Tuesday, March 29, 2011

थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोडा सा धुंआ...



जब किसी दिन हम कुछ अच्छा करते हैं तो थोड़ा और बेहतर करने का दिल करने लगता है। इस दिन होता क्या है कि हम जिम जाते हैं और वापसी में जूस पीते और घर पर अखबार आने और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के बावजूद एक अखबार खरीदते आते हैं। थोड़ा सा और पछताते हैं कि काश थोड़ा और पहले उठते तो सुबह का सूर्योदय भी देख लेते कि पिछली बार सूर्योदय ‘शायद‘ (शायद यह बता रहा है कि ठीक ठीक वो समय कब था, यह भी याद नहीं) छठ पूजा के अवसर पर दो साल पहले गांव में देखा था और यहां तो बस पता था कि आज छठ मनाया जा रहा होगा। थोड़ा सा बेहतर और सोचते हैं कि बस अब रूम पर जाकर चाय बना नहा लें फिर घर के पीछे जो मंदिर है वहां शिवलिंग पर जलाभिषेक कर सुबह को उसका सबसे एक्सटेंशन दे मिल जाएगा।

ठीक उसके उलट दो दिन पहले की ही बात है जब सब व्यर्थ लगता था। तब के जवाब आज के लिए फालतू हैं आज के जवाब कल की नज़र में व्यर्थ थे। तब कहते जिम जाने से क्या होता है ? घोड़ा दौड़ता है अठ्ठारह साल जीता है अजगर पड़ा रहता है अस्सी साल जीता है। आज जवाब यूं होता है कि मतलब जीने से नहीं स्वस्थ तरीके की जीवन शैली से है। तब कहते जेब में माल हो नींद पूरी हो बस यही सही है। आज कहते हैं कसरत करने से मस्तिष्क में रक्त संचरण सही होता है, आप दिन भर अच्छा महसूस करते हैं और निर्णय खुले मन से लिए जा सकते हैं। सब काम समय पर करना चाहिए जोकि जंचता है। यह आज का दमदार तर्क है। न्यूज के एंकर की तरह जब वो सामने की टेबल पर दोनों हाथों की उंगलियों को फंसा एक लम्बी सांस लेकर कहता है - और इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है फलाने जगह से।

तो सब काम समय पर करना चाहिए। यह अगर कल कहा जाता तो जवाब होता - ए. आर. रहमान अपना काम रात के दो बजे करते हैं। अमिताभ यह काम अमुक वक्त पर करते हैं। कई बार हम अपनी जीवनशैली अपने प्रिय सेलीब्रिटी के करने अनुसार करते हैं। जैसे नहाने वक्त लक्स लगाने पर खुद को प्रियंका चोपड़ा मानना या उसका ख्याल आना, चिलाने ब्रांड की नेल पोलिस लगा लेने पर यह संतोष कि हमने जेनिफर लोपेज वाला नेल पालिस लगाया और अब हमारा हाथ एंजलीना जोली सा दिखने लगा है और 1500 रूपए की एक फटी जींस पहन पेप्सी पीते वक्त रणबीर कपूर का अक्स ज़हन में उभरना, कई बार तो खुद को वही मान लेना। विज्ञापन यहीं सफल है और यही उसका आधार है। खैर... 

तो यही सब सोचता हुआ जब मकान की सीढि़यां चढ़ रहा होता हूं तो तवे पर रोटी के सिंकने की महक आती है। किचन हल्का धंुधला है और और एक आदमकद छवि नज़र आती है। यह एक नई नवेली दुल्हन दिखती है जिसकी शादी के महीने भर ही हुए हैं और यहां आए दो दिन। बैचलर के कमरे की साफ सफाई के बाद जब सभी सामान करीने से अपनी जगह पा चुके हैं तो यह सुबह सुबह नहा कर बालों को हेयर पिन से गर्दन से थोड़ा नीचे एक बंधन दे रोटी बेल रही है। पीछे से यह देखना जब हमारे लिए सुखद है तो पति के लिए क्या होगा ? कमरे के बाहर एक अलगनी है जिस पर पहले फस्र्ट फ्लोर के सारे लड़कों के कपड़े बेतरतीबी से फैले होते थे आज वहां तीन नए कपड़ों का ईजाफा हो गया है। पेटीकोट बता रहा है कि अब अमित बाबू सब से कट गए हैं और उन्होंने अपनी नई अलगनी बना ली है। सब कुछ अपना अपना हो गया है। हर चीज़ के रखने सहेजने में एक क्लास आ गया है। बाथरूम में गुलाबी रंग की नई बाल्टी है तो कपड़ों पर सलीके से इस्त्री। जो दो रूपए वाले रिन सर्फ से काम चलता था अब एरियल का बड़ा पैकेट है। सोप केस में भी कई नई चीज़ें हैं जो अवारे बैचलरर्स के लिए खासा दिलचस्पी का सबब है गोया रंग ही रंग बिखरे हैं।

दुल्हन के बालों में चमेली का गजरा है जो हो न हो अमित बाबू पटेल नगर की मुख्य लाल बत्ती से कल दफ्तर से लौटते हुए लिए होंगे आदतन बहस करके छोटी लड़की ने धमकाया होगा दस का दो उन्होंने आंखे तरेरी होगी क्योंकि पति और बच्चा दोनों प्यारे हैं की तर्ज पर खूबसूरत पत्नी और उसकी रेशमी जुल्फों में ये गजरा दे कर उसको और इम्प्रेस करने का तरीका वो छोड़ना नहीं चाहते होंगे। कल शाम ही अमित बाबू ने यह गजरा अपनी पत्नी को दिखा बदले में मुस्कुराट पा कर अपने दिन भर की थकान को हल्का पाया था। रात होते होते उन्होंने एवज में और कीमत वसूल की होगी! कौन जाने ? नहीं, सब जानते हैं यह बात।

अमित बाबू अब पक्के घरेलू हो गए हैं। कभी पौधों की कदर नहीं करने वाले के दरवाज़े पर कसे हुए गेंदे के फूल वाले तीन गमले हैं। अमित बाबू नियमित डेल्टाॅल की शेविंग क्रीम से सेविंग करने लगे हैं अब उन्हें हम जैसों से मांगना नहीं पड़ता। वे आत्मनिर्भर हो गए हैं। अब वे आफ्टर शेव भी लगाते हैं। नाश्ता करके ही दफ्तर निकलते हैं। नहाने के बाद बाथरूम से बाल्टी सहित सभी चीज़ें वापस कमरे में ले आते हैं। देर रात उठ कर पीने का पानी नियमित रूप से भरते हैं। शराब, सिगरेट को हिकारत भरी नज़र से देखते हैं उनकी नज़र में यह चीज़ें उन्होंने कभी देखी ही नहीं थी। हमारे बारे में राय यह कि जैसे लोगों को गोली मार देनी चाहिए। इसपर भी खैर...

कमरे के पर्दे की नोंक उत्तरी धु्रव के दक्षिणी धु्रव तक खिंचा रहता है गोया सांसें तक कमरे में ही जज्ब कर लेना चाहते हों। काले चश्मे के अंदर से झांकती संजीदगी भरे चेहरे से शराफत आजकल यूं टपकती है मानो दुनिया भर की सारी लड़कियां इनकी मां और बहन थी, हमारे सामने भी पत्नी को यूं ट्रीट करते हैं कि एकबारगी लगता है पत्नी नहीं उनकी बहन हो यह और बात है कि ये एक महीने में प्रेगनेंट कर देने का दावा भरते थे और बैंक की तैयारियों की आड़ में देर रात काम क्रिया के सारे आसन सीखने का ज्ञानार्जन करते।

मैं तंज नहीं कस रहा पर मैंने देखा है ऐसे कई अमित बाबू को जो गृहस्थी के नाम पर रंग बदलते हैं। मैंने देखा है ऐसे लोगों को जो छत पर कपड़े सुखाने वाले पिन तक पर भी अपना नाम डाल देते हैं। मैंने देखा है ऐसी कई औरतों को जो सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का की तर्ज पर चलती हैं कि वो अपने गोतिनों (पति के भाई की पत्नी) पर दफ्तर से मिली सुविधाओं पर इठलाते कि वो इससे अपने संयुक्त परिवारों की जरूरत पूरा नहीं करती अलबत्ता उन चीजों पर धौंस जरूर दिखाती हैं यह भूलते हुए कि उनके पति को यह नौकरी उसके भाईयों ने अपना करियर खराब करके दिया है, खेत बेचकर दिया है, बहनों ने देर से शादी करके दी है। बहरहाल...

कुछ मीठी चीज़ें देखकर पिछले दो हफ्तों से ख्याल आ रहा है कि मैं भी शादी कर लूं जब थर्ड फ्लोर से नीचे झांकता हूं तो इतने लाल कि भूरे रंग वाली मेंहदी भरे गोरे कोमल हाथ दिखते हैं, कि जब नियमित समयअंतराल पर अपने अंदर जहर भरा हुआ पता हूं तो लगता है कोई पत्नी रूप में पार्वती भी हो जो आलिंगनबद्ध हो मेरे जहर को बांट ले कि कभी कभी जब आसपास आततायीयों से घिर जाऊं और सिर का दर्द सहन न हो तो वो मां के आंचल में तब्दील हो जाए कि सिर्फ लड़ना बेमकसद होता है जब तक कि जीत हमारी होगी तो किसके साथ बांटूगा यह प्रश्न न रहे।

तो थोडा सा और बेहतर सोच रहा हूँ की मैं भी शादी कर लूँ. कुछ ख्याल यह भी है जैसे लाइन मारने के विभिन्न पडाव पर जिक्र करेंगे, खेत से एक शाम मकई के बोझा जब आंगन में पटकेंगे तो माथे का पसीना उनसे आँचल से पोछेंगे और गंगा पार फैले हुए विशाल बालूराशि पर उगे परवल के लतों की जड़ ढूंढेंगे. 


Tuesday, March 22, 2011

धूप निकली है मुद्दतों के बाद, गीले ज़ज्बे सुखा रहे हैं हम




कभी उससे पूछना कि वो कितना अकेला होता होगा जब तुम उसे छत पर कड़ी धूप में सूखने छोड़ आते होगे। वो सूती साड़ी जो तुम्हारे बदन से लगकर अपने पोर पोर में तुम्हारे होने को अपने में समेट लेता है। कभी उससे पूछना कि वो जब दोपहर के ढ़ाई बजे छत पर कड़कड़ाता है तो कैसी तनहाई घेरती है उसे कि दिखाने के लिए झूलता रहता है। 

आज तुमसे देर तक बात करके देर तक उदास रहे। ऐसी उदासी बरसों से नहीं आई थी। जो आई थी इस दौरान तो वो नौकरी, करियर, आटे दाल की कमी की उदासी थी। तुम्हारे छूने की उदासी नहीं थी। साथ जिंदगी गुजारने की बात यों थी कि बगैर जिंदगी गुजारना। साथ जिंदगी गुजारना महज़ एक हसीन बात थी। अपने आप में खूबसूरत ख्याल और हकीकत उदासी लिए हुए। कितना अजीब होता है कि हम अपने अतीत पर हैरां होते हैं और कई चीज उम्र बीत जाने के बाद मिलती है। भरी जवानी समंदर किनारे घूमने निकले और कुछ न मिला और एक दिन जब फेफड़े में हवा ना रहा ना ही गले में ताकत तो गीले रेत संग पानी में शंख से पैर टकराता है। हम उठाकर देखते हैं, अपने बालों को इधर उधर झटका देते हुए जांच परख करते हैं और फिर यह अधिक से अधिक ड्रांइग रूम में सहेजने के लायक नज़र आता है। तुम्हारा मिलना दूर के डाल के पंख फड़फड़ाता पंछी जैसा था। जो प्यार चाहा था वो मिलने के बाद भी... 

मार्च के इस मौसम में जब गुलाबी से ठंड में (जब तुम बालकनी में अपनी गोरी नंगी बाहों को इस ठंड के बाइस सहलाते हुए आती हो) रातों को उजास चांदनी फैली रहती है, चांद के दाग ज्यादा गहरे दिखते हैं और वो झीनी सी उसी तन्हा सूती साड़ी के पार खिलता है, चांद को नीले काले कैनवास पर कोई बनाता है और उसपर हल्के हाथ से झाड़ू बुहार देता है।

राजधानी की सड़कों पर नीम तथा अन्य पेड़ो के पत्ते पटे हुए रहते हैं, पत्ते जो सड़को पर ही गिरे गिरे सड़ रहे हैं हमारा मानस पटल भी ऐसा ही राजमार्ग बन जाता है जहां कई यादें छींकती हुई हैं तो कई बीमार, कई सहेजे हुए, कई उत्साह से लबालब पर सभी अपनी जगह गल रही है, उसी से महक उठता है और एकाकार होकर खड़ा क्या होता है - कुछ स्नेह संबंध, कुछ प्रेम संबध।

देर से आना, तुम्हारा हाथ पकड़ खुद को सांत्वना देना है। वो सुख पाना है जो बस मिल जाना होता है।

... और अब दिल में यही चाहत करवट ले रही है कि जोर से तुम्हारी हथेली रगड़ और दूर तक के वीराने जंगल में आग लगा दूं। लग जाएगी यकीन मानो। ये भावावेश नहीं, तुम्हारे मिलने के खुशी पर नहीं बल्कि उदासी के उस ढ़ेर पर खड़े होकर जुटाए से आत्मविश्वास से कहा जा रहा है।

Thursday, March 10, 2011

आओ आने की करें बात कि तुम आये हो !!



उसके आने की जब खबर महकी थी तो वो उतनी बड़ी नहीं थी जब सच में उसके कदमों की आहट आने लगी क्योंकि उसने आने को कई बार कहा था। ऐसा ही लगा वक्त ने एकदम आंखों के पास माचिस की तीली जलाई हो। इस झूठे आने को कहने पर उसे एकबारगी ऐतबार तो हो ही जाता था। और नहीं भी होता था तो यह एक खूबसूरत छलावा था, मन में घूमने वाला एक काल्पनिक छल्ले की तरह। दिल को अच्छा लगने वाला झूठ। 

झूठ भी दो तरह के होते हैं एक जिसे सुनकर तन बदन में आग लग जाए, आपका तलवा लहर जाए तो दूसरा जिसे सुनने को आपका दिल बार-बार दिल करे। जैसे किसी लड़के की कई प्रेमिकाएं हो और एक नई लड़की जो उसकी दोस्त बनी हो वो भी उससे आई लव यू सुनने की इच्छुक हो। एक संतुष्टि प्रदान करने वाला झूठ मानो बेटा उम्र के एक बड़े मोड़ तक बेरोज़गार रहे और मां को दिलासा देता रहे - अम्मा दो रोटी भी कमाऊंगा न, तो एक- एक खा लेंगे.... और मां इसे सुनकर वारी वारी जाए। 

अपनों के कदमों की आहट अपने आप में एक पुरकशिश कहानी होती है। दिल को धड़काने वाली। करीब आती जाती और पेट में एक मीठा सा दर्द उठाती हुई। जैसे सुहागरात में सेज पर दुल्हन की आंखें बंद हों और पति देर तक कोई हरकत न करे। दुल्हन का मन वन में कुंचाले भरती हिरणी सी हो जाए। एक छटपटाहट, आंखे खोलकर देखना चाहे लेकिन पलकें भींचे रहे और साड़ी में आधा छुपा पेट वैसा ही हरकत करे जैसे मानव हृदय का गुब्बारा फक-फक करता है।

उस अपने की कदम की आहट छोटी-छोटी सांस वाली शहनाई की आवाज़ जैसी भी लगती। घर की सारी चीज़ें अपने जगह से हिली हुई लगती। दीवार धसके लगते, किताबों का ताखा तिरछा लगता। पलंग का तखत का रंग ज्यादा कजली सा लगता, घर की सभी चीज़ें रोकती लेकिन वो इन्हें देख कर भी अनदेखा करती। हर चीज़ के साथ व्यवहार बदला हुआ था लेकिन अनिभय ऐसा मानो ‘नहीं-हां मैं तुम्हें समझ रही हूं‘, ‘मुझे किसी चीज़ की जल्दी नहीं है‘ जैसा।

अब कहां फुर्सत थी! कांटी पर टंगे करछुल को सीधा करने की जिसके लिए छोटी बहन को सज़ा दिया जाता। हर चीज़ को रखने का एंगल बताया जाता। सहेजने और बरतने का सलीका समझाया जाता। जिंदगी काट कर रखी हुई थी और तनहाई ने खीझ पैदा कर थी। कभी रो लिया जाता तो कभी किसी छोटे बच्चे को पकड़कर दो तमाचे मार दिए जाते।
नेक लाइन के गड्ढे गहरे हो जाते, जहां अक्सर नहाने के बाद पानी की एक बूंद देर तक रूकी रहती। कई बार तो रूके रूके ही सूख जाती तो कई बार वो उसके देख लिए जाने के बाद होंठों से चुन ली जाती। एक बार तो उसने कह भी दिया था सबमें लड़ाई होती होगी मैं यहां ठहरूंगा।

उसकी दुनिया जबसे छोटी हुई यह आहट ही है जिसे सुनकर जीवन के तमाम गंगा घाट पर दीये जल जाते और उसके बाइस पानी में एक शरारे पैदा हो जाते।

प्रेमिका इतनी संवेदनशील कि काम करते, सोते जागते उसके आने का एक खदशा होता। सूनी सी गली मन के एकांत में दूर तक रेंग गई थी लेकिन जब आज सीढ़ी पर आदमकद छाया देखी तो पूरा बदन झूठा (सुन्न) पड़ गया और अब पवित्र मिलन से जूठा होने की बारी थी।

Tuesday, March 8, 2011

क़िसास. क़िसास. क़िसास.



क्या जरूरी है कि मरने के लिए दौड़ती ट्रेन से टकराया जाए या फिर रबर के गेंद की तरह जमे हुए सीमेंट के बोरे पर सिर को पटका जाए। चलते फिरते भी मरा जा जा सकता है। नमक की तरह पानी में घुला जा सकता है और जनवरी की रात में टंकी में रखे पानी की तरह जमते हुए भारी हुआ जा सकता है।

जिंदगी का डार्क शेड कैसा होता है ? क्या वो भी ब्लैक होल्स की तरह चमकता है। कोई चीज आखिर कितनी बदसूरत हो सकती है ? किस हद तक गुमराह हुआ जा सकता है ? 

यह सच है कि पिछले कुछ दिनों से मुझे संभोग से भी विरक्ति हो गई है। जबान का जायका खराब रहता है, रात भर सो कर उठता हूं और खुद का थका हुआ पाता हूं। मन स्पेनिश सांढ सा नथुने से जोर जोर का सांस मारता हुआ इधर इधर दौड़ता है  और बार बार इसे लिखते हुए यों महसूस होता है जैसे मैं परदेस में रह रहे अपने बेटे को अपनी बीमारियों का जिक्र सिर्फ उसे वापस बुलाने के लिए कर रहा हूं।

सुना हर गरम चीज़ की उमर कम होती है। मशीन ज्यादा गर्म हो तो फूंक जाती है। तवा ज्यादा गर्म हो तो रोटी जला सकती है। और जो पार्क में किसी लैम्प पोस्ट में लगे बिजली की बल्ब की तरह जलते हुए खड़ा है और बारिश की एक बूंद भिगो रही है, यह कैसा चैतरफा आघात है? दण्ड पाते समाज में सिर झुकाए लैम्प पोस्ट में लगा बल्ब जो जलने के बाइस उम्र कम होना अपने नसीब में लिखवा लाया है क्या उसे यह बताने से क्या होगा कि जब तक जले रोशनी दी। ऐसे में एक रूसी कविता याद आती है कि ये सारे चमकने वाले चीज खुदगर्ज हैं यह सिर्फ अपने लिए चमकते हैं।

कसम से इस मौसम ने बहुत सताया यार। नहीं मुझे लगता है कि सताया हर मौसम ने है पर अबकी मैं इन दर्द को लिख सका इसलिए यह ज्यादा नुमायां हो रहा है। तुम तो जानते हो न इस बेदर्द दुनिया में शोर सुनी जाती है, समझी जाती है और उसकी इज्जत की जाती है।

इन दिनों मंटो को चाट डाला और अंतिम खंड पढ़ते हुए यह महसूस हुआ कि मंटो की तरह मेरे भी बदन का दर्जा-ए-हरारत नोर्मल से एक डिग्री ज्यादा रहता है। 

... तो क्या लगता है तुम्हें हम कितनी जल्दी मिल सकते हैं? 

Monday, March 7, 2011

अवसाद का गाढ़ा रंग



मांमरगई.जल्दीआजाओ

किया गया तार इतना ही छोटा था। छर्रे जितना छोटा और हृदय में धंसता हुआ। पैर तो एकबारगी उठे ही नहीं थे। यों लगा था जैसे धरती का बोझ बांध दिया गया हो। अब यह बोझ आगे बढ़े तो कैसे... अगला कदम आगे बढ़ाते ही महसूस हुआ दिमाग में कसी गई प्लेट ढीली कर अपने धुरी पर घुमा दी गई है। एक जोरदार झन्नाटा आया और बाएं हाथ पर दो कदम दूर जाकर गिरे। लोग इसे सर में चक्कर आना कहते हैं।

यह शौक अधूरा रह गया कि कमरे के दो अलग अलग कोनों में बैठकर हम रोएं। ऐसा मैंने प्रेम में सोचा था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमारा मूड एक सा हो। कभी मैंने उसके गोलों पर रूका आंसू का वह कतरा पीया था तो कभी वो माथे पर थपकियां देती और मेरी सांसों को अपने उभारों के बीच बसाने की भरसक कोशिश की थी। यह इंसानी फितरत है कि एक रोते हैं तो दूसरा उसे चुप कराने लगता है। मुझे मेरे चाचा की आकस्मिक मौत याद आती है जब एक जवान अकाल मौत हुई थी। आंगन में एक साथ पूरा परिवार बिलख रहा था। सब बिलख रहे थे और दूसरे को चुप करा रहे थे। सबकी आंखे मछली के गलफड़े जैसे ताजे लाल थे। उनमें हारे हुए का बोध था या नहीं मैं नहीं कह सकता। हां चूल्हे में राख हुआ एक आधा जलावन जैसी मुर्दानी छाई थी।

सिहरा किससे जा सकता है ? घटना की वीभत्सता से, कल्पनामात्र से, श्मशान में आधी रात जलते शव के पास बैठ कर कुछ अनसुलझे मर्म के खुलने के एहसास से या कि पीठ पर लेकर किसी लाश को घाट घाट पर ‘यहां नहीं जलाओ‘ के आदेश से ? आखिर क्योंकर कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है ?

बहुत पतली गली से जब तुम लोग इतने पास से निकले थे तो हरगिज हरगिज यकीन नहीं था कि आप लोगों की सांसो को आखिरी बार सुन रहा हूं और तुम... तुम्हारे लिए तो सिर्फ इतना याद है कि पिताजी की डांट लग रही थी और तुम्हारी पीठ पर पसीने की धार चल रही थी।

सुना है शब्द देने मात्र से चीज़े जिंदा हो जाती हैं? फिर क्यों नहीं जिंदा हो जाते हैं वो लोग जो गाहे बगाहे हमारी लिखावट में उतर आते हैं ? इस समय जब फूल लदक रहे हैं शाखों पर और डालियां वसंत में इतरा रही हैं तो यह कौन सा शाप है जो अवसाद का रंग गाढ़ा किये हुए है ? यह कैसी जगह है जहां मैं जो घोट रहा हूं मुझे इसका इल्म नहीं है कि यह सेहत पर क्या असर डाल सकती है।

गले में अगर शराब का स्वाद रूका रहे तो पीना छोड़ दिया जाए। नीलकंठ ने जैसे ज़हर रोके रखा है वैसे ही हमने भी कुछ सवाल हलक की धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर रखा है। उसका नीचे उतरना हमारी दिखावटी मौत होगी और उगल देना हार। तो इन सवालों को रोके रखकर जो उकेर रहा हूं, उरेक रहा हूं, उलीच रहा हूं वही मेरे जीवित रहने का प्रमाण है।

Thursday, March 3, 2011

सची माता गो, आमी जुगे-जुगे होई जनोमो दुखिनी...!

            
      ...और जंगल में नदी उतरती जा रही है। उफनती हुईबड़ी गाढ़ीमटमैली नदी। वेग से बहनावेग में बहनातेज़ हवा के साथ झूमतीपागलउन्मत्त नदी। पहली नज़र में बरसाती नदीभादो की नदीअपने साथ छोटे झाड़ झंखाड़ तो क्या बड़े बड़े पेड़ों को को उखाड़ बहा ले जाने वाली नदी। सबको अपने साथ यूं बहाते लिए चल रही है कि किनारों पर बैठे लागों को बात करने का मौका मिलता है। बातों में अंदेशा है - बरगद होगा नहींअब इनती भी तेज़ हवा नहीं है कि बरगद जैसे मिट्टी से गूंथे जड़ वाले पेड़ को भी उखाड़ दे। पूरब से पागल हवाएं चल रही हैं। पेड़ों के कान पश्चिम की ओर मुड़ गए हैं। कान का कच्चा होना इसे ही कहते हैं। सभी एक साथ निंदा रस का आनंद ले रहे हैं। एक पूर्णिमा की सांझ समंदर किनारे रेत के घर का नक्शा बनाती है। गुलदाऊदी के फूल खिले हैंबागों में। तमाम तरह की कई और फूल भी खिले हैं सभ्य से बर्बर फूल तक। हवाएं यूं चल रही हैं जैसे कान में शंख बजते हों और लड़की के बालों को लगातार तंग कर रही है। बाल बुरी तरह से उलझ गए हैं। अब कोशिश इतनी है कि वो आंखों के ठीक आगे न रहे या होंठ से न उलझे। 
एक आवारा देखता हैकहता है। गुलाम अली के गज़ल से ज्यादा हवा के इफेक्ट में दिलचस्पी है।

खट-खटखट-खट... !
जालीनुमा खिड़की के किनारे दीवार से बार-बार टकराती है। बंद करो खिड़की जी। कमरे का सन्नाटा तोड़ती है। बाहर बेहोशउन्मादी हवाएं हैं। शीशे का फे्रम गिराएगी और तीन बरस बाद मेहनत के तैयार किया हुआ माहौल तोड़ेगीवीसीआर के रखा वो लंबी चिठ्ठीआले में रखा दीया अंधेरे के शून्य से फिर वापस आकर जीवित हो जाता है। हल्का अंधेरा कितना अच्छा हैबहुत उजाला अच्छा नहीं होता। आंखों को लत लग जाती हैदिल को आदत। लोगों की नज़रों में खटकती है। अपनी ताकत से खड़े रहना सामने वाले को प्रतिद्वंदी जैसा लगता है। आंखो से असहायतामजबूरी झलकती रहनी चाहिए। लोग इसे पंसद करते हैं। अपने मुताबिक एहसान करने की संभावनाएं बनी रहनी चाहिए लेकिन बड़ों का काम तो छोटों को जगह देना है ! नहींएहसान करने के बाद उम्र भर एहसान मानना चाहिए। उसके अहं के तले दबे रहना चाहिए। अपनी हैसियत उसके पैरों की कनिष्का उंगली में समझनी चाहिए।

लड़की शोव्ल लपेटती है। थरथराती है। अनमयस्क सा मन बनाती है। कितना उजाड़ मौसम है। अपने कमरे का मौसम सबसे अच्छा है सदाबहार खूबसूरत उदासी। बाहर जो दुनिया हो रही है उसका क्या भरोसा आज तलवे में हरापन लगता हैघास पर रूके बारिश की बूंद चिपटती हैओस को बड़ा कर के देख लूं तो उस बुलबुले पर अपना ही चेहरा नज़र आएगा और देखना भी तो अपनी ही आंखों से होगा। झाड़ पर खिले गुच्छे गुच्छे में पीले फूल खिले तो खिले लेकिन जो रूक्का उठाने ज़मीन पर बार बार लरज़ती है तो वज़ह ये कि आज दामन में फूल हैं। परिवर्तन संसार का नियम है! होगा। हमको इसी के प्यार है। 

पृथ्वी घूमती हैनदी बहती हैनदी में नाव चलती हैएक पुरकशिश आवाज़ आती हैखेवनहार के कान चैंकते हैं! उंह ! यह तो रोज़ का गाना है।  

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