Thursday, January 20, 2011

लो जानां, तुम्हारे लिए कुछ भी...



पानी, एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन पदार्थ है.  पानी को जिस बर्तन भी बर्तन में रख दो, उसका आकार ले लेता है. पानी निकाल दो, हवा उसका जगह ले लेता है. मौसम भी पानी जैसा होता है. नहीं मौसम पूरी तरह से पानी जैसा नहीं होता. यह आयतन के मामले में पानी जैसा होता है. मौसम से हमारा वातावरण कभी खाली नहीं होता. एक जाता है तो दूसरा डेरा जमा लेता है. मौसम के रंग होते है, गंध होते हैं और स्वाद भी होते हैं. और जब मौसम में रंग, गंध और स्वाद नहीं होते तो यह पानी जैसा हो जाता है. तब मौसम बेरंग, और बेस्वादी हो जाता है. बहना - बिना किसी मकसद के, फर्क के. शहर के शोर में टूटा हुआ एक दिल जैसा, बस काम काम और काम की धुन, बस चलना, चलना और चलने की जिद जैसा, पुराने किले के सर पर पीछे से पड़ता चाँद के प्रकाश जैसा जिसके आगे किले लम्बाई से अँधेरा हो. एक विरोधाभास जैसा. हम सभी अल्लाह की संतान हैं पर उंच नीच का स्थाई स्वाभाव जैसा. वैसा.

ज़हर, अमृत, विरासत, फकीरी, दुःख, सुख, ज्ञान, अँधेरा, रास्ता और रुकावटें. सभी कुछ ना कुछ छोड़ रहे हैं, कारखाना धुंआ छोड़ रही है. ... और मैं अपनी गर्ल फ्रेंड को छोड़ने एयरपोर्ट जा रहा हूँ. 

वो मुझे और इस शहर को छोड़े जा रही है. पैरों के पास काफी सामान है, कुछ सामान को सीट पर भी रखना पड़ा है.. ऑटो का रोन्ग साईड से पर्दा लगा हुआ है.  सड़क पतली है. रातरानी शाम से ही महकना शुरू कर देती है. उसकी महक से मदहोशी आने लगती है. हमारे पास एक दुसरे से  बोलने को कुछ नहीं है. दोनों के पास एक सूखता हुआ चेहरा है, हेयरपिन में फडफडाते उसके बाल हैं, बाहर घिरता अँधेरा है. गुलाबी सी ठंढ है. एक तरफ खुला रहने से उतनी समस्या नहीं है जितनी परदे से होकर आता थोड़ी थोड़ी देर में तेज़ ठंढ हवा. जैसे कम्बल में गर्म होते ही कोई दोस्त उसे बार बार खिंच ले और सारी मेहनत बेकार चली जाए. 

हम पास बैठे हैं. बहुत करीब. उसका चेहरा उतना ही सर्द है जैसे चार डिग्री पर भारी होता पानी. उदासी भरी पलकें, लगता है उसने नशे की सुई ली हो. अँधेरे में उसकी आँखों में एक हारा हुआ समर्पण है जैसे गली में किसी कुतिया ने ढेर सारे बच्चे दिए हों और सबसे कमजोर बच्चा अपने भाई बहनों को माँ के सारे स्तन व्यस्त रखता देखें और अपने लिए कोई जगह ना देख सके तो निरीह सा गली से बाहर निकल आये. 

हमारी साँसें टकराने लगी, हमने वहीँ अपना घर बसाने का सोचा. आखिर कमी क्या थी, उस लम्हें में ऑटो हमारी दुनिया बन गयी थी. चलाने वाला था ही, वो सही रास्ता ले जाएगा इसका भरोसा भी था, पास में सामान था, और ऑटो सफ़र कर रही थी. हलचल का पता कभी कभी सड़क में पड़ते गड्ढे और घर में घुसती हवा दे देती थी. 

बहुत व्यस्तता के कारण मेघा उस दिन नहा नहीं पायी थी, बासी बदन मुझे शुरू से अच्छा लगता है किसी किताब जैसा. जैसे उसने अपने पास कहानी रहते हुए भी, किसी पढ़े जाने के चेहरे को भी कई बार पढ़ा हो (और पढने वाले सोचते हैं हमने वो किताब पढ़ी, किताब भी तो हमें पढ़ लेती है, तलाश लेती है की कितने इंसान हैं हम, कैसे इंसान हैं हम, क्या छुपा है हममें सबसे ज्यादा). किताब एक औरत बन आई होती है. फिलहाल मेघा किताब थी, औरत थी. वो औरत जिसने कल रात आखिरी बार बिस्तर गर्म किया था और जिसके छोड़ कर जाने का दर्द अब मुझे ता-उम्र गर्म रखने वाला था.

हम माहौल गर्म करते, बाहर से आती ठंढी और ताज़ी हवा सब कुछ उड़ा ले जाती. मैं हमेशा खुली आबो हवाहवा पसंद करता हूँ लेकिन यह पहली बार था की मैं बंद हो जाना चाहता था. उस ऑटो से हमारी महक, गर्म साँसें बाहर निकलती थी और मुझे एक अजीबोगरीब झुन्झुलाहट से भर देती. मुझे अपने माहिम पर गुज़ारे गए दिन याद आने लगे जब खोली के अन्दर पर्दा करने के सारी कोशिशें नाकाम हो गयी थी. नंगे बदन रहना सबसे ज्यादा एहसास देता है एकबारगी वो कहानी कौंध गयी जब अरुण ने गुरु के इस आदेश को की मेरे खेत में पानी मत घुसने देना को सर माथे मान मेड़ पर लेट गया था और लेटने बाद भी खेत में पानी का घुसना अपने बदन के मार्फ़त महसूस कर रहा था. कई बार हमारा दिमाग छठी से लेकर दसवी इन्द्रिय तक के काम कर लेता है. 

थोड़ी देर बाद ऑटो ने करवट ली, हवा के तेज़ झोंके बंद हो गए. हम (मैं और मेघा) करीब होते गए. मेघा की जिस्म से शदीद किस्म की महक आ रही थी, मैं उसके बालों को चूमता और सरसों के खेत महक उठते, माथे को होंठों से लगाता अंगूठी का नगीना बेसब्र हो उठता. गर्दन पर के सुनहरे रोये पर छोड़ कर ना जाने वाली इल्तजा भरे सासें उतारता तो जिस्म के सारे औराक थरथरा उठते. 

साइड मिरर से ऑटो वाले की निगाह मुसलसल हमपर टिकी हुई थी. चूल्हें में एक फूंक मारी थी हमने ऑटो की चाल धीमी हो चली थी, मैं जानता था वो अब जानबुझ कर देर करेगा और लम्बे रास्ते से ले जाना चाहेगा. मेरी इमानदारी उससे ज्यादा बेईमान थी. 

आखिरकार होंठों ने माहौल मुताबिक अपनी जगह तलाश कर ही ली. मेरे होंठ मेघा से होंठ से उलझ गए. यह सिलसिला कितना लम्बा चला मुझे याद नहीं. हम एक दुसरे को छोड़ने की कोशिश करते और फिर उलझ जाते. आखिरी बार एक सुकून तलाश कर रहे थे और क़यामत की बात , हमें वो मिला भी. यहाँ कोई गड्ढा नहीं था. जो था भी तो सबकी ज़मीन चिकनी थी. और गले की चिमनी से निकला अरमानों के आग एक दुसरे को बांधे थे. यह प्यार का एक्सटेंशन था या प्यार इसका एक्सटेंशन था मुझे पता नहीं.  काश हमारे रिश्ते में भी ऐसा उलझन होता, पुराने दिन अच्छे थे साथ चलने का एक दबाव होता था. 

मेरे होंठ और जीभ मेघा के होंठ और जीभ की तलाशी ले रहे थे. दोनों की आँखों में आंसू थे, नमकीन पानी की  नदी की चार धारा बहती जा रही थी. 

हम दोनों जानते थे अब हमारा जीवन इसके बाद पानी जैसा ही हो जाएगा. हम अब किसी और से उलझते रहेंगे और उसमें मिल जायेंगे. मिलते जायेंगे और बहते रहेंगे और जब निकलेंगे हमारी जगह कोई और ले लेगा.

Wednesday, January 12, 2011

सातवां फेरा



कैमरापर्सन  : रोल कैमरा !
(थोड़े अंतराल के बाद) 
एक्शन !
(शब्दों के शुद्ध उच्चारण उपयुक्त स्थान पर विराम और बलाघात* के साथ)

"बिहार का मौसम इस बार राजनितिक रंग के साथ मिलकर एक हो गया है. गर्मी जम कर कहर ढा रही है. मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे ! तमाम पटनावासियों की फिलहाल यही आरज़ू है. मेरे पृष्ठभूमि में गांधी मैदान उजाड़ और निचाट अकेला है. गर्म हवा के थपेड़े गालों को झुलसा रहे रहे हैं. आसमान में बादलों का पुलिंदा तो नज़र आता है लेकिन बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं. भले ही विज्ञान ने कई चीजों में अपनी दखल दे रही हो  लेकिन अभी भी कुदरत की इस नेमत का कोई सानी नहीं. लोग पसीने से बेहाल हैं. जहाँ कोल्ड ड्रिंक वाले चादी काट रहे हैं वही लोगों की जेब ढीली हो रही है. गंगा, घाट से साढ़े तीन किलोमीटर पीछे चली गयी है और इस बार छठ पूजा में श्रद्धालुओं को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग से कोई शहर अछूता नहीं रहेगा."

----कैमरामैन कामिनी के साथ सागर शेख, मग्निफिशेंट न्यूज़ , पटना. 

- यही कहा था ना तुमने पहली बार पी टी सी (PTC) देते हुए ... 
- हाँ, बिलकुल ! पूरे ग्रुप में सबसे अच्छा मैंने ही दिया था पर तुम्हें तो सब वैसे का वैसा याद है 
- पर तुमने एक गलती कर दी थी 
- हाँ मैं कैमरा पर्सन के जगह कैमरामैन बोल गया था
- कैसे हो गयी थी यह गलती ! तुमने टीचर की बातों को फोलो नहीं किया था. 
- आखिरी वक़्त में ....  मैं खुदा कसम खा कर कहता हूँ मैं सिखाये हुए सारी बातें फोलो कर रहा था, मैंने कैमरे की लेंस में  पांच सेकेण्ड तक देख कर उससे एकाकार हो गया था, गहरी सांस भरी थी, शांत हुआ था, अपने शब्द जुटाए थे, और अपने आत्मविश्वास का पारा शून्य से दस पर ले जा पहुंचा था पर हाँ  टीचर ने साइन ऑफ करते वक़्त फ्रेम बनाकर ट्राई पोड पर इत्मीनान से रखी गोरी उँगलियाँ और खुले बाल देखने से मना नहीं किया था, चूँकि तुम्हारी आँखें कैमरे के पीछे थी अतः मैं वहीँ उलझ गया था, 
तभी इसका परिणाम तुम्हारे पक्ष में नहीं गया था सिर्फ शाबाशी मिली थी 
- पर मैं अपने और दोस्तों की तरह धूप में नहीं झुलसना चाहता था, तुम्हारी उँगलियों और खुले बालों ने मुझे ठंढी छाँव दी थी.
- च... च.. च.. च्छ... पर अफ़सोस की यह हमेशा नहीं रहा, हम एक समय सब कुछ ठीक रहते हुए एक गलतियाँ कर जाते हैं और फिर उसे भुगतते हैं 
- प्यार की तरह !!!
- नहीं, यहाँ शादी भी रख दोगे को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा 
- और फिर ...
- फिर "मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी" वाली डायलोग मारते हुए जिंदगी ज़ुगारनी पड़ती है.
- पता है तुम्हें पहली बार क्लास में देखते ही मेरे मन में क्या आया था ?
- हाँ यही की क्या मस्त पटाखा है ! मैं तुम लड़कों की गिरी हुई सोच से वाकिफ हूँ 
- नहीं तुम मुझे थोडा ही गिरा हुआ समझी जबकि मैंने इससे भी दो कदम आगे की बात सोची थी वो भी तुम्हारे पति के बारे में.
- तो वो भी बता दो 
- नहीं रहने दो, यह मुझ तक ही रहे तो अच्छा है, कुछ बातें देह की हद पर नहीं करनी चाहिए
- ठीक है, लेकिन यह बता कर क्या तुम्हारी उत्सुकता ख़त्म नहीं हो गयी ? अब  कैसा लग रहा है  ?
- मैं तुम्हें वो बता कर तुम्हारा चेहरा देखना चाहता था, एक खास चेहरा सिर्फ अपने लिए, शादी के पहले फेरे जैसा, के जैसे बात खोलता जाऊं और चेहरे पर के भाव बदलते जाएँ, - वो भाव पहले संगीन हों, फिर उनमें हौले हौले  नमक घुलता जाए और फिर वो फिजा में घुले रंग की तरह मेरे अन्तःस्थ में बस जाए. 
- पर अब क्या तुम यह बता कर वो बात बताओगे तो वो भाव पा सकोगे ?
- नहीं, कतई नहीं, तुम उसके उलट दूसरी प्रतिक्रिया लिए तैयार हो जाओगी, हालांकि वह भी अभिनय ही होगा लेकिन तुम्हारे मन में उस वक़्त सिर्फ मुझे गलत साबित करने की भावना होगी.
- तुमने असल बात ना बता कर फिर से गलती की 
- इस गलती ने हमें फिर से मिलाया है
- टुकड़ों में जीना, जीना नहीं होता. तुम टुकड़ों में क्यों जीते हो ? नहीं मुझे लगता है हम टुकड़ों में क्यों जीते हैं, तुम जब भी यहाँ से जाते हो मेरी याद में एक ईंट का इजाफा होता है - और मेरी जिंदगी के एक पाए गिराए जाते हो 
- तुम्हारी याद भी इस शहर की गलिओं में पलती, पकती और समृद्ध होती सभ्यता जैसे है. धीमी आंच पर मद्धम मद्धम. 
- ऐसे में क्या पकता है ? मेरा मतलब क्या पक पाता है ? यह क्या है ? क्यों है ? और इसका अंत क्या होगा ? 
- तुमने मेरे साथ कितने फेरे लिए हैं ?
- एक कम सात में यानी छह 
- सातवाँ जरुरी है ? 
- नहीं, यह शादी ही हमारे लिए विलेन है, यह प्रेम का एक अनोखा मकाम है की सबसे पवित्र मानी जाने वाली चीज़ ही सबसे बड़ा दुश्मन बन खड़ा हुआ है. 
- तो जो शादी हमने नहीं की और ऐसे में इस ना मिलने का सामजिक प्रतिबन्ध के विरुद्ध मिलने को अपना सातवां फेरा समझो 

Thursday, January 6, 2011

शम्म-ए-फरोज़ा


"मौज-सी पानी में इक पैदा हुई,
बह गयी,
जैसे इक झोंका हवा का
पास से होकर निकल जाए कहीं
चंद रोज़ा आरज़ुओं का चिराग़
झिलमिलाकर बुझ गया" 
- सआदत हसन मंटो

***** 


(शादी से पहले दो मुलाकात) 
- एक -
राशिद :चार दिनों से सूरज नहीं निकला, रूई के फाहे में लिपटे यह दिन देखना जरूर किसी दिन अचानक ज़ख्म पर लगे पट्टी की तरह फिसल कर गिर पड़ेगा. 

सुधा : और गिरेगा तो हैरान होने को जब बैठेगे तब तक पसीने वाले दिन आ जायेंगे. वक्त यूँ तेज़ी से कटा करता है, वक्त यूँ तेज़ी से कटा....

राशिद : भीड़ में तुम्हारी  पहचानी गंध हो जैसे.

सुधा : फ़र्ज़ करो कि यह लगभग खाली खोली, कुछ सस्ती शराब की बोतलें, एक गलीज़ रजाई, तार पर टंगे दो दिनों के गीले कपडे... 

राशिद : गीले कपड़ों में क्या ?

सुधा : ज़ाहिर है मेरा पेटीकोट, और थोडा खुराफात सोचने के लिए तुम्हारे दोस्तों के अंडरवियर 

राशिद : एक ही तार पर  ?

सुधा : एक ही ग्रह पर बोलो 

राशिद : और एक बड़ी मुख्तलिफ किस्म की बू, जिससे कलेजे में नफरत जगे और छोड़ कर जाया ना जाए 

सुधा : हाँ ठीक... जैसे बेरोज़गारी का आलम में यह एहसास कि रोज़गार के दरम्यान ऐसे एहसासात से फिर रु-ब-रु ना हो पाएंगे... 

राशिद : और किसी काम करने वाली, जवान होती लड़की की आँखों में हादसे भरी मटमैले से रंग देखने को तरस जायेंगे.
***
-दो-
(दूसरी और आखिरी मुलाकात ...)

सुधा : मेरा होने वाला पति भी तुम जैसा ही है. अब तुम भी कोई ढूंढ़ लो, मुझ जैसा 

राशिद : मुझे तुम्हारे जैसी लड़की नहीं चाहिए

सुधा : ओफ्फ़ हो ! फिर तुम्हें कैसी लड़की चाहिए ? 

राशिद : छोड़ो भी, तुम्हें मालूम है ... फिर भी..

सुधा : अपनी कविताओं से परे, सीधे सीधे समझाओ

राशिद : ठीक. गुज़रते दिनों जैसी लड़की, परत दर परत अनसुलझी, एक अँधेरे अजायबघर में अँधेरे से लडती मोमबत्ती के लौ में बनावटें देखती हुई, जिसका हाथ अपने हाथों में लो तो एहसास रहे कि यह छलावा है और चाय बनाने को कह कर किचन की तरफ रुख करे तो लौट ना आये.

सुधा : हाँ आने वाले दिनों की तरह ढीली लड़की, गिरिडीह के अभ्रक जैसे परतों वाली लकड़ी, सातो इन्द्रियों के सभी एहसास को साथ लेकर चलने वाली, कभी मद्धम प्रकाश में बुद्ध के तरह कुटिल मुस्कान होंटों पर लिए तो कभी तुम्हारी आँखों में मन भर रौशनी का झाग उड़ेलती.

राशिद : हाँ वही लड़की, गुलाब की कली में कसे पत्तियों जैसी, भीनी भीनी बरसात की खुशबु लिए, थोड़े गर्म हाथों वाली ... 

सुधा : थोड़े गर्म क्यों ? 

राशिद : ताकि पूरी गर्माहट की तलाश की गुंजाईश बनही रहे ता-उम्र सुधा

सुधा : वो तो तुम अभी अभी तलाश चुके हो !

राशिद : अभी बहुत तलाश बांकी है, सुधा ! मत भूलो की हम शरणार्थी है और हमारा सफ़र उम्र भर ज़ारी रहेगा. वो खुन्क हाथ तुम्हारे थे, 
वो खुन्क हाथ तुम्हारे थे, 
वो खुन्क हाथ तुम्हारे थे, 
वो खुन्क हाथ तुम्हारे 
वो खुन्क हाथ 
वो खुन्क...

(आवाज़ डूबती जाती है, सुधा चली जाती है )
(थोड़ी देर के बाद इस शाम की आख़िरी चीख उभरती है)

'हमारा मकसद यह नहीं था सुधा, वो लड़की जिसे तकलीफ देकर माँ की याद आये.'

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