Wednesday, December 29, 2010

जलता और पकाता चूल्हा



(विंध्यवासिनी मंदिर के ऊपर एक छज्जे पर बैठे दो कबूतरों की बातचीत (एक नर, एक मादा)  ज्ञातव्य हो की दर्शन की बेला है और दोनों बातचीत में बार-बार अपने चोंच और नज़र को सीढ़ियों पर चढ़ते लोग की तरह इशारा कर रहे हैं )

एक घर होता है जहाँ तुम पैदा होकर बड़े होते हो. कुछ रिश्तेदारों के बीच एक और किरदार दिखता है जिसका आम सा संबोधन नहीं होता या घिसे हुए संबोधन होने के बावजूद वो खून का रिश्ता नहीं होता. पर उस किरदार का पूरे परिवार में और लिए जाने वालों फैसलों में पूरा दखल रहता है. तुम्हारे  पिता के बाद वे मुखिया का स्थान ले लेते हैं. तुम बड़े होने तक नहीं जान पाते कि यह आखिर हैं कौन... पहले तो सिखाया जाता है कि इस किरदार को यह पुकारो, पर जब अक्ल खुलती है फिर पड़ताल करने पर यह पता चलता है कि इसका हमारे खानदान के खून से कोई रिश्ता नहीं .. यह एक अपरिभाषित रिश्ता है, एक अनाम सा जिसे तुम बुआ, ताई, जिज्जी, काकी या फिर नाम से ही बुलाते रहे हो. यह किरदार घर की भलाई के बारे में तुम्हारे पिता (अगर जिम्मेदार हुए तो ) से कम नहीं सोचता. ऐसा होने के कारण कई रहे होंगे और अब चूँकि वो अपनी जवानी खो चुकी है और सारे बदनामियाँ और जालालत उस उम्र में दोनों ने अपने सर माथे ले चुके हैं और पूरा परिवार इसका अभ्यस्त  हो चुका है तो हम भी सोचना छोड़ इस रिश्ते को वैसा ही अपना लेते हैं जैसा सब मान चुका है. फिर कोई खोट भी नहीं दिखती क्यूंकि ना उसके बच्चे हैं और सारा प्यार तुम पर उसके द्वारा उडेला जा चुका है सो कोई संदेह नहीं बनता. जिससे पिता शादी नहीं कर सकते थे लेकिन उसे छोड़ भी नहीं सकते थे, वो दंगे में मिली होगी, वो मर रही होगी, उसने तुम्हारे पिता को कुछ ऐसे प्रोपोज किया होगा कि वो इनकार नहीं कर सके होंगे, कुछ कसम होगा, कोई रसम होगा कुछ नहीं तो इंसानियत होगा.

-आह इंसानियत (आज के सन्दर्भ से उठ कर बोलें) कितना गर्म शब्द है ! इस सर्दी में ठिठुरन का एहसास देता हुआ

- तुमने ठीक समझा ठिठुरन तभी होता है जब थोड़ी गर्माहट लगनी शुरू होती है.

(कबूतरी अचानक थोड़ी मोटी हुई जाती है, लगता है किसी ने हाथ से उसके सारे पंख उलटे कर दिए हों)

- ओह तुम्हारे फर रजाई जैसे हो गए हैं, लगता है रोंगटे खड़े हैं 

- ह्म्म्म... अभी ठीक हुआ जाता है 

- इसका एक इशारा और भी है कि तुम्हारी खून अब तक गर्म है और तुम जवान हो 

- उफ्फ़ जवानी ! यह तो और भी गर्म शब्द है  

- कितना गर्म ?

- तुम्हारे उफ्फ़ में मौजूद ठंढेपन कि तासीर जैसा गर्म ... 

- गर्म ! गर्म भी कितना गर्म होता है, मिजाज़ का गर्म होना जैसे मैं... बदन का गर्म होना जैसे तुम, 

- उफ्फ्फ... 

- इस जवाब में वजह वाली गर्माहट थी. 

- तुम्हें कुछ हुआ ?

- हाँ मेरा दिल धड़का. 

- तो समझो तुम भी जवान हो.

- मेरे जीवन में तुम भी वही किरदार हो, अपनाई हुई पर अलग, अलग और साथ-साथ, साथ साथ और दूर दूर, दूर-दूर और करीब, करीब लेकिन शारीरिक सम्बन्ध की निषेध आज्ञा के फरमान के घेरे में

- हाँ, अपरिभाषित, एक मौन समझौता... मौन, शांति, चुप्पी, शरद चांदनी की रात में बर्फ के उजले फाहों जैसा, नीरव शांति में टूटता पत्ता जैसा. धूप का ज़मीन को छूने जैसा, रूई का वातावरण में विलीन हो जाने जैसा.  

-  देखो ज़रा, शोर मचाते हुए लोग कहाँ -कहाँ नहीं जाते. 

(दोनों नीचे देखते हैं फिर एक दुसरे से नज़रें मिला कर तसबीहें फेरने लगते हैं )

Tuesday, December 21, 2010

कुरेदो जरा राख के वहाँ आग है क्या ?



सूत्रधार : पहाड़ पर बिछे हुए कोयलों में सुलगने की गुंजाईश है ... जिस को बाहर से दुनिया बंजर मानती है ... ढलानों पर ज़रा ज़रा सा फिसलन होती थी उन कोयलों का ... थोडा सा फिसलता ... राख उडती और लगता जैसे सब शांत है. जो गोला अन्दर फटता रहता उसका इल्म नहीं था... और जिन्हें था वे शिक्षित और समाज में पागल करार दिए जा चुके थे. समाज यह कर के अपने दायित्व के निर्वहन से स्वयं को च्युत मान चुका था... हालांकि उसका पाठ्यक्रम बहुत बड़ा था लेकिन सुविधाओं की लिंक ने सब काम आसन कर दिया था .. हैरत यह थी इतने के बाद भी हर दिन किसी ना किसी चीज़ की डेडलाइन होती ... लोग तनाव में रहते थे नतीजा बालों का झाड़ना और रुसी का होना था... एक बड़े वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यही थी...लोग इस पर बातें करते थे... 

/संगीत/

रजाई में पैर गर्म हो जाते थे. भुने हुए आलू के पराठे और उस पर हरी चटनी की सुगंध ने आँखों से बहरा और कानों से अँधा बना दिया था.. लेकिन यह सुख स्वीकार्य था और इस सुख के सब कुछ त्याज्य था... इस सुख की फेहरिस्त लम्बी थी. ईमानदारी से कहूँ तो इसकी फेहरिस्त अंतहीन थी... गैस की पाईपलाइन किचेन तक बिछी थी. माईक्रोवेव में खाना सेट टाइम के मुताबिक सेकेण्ड में गर्म हो जाता था... उँगलियों पर फेंटसी पूरे करते चैनल्स थे... आप कहेंगे "शिल्पा नाच !" वो भी दिखेगा, आप कहेंगे ऐश्वर्या चूम तो वो भी मिलेगा... इस सबसे परे बंगलों में वाईल्ड शौक पुरे करने के लिए जिगोलो से लेकर बाल मजदूर तक थे... औकात मुताबिक फैले हुए थे. Its just ridicules ना !

/संगीत/

बेकारों की बात करना लोगों को अपशकुन लगता ... मतलब कुछ इस तरह का कि जैसे उनकी चर्चा या समस्याओं पर बात करने से वो भी बेरोजगार हो जायेंगे... यह आम आदमी का हाल था... वहीँ, संसद के गलियारे में और एन जी ओ में ऐसे मुद्दों कि जरुरत थी ... यह वहां जलते कोयले थे ... बेतर तरीके से सुलगते थे इनपर रोटी भी बन जाती थी और गर्म खून के कारण सोने से पहले सर्दी में हाथ भी थोडा सेंक लिया जाता. मैं कहता हूँ क्या हर्ज़ था! कुछ भी तो नहीं. वहीँ जो मुद्दे नहीं हैं उसे एक मुस्कान के साथ दोनों हथेलियों को रगड़कर और "क्या लगता है" का गर्म और जोशीला मुद्दा बनाने का काम समाचार एंकर दबाव में भी कुशलता से कर रहे हैं.

/संगीत/

भारतीयों में कुछ उत्तर के थे, कुछ दक्षिण के थे, दक्षिण के उत्तर में नहीं आते थे या फिर गरज होता था तो आ भी जाते थे. इसी तरह उत्तर वाले भी चले जाते थे उनको गरज तो था ही... उत्तर भारतीय, दक्षिण के शुक्रगुज़ार थे. दक्षिण राजा था. वहीँ पूर्वोत्तर पूरा कटा हुआ था... दिल्ली जिसके जिस्म पर हंसिये के कई निशान थे वो अस्सी हज़ार करोड़ खा कर किसी तरह फिर से उठ खड़ा हुआ था.. लोग उसकी हिम्मत को दाद देते थे. और कोई चारा भी नहीं था क्योंकि चारा तो बिछाया जा चुका था सो वो मवेशी बनकर यह चारा चरने आ रहे थे...  यहाँ सी सर्दी और गर्मियों का जिक्र किताबो में होने लगता थे जिसे पर्यटक दूर दूर से देखने/ भोगने आते थे. कुल मिला कर बड़ा खुबसूरत शहर बन पड़ा था. कनौट प्लेस की चुनिन्दा रेस्तरां के नाम लोग मक्का काशी की तरह जानते थे. 

/संगीत/
हाँ तो पूर्वोत्तर जख जिद्द खाए बच्चे कि तरह एक ही शिकायत कर रहा था - दिल्ली मुझे अपना हिस्सा नहीं मानती... वहीँ दिल्ली को सिर्फ उधर गुवाहाटी दिखती...  हमारा पडोसी इसे देख रहा था... आप भी देख रहे हैं ना. 

ले दे कर आर्थिक राजधानी बची है - बम्बई (आई ! राज ठाकरे माफ़ करें, जुबान ही था, फिसल गया ! क्या ? अब पेशी देनी होगी ! ) मुंबई, वो विदेशी राजनेताओं द्वारा लिए जा रहे "दिलचस्पी" और बीस हजारी सेंसेक्स में धुत है. 

फेसबुक पर समाज में क्रांति कि मुहिम चल पड़ी है. दहेज़ प्रथा के खिलाफ से लेकर ईराक और अफगानिस्तान में लोकतंत्र के ठेकेदार (अगर माई बाप अमेरिका के हितों को नुक्सान ना हो तो !) द्वारा विकिलीक्स पर लगाम लगाने कि बात चल रही है.

मैं अपनी स्थिति इस पहाड़ से उतरते सायकिल सवार की तरह पाता हूँ.. ढलान आराम दे रहा है. मैंने पैडल मारना छोड़ दिया है.सायकिल ने खुद ही नीचे जाने की रफ़्तार पकड़ ली है.  सायकिल की चेन टिक-टिक-टिक-टिक कर रही है. (आप देख रहे हैं ना मुझे सायकल चलते हुए और मेरे चेहरे पर अब उग आई मुस्कान को ! आप देख रहे हैं ना !)

नज़र दौड़ता हूँ तो कहीं थोडा, कहीं बड़ी मात्रा में कोयले का सरकना अब भी दीखता है.. सरकार ने उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र, बीमारू राज्य, दलित, शोषित समाज, बेरोजगार, अत्यधिक जनसँख्या वाला राज्य आदि नामों से सुशोभित कर दिया है... (सुना है इससे पंचवर्षीय योजनायें बनाने में आसानी होती है) इस हीरे जडित हार सा नाम पा कर वो चमक उठा है. सभी प्रयासों में लगे हैं सरकार भी और हम भी भई !

अब गिन लीजिये आज अपने घर के लोग तो पूरे हैं ना ! हैं ? बस्स्स ! हुफफ्फ्फ्फ़..... thank god ! 

नमस्कार!

/संगीत/

Saturday, December 18, 2010

दीबाचा

जिंदगी मौत का दीबाचा (भूमिका) है, क्या अजब कि इनको पढ़कर आपको मरने का सलीका आ जाए  
 ----- सआदत हसन मंटो 
*****

बड़े से आँगन के किनारे ढेर सारी अगरबत्तियां जल रही हैं... कुछ लोग खाना खा रहे हैं ... एक आदमी के सामने मैं बैठा हूँ... हालांकि वो खा रहा है फिर भी जबरदस्ती उसे खाने का आग्रह कर रहा हूँ. वो हाथ लगाकर इनकार कर रहा है. मैं ताली बजाकर परोसने वाले को बुलाता हूँ. लड़का बाल्टी ले कर आया है. खाने वाला शोव्ल ओढ़ कर बैठा है.. वो नहीं खाना चाहता ...लड़के के आते ही वो पत्तल लेकर उठ पड़ा है... गीली दाल किनारे से बहने लगा है... वो आदमी अब लगभग उठ खड़ा हुआ है... 

मैं उसका हाथ पकड़कर उसे उसकी जगह पर बैठने का जिरह करता हूँ... बहुत मान मनौव्वल के बाद वो बैठ जाता है. वो और खाना लेने से फिर से इनकार कर रहा है. उसका हाथ बार बार उत्तेजना में सख्त मनाही के रूप में उठता है... मैंने जिद बाँध ली है...

पत्तल की दाल अब लगभग ख़त्म हो चुकी है... टप... टप... टप ! जैसे सईदा की पायल .. छम.. छम.. ! छम...छम... ! 
छिः ! मैं श्राद्ध भोज में भी कैसी बातें सोचता हूँ.

आँगन और बरामदे की लीपी गोबर से हुई है. ताज़ी लिपाई की हलकी सी महक गर्म होती हवा में घुल रही है. आँगन के बाहर द्वार पर झुके हुए रातरानी के पेड़ हैं. नवम्बर में यह शाम साढ़े पांच बजे से ही महकने लगता हैइसकी गंध तीखी हैमाथे में चक्कर आता है... सभी लोग नशे में हैंखाना खा रहे हैं ... नशे में ज्यादा खाते हैंनशे में खाने से ज्यादा खिलवाड़ करते हैं... नशे में खाने से ज्यादा फैंकते हैंयह बात मैंने अपने पूर्वजों से सीखी थी.... नशे में  लोग सब कुछ ज्यादा करते हैं... मेरा एक दोस्त खुद धतुरा खाने के बाद अपनी बीवी को भी भांग खिलाता है... भांग से ज्यादा वक्त तो जरूर लगता है .. मेरा एक और दोस्त भांग खा कर ज्यादा कवितायेँ पढता है. अमृतेश नशे धुत होकर अपने बहुत पछताता हैमेरा एक दोस्त नशे में शांत हो जाता हैएकदम शांतमेरा एक और दोस्त (मुझे नाम नहीं याद आ रहा चूकि मैं भी नशे में हूँ) मेरा एक और दोस्त.... ओह ! मेरा एक और दोस्त....  लाफ्दाफ्ताफ़....लाफ्दाफ्ताफ़... (लडखडाई/बौरायी जबान)

मैं कहाँ था... हाँ... खेत में... मेड़ काट रहा था... उस तरफ पानी जाना चाहिए अब... क्या ? ! नहीं ऐसा तो नहीं था... चांदनी रात में खेत में मेड काट कर पानी बहाना कितना सुखद है... लेकिन मैं कहाँ था यहाँ तो नहीं था... हाँ मैं अपने बाबा का गर्म शोव्ल पकड़ते चल रहा था... कितना गर्म था वोदादी के कहानी जैसी.. नर्म सी... माँ जब चूल्हे के पास रोटी बेलती थी तो दोनों हाथों में आधा-आधा दर्जन चूरियां हौले हौले बजती थी.. कैसा संगीत था वो उफ्फ्फ... मेरा सर दर्द से फटा जा रहा है... हाँ आराम आ रहा है अब... मैं टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चला जा रहा हूँ ... थोड़ी थोड़ी देर पर सर में अचानक से चक्कर उठता है ... लगता है किसी ने मेरी बुद्धि हर ली है.... चाँद परात में गिरा हुआ है मेरे पैरों के पास... सबको नशे में रहना चाहिए... सूरज चाँद दूर थोड़े ना हैं... होश में आदमी कैसी पागलों वाली बातें करता है... प्लान बनाने लगता है ये चाहिएवो करना है... फलाना -ढीम्काना.... लाफ्दाफ्ताफ़....लाफ्दाफ्ताफ़... 

बैठो यारखा लो थोडा सा औरहाँ ढूधवाले तुम भी पैसा ले लेना... काकी तुमको सत्तर रुपैया देना है ना ...  क्या कहा ! दादी ने बाद में ढेड सौ रुपये और लिए थे ... मतलब तुमको तीन सौ रुपये देने हैं. अरे रहने दो नासीधा हिसाब - तीन सौ देने हैं .... पीछे से गाडी की आवाज़ आ रही है... हांय ! यह तो ट्रेक्टर है... मादरच *** सारा कीचड हमें पर उड़ा गया... लाफ्दाफ्ताफ़....लाफ्दाफ्ताफ़... 

सरकारी स्कूलइसकी खिड़की के दो रोड तो मैंने ही तोड़े थे... यहाँ से काने हेडमास्टर को गरियाना ... आह ! बचपन फिर से लौट आये... क्लास टीचर चमचमाता कुर्ता पहनते थे ... कितने खिले हुए लगते थे... सांवले से शरीर में बंधा हुआ रेशम लगता था... उसकी बेटी ने मुझे पहली बार तब देखा था जब उसे खजूर के बीज से मारा था.... इनारे के पीछे आधे घंटे बैठे थे... कुल ढाई घंटे तक उसे भगाए रखा था... हडकंप मच गया था उस दिन... .. घंटा ! कहाँ गया था उस दिन अनुशासन का डींग हांकना... पहली बार मेरे कारण स्कूल में आधे दिन पर छुट्टी हुई थी...  

जिस साल आम होता हैउसी साल लीची भी आती है... दोनों का क्या रिश्ता है आखिर... अबकी दुर्गा माँ किस पर सवार होकर आ रही है आशिन मेंछह महीने तो पानी में ही खेत डूबा रहता है.. गेंहू का रंग कैसा सुनेहरा हैदुनिया क्यों सोने के पीछे मरती है गेंहू ... हाँ गेंहू जब पकती है तो माँ के दामन जैसा लगता है जब खड़ी - खड़ी खेत में लहराती है तो ... तो... तो ...

उस पार ले चलोगे नाव वाले बदले में अपने गमछे से तुमको कुछ मछली पकड़ कर दूंगा.... यह देखो मछली.. इसका गलफड़ा कितना लाल हैताज़ा ताज़ा... !! तेरी बेटी की देह से भी मछली की गंध आती है शादी करा दो मेरी उससे... गोड़ पड़ता हूँ तुम्हारे ... शादी करा दो उससे मेरी... लाफ्दाफ्ताफ़....लाफ्दाफ्ताफ़...

Thursday, December 16, 2010

इश्तियाक *

आईने से मुझे नफरत  है कि उसमें असली शक्ल नज़र नहीं आती... मैंने जब कभी अपना चेहरा आईने में देखा, मुझे ऐसा लगा कि मेरे चेहरे पर किसी ने कलई कर दी है... लानत भेजो ऐसी वाहियात चीज़ पर... जब आईने नहीं थे, लोग ज्यादा खूबसूरत थे... अब आईने मौजूद हैं, मगर लोग खूबसूरत नहीं रहे...
-----सआदत हसन मंटो 
*****

[जुहू चौपाटी पर का एक कमरा जिसमें  चीजें बेतरतीबी से इधर उधर फैली हैं .. हरेक चीज़ इस्तेमाल की हुई लग रही है, बिस्तर पर सुजीत और श्यामा अलग अलग लेटे छत में कोई एक जगह तलाश रहे हैं जहाँ दोनों की निगाह टिक जाए और कहना ना पड़े की "मैं वहीँ रह गया हूँ " ]

सुजीत : उलझी से लटों में कई कहानियों के छल्ले हैं..... मैं एक सिगरेट हूँ और तुम्हारी साँसें मुझे सुलगाती रहती हो. मैं ख़त्म हो रहा हूँ आहिस्ता-आहिस्ता... तुम धुंआ बनकर कोहरे में समा जाती हो... किसी रहस्य की तरह... 

श्यामा : तो तुम अपनी सासें कोहरे से खींचते हो ?

सुजीत : हाँ ! तुम ऐसा कह सकती हो, तुम्हारे पूरे वजूद में ही गिरहें हैं... 

[श्यामा पलट कर सुजीत के ऊपर चढ़ आती है ]

श्यामा : तो ज़रा सुलझा दो ना !
सुजीत : मेरे बदन का तापमान बढ़ गया है. 
श्यामा  : (हलके से हँसते हुए) इतने बरस बाद भी ? 
सुजीत : तुम इस दुनिया की सबसे हसीनतरीन औरत हो. 
श्यामा : सबसे मतलब ? कितनों को जांचा है तुमने ?
सुजीत : कईयों को !
श्यामा : अब मेरी सारी गिरहें खोल दो !
सुजीत : कमबख्त यह कुर्सी भी ऐसे में पैर में ज़यादा लगने लगती है.

[कुर्सी की खटखटाहत बढ़ जाती है]

[तूफ़ान के थोड़ी देर बाद, सुजीत श्यामा पर निढाल पड़ा है, जैसे सपने में किसी ने पहाड़ से नीचे फेक दिया हो, माथे पर पसीने की हलकी चिकनाहट उभर आई है]

श्यामा : कैसा महसूस हो  रहा है ?
सुजीत : फिलहाल तो पैरों में कमजोरी लग रही है ?
श्यामा : उम्म्म.... प्यार और सेक्स में क्या फर्क होता है ? जानते हो ?
सुजीत : सेक्स थोड़ी देर का उन्माद होता है; एक क्षणिक पागलपन जो ख़त्म होने के बाद शरीर, शक्ल और बिस्तर से विरक्त हो जाता है, वहीँ प्यार में सेक्स हो जाने के बाद भी मैं तुम्हें बड़े तबियत से जकड़े रहता हूँ.
श्यामा : आदमी और औरत क्या है ?
सुजीत : एक दूसरे को जानने की भूख और ना जान पाने के बाइस एक गैर जिम्मेदाराना उब. 
श्यामा : जुहू चौपाटी पर कितने मर्द ऐसी बातें करते होंगे? 
सुजीत : दुनिया में कितनी औरत में इतनी शिद्दत होगी.?
श्यामा (कान में)  : हम्म... मुझे बना रहे हो !
सुजीत : औरत यह भी होती है, एक वक्त के बाद उसकी महीन-पतली आवाज़ भी गर्माहट देती है.
श्यामा : और आदमी ?
सुजीत : मैं फिर से खोजता हूँ, वैसे यह तुम्हें बताना चाहिए.... क्या कहती हो !

[सुजीत और श्यामा की धीमी हंसी उभरती है और एक साथ शांत हो जाती है. ]

सुजीत : क्या है आदमी ?
श्यामा : सिर्फ अपने सम्बन्ध के आधार पर बताऊँ ?
सुजीत : बता सकोगी ?

[बाहर ट्राफिक का शोर उभारना शुरू होता है जो बढ़ता जाता है ]

[सुजीत और श्यामा छत में फिर से कोई कोमन जगह तलाश रहे हैं]

*****
जिज्ञासा, उत्कंठा 

Saturday, December 11, 2010

हम पी भी गए छलका भी गए...



वो खिले हुए इन्द्रधनुष के गोशे-गोशे को देख रही है... उसकी आँखें उन सात रंगों में सफ़र रही है...  ऐसा लग रहा है मानो सारे रंग उसकी आँखें से निकल रहे हों. हालांकि उसके होंठ थोड़े तिरछे हैं लेकिन थोड़े और होकर कब मुसकाये यह उसे मालूम नहीं हुआ. उसकी आँखों से नन्हें फ़रिश्ते उतरकर ज़मीन पर चहलकदमी करने लगे हैं.... वो कहती है 'मुझमें कुछ बचपना है' जबकि मुझे लगता है कि  बचपना उससे है... एक लहजे के लिए लगता है जैसे लड़कियां कई संस्कृतियों की पोषक होती हैं... मैं बीच में नहीं आना चाहता... आँखों के बसे यह रंग उतने पक्के नहीं होते .. गोया इन्द्रधनुष भी कहाँ हमेशा खिला रहता है. 

आकाश यानी सपने में रहने वाली वो और ज़मीन यानि निरा हकीकत में जीने वाला मैं (पाताल नहीं, क्योंकि कई किम्वदंतियां पाताल से जुड़े हुए हैं जैसे, वहां बहुत सोना है, शेषनाग है, नागकन्या है आदि), हमारे बीच एक कई लोग हैं .. वो मुझे अपनी दुनिया की कहानियां नहीं सुनाती .. शायद वो जब भी कुछ कहना चाहती होगी मेरी आँखों में तैरते नंगे अफ़साने उसे रोक देते होंगे... पर मैं उसकी दुनिया देखना चाहता हूँ क्योंकि इस धरती पर जीवन चलने के लिए सपनों का होना बहुत जरुरी है.. 

और मैं यह सब तब सोच रहा हूँ जब वो इन्द्रधनुष देखने में मशगूल है. इसे दिखने के लिए मैं उसे बहुत दूर अपने सायकिल पर बिठा कर लाया... उसने पूछा था "कहाँ बैठूं ?" दिलफरेबी ने मेरा साथ छोड़ दिया (आदतन मैं ऐसी स्थितियों में अपना सर झुकाकर कहता  हूँ "मेरे दिल में मेरी जान")  मैंने लड़कों की फितरत से आगाह करते हुए उसे पीछे बैठने को कहा. मुझे मेरा आगे का रास्ता साफ़ चाहिए था जबकि उसके हिस्से सिर्फ छूटे हुए दृश्य आ रहे थे... यह पहली बार था जब मेरी पैरों की मांसपेशियां थक नहीं रही थी. सायकिल पहाड़ तक चढ़ गयी.. हम पैर लटकाकर एक बहुत ऊँचे पहाड़ के अंतिम छोड़ पर बैठे ... सामने गहरी खाई थी और उसके बाद दूसरा पहाड़... नीचे देखने पर दिल धक् से हो आता था... जहाँ मैं उस खाई की गहराई से आकर्षित हो रहा था वहीँ वो दूसरी पहाड़ी पर जाना चाहती थी... मुझे लगा कि मैं उसके गुलाबी तलवों में बसे तितलियों की उड़ान में बाधक बन रहा हूँ और यह सही वक़्त है कि मैं यहाँ से नीचे छलांग लगा दूँ... 

उसकी नज़र लगातार इन्द्रधनुष पर टिकी हुई है.. सातो रंग ने उसपर नूर बरसाया है उसका सफ़ेद रेशमी दुपट्टा लरज़ उठा है... आसमान ज़मीन की हस्ती पर छाया है... इश्क  फ़रिश्ता बन कर आया है. 

मैंने उसका चेहरा देखा ... कुदरत एक सायकिल मैकेनिक बन गया है और उसने अपने ने गुब्बारे में जोर पञ्च मारा है... इन्द्रधनुष रुपी गुब्बारा पुरे आसमान में खिल उठा है... मुझे फिर से जीने का दिल हो आया है.... उसकी आँखों में कितनी चमक है ... मेरा दिल करता है कि में उन गीले रंगों में अपनी तीन उँगलियाँ (तर्जनी, मध्यमा और अनामिका) डुबो कर उसकी मांग भर दूँ...

वो अब भी आसमान में है और मुझे हकीकत का ख्याल हो आया है.

Friday, December 10, 2010

L.H.S.= R.H.S.



प्रश्न 1 : राम एक गधा है : सिद्ध करें .
उत्तर : राम के एक सर हैं, 
गधे का भी एक ही सर है.
राम की दो आँखें हैं 
गधे को भी दो आँखें हैं 
राम के दो कान हैं 
गधे के भी दो कान हैं.

अतः सिद्ध हुआ - राम एक गधा है. 

प्रशन २ : सिद्ध करें : राम एक गधा नहीं है
उत्तर : राम के दो पैर हैं 
गधे के चार पैर हैं 
राम की पूँछ नहीं है
जबकि गधे के पास पूंछ है
राम के चेहरे पर हर तरह भाव आते हैं 
जबकि गधा कातर सा चेहरा लिए रहता है.

अतः सिद्ध हुआ : राम एक गधा नहीं है. 

लब्बोलुवाब ये कि प्रमेय हो या जिंदगी के प्रश्न अपने तर्कों पर सिद्ध किये जा रहे हैं. तर्क बलवती होता है सुविधाओं में, अपने हितों में. जैसे भारत रक्षा क्षेत्र में रूस से सौदा करता है तो अमेरिका इसे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में सैन्य प्रतिद्वंदिता को बढाने और हथियारों कि होड़ बढ़ने का तर्क देता है लेकिन जब खुद अरबों का बजट अपने संसद में पेश करता है तो इसे "शांति के लिए निवेश" का नाम देता है.

कफ़न (कहानी) में घीसू और माधव का अंतिम संस्कार ना कर दारु पीने का दिल था तो दोनों ने इस बलवती तर्क को जन्म दिया - मरने के बाद नए कपडे ?

तर्क से गिरे तो निष्कर्ष पर अटके

जहाँ रिक्शाचालक रामशरण अपना प्यार यानि लछमी से शादी ना कर सकने को निर्दयी बताता है वहीँ मल्टीनेशनल कम्पनी का एक इंजीनीयर सिध्धार्थ देर रात सिगरेट पीते हुए "लव- माय फुट" कहता है. चूँकि सुनीता की नयी-नयी शादी हुई है वो इसे मन लगाये रखने का एक जरिया बताती है वहीँ रबिन्द्र कला केंद्र की पेंटर सुहासिनी अपने स्ट्रोक को रोकते हुए इसे कई सपनों का उदय मानती है. मेट्रो में मेरे साथ अक्सरहां सफ़र करने वाली एक लड़की जिसका हाथ कलम से ज्यादा तेज़ मोबाईल पर एस एम् एस टाइप करने में चलता है वो अपने जीवन में घटित हो रहे इस प्यार को "बहारों के आने सा" बताती है (मोबाईल फिर से चमक उठा है) और एक अधेड़ उम्र का तीसरा आदमी भी है  जो डेस्क पर प्यार को महान बताता है. 

बहुत से ऐसे किरदार हैं जिनके लिए प्यार ना महान होता है ना क्रूर, कई बार यह वैसा ही होता है जैसा उनका मूड होता है.

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