Tuesday, November 30, 2010

हश्र है वहसते-दिल की आवारगी...




मैंने कहा मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे बिना मर जाऊंगा उसने सुना कि मैं आत्म निर्भर नहीं हूँ और मेरा दिल बहुत छोटा है. मैंने कहा मुझे तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता और अगर तुम एक बार मुझे कह दो कि मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ तो मेरा जीना सफल हो जाएगा, उसने सुना मेरी पसंद बड़ी सीमित है साथ ही मेरा संसार भी बड़ा छोटा है और जिसका दायरा छोटा होता है उसके घेरे नहीं बढ़ते और ऐसा आशिक ही क्या जिसे सपने इतने छोटे छोटे हों कि महज़ एक लाइन से जिसका जीना सफल हो जाए. फिर मैंने कहा मुझे मेरी गलतियों के लिए कोई भी सजा दे दो पर मुझे माफ़ कर दो उसने सुना कि मुहब्बत में गिडगिडाने में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती. मैंने उससे क्षणिक सहमति दिखाते हुए फिर उसे फिर कहा कि हाँ मेरा दायरा छोटा जरूर है पर उसके अणु बहुत मजबूत हैं. उसने कोई उदहारण माँगा तो मैंने बताया कि तुम्हारे घाघरे कि तरह जहाँ उत्सुकता लगातार बनी रहती है मेरा आशय उसके क़दमों में पड़े रहने से था जो उसकी मौन आज्ञा के बाद ही ऊपर जाता लेकिन उसने सुना कि मर्द मर्द ही होते हैं और पूरी उम्र तिलचट्टे कि तरह चिपकना पसंद करते हैं.

मैंने कहा कि अच्छा शाम हो चुकी है मेरा हाथ पकड़ लो उसने सुना कि यह जीवन की साँझ है जिससे उसके हथेलियों को वो नरमी और गर्माहट नहीं मिलेगी ना ही कुव्वत से पकड़ कर नृत्य किया जा सकता है. मैंने कहा कि मैं कभी शरीफ आदमी नहीं रहा और तुम्हें टूट कर चाहना चाहता हूँ, उसने सुना कि मैं निकृष्ट श्रेणी का आदमी हूँ जो फिर से मनुष्य योनि में जन्म नहीं ले सकेगा मैंने इसका वास्ता देते हुए भी उसे मान जाने को कहा लेकिन तब उसने सुना कि मेरा कहीं कोई ठौर ठिकाना नहीं होगा. 

मैंने कहा कि तुम मेरे दिल में रहोगी उसने धरना बनायीं कि यह स्पर्श का क्षणिक अनुभव से बोलता है. मैंने कहा कि कम से कम मेरे से बात तो कि और इसके लिए में तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ और रहूँगा.. उसने सुना कि मैंने उसके अहम् को सहलाया और बाकायदा उसने अपने डायरी में तुरंत, किये गए एहसानों कि लिस्ट में चौथे नम्बर पर रख दिया.

मैंने कहा तू बहुत खुबसूरत है, उसने सुना कि पेड़ से अब पत्ते टूटने ही को हैं. मैंने कहा देखो घास पर ठहरे हुए ओस कि बूँद कितनी ताज़ा है और इसी पल धरती सबसे सुन्दर है उसने अपने तलवे से उन बूँद को महसूस किया. मैंने कहा यह तुम्हारे लिए ही था और तुमको प्राप्त हुआ उसने सुना कि आदमी को अपनी आज़ादी किसी को नहीं देनी चाहिए. मैंने उसका यह सुनना भी सुनते हुए कहा हाँ मैंने अपनी आज़ादी तुम्हें दे दी क्योंकि शायद प्यार में ऐसा भी होता है (जैसा कि आप देख सकते हैं मैं इतने देर से महसूस कर रहा हूँ) उसने स्पष्ट सुना कि अब वो एकतरफा प्रेमिका से रानी हो गयी है और हजारों दिलों पर उसका राज है और आने वाले दिनों में अलग -अलग उम्र के लोग उसका गुलाम बन जायेगे. जो नहीं बन पायेंगे उन्होंने यह सुना तो मुझ पर लानत भेजी. 

कई साल बीत गए और उन रह चुके गुलामों ने जब इस ज़िक्र को सुना तो वफादारी से साफ़ पलट गए. मैंने अभी अभी उससे भी यह कबूलते हुए कहा है कि हमारा समकालीन तथाकथित प्यार अमर था तो उसने सुना है कि अब इन बातों का कोई मतलब नहीं.

*****

(शीर्षक - नुसरत फ़तेह अली खान साब के गाये एक कव्वाली "ओ वादा शिकन" से. "ओ वादा शिकन" नाम की यह पोस्ट और कव्वाली प्रिय ब्लॉग हथकढ़ पर मौजूद है.)

Monday, November 29, 2010

पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है




"जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है जहाँपनाह, उसे ना तो आप बदल सकते हैं ना मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उँगलियों में बंधी है. कब, कौन, कैसे उठेगा ये कोई नहीं बता सकता है. हाः, हाह, हाह, हाह हा........"

काली पैंट, झक-झक सफ़ेद शर्ट.. और उसके उपर काली हाफ स्वेटर पहने मैं किसी अच्छे रेस्तरां में वायलिन बजने वाला लग रहा हूँ.. कल मैंने म्यूजिक अर्रेंज किया था... १२ लोगों की ओर्केस्ट्रा को जब निर्देश दिया तो सा रे गा मा प ध नी ... सब सिमटते और मिलते जाते थे... 
तीन  रोज़ पहले जब पुराने झील के किनारे मैं आदतन अपने गाढे अवसाद में बीयर की ठंढे घूँट (चूँकि शराब की इज़ाज़त वहां नहीं है) गटकते हुए  एक खास नोट्स तैयार की थी .. तब मेरी वायलिन जिस तरह बजी थी आज लाख चाह कर भी मैं वो धुन नहीं तैयार कर पा रहा हूँ. 
दर्द के वायलिन किले में भी सिहरन देती है और हम उन सारे कम्पन को समूची देह में दबाये घूमते हैं. 

ट्राफिक पुलिस वाले के लिए चलती रिक्शा का रोक देना कितना आसान होता है.... पर सवारियों को यूँ बिठाये हुए फिर से पहला पैडल मारना बहुत कष्टकारी होता है. भोर की इस सर्द हवा में कलेजा हिल जाता है. त्यागा हुआ पेशाब भी समतल या निचला रास्ता तलाशने लगता है. मैं अपना रिक्शा किसी किसी नोक पर छोड़ दूँ तो वो किधर जायेगा ?  इस शहर की कई सड़कें ऊँची हैं.. सरकार हमारे खिलाफ हो गयी है माँ.

हमने चाहता था आसमान की नदी में बाल्टी डूबा कर ढेर सारा बादल तुम्हारी मेज़ पर उड़ेल दूँ... फिर तुम अपने हाथों की चारों उँगलियों में अबीर की तरह वो बादल मेरे गालों पर लगा दो... ऐसा करते ही वक़्त और सीमायें हमें एक दूसरे से दूर कर देती.... 
अच्छा अगर मेरी बातों को को गुज़ारिश के इथन (नायक) से जोड़ कर ना देखो तो तुम्हें नहीं लगता कि मैं भी एक विकलांग हूँ और बैठे बैठे कल्पनाओं कि कोरी ऊँची- नीची, हरियाले और पथरीली उड़ान भरता रहता हूँ ? कितना बेबस हो जाता हूँ अपनी जगह ईमानदार स्वीकारोक्ति में .... तुम गिड़गिडाने  का मतलब समझती हो जिंदगी ? क्या एक ईमानदार वक्तव्य गिड़गिडाता है तो संसद में प्रधानमंत्री जैसा हो जाता है जो प्रतिपक्ष से घोटालों के बीच भी संसंद चलने देने कि गुज़ारिश करता है ? 

यह शाम का चार से छह बजना कितना दुर्गम है .. शरीर से जन्मा यह माइग्रेन नवजात बच्चे कि तरह गोद में पांव पटक रहा है. अब इसे ढूध कहाँ से दूँ ...

चन्दन कि लकड़ियाँ बतियाती हैं - क्या लगता है कितनी जल्दी यह हमारी गिरफ्त में होगा ? 

*************************************************************************************************************
यहाँ का पियानो कितना संगीन है ना माँ ?


Friday, November 26, 2010

मजनू को बुरा बताती है लैला मेरे आगे...


- सुन सहेली, क्या तेरा वाला भी तेरे को इतना ही प्यार करता है ?
- हाँ रे, इतना कि पूछो मत 
- फिर भी... बता तो ... कितना
- जब वो मेरे साथ होता है, मैं तितली बन उडती रहती हूँ. आसमान बन कर मेरे ऊपर छा जाता है, पहली बार अपने होने पर नाज़ होता है मुझे... तू भी बात ना.. मुझे अकेले बोलते शर्म आती है.
- मुझे भी वो बहुत चाहता है और मैं भी, अब तो खाना-पीना कुछ भी नहीं सुहाता.. हर आहट पर कान धरे रहती हूँ... लगता है आ रहा है... और तो और आज सुबह कपडे प्रेस करते वक़्त पापा की कमीज उसकी समझ के प्रेस कर दी ... पापा ने कहा - इत्ते अच्छे से तो आज तक तूने मेरी जुराब भी  प्रेस नहीं की.  वो गाना है ना " मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में " उसी टाइप
- ... हम्म... तो तू क्या सोचती है ?
- सोचना क्या है, बस प्यार करना है उसी से 
- और शादी ?
- छिः प्यार और शादी दो अलग अलग चीजें थोड़े ना होती हैं ?
- तो ?
- तो क्या ? शादी भी उसी से करुँगी
- तू बड़ी भोली है रे !
- और तू ? तू तो जैसे सबकी नानी है 
****
- जानती है, वो भी जब मेरे को अपने बाहों में कसता है दिल कसम से एकदम झूम सा जाता है
- अरे सच्ची, मन कितना भी भारी हो पर शरीर एकदम हल्का लगने लगता है 
- और जानती है जब मैं अपने वाले के पैरों पर पैर रख कर खुद को उस पर छोड़ देती हूँ तो ..
- तो ... बोलो बोलो ...
- तो मैं एक पंछी के जैसी हो जाती हूँ... उसके पैरों पर नाचना जाने कैसा लगता है..
- हाँ सही, और मेरा वाला तो मुझे अचानक से पलट कर धोखे से सालसा भी करने लगता है 
- तब तुझे कैसा लगता है री ?
- क्या कहूँ.. सालसा कम करता है और कानों में फुसफुसाते हुए आई लव यू ज्यादा बोलता है
- तो तुझे अच्छा नहीं लगता ?
- धत पगली,अब कैसे कहूँ कि अच्छा नहीं लगता ? अच्छा तो लगता ही है 
*****
- जानती है अभी बीते करवा चौथ में वो एकदम मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया 
- फिर ?
- फिर क्या, मैं टेबल के पास खड़ी थी, बाल धोये थे सो खोल रखा था, मेरी सारी उँगलियाँ टेबल पर उसका इंतज़ार कर रही थी
- अच्छा सुन , यह भी क्या कम हसीं बात है, जो तेरे लिए बाल है उसके लिए ज़ुल्फ़ है
- हाँ पता नहीं इतने रोमांटिक बातें कहाँ से लाता है........  खैर... सुन तो... 
- हाँ बोल  फिर क्या हुआ ?
- फिर, मेरे बाएं कान के झुमके को उठाया और आवाज़ में मिसरी घोल कर कहा - जानेमन, मेरे मुहब्बत में बर्बाद हो जाओ. 
- मेरा वाला तो मेरे दोमुंहे बालों को सहलाते हुए कहता है - दिलरुबा, इसमें गर्क हो जाने हो जाने दो 
- मेरा वाला भी यही कहता है 
*****
- देख आज उसने मुझे यह बाली दी 
- सोने की है ?
- यह तो नहीं पता, पर उसने तो यही कहा . 
- ह्म्म्म... 
- क्या हुआ पसंद नहीं आई तुझे ?
- ठीक है. 
- और एक बात कहनी थी तुझसे, किसी को कहेगी तो नहीं ? देख किसी को मत बताना 
- हम्म...तो कल सुबह तू भी उसके साथ भाग रही है.
*****

Thursday, November 18, 2010

तीन नंबर की ईंट वाली गली



रूम पर लड़की लाना कोई बड़ी बात नहीं थी वो साकेत से उठाई जा सकती थी और आज २ अक्तूबर यानि ड्राई डे  को भी दारु को जुगाड़ करना भी कोई बड़ी बात नहीं थी वो मुनिरका से मंगवाई जा सकती थी.  बड़ी बात तो अपने साए से पीछा छुड़ाना था. वो डर जो अकेले में आँखें बंद करते ही पैर के अंगूठे को अपने मुंह में लेने लगता है. एक गर्म गलफड़ा अपना भाप छोड़ते हुए बहुत मुलायम लेकिन अघोषित निवाला बनाने लगती है. वो जीव जो रासायनिक प्रयोगशालाओं से निकला लगता है और तमाम हानिकारक अम्ल से लैस है...

...और गर्म गलफड़े में भाप की गर्मी से अंगूठा गायब हो जाता है.

अब तो घुटने पर है .. 

यह डर  खाए जाता था. सर के ऊपर घूमता पंखा सीने पर गिर जाता और उसकी सारी डालियाँ अलग-अलग हो जाती.. एक पंखा सीने में भी चलता है, थोडा बीमार सा कम वोल्टेज में जैसे चलता हो... जैसे अब प्राण पखेडू उड़ने वाले हों. और यह लगना पिछले कई सालों से चला आ रहा हो और अब यकीन हो चला हो कि अबकी भी मरना नहीं है अलबत्ता मरना महसूस करना है उसकी प्रक्रिया से होते गुज़ारना है. 

नीचे देखता तो लगता अब धरती  फट जाएगी तो मैं उसमें नहीं समां सकूँगा क्योंकि समाते तो दिव्य लोग हैं. वहां से मैग्मा निकलेगा और मुझे अपने में मिला लेगा. 

लेकिन धरती से छुटकारा नहीं था. आसमान में जाया जा सकता था और वहां जाने में अभी वक़्त था पर कितना ? यह बताया नहीं जा सकता. तो उससे सीधा सामना करने के लिए मैं खुले में भी सोया तो लगने लगा कि अब आसमान फट जाएगा और सहस्त्रों साल की बारिश होगी. मेरे को छोड़ कर सारे लोग डूब मरेंगे और मैं किसी महामारी का शिकार होकर मरूँगा. लेकिन इस मरने में भी अभी वक्त था. कितना ? यह पता नहीं . 

इस प्रोसेस में थरथराहट होती, सिहरन सी होती जैसे फॉर प्ले में होता है. इसे मैंने कई बार अपनी प्रेमिका में देखा था. अतः मरना, सिहरन था. एक कम्पन था. सेक्स में क्लाइमेक्स का कम्पन. स्खलन से ठीक पहले का रोमांच और एकाग्रता.   बिजली के ग्यारह हज़ार वाट से गुजरने का कम्पन के पश्चात् भस्म हो जाना था. किसी मेट्रो के आगे फैंक दिया जाना था. शरीर का तीन लगभग बराबर टुकड़ों में अपने अपने तरफ लुढ़क जाना था.  पहाड़ से सख्त चट्टान पर सर के बल फैंक दिया जाना था. 

डरना मरना था, और मरना ही डर था. यह आना था. यह लाज़मी था. पर यह ऐसे स्वीकार्य नहीं था. यही लड़ाई थी. डर यह लड़ाई जीत जाया करता था. कई बार हार-जीत के मुहाने पर मैंने प्रतिरोध भी किया था. यह हिंसात्मक रास्ता था. मैंने यथासंभव उसको चोट पहुँचाया था. वह लौटा था बहुत बार. यह डर जिस्म में जैसे-जैसे घुसता मेरा अपनी प्रेमिका को पकड़ना तेज़ हो जाता. अपने डर से भागा हुआ गुज़ारे पलों में अनुभवी मैं और कर भी क्या सकता था (मैं कन्विंस नहीं कर रहा). थोड़ी फिक्रमंद और अपने जिंदगी में खुश उपासना (मेरी प्रेमिका) भी थी लेकिन अकेले में लाख कोशिश करता कि हम दोनों एक-दूसरे को और बेहतर जानें और इस तीन नंबर की ईंट से बनी गली में हाथ पकड़ कर जोर से भागें तो इसके पीछे जिंदगी जीने का उत्साह नहीं था. पीछे था, तो एक उन्मादी भीड़ जिसमें भागते वक्त मेरे जूते भी छूटे थे और उपासना के जेवर भी गिरे थे. भागते हुए हमने एक एक बच्चा भी देखा था मासूम सा अपनी आँखों में गोधरा का खौफनाक हिंसा समेटे.. वहीँ बायीं ओर एक और बच्चा था वो सिर्फ दिखने में बच्चा था हाथ पेशेवर गोश्त काटने वाले जैसे थे और वो यों हंस रहा हो जैसे जाओ यह भीड़ तमाम गलियों का पता जानती हैं और संभव हुआ तो मैं ही इसे लेकर तुमरे पास आऊंगा... 

सचमुच, डर से बचने को कोई रास्ता ना था, उपासना पर बहुत प्यार आता तो भी उसके बदन से गुज़रना होता. बदन से गुज़रना तब भी होता जब समर्पण में होता, इबादत में होता, शराब पी कर मर्दाने गुरूर में होता या फिर इस हेलिकोप्टर के पंखे सा सांय-सांय करते डर से...

इससे इतर करने को कुछ भी नहीं था. एक भयंकर उब थी शायद जब खुदा ने सम्भोग बनाया और इसमें सिनेमा के कल्पनालोक जैसा रोमांच भरा. इससे जब भी उबरे फिर वही हेलिकोप्टर का पंखा, सांय-सांय करता डर... 

Saturday, November 13, 2010

ये करें, वो करें, ऐसा करें, वैसा करें !



With the first light of dawn, came the twittering of birds from the bamboo groves of a nearby village. That filled her with foreboding. She was not sure how she would relate now to the world of the living.

स्क्रिप्ट राइटर ने वर्ड पेज खोला और कुछ लिखने की कोशिश करने लगा.. स्क्रीन पर कर्सर ब्लिंक करता हुआ उसके उँगलियों की प्रतीक्षा करने लगा... कर्सर आधे सेकेण्ड प्रति मिनट की दर से गायब और प्रगट होता यों ऐसी हरकत कर रहा था जैसे उसे उकसा रहा हो कि  - लिखो यार !

लेकिन ऊपर जो रवीन्द्रनाथ टैगोर का पैरा दिया है उसको आधार मानकर उसे वह आगे नहीं बढ़ा पा रहा था. घटनाओं से वो खुद को रिलेट नहीं कर पा रहा था. उसने पत्रकारिता कोर्स के दौरान टेड ह्वाईट की किताब में पढ़ रखा था कि कई बार दिमाग में खबर नहीं बनते. ऐसे में दिमाग में आते ही नहीं कि शुरुआत कैसे करें, क्या लिखना है. ऐसे में बिना कुछ सोचे-समझे कुछ लिखें और मिटा दें लय पकड़ में आ जाती है ... स्क्रिप्ट राइटर ने भी यही किया. वह कुछ लिखता और सात से आठ शब्द टाइप करने के बाद बाद मुंह से चक्क  मारकर, बैकस्पेस ले मिटने लगता... जिस की-बोर्ड पर उसकी उँगलियाँ सिध्हस्त पियानो वादक जैसी चलती, जो नुसरत फ़तेह अली खान के कव्वाली सुनकर और दुगनी रफ़्तार से भागने लगता, जिसके खट-खट से पूरा केबिन गूँज उठता और देखने वाले अगर अपने आँखों का लेंस जूम कर लें तो फर्क करना मुश्किल जाएगा कि यह उँगलियाँ स्क्रिप्ट राइटर की  हैं या फुर्ती से पियानो पर भागते अदनान सामी की. 

कुछ लिखना और उसे मिटा देना ऐसा कई बार होने पर लगा कि उसकी कलम कुंठित हो गयी है या फिर भाषा बड़ी दरिद्र होती है क्योंकि घटनाओं को वह वैसा शब्द नहीं दे पा रहा था जैसा उसने देखा था या लिखने का सोचा था.  

स्टोरी -1
एक दब्बू लड़का एक लड़की को फूल दे रहा है और लड़के के चेहरे पर लाज भरी प्रसन्नता उसके रोम - रोम में घनीभूत होकर फैली हैं. लड़की के पैर काँप रहे हैं और वो थरथरा सी गयी है. उसने यह लिखा लेकिन पूरी तरह ऐसा नहीं हुआ था. राइटर वो लिखना चाहता था जो छूट रहा था. अतः उसने लिखा और फिर मिटा दिया. 

स्टोरी -2
पार्क में एक अधेड़ उम्र का आदमी बुरी तरह थका हुआ है. वह जोर - जोर से हांफ रहा है. किसी एकांत जगह पा कर वह जोर जोर से साँस लेने लगता है. उसमें सुकून था, ऑक्सीजन तो था ही . उसकी छाती अब भी लगभग चार से पांच सेंटीमीटर तक फूल जाती है. वो पसीने में तरबतर है. - राइटर ने यह लिखा भी लेकिन  फिर से एक बार उस लिखे को पढने पर लगा कि नहीं ऐसा नहीं हुआ था, यह पूरी तरह वैसा नहीं था जैसा मैंने देखा और लिखने का सोचा था. 

स्टोरी -3
दरवाजे का सांकल लगा कर वो जैसे ही पलती एक और काम याद गया उसे, रात के एक बज आये थे और अब बाहर जाना निहायत बेवकूफी भरा फैसला था. फिर भी मन में काफी देर उधेड़बुन चलता रहा, एक मन कहता थक गयी है आराम कर ले, कल कर लेना. दूसरे ही पल लगता- नहीं, यह बहुत जरुरी है, करना ही होगा. उफ्फ्फ कुछ समझ नहीं आ रह क्या करें.. - राइटर ने यह लिखा लेकिन यह भी पूरी तरह वैसा नहीं था जैसा उसने देखा (कल्पना में) और लिखने का सोचा. 
  
इससे पहले, राइटर को तब बड़ी कोफ़्त होती जब लोग या अच्छे-अच्छे लेखक भी कहते कि "मैं इतना आभारी हूँ कि इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता. मैं इतना भावुक हो गया की बता नहीं सकता, वो इतनी खूबसूरत है की कहा नहीं जा सकता. सोमालिया इतना गरीब देश है की बताया नहीं जा सकता.... इस पर खीझ होती कि बताओ यार, आम आदमी होते तो कोई बात नहीं थी एक लेखक होकर भी अगर शब्द नही दे पा रहे हो तो कैसी समर्थता ? योग्यता पर प्रश्न चिन्ह है यह तो ? 

अब उसे लगने लगा कि वाकई हमारी भाषा ही गरीब है. हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं है. एक सीमा तक ही हमारा ज्ञान है. महज़ कुछ शब्द ज्यादा पा कर हम औरों से आगे हो लेते हैं.

इस तरह, किसी घटना, किसी स्क्रिप्ट, किसी स्टोरी से रिलेट ना करते हुए उसने इस कमी से खुद को रिलेट किया. और आज जब इस पर भी वह लिखने बैठा है तो वह यह सब  मिटा देना चाहता है क्योंकि यह भी ऐसे नहीं लिखने का सोचा था. सोचा तो था कि पूरी बारीकी से  लिखूंगा.. हर एक बात जो हुआ वो भी और जो ना हुआ वो भी. लेकिन असल काम के नाम पर यही शब्दों का पुलिंदा तैयार होता है हर बार.

......................................................................
इधर, कर्सर अब भी ब्लिंक करता हुआ चिढ़ा रहा है.

Wednesday, November 10, 2010

तालमेल

मलिन आत्मा ने अपनी केंचुल उतारी, ड्रेसिंग टेबल के दराज़ में पड़ी कुंवारी काज़ल की डिबिया से सपनो का काजल निकाल अपने आँखों में लगा लिया. अब दुनिया वैसी नहीं थी जैसी पिछली रात थी. स्याह काली.  मुस्कुराकर वस्तुओं को देखना आ गया था. किसी की बात शांत चित्त से सुनता. इन्द्रियों के गुण दुनिया में फिर से सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक लगने लगा था. छूना, देखना, महसूस करना, सुनना इन सब प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए रोमांच हो उठता था. मौसम के साथ यह बदलाव सुखद था. रही सही कसर तब पूरी हो गयी जब हथेली से पतली परत हटा कर प्रार्थना के नदी में बिना तैराक हुए कूद पड़ा और तलहथी से जा लगा. पर शरीर अभी एक पानी में फूला हुआ लाश नहीं था जो तली से टकराने के बाद गेंद के तरह नदी के सतह पर जा जाता.

इस नदी में समर्पण था, अपनी रूह ईश्वर के नाम कर देने का. क्षण -क्षण प्रतिपल रोमांच का अनुभव करते हुए स्वयं को हवाले करने का. आँखों में आंसू थे, रहस्यमयी साक्षात्कार के जिससे लगता पवित्र हाथ आत्मा पर हाथ फेर रही हो और कांटें गिलहरी के त्वचा में बदलती जा रही हो. परिवर्तन संसार का नियम है यह गीता में उसने पढ़ रखा था लेकिन यहाँ स्वयं से साथ घटित होता देख विस्मयकारी अनुभव था. 

यह सुख का क्षण था जिसे संत परम आनंद कहते थे. एक गुज़ारा हुआ सुख और भी था जिसे जिंदगी कहते हैं. जिंदगी इसे भी कहते हैं किसी एकाकी पल में लेकिन अभी यह आत्मा की अभिव्यक्ति थी तब जीवन की अभिव्यक्ति थी.

नाभिक पर दोनों तरफ से जोर पड़ने पर शक्तियां बराबर बंट रही थी जिस एक पर पहले गुरूर था वो समय के साथ क्षीण पड़ता जा रहा था. यह दबाव नहीं था पर यह होना था और इस यज्ञ के आवाहन के लिए ही आत्मा ने प्रार्थना की नदी में छलांग लगायी थी. फिलहाल यह सोचना नहीं है कि पहली शक्ति के चले जाने से प्रलय आ जायेगा तो  निर्वाह कैसे होगा. आत्मा उदार हो चला था. वह स्वार्थ छोड़ दूसरे (हुए, अपने ) के लिए विनती करने लगा था. कुछ देर के लिए उसमें माँ का अंश आता तो कभी वो परम पालक पिता बन जाता. लेकिन यह सब अंतरतम में ही घटित हुआ जा रहा था. सम्बन्ध के संबोधन के आधार पर वो माँ था, ना पिता. 

शरीर से कपडे उतारे जा रहे थे. कपडे लेने वाला समय था. चीर - हरण हो तो रहा था पर इसकी सहमति देनी ही थी. इस प्रथा में कर्त्तव्य निर्वहन और सामाजिक रीत जैसे बड़े बड़े शब्द थे.

घर से निकल कर जब भी शरीर भारमुक्त अनुभव करता है शरीर सात्विकता छोड़ फिर से रक्तस्नान करना चाहता है. जिसकी धारा गर्म हो उबलती हुई, जिंदगी सी.

Monday, November 8, 2010

लाइफ टेंड्स टू किधर ?



          माथे पर जब भी ठीक से टीका नहीं लगा तो मन वहीँ अटका. बस नहीं पकड़ सका तो बड़ी कोफ़्त हुई. नल में पानी नहीं आया तो 4 घंटे उसके फ़िक्र में खोया रहा. रात भर बिजली नहीं रही तो रात के कई घंटे उसके गौरो फ़िक्र में रहा. 

         अक्सरहां ऐसा होता है जो हो जाता है उस पर नहीं सोचते और जो नहीं होता वो घर बना कर बैठ जाता है. यह डर नहीं है ना ही कोई पूर्वाग्रह बल्कि कई बात तो सफलता पूर्वाग्रह कि तरह आता है. जब काम करने को हुए तो पहले कि सफलता से हो गए काम याद आते हैं. हमने कभी उतना नहीं सोचा. सोचा तो बस इतना कि देखे अबकी क्या होता है या इस बार ऐसा करूँ तो कैसा होता है ? यहाँ सफलतापूर्वक पहले हुआ ठीक यही काम एक पल के लिए दिमाग मैं कौंधता है पर उससे संतुष्टि मिली थी और नहीं होना बेचैनी देता है.

मैं कह सकता हूँ कि ये ना होना कई और चीजें होने कि वजह बनती हैं. 

विचारशून्यता का होना, विचार का होना, उसे कहना और उस पर अमल करना यह सब अलग - अलग बातें हैं ठीक वैसे ही जैसे घर में दर्जनों ए.सी. लगाकर पर्यावरण में चिंता जताते हुए इस मुद्दे को बड़ा बताना और इसके लिए किसी कैम्पेन में शामिल होने की गुहार करना.

समझदार लोग चिंता करने को बुरा बताते हुए निश्चिन्त होकर जीने कि सलाह देते हैं, खुश रहने के टिप्स देते हैं यह वे लोग है जिंदगी को बेफिक्री और बिंदास जीने को कहते हैं अलबत्ता यह काम वो संजीदगी से कर रहे होते हैं. 

कोई मेरे मन के आँगन में आ कर देखे कि उलझने कैसे चूजे बन कर अपने नन्हे नन्हे क़दमों से चहचहाते हैं. 

किसी चीज़ को परिभाषित ना कर पाना कैसी अक्षमता है. फिर काहे का पढना और इत्ती सारी बातें ? बातें बहुत हो जाती है, चर्चाएँ और बहसें निकल जाती हैं और जब किसी निष्कर्ष पर जाना हो तो चौराहा आ जाता है. नहीं, इसे चौराहा क्यों दसराहा कहना उचित होगा. पर यह भी तो कोई निष्कर्ष नहीं. केलकुलस में अक्सरहां पढ़ते रहे  'एक्स टेंड्स टू जीरो' {X → 0}  लेकिन मास्टर ने यह नहीं बताया कि लाइफ टेंड्स टू किधर ?

दिमाग में संलयन होना चाहिए पर होता विखंडन है पर इससे भी इतर यहाँ इस प्रक्रिया के दौरान न्यूत्रोन के सिर्फ तीन कण कहाँ हमला करते हैं ? अकेले हम ना जाने कौन से और किसके रथ का पहिया लिए इस चौतरफे (?) (क्या सिर्फ चौतरफा, यह भी सोचना, देखना होगा ) हमले से बचते हुए मारे जाते हैं. 

यह सब तुम्हारी याद के बाइस हैं जिसे हमने बड़े दर्द से सींचा है, संजोया है बड़े जतन से, तकलीफ को सहेजा है, पालपोष  कर बड़ा किया है एक जवान बेटे कि तरह जो रोज़ दोपहर ढलने के वक्त कोई ना कोई जिद पकड़ता है, रूठ कर, लड़ कर शाम को आवारगी करता है और रात के दस बजते-बजते फिर से घर कि ही मुफ्त में मिलने वाली रोटियां तोड़ रुलाते हुए सुलाता है. हर रोज़ यह सोच कर मैं मरा हूँ कि अब मुझे जीना है.

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...