देखता कि दुर्गापूजा के भव्य पांडाल से कैसे कोई गली गंधाते, बजबजाते पिशाब वाली गली में भी खुलती है.... देखता और एक दफा दिखता भी तुम्हारे वादे के चंद चुनिन्दा शब्दों को... ब्रह्माण्ड से खिंच लाता कहीं टिके ''मैं तुमसे प्यार करती हूँ'' और ''मैं तुम्हें कभी कहीं छोड़ कर नहीं जाउंगी'' जैसे अति साधारण और बेमतलब, बेगैरत जुमले... दिखाता कि यह जुमले शब्द की तर्ज़ पर कैसे खरे हैं और ब्रह्माण्ड के निर्वात में कहीं जस के तस कैसे बेशर्मी से गड़े हैं... जबकि इन्हें भी तुम्हारी तरह मेरी जिंदगी से गुम हो जाने चाहिए थे...  लेकिन अगले ही पल उन पर तरस आता है जैसे सातवीं का विद्यार्थी अपनी गलती को महसूस कर चुकने के बाद सर झुकाए डांट खा रहा है. ..... यह दिखाता.

देखता, किसी जादू टोने करने वाले की तरह तुम्हारा माथा छूता, भरम रचता, दर्द ठीक करने वाले की तरह फिर एक और बोझिल रहने वाला सा दर्द दे देता, यकायक छोड़ कर पीछे हट जाता और अपने त्योरियों पर के जुटाए झुर्रियों को इकठ्ठा कर कुटिल मुस्कान से देखता... फिर हँसता, तुम्हारे चेहरे से तुम्हारी जिंदगी कि बस्ती में लगे आग को देखकर अट्टहास करता... उस जलती बस्ती में फूस के घरों को लहकते देखते, हाथ - हाथ भर बड़े टुकड़े को कालिख में लिपा- पुता  गिरता देखता... तापता भी ..... फिर यह भी दिखाता.

साबित करने से ठीक पहले किसी ऐन मौके पर बोलना बंद कर देता. इस तरह एक और भार देता. मुक्त कर भी तुम्हें ताउम्र उसी भंवर में जकड़े रखता. 

फिर देखता....       
..... दिखाता भी.

तुमको, तुम्हारी सहेलियों को, तुम्हारे भाइ-भौजाइयों को, बलवाइयों को 
और कसाइयों को.

Monday, October 18, 2010

नैराश्य

 
डोर है ?  डोर ही तो है. नहीं ? हाँ सचमुच. डोर ही है. कम से कम डोर जैसी तो जरूर है. जब तक हमारे हाथों में थी कैसी तनी हुई थी. दोनों सिरों  ने खिंचा हुआ था. उसकी दाग उँगलियों में है.  कैसी जीवंत लगती, हर वक़्त बोलते, अपने उपस्थिति का अहसास दिलाते... ऊब तो जाता ही था, गुस्सा आता था उसपर ...  अभी नहीं है तो एक पल को चैन तो आया...

*****
लेकिन अब ? अब क्या करें, आवाज़ बगैर घर सूना हो गया है.... आवाज़ थी, कंठ से फूटती, छनाके के साथ फर्श पर गिरती कभी कानों से टकराती. प्यार के बोल होते तो चिन्न - चिन्न हो जाते और कठोर बोल होते तो रेशा रेशा उधड़ जाता. जो भी, जब भी छूट कर/टूट कर गिरी है तो पूरे बदन में जैसे लोच आ गयी है... कैसी अलसाई सी पड़ी है ...बस करवटों की कुछ सलवटें उभरी हैं बदन में, अरे एक हल्का सा पेट का मरोड़ है. अभी ठीक हो जायेगा. देखना एक पल में कैसे झक से आँखें खोल बोल पड़ेगी... तुम खामखाँ शोक मानते हो... यकीन नहीं होता, निष्प्राण है.

*****
मैं अगर पतंग था तो वो तो मांजा जैसी थी... कैसे हाथ काट डाले हैं उसने देखो तो !
इस रास्ते से पिछली बार गुजरी होगी तो क्या सोचा होगा की अबकी लोग काँधे पर उठाये हुए ले जायेंगे ?

*****
चिता का अम्बार छोटा होता जा रहा है. आग की लाह आधे किलोमीटर दूर तक भी लगती है... मैं बेटा हूँ ना, पास रहना पड़ता है. तपिश झेली नहीं जाती... लगता है अभी हुमक के दुलार करेगी, आग की लपटों में उसकी ममता की बाढ़ ही तो है, देखो कैसी लपकती उठती है. लग रहा है मेरी खाल भी पिघल जाएगी.. कैसा नैराश्य है जीवन ! भूख मर गयी है. मन सहित मुंह का जायका बेस्वाद हो चला है. नदी किनारे का यह रूप इससे पहले कभी देखा ना था...

 *****
साढ़े तीन से चार घंटे लगे जलने में... बाल तो छन से जल गए. बांकी गल कर तिहाई हो गयी है. पेट का यह हिस्सा नहीं जलता... इसे गंगा में प्रवाहित करना पड़ेगा. आग का काम हर हाल में जलना ही होता है सो जला रही है. चिता के उस प़र की नदी थरथरा रही है.

... और इधर फिर से यह सब याद कर मेरी दुनिया भी.

Thursday, October 14, 2010

री सखी ! जाग री


गुलाबी रंग की फ्रोक और लगभग उसी रंग की हेयर बैण्ड पहने  रेनी (मेरी बेटी) बालकनी से टाटा करते सूरज को चिढा रही है. उसने जाते हुए सूरज को रुको साले, एक मिनट कह कर अपने हाथों से बैंगल खोला और उससे सूरज का नाप ले उसकी हैसियत बता दी है. इतने पर भी उसकी खीझ खत्म नहीं हुई तो उसने उसे मुंह दूषना शुरू कर दिया. अपमानित हो रहा लाल सूरज गुस्से के मारे और सूज कर बड़ा हो गया है और फलक पर किसी यूँ टिप्पा खा रहा है के जैसे किसी थके हुए नौजवान ने अपने कमरे के दीवार पर दिन भर लात खाया हुआ फुटबाल दे मारा हो.

रेनी भी भीतर से खीझ इसलिए महसूस कर रही है क्योंकि सूरज उसके हाथ नहीं आ रहा. उसका बस चले तो उसका मुंह नोच कर ही दम ले लेकिन फिलहाल जो कुछ उससे बन पड़ रहा है उसमें वो पूरे लगन से लगी हुई है.

बालकनी में जाती हुई धूप की अंतिम किरणें छिटक रही है. रेनी को गुमान होता है जैसे सूरज अपनी रूह यहीं छोड़ गया हो. उसे एक मौका मिल जाता है. अपनी सैन्डल उतार कर वो धूप पर ही सूरज को दिखा-दिखा कर सैन्डल बरसाए जा रही है. उधर सूरज भी पेड़ों के झुरमुट से लुक्का-छ्प्पी करता हुआ उसके चेहरे और आँखों पर अपनी चमक हर कुछ सेकेंड बाद टोर्च की लाइट की तरह दे मारता है जिससे रेनी की आँखें चमक उठती हैं. किसी खास कोण से देखने पर उसके कान के नीचे के सुनहरे रोयें चमक जाता है और उसके साथ उसके गले में हिलोरे मार तैरता चेन भी, जिसको वो अपनी मासूमियत में सोने का मान बैठी है और उसकी इसी ग़लतफहमी से हमारी  जान छूटी है.  

रेनी सूरज से इसलिए खफा है क्योंकि उसने कुछ मिट्टी के खिलौने बनाये थे जिससे खेल कर उसका दिल भर गया है. अब वो उसी मिट्टी से दूसरा खिलौना बनाना चाहती है. इसके लिए उसने छत पर उन खिलौनों को रख दिया है. उसका प्लान कुछ ऐसा है कि जब बारिश होगी तो यह खिलौने अपने आप गल जायेंगे फिर उस सौंधी और गीली मिटटी को थोडा नज़र बचा कर खाते हुए उससे नए खिलौने बना लेगी लेकिन यह सुरजवा तो जिद पर अड़ा हुआ है. रोज मुंह दिखlने आ जाता है और बारिश को आने नहीं देता. मैं उससे कहता हूँ कि यह काम तुम नल के पानी से भी कर सकती हो तो इस पर उसका कहना है कि इससे उन मिट्टी में खुशबू नहीं आती और मेरी कोई सहेलियाँ इस नियम से खिलौने नहीं बनाती. 


खिलौने पर इतना गहरा चिंतन देख किसी को भी यह लगेगा कि रेनी अच्छा खिलौने बनाती होगी. ये बात दीगर है कि रेनी के किसी भी खिलौने के नाक-मुंह सीधे नहीं हैं (ठीक रेनी की ही तरह) लेकिन यह बात उसे कह देना किसी के बूते की बात नहीं है. खैर...

मैं रेनी से कहता हूँ कि सूरज तुम्हारा बॉयफ्रेंड है, रोज तुमको देखने आता है और आगे भी आता रहेगा. वो हुंह कहकर अपना मुंह टेढा कर देती है. इस दरम्यान बहुत कुछ घट जाता है. उसके उपरी और निचले होंठ सटते हैं एकबारगी लगता है जैसे वो उस वस्तु विशेष को किस करेगी लेकिन अंत में अपने होंठों से ही उसे दूर करने का इशारा कर देती है. उसका कहना है कि सूरज बॉयफ्रेंड नहीं है और ना हो सकता है अगर होता तो मेरे हाथ आता और अब तक मेरे हाथों पिट चुका होता.

रेनी यह सब कहते हुए बहुत सहज है लेकिन उसका इस दौरान उसका पाँव हिलते जाना यह बता रहा है कि सूरज से गुस्से की कसक उसके मन के एक कोने में अभी भी पालथी मारे बैठी है.

...उधर टिप्पा खाता हुआ सूरज मुझे इशारे कर जाता है कि इस इतवार मैंने तुम्हारे कई सपनों के दीयों में अपनी ज्योति लगा फिर से उसे रोशन कर दिया है.

मैं रेनी को उसके भावी बॉय फ्रेंड के लिए इक शेर गा कर सुनाता हूँ

आज छत पर नहीं आया सूरज
धूप की आंच में बाल सुखाने में बड़ी देर हुई

Friday, October 8, 2010

सागर रिपोर्टिंग, सर !




 रात के बारह बज चुके हैं. सारी ख़बरें कल में तब्दील हो चुकी हैं. न्यूज़ रूम में सोनी ब्राविया के  पूर्ण फ्लैट 9 टी.वी. लगे हुए हैं. सभी चैनल एक साथ किकिया रहे हैं. न्यूज़ का फास्ट ट्रैक शेड्यूल चल रहा है. 10 मिनट में 20 बड़ी ख़बरों का विज्ञापन है. ऐसे में दूरदर्शन सपाट खबर दिखा कर सबसे अलग प्रतीत हो रहा है. पिछले कई दिनों से किसी चैनल पर किसी गाँव की खबर नहीं देखी. हम शायद अब टी. वी. पर गाँव की रिपोर्टिंग देखना भी नहीं चाहते. शायद क्या, पक्का नहीं चाहते. पंचायत, परधानी यह सब दूर की बात हो गयी है. हमें अब फिल्में देखते वक्त गरीबी भी अच्छी नहीं लगती.


कलर्ज़ पर बिग बॉस आ रहा है. यह घर देख कर लग रहा है की हिंदुस्तान ऐसा ही चमचमाता होगा. काश मेरे पास अच्छा कैमरा होता तो दिखता की नेशनल स्टेडियम के सामने रात को मजदूर कैसे दुष्यंत कुमार की "नहीं चादर तो पैर से पेट ढक लेंगे" वाली लाइन सिध्ध करते हैं. इस लाईफ स्टायल को सभी जीना चाहते हैं. लोगों की दिलचस्पी गोसिप में किस कदर बढ़ी हुई है. मेरे सामने वाले डेस्क पर के सहयोगी मेरी हालचाल नहीं लेते लेकिन ऑस्ट्रेलिया पर विशेषज्ञता उनको न्यूज़ रूम में विशिष्ट बनाती है.  एक हमारे सिनिअर एडिटर हैं उनपर एक प्रोग्राम लोकसभा चैनल पर आ रहा है. मुझे हंस में उनकी एक बहोत वाहियात कहानी याद आती है. कहानी क्या थी थोड़ी सी बस पत्रकारिता की झलक थी. कोमन वेल्थ गेम ने कई और ख़बरों की जगह ले ली है. कागजों की बर्बादी अगर किसी को देखना हो तो न्यूज़ रूम आये. इनके बाप की जाती तो समझतेमेरी आत्मा कटती है.

मैंने सामजिक सरोकार से जुडी एक खबर बड़े तबियत से बनायीं है. आखिरी गत्ते पर लग कर बुलेटिन के लिए वो जा तो रहा है पर हर बार लौट का वापस आ जा रहा है. आखिरकार जाने क्या सोच कर मैंने उस खबर को खुद के अक्स से जोड़ लिया है. उसका बार बार बिना पढ़े लौटना मुझे अपने खाली हाथ लौटना जैसा लग रहा है. अमृता प्रीतम ने शायद कुछ ऐसा ही सोच कर अपने किताब का नाम रसीदी टिकट रखा होगा.

मैंने अपनी एक पुरानी प्रेमिका को खबर कर उसका नाम एफ़ एम पर अनाउंस करवा दिया है. उसके नाम से समर्पित एक गीत "तेरे बिना बेसुवादी- बेसुवादी रतिया" चल उठा है. वो बहुत खुश है. अपने पति की बाहों में लेटी हुई इस वक्त वो एक पल तो मेरे बारे में सोची ही होगी.  शायद इससे ज्यादा मैं उसे कुछ दे भी नहीं सकता था. अपनी - अपनी औकात है प्यारे... 

बुलेटिन के बाद बालकनी में सिगरेट पीना सबसे अच्छा अनुभव है.  पांचवे मंजिल से कनाट प्लेस, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, योजना भवन, पी टी आई और कई मंत्रालयों को आधी रात के आगोश में देखना रूमानी अनुभव है. दिल्ली की सड़कें खाली हैं.  दिन में यही मंत्रालय भ्रष्टाचार का अभेद किला लगता है. जेब में पैसे हो और धक्के ना खाने पड़े तो दिल्ली वाकई एक खुबसूरत शहर है.

बंगला साहिब पर रात के ढाई बजे चाय पीना भी खुद के लिए एक सुखद एहसास है. दुधिया रौशनी में सफ़ेद संगमरमर ताजमहल सा लग रहा है.  सामूहिक प्रार्थना गूंज रही है:

" सहस्यनान पालक वोहे ता एक्क ना चल्ले नाल  
किव सचियारा होइए किव पूरे टुट्टे पाल  
हुकुम रचाई चलनां, नानक लिख्या नाल "

अभी कुछ महीनो में ठंढ शुरू हो जायेगी. पिछले साल दिसंबर की हड्डियाँ जमा देने वाली सर्दी में आधी रात को ड्यूटी के बाद दफ्तर की गाडी ठुकराकर अपनी मस्ती में लारी में हवा खाते वक़्त वापस आने में एक ख्याल आया था .. इसी तरह रोज़ के लिए जैक भी  अटलांटिक महासागर में गल गया होगा मगर मैं किस चीज़ के लिए गल रहा हूँ ?

इस वक्त मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ रंग दे बसंती की शूटिंग हुई थी. और यही तस्वीर फिल्म में दिखाई गयी है. इधर स्टूडियो में फेडर दे दी गयी है : यह आकाशवाणी है, अब आप आशा निवेदी से समाचार सुनिए ...

कुछ घंटे में सुबह हो जायेगी और हर इमारत पर सूरज के साथ तिरंगा खिल उठेगा.

Thursday, October 7, 2010

लाईटर



पैकेट खुला रखने की आदत से सारे सिगरेट में बरसाती हवा लग गई है. कई बार तो उसे जलाने में तीली को आधे रास्ते तक सफर तय करना पड़ता है. पहले ऐसा नहीं था एक भरम भर होता था कि तीली सुलगाई है. सिगरेट के पास ले जाते ही सिगरेट जल उठती

ज़िन्दगी, सुनसान जगह पर किसी पठानी औरत के साथ ठहरी लगती है. वो कसाई जैसी आँखों से मुस्कुराती हुई देख रही है.

बत्तीस इंच कंप्यूटर स्क्रीन पर यू ट्यूब में वृहत फलक लिए उदासी भरा गीत सुन रहा हूँ. फिलहाल गीत चल रहा है पर दृश्य रुक गया है.

मस्तिष्क की स्मृति में कई गैर जरुरी वायलिन का नोट्स छूट रहा है .. मुझसे बाहर कितनी लहरें है जिसके भिगोने का कोई टाइम टेबल नहीं है. बदन सूखते ही बौछारें अपने गिरफ्त में ले फिर से जगा जाती है

थोड़ी नींद, थोड़ी खुमारी, आधी बंद लाल आखें और बायीं बाजू पर औंधे पड़ी जांनिसार अख्तर की किताब.  कितनों कि ज़िन्दगी में हमारा अपना अक्स है लेकिन हम नहीं जान पाते कि इस बिनाह पर हमारा क्या होना है... उम्म्म्म.... किसे लिख सकते हैं हम ना होंगे तो हमको बहुत याद करोगे ?


और अंत में :

रोज कितने ही लड़के इस शहर में आते हैं और जाने कैसे उन दिनों बसर करते हैं, किसी के पास पैसे की कमी, तो किसी के पास काम की, कोई घर की याद से बेहाल तो किसी पर कई सपनों का धुन, विज्ञापनों का शोर और रफ़्तार भरी गाडियां... लेकिन वो हिम्मत ना हारे

उस दुर्लभ क्षण में जब आवाज़ दर्द की टीस से लरजता, झुकता होता है और प्रेम या विरह की हिलोरें कचोट मारती हैं उसका ऐसा कॉल हैरानी से भर गया

(कल रात प्रोग्राम के लगभग अंत में एक बजकर एक्वावन मिनट पर का काल )

...  शुक्रिया लड़की (कुछ और दिन उम्मीद जलाने के लिए)

लाईटर जलती है, सुलगाती है. जलाती है.

Wednesday, October 6, 2010

सरगर्मियां

/जुम्मे का दिन/

आम के बगीचे के बाद सड़क किनारे एक मस्जिद. क़ुतुब मीनार के जैसे एक ऊँची जाती लंबी इमारत. बढ़िया संगमरमर लगा हुआ है और सबसे ऊपर टंगा है एक चमचमाता संकेत चाँद और तारा. ठीक बाजू में एक लाउडस्पीकर जहां से इमाम तक़रीर कर रहे हैं  हमें अपने वालिदेन की खिदमत करनी चाहिए. वजेह उस खुदा, पाक परवरदिगार का सरमाया हम पर है और यह ज़िन्दगी जन्नत है, वालिदेन की खिदमत ना कर के हम खुद को दोजख के लिए तैयार करते हैं. सुपुर्द-ए-खाक के वक्त हमारी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं होती और रूह खुदा से मिल कर पाक नहीं हो पाता. इसलिए गरीबनवाज़ को हाजिर-नाज़िर जान वालिदेन की खिदमत करो.

मस्जिद के ठीक पीछे सड़क उससे लगती हुई बद से बदतर हालत में एक नाला जिसका गंदला पानी जाम है. नाले से सटते ही मुसहरों का टोला जहां के लोग सूअर मार कर, चूहे खा कर, अफीम, गांजा पीकर अपनी लुगाई को पीट कर, बच्चों के कूड़ा उठवा कर गुज़ारा करते हैं.

टोला खत्म होते ही रेलवे लाइन जहां कोई हाल्ट नहीं है एक चाय की दूकान और उस पर कुछ लोगों की बातचीत

पिछली बार का पोलिंग एजेंट (जो बहुत संभव है की इस बार भी होगा) : हम तो कहते हैं इस टोले को कम से कम बड़े वाला ड्रम से तीन ड्रम दारु चाहिए.

एक कार्यकर्ता... पार्टी : अबकी तो देखे के भी पड़ी ई भोसड़ी वाले किसपर ठप्पा लगाते हैं.

दूसरा कार्यकर्ता : जे तो हुई इस टोले की बात, उस पार ?

तीसरा कार्यकर्ता : उधर के लिए आठ राजदूत तैयार है, झंडा-वंडा सब...

पहला : तो अभी यादव इतने से मान जायेंगे ?

दूसरा : और इंतजाम भी है हो, अबकी सबको गंगा पार से इधर बसाना है इसी भूमिहार और बाभन के बीच में

तीसरा : दू साल से फुसला रहे हो, वोट नहीं दिया तब ?

पहला : देगा कैसे नहीं, नदी किनारे बालू पर परवल कब तक उगायेगा ?

पहला : और पासवान ?

तीसरा : उ पटना मुश्किल है भईया

दूसरा : काहे ?

पहला (मुस्कुराते हुए ) : अभी त दोस्ती भी है ?

तीसरा  : लेकिन पिछवाड़े पर लात मारने में केतना टाइम लगता है ? और हेहर हैं आपलोग जो आगे भी लात खाने को तैयार हैं...

पहला और दूसरा (एक साथ ) : अरे मौगी के नखरा और दुधारू गाय के लताड सहे ही पड़े है ... काहे से तू जाने है ना की दोनों से का मिले है ? जाने है की ना ?

तीसरा : (गुटका का पीक फैंकते हुए) : उ त ठीक, कोई जुगाड करते हैं पर हम ?

पहला : का तुम, पार्टी महासचिव बनोगे ?

दूसरा :  उ भी हमरा रहते ?

तीसरा : ना पर कम से कम लाख रुपैया

पहला (हँसते हुए) : हिंदुस्तान ले ले बेट्टा

दूसरा :  ई बकवास सुन रहे हैं इसके लिए का सोचा है (लाउडस्पीकर से आती आवाज़ की ओर इशारा करते हुए)

पहला : जो रे साले, सबके सोचेगा ? अपने जात का सोच, गला साफ़ कर और शुरू कर अभियान

दूसरा : त वही M + Y फार्मूला (मुस्लिम यादव समीकरण )

तीनो (एक साथ) : हे हे हे !

***
(अभियान शुरू हो चुका है, गौरतलब है की बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं... सो जारी है...)

Tuesday, October 5, 2010

क्यों टटोलूं तेरी नब्ज़ मैं ?

राधा-कृष्ण की एक मूर्ति जिसमें कृष्ण खड़े बांसुरी बजा रहे  हैं.राधा का सर कृष्ण के काँधे पर है. पीछे एक गाय है. 


(दृश्य टूटता है)


कई गायें खेतों में चरने लगी हैं. राधा अपना सर कृष्ण के काँधे से उठा कर देखती है ... दिन ढलने को है. पिछले ही पल तो कंधे पर सर रखा था तब तो सवेरा था. अगर काफी देर हुआ तो मेरे गर्दन में दर्द होना चाहिए था लेकिन नहीं हो रहा. कृष्ण, राधा की मग्नता टूटा देख अपनी उंगलियों से बांसुरी के छिद्रों की तस्दीक करते हैं. पीछे गाय अपना सिर हिलाते हुए रंभाती है, उसके गले की घंटी बज उठती है. इसी हलचल में अपने झाड़ू जैसी पूंछ पटकती है और जंभाई तोड़ने के बहाने आखिरकार अपने सूप जैसे कान जोर-जोर से हिला कर हवा पैदा करती है.. फलक बड़ा हो जाता है. पृष्ठभूमि में सुदूर तक मकई के खेत नज़र आते हैं. प्रेम और संगीत के गोद में दिन बीत जाता है.

... मैं महारास की बात नहीं करूँगा पर वो द्वापर था.

*****

दीदी के शादी की तैयारियां जोरों पर हैं. पूरे घर में सामान की उठापटक चल रही है. पूरा घर मेहमानों से  भरा है. आँगन का चापाकल लगभग दिन भर चलता है और हर बार उसमें से ग्रीस कम होने के कारण लोहे की आवाज़ आती है. एक महीने से काम करते करते पापा ऐसे थके हैं जैसे सुधा की शादी में चंदर थका था.

एक पहचानी की गंध का पीछा करते हुए भंसा घर जाता हूँ जहां गोबर से लीपे चूल्हे पर रोटी सेंकी जा रही है. उसकी महक से आकर्षित होता हुआ मैं भाभी से रोटी मांगता हूँ. भाभी फिर वही सवाल पूछती है हमसे शादी करोगे ? फिर वर्जित अगों पर गुंथा हुआ आटा लगा देती है... मेरी खीझ पर पूरा घर खिलखिला कर हँसता है.


दोपहर का सूरज ऊँचा चढ जाता है और उसकी आंच चूल्हे में समा जाती है. रोटियां तेज पकने लगती है. दीदी की सहेलियां कोहबर गाना शुरू करती है तो आँगन में लगा गेंहू का अम्बार बरबस बताता है की ज़मीन से जुडना क्या होता है और किसान होने का गर्व किसे कहते हैं. (पर क्षमा करना बाबा, यह गर्व अब आप अपने तक ही रखें, पाठक भी इस बात को तत्कालीन सन्दर्भ में ही लें)

ज़िन्दगी स्वस्थ धडकन के साथ तेज़ी से धडकती है.

... मैं सिंकते रोटी के धुंएं से अपनी संबंधों की बात नहीं करूँगा पर वो मेरे बचपन था.

*****

जब से सिन्हा को गोलंबर पर गोली मारी गई है, पूरा दल हताशा से भरा है. युनिवर्सिटी में पढाई कम राजनीति ज्यादा हो गई है. हर विद्यार्थी छात्र आंदोलन का सदस्य कम, गुप्तचर विभाग का मेम्बर ज्यादा लगता है. गंगा किनारे दरभंगा हाउस की सीढ़ियों पर बैठा मैं महसूस कर रहा हूँ 'लोकतन्त्र में राजनीति को स्वस्थ जड़ बनाने के चक्कर में राजनीति फल में तब्दील हो गई है.'

सेकेंड ईयर वाली परमजीत खाना लेकर आती ही होगी और वह समय भी दूर नहीं जब खिलाते वक्त आगे की योजनाये पूछेगी और हमें हमारी जिम्मेदारियों को याद दिलाना नहीं भूलेगी.

ये वे दिन हैं जब आसमान में खिले चाँद, तारे और उल्का पिंड तक गवाह हैं कि मैं पिस्तौल और गुलाब के बीच करवटें लेता हूँ और दोनों को सहलाने में मेरी हथेली के पोर जीवन सार्थक होने का एहसास कराते हैं. (कृपया ध्यान दें केंद्रीय मकसद गुलाब है जो पिस्तौल से होकर जाता है)

... मैं भविष्य की बात नहीं करूँगा पर वे मेरे जवानी के दिन थे.

*****

किसी दीवार में पतली सी दरार थी. स्टूडियो में पानी घुस आया है. तारें संपर्कहीन हो बेतरतीबी से ज़मीन पर फैले हैं. उनके बीच से गुजरते हुए हर बार वो पांव में उलझते हैं. स्पीकर त्योरियां चढ़ाये हुए एक दोस्त जैसा लगता है जिससे  अनबन हो चुकी है. सिर के पीछे का पंखा नाराज़ हो एक ही तरफ मुंह लटकाए/घुमाए चल रहा है. सामने की दीवाल घडी तीन बजकर पैतीस मिनट बजा रही है. सुईयों के खिसकने से टिक टिक की आवाज़ नहीं आ रही. रुके हुए पल में समय का बहाव तेज हो चला है. सुईयां स्मूथली अपनी परिधि पर घूमे जा रही है. यह वो जगह है जहां से मैं सब कुछ देख सकता हूँ.

... इस बार, मैं सबकी बात करूँगा, पता नहीं ये मेरे कौन से दिन हैं.

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