Thursday, February 24, 2011

मेघे ढाका तारा



कल कितना हसीन दिन होगा न दादा ! मुझे समय से भूख लगेगी और हम सवेरे सवेरे मंदिर जाएंगे, कम से कम अपना कर्म तो करेंगे। मैंने सोचा है कि बड़ी सी टेबल पर शीशे के ग्लास जो उल्टे करके रखे हैं उसी समय सीधा करके उसमें तुम्हारी फेवरेट रेड वाइन डालूंगी। 

आखिरकार मैंने ठान लिया है दादा कि मैं कल सीलन लगी दीवार, इस मौसम के गिरते पत्तों की परवाह नहीं करूंगी। कल न उनसे अपने दिमाग की उलझनें जोड़ूंगी दादा। कसम से दादा। कल उधर ध्यान नहीं दूंगी दादा। दादा बुरा वक्त है जानती हूं लेकिन मैं खुश रह लेती हूं। तुम्हारे नाम की आड़ रखकर तो मैं कुछ भी कर लेती हूं दादा। दादा हम शरणार्थी। शिविर को कैसे घर मान सकते थे दादा ? चैकी के नीचे का रूठा पायल कुछ बोले, न बोले दादा हम तो कल खूब खुश रहने वाले हैं। दो शब्द बस दादा - खूब, खूब खुश। सच्ची। नए साल की तरह। 

हमारे अंदर जब अच्छाई जागती है न दादा तो खूब जागती है इतनी कि कुछ भी अच्छा नहीं हो पाता। ऐसा कि खुद को ऊर्जा से भरपूर मानो दादा और सोचो कि आज सारे काम निपटा देंगे फिर कैसी गांठ जमती है मन में कि शाम तक बिस्तर से उतरना नहीं होता ?

हाट जाने के सारे रस्ते इसी होकर जाते हैं दादा। दोपहर बाद कोई तो पहर लोगो के पैर थमेंगे? प्लीज़ दादा कल तुम अपना मूड खराब नहीं करना। प्लीज दादा कल चार बजे भोर में उठकर क्षितिज पर उड़ती धुल देख भविष्यवाणी मत करना, मत बतलाना घोड़े किधर से दौड़ते आ रहे हैं। टाप की आवाज़ कल नहीं सुननी दादा। धु्रव तारा देखना। धु्रव तारा। ता आ आ आ आ आ.... रा आ आ आ आ आ...। तारे में भी शोर है दादा, संगीत है। ताक धिना धिन ना। पर कल, कल यह संगीत सुनना दादा। सोच लो दादा, सारे अच्छे काम सोच लो ऐसा ना कि कल उधेड़बुन में ही रह जाना कि करें क्या ? 

अच्छा दादा कल देर रात हमको अपने गोद में रखकर मेरे माथे सरसों तेल ठोकना दादा। बड़ी हसरत हो रही है। अपनी पसंद की कोई कविता भी सुना देना। 

हम सरोजनी नगर मार्किट से जैकेट लेंगे और तुम्हारे नाम की एक और पार्टी खाएंगे। कल तुम बहुत नेचुरल होकर सिगरेट पीना। धुंआ नाक से ऐसे निकालना दादा जैसे सांस निकलती हो।

दादा हम शाम को कमरे में अंधेरा कर देंगे और मोमबत्ती जलाएंगे ढेर सारी एक साथ कमरे के बीचों बीच। क्या पिघलेगा दादा तब ? अंधेरा कि रोशनी ? हम ब्याह के लायक हो गए ना दादा और तुम भी तो अपनी उमर से ज्यादा के लगते हो ? अच्छा दादा, एक बात बताओ,  जब तुम हमको लाए थे तो कुछ सोचे नहीं ना थे ? हम लाए गए थे ना दादा ?एक्स रे कराएं दादा हम दोनों अपने कलेजे का ? स्टील का तो नहीं ना निकलेगा ?

Friday, February 18, 2011

पार्क में उड़ता पर्चा...




गन्ने का जूस निकालने वाले मशीन और जीवन में यही समानता है कि दोनों रस भरे आदमी का कचूमर निकाल देते हैं। कहीं कारखाने का मशीन भी ऐसा करती है तो कहीं किसी प्राईवेट आॅफिस में काम करने वाला मुलाजिम का भी यही हाल होता है। नया नया प्रेस ज्वाइन किया हुआ पत्रकार भी पिसता है। तो सिर्फ जवान और खूबसूरत होने की योग्यता, जब बोलने पर हावी हो जाए तो देर रात तक लम्बी शिफ्टों में समाचार पढ़ने वाली टी.वी. एंकर भी, जो चैनल वाले कम पैसों पर नियुक्त करते हैं। मतलब कि शोषण हर जगह है। मंटो से मुत्तासिर मैं सबसे पहले इसलिए हुआ कि उसने पचास बरस पहले यह लिख गया कि मौजूदा दौर किसी इंसान की गोश्त या खून की वाजिब कीमत अदा नहीं करता। अव्वल तो वो अदा करना नहीं चाहता।

लेकिन मैं यह सब तुमसे क्यों कह रहा हूं? जाने कहां से ख्याल आया मुझे कि अधिकतर इंसान भी इंसान से एक खास समय तक ही मुहब्बत रखते हैं गोया वो इंसान नहीं जैसे एक रस भरा आम हो उसे सबसे जवान समय में चूसो और जब लगे कि उसमें कुछ बाकी न रहा हो तो कोई दूसरा खोजने में लग जाओ। इसे मेरी तल्खी से जोड़कर मत देखो कि तुम्हें भी ईश्क में जूनून चाहिए था जो मुझे जैसे आशिक ही कर सकते थे और प्यार में पागलपन के बाद जब हसीन जिंदगी का वक्त आया तो तुमने समझदारी का दामन पकड़ते हुए एक जिम्मेदार मर्द को चुनना पसंद किया। तो मतलब तुम्हारी अपनी जिंदगी के लिए भी तुम्हें कम से कम दो मर्द चाहिए थे।

जो तुम आज हो वही कल भी थे पर जो तुमने कल किया था वो आज तुम्हारे लिए बचपना हो जाता है जिसका जिक्र करना तुम्हें तौहीन लगता है। अपने अक्स पर धब्बा लगता है। मुझे लगता है कि आज थोड़ी देर का दर्द, कष्ट या वियोग का दुख तमाम जिंदगी की सुख सुविधाओं से कमतर है। बहुत भरोसा है तुम पर तो चलो माना कि तुम भी शदीद किस्म की तन्हाई में रोज दस मिनट मर मिट लेती होगी लेकिन कनाडा की उस ऊंची इमारत से जब गगनचुंबी इमारतों को देखती होगी तो, बच्चे को बर्फ पर स्केटिंग करना सीखाती होगी तो, शानदार मोल्स में शोपिंग करती होगी तो और पार्टियों के लिए तैयार होती होगी तो, लजीज़ खाना खाती होगी तो, यक़ीनन मेरा ख्याल ज़हन में नहीं उभरता होगा। 

तुम्हारे मुत्तालिक मेरे दिल में सबसे कमजोर कड़ी यह है कि तुम्हारा दुख मेरे लिए सबसे बड़ा नहीं है बल्कि यह तो सबसे आसान का दर्द है जिसे मैं लिख डालता हूं ज़रा उस दुख के बारे में तो सोचो जो जिसको मैं अंदर ही अंदर जिबह किए जाता हूं और जिसको सफहों पर उतारने में मेरी हाड़ मांस तक कांपने लगती है। अप्रत्यक्ष रूप से यह तुम्हारे धोखे जैसा ही है। मैं इन्हें धोखा और भुलावा देता रहता हूं। मैं याद दिला दूं तुम्हारा धोखा देना कोई बड़ी बात नहीं। जैसा कि खत को पढ़कर तुम्हें महसूस होता है कि मैंने तुमपर तोहमत लगाए हैं। कि मैं बड़ा पाक साफ हूं और तुम्हें ऐतिहासिक रूप से कोई विलेन बना रहा हूं। यही काम कहीं तुम भी कर रहे होते हो बस किरदार बदल जाता है। (मसलन मैं लिखूंगा तो उसमें कोई स्त्री होगी तुम लिखोगी तो बहुत संभव है उसमें वो किरदार पुरूष होगा ) 

ये मौलिक रूप से वही बातें हैं जो मेरे दिमाग में आ रही हैं और मैं बिना लाग लपेट और चाशनी के तुम्हें बता रहा हूं। यह दुनिया देखने की अनुभव से उपज रहा है और इसमें मुझे लगता है प्यार का सिक्का उछालने में पाना और ना पाना को सिक्के के दो पहलू माना जाना अब छोड़ देना चाहिए। एक कविता याद आ रही है कि जिसमें नायक नायिका को प्यार करता है और एक शाम किसी नदी तट पर प्यार कर रहा होता है और उसके जुल्फों से खेलते हुए उसके बालों को गले से बांधकर उसकी जान ले लेता है। फौरी तौर पर कह देना मुमकिन है कि वह प्यार नहीं था क्योंकि अक्सर हम होशमंद होते हुए विवेकपूर्ण परिभाषाएं गढ़ते हैं। 

तो चरित्र में उतरो मेरी जान !

इन दिनों ये जो पर्चे लगातार उड़ा रहा हूं, यह सब भी तुम्हारे मुहब्बत के बाइस है। क्या लिख रहा हूं, इसका क्या मतलब निकलता है यह सब सवाल ऐसे ही हैं जैसे क्यों इतने दिन क्यों जिया, और जी कर क्या हासिल कर लिया, तुम्हें प्यार ही करके क्या मिल गया आदि आदि।

फज़ा में शराब बरस रही है, खून रिस रहा है, और हम अपने पीरियड्स के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं। तुम पढ़ कर कहोगे - खुदा खुदा ! हम भी जी कर यही कर रहे है, बस ज़रा गुहार का स्वाद अलग है।


Thursday, February 17, 2011

ना बात पूरी हुई थी कि रात टूट गयी...


एक सुस्त सा मौसम चल रहा है गदर मचाता हुआ। जैसे सबसे फुर्सत वाले दिनों में ही हम गौर कर पाते हैं हर चीज का घटित होना। ये बात अलग है कि तब उसका एहसास नहीं होता और अत्यंत व्यस्ततम क्षणों में उसके लिए तरसते हैं, उसकी लज्जत महसूस होती है। इन दिनों जो सुन रहा हूं, देख रहा हूं सब ठहरी हुई हैं। 

आसमान में ठहरा सफेद बादल बह रहा है, गमले में उगा पौधा भी बढ़ रहा है। दुनिया नित नई रोज आगे जा रही है (?) सरकार नए कदम उठा रही है। नए पनपते प्यार वादा कर रहे हैं। मिस्र में जनता की आवाज़ सुन ली गई है। बस अंधेरे उजालों में छिपता तुम्हारा हुस्न मुकम्मल नहीं होता। 

एहसास वही हैं पर हर बार उन ख्यालों को नए शब्दों का पैरहन पहना रहा हू। इन ख्यालों के कपड़े उतारने के लिए नए कलफ चढ़ाने होते हैं। यह भी अजब है कि नंगे करने के लिए कपड़े पहनने होते हैं। हमने अपने मनोरंजन के लिए कितना कुछ बना रखा है। तुम्हारी याद के अक्स के इस बुखार का आज सांतवां दिन है। बिस्तर से उठ नहीं पा रहा लेकिन यह क्या है कि मेरे बदन पर पर सकून की गुदगुदी कुछ इस तरह से हो रही है जैसे गर्म पानी की बोतलें घुड़क रही हो। 

मैं तुम्हारा पति नहीं हूं कि तुम्हारे सीने को अपने पीठ पर महसूस करूं अलबत्ता तुम्हारा कंधा थपथपाते वक्त जो समझदारी हमारे आंखों में पैदा हुई उसके बाइस तुम्हारे सीने की बनावट अपने छाती पर महसूस करता हूं। 

सिगरेट और शराब बस सिर्फ इसलिए कि ये आसानी से मयस्सर है। ये अब मज़ा नहीं देते। अब तो अफीम चाहिए जानां। कम से कम हलक से उतरने के बाद अपना असर हुनर तो दिखाएगा तुम्हारी तरह नहीं कि जाओ तो दिल पर कोहसारों की तरह पैठ जाओ और हकीकत में पैरों के निशान तक बुहारती जाओ।

कभी मैंने तुम्हारा तलवा सुलगाया था. तुम मेरा वजूद फूंक दो तो तुम्हारे नक्श में मैं जज्ब हो जाऊं कि मैंने प्यार के नर्म एहसासों को एक अरसे से लिखना छोड़ दिया है। कि यह पढ़कर मुंह का जायका ख़राब हो जाता है, आंत से उठती हुई तड़प जो जीभ की अंतिम छोर पर आ कर रुक जाता है, यह सिलसिला खत्म हो.

Wednesday, February 16, 2011

बोल ऐ खूंखार तन्हाई किसे आवाज़ दूँ ?



ऑरकुट पर तुम्हारे फोटो पर ढेर सारे कमेन्ट आते हैं। आज भी साड़ी को कांधे पर पिन-अप वैसे ही करती हो जैसे मुझे अपने सीने पर लपेट रही हो। जाने कैसा हुस्न समेट रखा है। तुम जानती हो मुझे ज्यादा जलन नहीं होती। मेरी पहली प्रेमिका किसी और की हो गई, मुझे जलन नहीं हुई। लेकिन तुम्हारा किसी का होना मुझसे बर्दाश्त ना हो सका। यकीन जानो मैं अब भी जब तुम्हें तुम्हारे पति के पहलू में सोचता हूं तो मुझे जलन होती है। हालांकि तुम्हारी शादी को चार बरस, तुम्हारा मुझसे मिलना के दो बरस और हमारा बिछड़ना तीन बरस का हो गया। इन दौरान तुम्हारा बेटा भी दो साल का हो गया। क्या अजब है कि हम सब कुछ हम साल के हिसाब से हम नापते हैं।

तुम्हारा बेटा ठीक तुम पर गया है। आँखें, होंठ सब वैसा ही, उसका चहकना भी ठीक वैसा ही. मैं जानता हूं तुम्हारा पति बहुत खूबसूरत है और तुम भी किसी पठानी शहजादी से कम नहीं हो। तुम्हारी जोड़ी भी अच्छी जमती है। 

लेकिन यह आज भी उतना ही सच है कि तुम्हारा पति तुम्हें औरत नहीं बना पाया। तुम लड़की ही रह गई। तुम्हारी आखों में आज भी वो कवांरी लड़की ही मुस्कुराती है। सबको धोखा देने वाली चेहरे में वही चमक मौजूद है, आंखें आज भी वैसी ही हैं जैसे कसे कच्चे आम की फांक हो और तुम्हें पाने का लालच भी वैसे ही बना हुआ है जैसे स्कूल के दिनों में हम ब्लेड से कच्चे आम को छीलकर नमक के साथ खाने का ख्याल। इसके के तुम्हारा बहुत सम्मान करने के बावजूद मैं यह कहने से खुद को रोक नहीं पाता तुम बहुत सेक्सी हो।

मैं यह सब बातें मुझे मालूम है वो तुम्हें तुम्हारी सही अक्स, तुम्हारे अस्तित्व के बारे में भी नहीं बता पाया होगा। वो इस जिम्मेदारी का अहसास कराने में भी नाकामयाब रहा होगा कि तुम किस कदर हस्सास और खूबसूरत हो। यकीनन ऊबे हुए मन से या फिर कभी किसी वेलेंटाइन डे पर उसने तुम्हारी तारीफ की होगी लेकिन उसे सुनकर तुम्हें ‘ठण्ड नहीं लगती‘ होगी।

आज तीन बरस हो गए। मैं लगभग तुम्हें भूलने के नाटक करते-करते तुम्हें भूल चुका था। लेकिन जब ऑरकुट पर देखा तो जख्म हरे हो गए। 

इस फरवरी में जब अपना शरीर चीड़ कर छत पर सुखाने का वक्त होता है मैं जिस्म सिकोड़ कर बैठा हूं। बस एक कमरा है, सामने दीवार है (और यह वही दीवार है जिसका आड़ लेकर तुम दोनों हाथ उठाकर बड़ी बेफिक्री से अपने बाल समेटा करती थी दीवार तुम्हें सामने से यूं देख सांस लेने लगता था और गढ़ढे पड़ते पीठ को देख मैं आहें भरता था) मेरा सर घुटने पर है और घुटने पर घुटता हुआ मैं हूं। आंसू तो अब आते नहीं चुनांचे पलकें गीली भर होती है। वो कतरा कितना खुशनसीब है कि जिस दायरे में जनमता है उसी में सूख जाता है।... बेहतर था पांच सौ पांच नम्बर वाली बस में आग लग जाती और हम जलकर खाक हो जाते। 

हमारे बीच दुनिया का रद्दे अमल हमेशा झूलता रहेगा।

यूं सुख में रहकर भी तुम मुझसे ज्यादा गरीब हो। मैं तो लिख भी लेता हूं जानेमन, तुम क्या करती होगी !

Saturday, February 12, 2011

तूने दुनिया की निगाहों से जो बच कर लिख्खे

 -2-


तुमने पूछा है - मैं क्या करती हूं! बहुत कुछ है कहने को मगर अब जबकि कहने बैठी हूं कि तो कोई बात बताने लायक लग नहीं रही। दिलचस्प तो नहीं होगा मैं फिर भी कोशिश करती हूं, बीच-बीच में ध्यान दे दिया करना। 

आर्चीज की गैलरी अब नहीं जाती। इमोशंस से सूखे फूल खरीदने होते हैं ना ही अब दिल के बैकग्राउंड में इश्क विश्क का गाना बजता है। ना ही तुम्हारी गिफ्ट की हुई डायरी में (जो डायरी कम दिखने में खूबसूरत ज्यादा है, गो कि ताला भी लगाने का सिस्टम है) लिखने का कुछ दिल करता है। आईएससी (इंटरमीडिएट) का प्यार तो है नहीं कि तुम भी फरवरी में जहान भर के मालियों से दोस्ती गांठ कर मेरे लिए लाल, पीले और काले गुलाब ले आओगे। मैं भी कहां अब सजती हूं। थोड़ा बहुत भी बनाव श्रृंगार करने पर लगता है कब्रिस्तान जा रही हूं किसी की आत्मा शांति की प्रार्थना करने। ये बी.ए. तीसरे साल का प्यार है जहां तुम जानते हो कि मेरे बाद दो बहनें और हैं, मेरी घर की माली हालत भी तुमसे छुपी नहीं है। अब तुम नहीं चिढाते कि पड़ोस का लड़का मेरे खातिर एकतरफा प्यार में जहर पी कर मर गया। 

तुम्हारे जिंदगी में में इस कदर घुल-मिल गई हूं कि तुम्हारे दोस्तों में भी काबिले जिक्र कोई बात नहीं। दोपहर थका सा लगता है जैसे हमारी जिंदगी में हम दोनों थके हुए लगते हैं। समाज हमारे लिए थका हुआ लगता है और दोस्तों के बीच हम भी थके हुए हैं। तुम्हारे दोस्त अब मुझे भाभी नहीं चाची की तरह ट्रीट करते हैं। 

चैदह साल की थी तो सोचती थी प्यार में कैसा थ्रिल होता होता है ! अब सोचती हूं ऐसा क्या होना बाकी रह गया है ? अठ्ठाइस से मौत तक हम ऐसे ही घसीटे जाएंगे। कोई सपने बाकी नहीं लगते। ना अब शादी का सोच कर कोई रोमांच होता है, ना बच्चों का, ना ही उनको पालने में कुछ महसूस होगा। मैं जानती हूं वो मैं नहीं बल्कि एक मां होगी। अपने सपनों का हवन कर, अपने बच्चों को कुछ बरस की छवाला राजगद्दी देती हुई। सच है, हम लोग जीवन में नाटक ही तो करते हैं उम्र भर और जब ये समझ जाते हैं तो... 

भरी दोपहरी में रेल की पटरी के साथ चलती हूं। अब पटरी पर चलने का दिल भी नहीं होता। पहले कदम ताल बिठाना होता था। कमर में एक लोच थी। पटरी पर डगमगाते हुए भी टिके रहने की कोशिश होठों पर हलचल पैदा कर जाती थी। कई बार तो गिरते गिरते भी वापस अपने जगह पर बन आती थी। तब लड़ना आता था। अब अभ्यस्त हो गई हूं। अब पैर नहीं डगमगाते। लड़ने से क्या होगा या क्या हासिल कर लूंगी ऐसे ख्याल आते हैं। 

तेज धूप में बिना कारण घूमती हूं। दौड़ती हूं फिर जमा हुआ ठंडा पानी पी लेती हूं। बचपने में नहीं। बस ऐसे ही। खुद को तकलीफ देना अब कहीं से अच्छा लगता है। यकीन करोगे इससे भी कुछ नहीं होता। जैसे मैं दिनों भूखी रह जाती हूं लेकिन ना कुछ खाने का मन होता है ना ही मुझ पर कुछ असर पड़ता है। कोई दो थप्पड़ लगा दे, शरीर को चोट भी लगती और मन पर असर होता है। यही लगता है हां उसने हाथ उठाया है, बस। इससे क्या हो गया, क्या हो जाता है इससे। मार ही लिया तो क्या हो गया। 

मुझे ऐसा लगता है मैंने अपने और अपनी आत्मा के बीच एक दीवार खड़ी कर ली है। या फिर मैं भी अब तपस्या कर सकती हूं। आग, पानी, भूख, प्यास, सर्द गर्म सब बर्दाश्त कर सकती हूं। मेरी जुबान पर अब कोई जायका नहीं रहता। मैं इन सब से ऊपर उठ चुकी हूं। प्यार में पड़ी सहेलियां हंसती हैं, उनको हंसते देख खो जाती हूं। सोचती हूं जब वो सच से रू-ब-रू होगी उसे कैसा लगेगा ? क्या वो भी मेरे जैसी ही हो जाएगी। 

दिन खुलता है, रात बंध जाती है। साल बीत जाते हैं। हम किसी नदी की राह में भारी पत्थर से बैठे हैं। न नदी को मुझे बहा कर ले जाने में कोई रूचि है न ही मैं गल कर मिट्टी होती हूं। जानती हूं जब तक जान नहीं दूंगी लोग नाटक ही समझेंगे। मरना सही होगा अपनी जगह लेकिन वो भी सही इलाज नहीं है। सही इलाज जीते जी कुछ हो जाना है। होश रहते बदल जाना है। समाज ढोंगी है मरने पर पुण्य कमाने आएगी। 

पुर्नजन्म में मेरा यकीन नहीं। मैंने उंगलियां काट कर उसी शिद्दत से नमकीन खून बहाने का सच्चा सुख भोगा और चखा है। वो भी झूठ नहीं है। उसमें भी शुद्धता है, सात्विकता है। उस जन्म वहां वैसे एहसास नहीं होंगे जैसा जीते हुए हुआ था। तब यह सब स्मृतियां धूमिल हो जाएंगी। स्वाद का मज़ा नहीं रहेगा। वो नया जीवन होगा। यादाश्त खो चुकी होगी। सुख होगा पर दुख इस तरह याद नहीं होगा। सिर्फ सुख ही सुख होगा। ऐसे में सुख अच्छा नहीं लगेगा। प्यार ही प्यार होगा। वहां तुम्हारे धोखे का डर नहीं होगा तब मेरे सही रहने की संभावना कम हो सकती है। सुनते हो ? हे प्रेम के भगवन् ! बचा लो न कृष्ण !

{माफ़ करना लड़की यहाँ शाया कर रहा हूँ. अब कम से कम अब ये प्रेम पत्र मथुरा रोड की धूल तो नहीं फांक रहा. इस ख़त को ज्यादा बेहतर जगह दी जा रही है. तेरे ख़त आज मैं यमुना में बहा आया हूँ, गीले गर्म ज़ज्बे गंदे नाले में फंसा आया हूँ. यहाँ आपत्ति करोगी तो हटा लूँगा.}

Friday, February 11, 2011

खाई में उतरते हुए


पहाड़ों के बीच धुंध का अक्स किसी नायिका के खोलकर फैलाई हुई साड़ी सी लगती है। धरती के सीने से नर्मो नाजुक जज्बात उठकर आसमान में मिलते से लगते हैं। नायिका अपने बाल हाथों को उपर उठा शंकर के जटा की तरह बांधती है। वक्षस्थल थोड़ा तन जाता है। धुंध को मुठ्ठी में पकड़ने की कोशिश करता हूं। हथेली गीली होती है और गाल पर थोड़ा ठंडेपन का एहसास होता है। कपोलों पर उगे लाल सेब गायब हो जाते हैं।


नायिका मानस पटल के चित्रपट पर एक कविता की तरह सामने खड़ी है। कमरे के कोने से आती सुनहरी रोशनी में पिघलती और सकुचाती। मेरी ग्लानि भी ऐसी ही है अपनी जगह गलती घुलती हूई। इसकी सुंदरता की आंच की तरह कभी ना खत्म होने वाली। उम्र की वहाव में रास्तों के उस उंच नीच का कोई अंत नहीं। जो मैं देखता हूं, महसूस करता हूं। ग्रहण करता हूं और अपने चोट लगे सीने से उठते लहर को दिखाने बताने के लिए मारा मारा फिरता हूं। चोट की खूबसूरती ऐसी ही होती है। बिल्ली के पंजों के निशान सी हसीन। किसी ऊंचाई पर उफनते चाय की केतली जो अपने ढ़क्कन से बार बार टकराती है।

नीम अंधेरे में लैम्प पोस्ट से गिरती रोशनी में कोई जवान पेड़ शाॅवर लेती हुई लगती है। बातें जो कही जाती हैं कहीं गुम हुई जाती है। रास्ता बहुत लंबा है सुनसान धड़ाम से वफा एक पेड़ गिरता है और तेज़ चोंच वाले जासूस पंछी ऊंची उड़ान भरने लगते हैं।

लचकदार बांस के लंबे पेड़ लरज कर झील की पानी में आ गिरा है। झील के सीने में दूध उतर आया है और पत्ते उन्हें पीकर मदमस्त हुए जाते हैं। 
आसमान में बादल रूई के फाहों जैसे ठहरे हैं। सबमें बंटवारा हुआ है किसी को बड़ी जागीर मिली है तो कहीं कहीं बड़ी सूराख है। 

नदी अपने साथ मटमैले पानी को लेकर आती है। उबड़ खाबड़ रास्तों पर पड़े पत्थरों से  चोट खाते हुए बहने के लिए क्या चाहिए होता होगा ?

किसी व्यस्त रास्तों के ही आस पास का एक अनजान रास्ता जिसपर पेड़ गिरा दिया गया है और पगडंडियों पर हरे जंगली घास उग आए हैं। इस उखड़े हुए पेड़ की जड़ किसी खजाने की चाभी जैसी लगती है। वर्जना, सम्मोहन और फिर खजाना। 

रहस्य का यह रंग, मृत्यु का ये आर्कषण मुझे हमेशा से खींचता आया है। 

आत्महत्या के पीछे मेरा आर्कषण हमेशा से रहा है। इसे मूर्त रूप में खोजने के दौरान ही जीना है और इसी में मरना भी.

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