Friday, April 22, 2011

यही आगाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था...


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प्यार में कुछ नया नहीं हुआ, कुछ भी नया नहीं हुआ। एहसास की बात नहीं है, घटनाक्रम की बात है। हुआ क्या ? चला क्या ? वही एक लम्बा सा सिलसिला, तुम मिले, हमने दिल में छुपी प्यारी बातें की जो अपने वालिद से नहीं कर सकते थे, सपने बांटे और जब किसी ठोस फैसले की बात आई तो वही एक कॉमन सी मजबूरी आई। कभी हमारी तरफ से तो कभी तुम्हारी तरफ से।

सच में, और कहानियों की तरह हमारे प्यार की कहानी में भी कुछ नया नहीं घटा। प्यार समाज से पूछ कर नहीं किया था लेकिन शादी उससे पूछ कर करनी होती है। घर में चाहे कैसे भी पाले, रखे जाएं हम उससे मां बाबूजी और खानदान की इज्ज़त नहीं होती मगर शादी किससे की जा रही है उस बात पर इज्ज़त की नाक और बड़ी हो जाती है।

कोई दूर का रिश्तेदार था जो मुझ पर बुरी नज़र रखता था। मैंने शोर मचाया तो खानदान की इज्ज़त पैदा हो गई। और जब अपने हिसाब से जांच परख कर अपना साथी चुना फिर भी इज्ज़त पैदा हो गई। बुरी नज़र रखने वाला खानदान में था इससे इज्ज़त को कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन एक पराए ने भीड़ में अपने बांहों का सुरक्षा घेरा डाला तो परिवार के इज्ज़त रूपी कपास में आग लगने लगी।

और प्यार की तरह हमारा प्यार भी विरोधाभासों से भरा रहा। हम कहते कुछ रहे और करते कुछ रहे। मैं तुम्हारे लिए उपवास पर रही पर फोन पर एसएमएस में हमेशा क्या खाया समय से बताया। तुम समय अंतराल पर ढ़ेर सारी किताबें अपनी माली हालत छुपा कर भेजते रहे। पता नहीं तुम इतनी किताबों के मार्फत कैसे प्रेम से रू-ब-रू करवा रहे थे। मैं रोती रही और तुम्हें हंसने के लिए कहती रही। तुम मेरा कहा मान सुबह की सैर पर जाते और सिगरेट फूंकते घर लौट आते। कितना सुन्दर होता है प्रेम ! सभी एक दूसरे को जानते हुए छलते रहते हैं।

हमारे घर का माहौल कुछ यूं है कि बहुत पढ़ लेने के बाद सिर्फ जांचने की शक्ति बढ़ती है। हमारा घर (पाठक यहां समाज समझ सकते हैं) भी विरोधाभासों से भरा है। बुजुर्ग लोग बहुत पढ़े हैं, भाई बहन भी ऊंची शिक्षा ले रहे हैं लेकिन शिक्षा आज वो है जो व्यवसाय या साख बनाने में काम आती है या फिर ऊंगलियों पर उपलब्धियां गिनवाने में। एक दिलचस्प बात बताती हूं मैंने स्नातक इतिहास विषय से करा और आज मुझे शेरशाह सूरी के शासन काल, अमीर खुसरो किसका दरबारी था यह तक याद नहीं हैं। लेकिन मैं बैचलर हूं, समाज में यह कहने से मुझे कोई नहीं रोक सकता। जबकि ईमानदारी से कहूं तो परीक्षा में यदि मौलिक रूप से मेरी उत्तर कॉपी जांची जाती तो मैं हरगिज़ हरगिज़ पास ना होती। लेकिन, मैं बैचलर हूं। अब हूं तो हूं। और अब इसी विषय से मास्टरी और फिर डॉक्टरी भी करने का सोचा है। हम पढ़ेंगे सागर, अपने लिए, सिर्फ अपने लिए। लार्ड मैकाले ने लकीर खींची हम पीट रहे हैं। मैं शादी करके बच्चे संभालूंगी पर इस क्षेत्र में मेरी पढ़ाई कहीं, कुछ काम नहीं आनी। हां इतना फायदा होगा कि जनगणना में शिक्षितों में मेरी गिनती होगी। सास, ननद से झगड़ने और रौब झाड़ने में मैं फलाने तक पढ़ी हुई हूं यह गिना सकूंगी। इतिहास से इतर मन में जो भी रचनात्मकता होगी, ख्यालों का भंवर होगा वो वहीं दफन करना होगा। परदादाओं ने लकीर खींची और अब हम पीटेंगे।

तुम्हारी किताबों ने बगावत भी सिखायी। कभी कभी तो लगता है किताबें भी विरोधाभास से भरी होती हैं। कोई प्रेम के लिए सब कुछ बलिदान करना सिखाती है, तो कोई गलत के विरोध में खड़े होना। किसके लिए बगावत करूं ? हमारा परिवार (पुन: समाज) यह जानता है कि मैं इन सबसे दूर नहीं जा सकूंगी। जब भी कोई परेशानी होगी तो मजबूरी का ऐसा रोना होगा कि गाज हमारे ही फैसलों पर गिरेगी।

शायद अब तुम ऊपर कहे गए इन सब बातों का मतलब समझ चुके होगे। तो सार यह कि मैं भी मजबूर हो गई और हमारा असंभावित मिलन अपने गंतव्य पर पहुँच गया। तो हमारे तरफ से ना हो गई और मैं वही अन्य लड़कियों की तरह ‘कॉमन मजबूर' हूं। अंत में, घिसी-पिटी बात कहूंगी कि खुश रहना। मुझे माफ कर देना। मुझे भूल जाना। इस वाक्य में अगर कोई क्रांति करूं तो यह कि मुझे कभी माफ मत करना जिससे मैं तुम्हारे मन मस्तिष्क में हमेशा बसी रहूं। 

तुम भी कहीं डोलते रहना, मैं भी कहीं बीच मजधार में हिचकोले खाती रहूंगी।

                                                                                                          अब नहीं,
                                                                                                         
                                                                                                        तुम्हारी (?)

Thursday, April 21, 2011

याद तेरी कभी दस्तक, कभी सरगोशी से...


टेबल कवर पर हाथ फेरो तो हथेली से धूल चिपकती है। हिन्दी व्याकरण की किताब खोजने ज़मीन पर समतल ना बैठ पाने वाले स्टूल पर चढ़कर खोजने की कोशिश की तो मंझले रैक से कितने तो रील वाली आॅडियो कैसेट गिरने लगे। सनसेट प्वांइंट, सिफर से लेकर वीर- ज़ारा तक के। एक भी कैसेट पर उसका सही कवर नहीं लगा है। शादी के गीतों वाली कैसट में मुकेश का गोल्डन कलेक्शन है और जगजीत सिंह वाले कवर में यूफोरिया। एक इंसान में भी ऐसी ही बेवक्त, बदतमीज़ और अनफिट ख्याल भरे रहते हैं। 


02.09.1995 के बाद से घर में कुछ नहीं बदला है। एक ट्रंक रखा है अंदर वाले कमरे के कोने में, उसके बगल में चार-चार ईंटों पर खड़ा आलमारी, बची हुई जगह पर मच्छर अगरबत्ती का स्टैण्ड, किसी टेढ़े कांटी पर मुंह फुलाया रूठा लालटेन लटका है। बचपन में जब लाइट कटती थी तो भाई बहन इसी लालटेन के दोनों तरफ बैठ कर मच्छरों, अंधेरों और बिहर खेतों से आती झींगुर की आवाज़ों के बीच पढ़ाई करते। रोशनी सिर्फ सामने होता। दोनों के पीठ पीछे पसरा मीलों का अंधेरा। भाई के आगे एक किताब होती उसके बाद लालटेन फिर एक किताब और आखिर में बहन। इसका ठीक उल्टा क्रम बहन की तरफ से भी होता। यहां आखिर में भाई होता। भाई हो या बहन दोनों के अपने पीछे अंधेरा पसरा होता। दोनों के आखिरी दृष्टि के बाद भी अंधेरा। रोशनी में सांस लेते बस यही दोनों होते। लालटेन, डिबिया नहीं था जो हवा से लड़ते हुए जलता, लालटेन तटस्थ था, गंदले शीशे की आवरण से ढं़का निर्विकार जला जा रहा था। सन्नाटे का अकेलापन बढ़ता तो अपने की आवाज़ सुनने के लिए किसी लड़ाई की खोज की जाती। भाई अप्र्याप्त रोशनी का बहाना बहना लालटेन का हत्था बहन की तरफ कर देता। बहन भी कम रोशनी का तर्क दे हत्थे को दूसरी यानि भाई की तरफ गिरा देती। यह फेंकाफेंकी शुरू होती और इस पर बहस बढ़ता तो मां बेलन लिए रसाई से आती और दोनों को एक-एक बेलन लगा, कुछ आंचलिक गाली देकर, लालटेन के कड़ी को बीच में कर देती। लालटेन कर हत्था टीन का था अपने पेंच में टाईट फंसता था। अब उसे बीच में कर दिया गया जहां से वो हवा में आसमान की ओर मुंह किए रहता। अंधेरे से डर कर किसी अपने को आवाज़ लगाने की इस क्रिया पर इस प्रकार रोक लग जाती।

शिलिंग फैन का पेंट उखड़ गया है। पूजा रूम के दीवार के किनारे का जाला जंगली वैजंती की तरह आगे बढ़ता जा रहा है। जवानी की मुहांसों के बीच लिखे प्रेम भरे खत छज्जे पर रखे काॅर्टून के नीचे रखा जाता। अब वहां उंगली डाल कर उन खतों को टटोलकर खोजने में डर लगता है। कहीं बिच्छू ना डंक मार ले। यह दूसरी दफा होगा लेकिन राहत यह कि अबकी उंगली पर ही होगा। पहला डंक तो विद इन फोर्टी डेज़ में ही दिल पर लगा था। 

पुराने घर जाओ तो याद कैसे मारती है कहना मुश्किल है। जीने के लिए नायाब तरीके ईजाद किए जाते। अभाव का दिन अपनों को बड़ा करीब रखता है। यह पराए शहर में भी आजमाई हुई बात है जब हम जिया सराय में रहते और महीने के अखिरी दिनों में एक दूसरे को संभालते। एक फोन पूरे कमरे का हो जाता। एक जोड़ा चप्पल भी जूतों का अल्टरनेट बन जाता। फिर जब सुख यानि सैलरी आती सबकी नई दुनिया बस जाती। सभी अपने अपने मन मुताबिक रेस्तरां में जा फ्राइड राईस, डोसा, उत्तपाम और नाॅन वेज थाली खाते।

याद मारती है तकिए में धंसा कर, चुपचाप। किसी अधेड़ उम्र के महिला की कमज़ोर बूढी हाथों से गुंथे आटे की रोटी खाओ और खाते वक्त उसमें बाल और कंकड़ भी मिले तो अपने अपराध बोध और अतीत की यादों का सिरा नहीं टूटता। 

यह किसी धारदार चाकू से अपना गला रेत, अपनी पीठ पर पत्थर बांध दरिया में कूद जाने से भी बदतर हालत में ले जाती है। आश्चर्य यह कि यह सब इतने के बाद भी सुख की अनुभूति देता है।

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विडियो फिर से...

Wednesday, April 20, 2011

बदहवासी में भागना, पहचाने पेड़ों से टकराना और गिरना...

लड़की वो जिसका अगला कदम क्या होगा ये पता न हो। लड़की वो जो किस करवट बैठेगी इसका अंदाजा न हो। लड़की वो जो मासूम चेहरा बनाकर चीख उठे। लड़की वो जो इतनी बेपरवाह कि बाल, दुपट्टा और हंसी उड़ी जा रही हो और यह न सोचे कि इनसे कैसे अनमोल हीरे मोती गिरे जा रहे हैं और इसे बचा कर रखना चाहिए। लड़की वो जो इतनी नासमझ कि छत से नीचे आती बीच सीढ़ी पर सबसे बचकर चूम लो तो चिल्ला उठे कि - ''मम्मी देखो इसने मुझे यहां सीढ़ी पर छुपकर जबरदस्ती किस किया।'' लड़की वो जो पैदाइशी कलाकार हो, हर सुबह उसका बदल यूं जैसे केले के नए पत्ते गोल गोल खुलते हैं। लड़की वो जिसकी दो आंखों में चूहे और खरगोश जैसी चलपता और गालों पर उगे सुनहरे रोएं जैसी हल्की नादानी हो। जो बार बार प्यार करने जैसी गलती पर मजबूर करे। 


2011 की डायरी में यह दर्ज कर रहा हूं कि उन आंखों में अब किसी ताखे पर जलती डिबिया का कम रास में जलने जैसा संशय भी आ चुका होगा और थोड़ी बहुत अपनी थरथराती रोशनी की ज़द में दूर रखे किसी सामान के कद का हिलना डुलना भी। भौतिक चीजों की अभावों में नहीं होगी इससे बदन में उभार भी ऐसे आए होंगे जैसे मिट्टी के घरो की सपाट दीवारों पर अचानक निकल आया कोई ताखा। लम्बे हाथों को लेकर सड़कों पर चलती होगी। बहुत खूबसूरत नही थी/हो तुम कि जिसके कारण मैंने तुमसे प्यार किया। बस इतना ही था कि चारों तरफ से घिरे किसी पहाड़ी की गोद में एक पहचानी सी हवा सरसराया करती है। यहां हवा काॅमन है जो जब पछुआ बन कर चलती है तो मिट्टी के दरारें सूख कर फैल जाती है, थोड़ी ठंड भी लगती है, गोया होंठ भी फटने लगते हैं और जब पूरब से आने का रूख अख्तयार करती है तो बदन में बसे अतीत के/जोड़ों के दर्द उभारती है। उत्तर और दख्खिन से आती हवा बड़ी क्षणिक होती है इतनी कि इन पर हम गौर नहीं करते। कभी कभी लगता है हवाओं पर पूरब और पश्चिम दिशा का ही दबदबा है और जो हवा इस लड़ाई में बहक जाती होगी वो बाकी बचे दोनों दिशाओं के मार्फत हमारी खिड़कियों से रिस आता है।

अपनी डायरी में दर्ज कर रहा हूं कि चैराहा घेर कर छोटा कर दिया गया है, मेन फील्ड अब बैठने की जगह नहीं रही, क्रिकेट खेलना तो दूर की बात है। सुधा डेयरी प्रोजेक्ट वाली दुकान पर अब तुम अपने छोटी भाई के साथ भी नहीं आती। अपनी दीदी का सलवार कुरता तुम्हें लगभग फिट आने लगा है जिनमें पहले भी हम इतने वाकिफ थे कि मुझे कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी। 

दूध लाना, मोड़ पर से दही, सब्जी लाना, अपने भाई को स्कूल से लाना वो सारे छोटे छोटे बहाने खत्म हो रहे हैं बस बच रहा है तो एक बड़ा हक़ीक़त। ज़रा मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में एक बार लेकर थपथपाते हुए यकीन तो दिलाना कि हम अब नहीं मिलेंगे! क्या एक बार अपने चेहरे पर अब वो भाव ला सकोगी कि तुम्हें राह चलते, बालकनी में खडे रहते कोई नहीं देख रहा होगा ? क्या एक बार उसी लहजे में फोन पर माफी मांग सकोगी ? क्या मेरे साथ किसी घुटे हुए उदास प्रेम भरे गीत में आवाज़ मिला सकोगी ? क्या मैं प्रति किलोमीटर एक रूपए आॅटो पर बचा कर सैंडविच (दुकान का नाम) से पैदल पांच रूपए का डेयरी मिल्क तुम्हारे दामन में रख पाऊंगा ? अगर तुम नाराज़ रही तो उसे खिड़की के बाहर फेंक सकूंगा? कैसी उम्र है कि मैं अपने रूखाई के शबाब पर हूं और डेयरी मिल्क दामन में रखने ना सही फेंकने तक का मौका भी तुमसे खुल कर मांग नहीं रहा?

कभी हम एक दूसरे में फिसलते थे। मैं चबाए हुए अन्न की तरह तुम्हारी हलक से उतरता था, तुम किसी आंसू की तरह मेरी आंखों में ही पैदा हो कर फिर से जज्ब हो जाती थी।

कई तहों में रखी जिंदगी से मिलती-जुलती, मां से सुना एक मुहावरा याद आता है - ‘‘मुठ्ठी भर चना, कभी घनघना ... तो कभी वो भी मना''

Tuesday, April 5, 2011

छज्जे-छज्जे बारिश से बचता लंगड़ा जानवर




लड़का दुनिया भर की बातें किया करता। कहता - तुम्हें सांवला होना चाहिए था ताकि तुम्हारे पैर की चांदी की पायल ज्यादा चमकती। यूं गोरे पैरों में उजला रंग ज्यादा नहीं जंचता। कभी मोटे मोटे मासूम गालों में चिकोटी काट कर बच्चों को दुलराती हुई आवाज़ में कहता - थोड़ा और खूबसूरत नहीं होना था। और जब यह कहकर अपना मुंह उसके गाल के पास ले जाता तो जीभ पर थोड़ा सा नमकीन पानी आ जाता। यह कहां संभव था उसका खूबसूरत दिल दुनिया को दिखाया जाता लेकिन लोग थे कि हैरान थे कि साले को उसमें आखिर ऐसा क्या दिखा जो उससे जी लगाए बैठा है!

अक्सर दोनों दूर तक घूम आते। ज्यादातर पहाडि़यों पर जाना होता। मुंह से भाप निकलते हुए एक दूसरे को देखना एक अजब सा सकून देता। अकेलापन पूरा भी था और अधुरा भी। प्रेमी प्यार करने के बाद वैसे भी अपना अधूरापन हर जगह साथ लिए चलते हैं। पहाड़ पर ही क्यों? तो इसका बड़ा साहित्यिक सा जवाब है कि वहां सदाएं गूंजती हैं और इश्क में गहरे उतरे हुए पर दूर-दूर रहते हुए जैसे प्रेमी नदी, झरना, परबत, फूल, तितली, जूगनू, रंग, मौसम, समंदर आदि से भी दिल लगा बैठते हैं कुछ उसी एहसास लिए पहाड़ पर जाते।  

लड़की अपने साथ रेडीमेड चाय की पत्तियां रख लेती, लकड़ी खोजना कठिन ना था। लड़का किसी चरवाहे से दोस्ती गांठता, प्यार के दो मीठे बोल बोलता, बकरियों की एक टोली को थोड़ी दूर तक चरा लाता। बदले में चरवाहा एक बकरी के एक वक्त का दूध खुशी-खुशी दे देता।

दोनों चाय पीते। कुछ बोलते, ज्यादा गुनते। बीच-बीच में एक लम्बी चुप्पी आ जाती। थोड़ी देर बाद दोनों खुद में ही असहज महसूस करते। इधर उधर गर्दन घुमाते और कोई नई बात कहने की सोचते। जो कहना होता सामने वाले को पहले से पता होता और कुछ मिला कर एक ऐसा माहौल बनता जैसे कोई बहुत बोरिंग सी नाटक देख रहे हों और अगला अब क्या करेगा और कौन सा संवाद होगा पूरा स्क्रीप्ट हमारे दिमाग में सहेजा हुआ होता है।

कई बारी ऐसा भी होता कि एक-दूसरे को देख दोनों दिल ही दिल में पछताते कि काश प्यार नहीं हुआ होता तो ऐसा बुरा हाल भी नहीं हुआ होता। क्षण भर बाद ही फिर अपराधबोध उभर आता। उसे मिटाने के लिए किसी बहाने से एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते। बात कुछ और करते पर दिल ही दिल में माफी मांगते और पछताते। कहीं से यह प्रतिज्ञा भी करते कि अब और ज्यादा टूट कर प्यार करेंगे।

कुछ हादसे हो चुके थे, कुछ होने वाले थे। जो हो चुके थे वो झेले जा चुके थे जो होने वाले थे उसका इल्म दोनों को था। इस ख्याल ने भीतर ही भीतर ऐसा उत्पात मचा रखा था कि 22-23 साल का प्यार 28-29 में तब्दील हो गया था। यह थका देने वाला था। पेट का दर्द अभी मीठा भी नहीं हुआ था कि परिपक्व हो गया। बातों में फिलोसफी गिरने लगे। सिगरेट का कश लंबा खींच कर देर में छोड़ा जाता। कई बार इतनी देर हो जाती कि लगता धुंआ अब बाहर नहीं आएगा।

पहाड़ों पर सांझ ठहर जाती। पेट में पड़ा कंकड़ बढ़ कर पत्थर का रूप लेने लगता। कई बार ढ़लते-ढलते सूरज भी रूक जाता अब आलम यह था कोई कुछ कहता तो अपने कहे को उसी तान पर सुनने की कोशिश करता और सामने होने के बावजूद आवाज़ उस तक देर में पहुंचती। कहने वाला देखता कि हवा की तरंगों पर वो जा रही है आवाज़, एक कदम, दो कदम..... अब उसके कान तक पहुंची, समाई, वो अब उसके मस्तिष्क में हरकत हुई और अब लड़की को समझ में आई और अब उसकी प्रतिक्रिया होने वाली है।

सांझ के सन्नाटे साथ देते। आंखें फाड़कर देखा जाता तो कहीं-कहीं ही सही झाडि़यों का झुरमुट ज्यादा अंधेरे में डूबा लगता। कितनी तो टोकरी अंधियारे की रखी हुई लगती। पलकें देर से झपकायी जाती और अंधेरा प्याला दर प्याला दिल में उतरने लगता।

हादसों ने हमें बताया कि तुम्हारा रूतबा किस कदर अहम था।


Friday, April 1, 2011

शीशे का खिलौना था, कुछ ना कुछ तो होना था ! हुआ.


 
मैं: 


आज आया तुम्हारे घर, 
कुछ वक्त बिताया
रोशनदान देखे, अलमारी, अलगनी, दीवार और पंखे के ऊपर लगा जाला भी देखा। 
पांच रूपए का बेसन, एक पाव दूध, सोयाबीन ढ़ाई सौ ग्राम और आटा आधा किलो
रद्दी अखबारों के बीच किसी किसी काग़ज़ पर लिखा यह बजट भी देखा
उदास किताबों के बीच मोड़े मोड़े पन्ने देखे
लगा तुम्हारा उचाट जी, जम्हाई, बेवक्त किसी की पुकार अभी तक वहीं रखा है।

ठीक उसी कांटी पर टंगा है अब भी तुम्हारा बी. एड. वाला बस्ता
और टीचर्स डे के बहाने चश्मीश शिशिर का दिया बिना डंठल वाला गुलाब
(यह अलग से छुपा कर ‘गुनाहों के देवता‘ में रखा है)

ज्यादातर फूल की प्रजातियां, शब्दों के उद्गम, उनकी विशेषताएं और प्रयोग तो याद है
पर क्या अब भी रोमांचित होती हो ?
दिमाग में झटका लगता है ? कोई विलक्षण किरदार मिलता है ?

साड़ी अब सिर्फ कपड़ा भर क्यों है ?
रंग गैर जरूरी हुआ ?

सुलोचना का जवाब:

बावजूद सबके समंदर नहीं होते हम
कि पर्याप्त मात्रा में ही होता है हममें नमक जैसा कुछ
तो यूँ समझो कि
धूप बेहद तेज़ खिली और जो तुम खोज रहे हो उसका वाष्पीकरण हो गया
रूको-रूको-रूको 
जो इतनी घनीभूत भी नहीं कि फिर से बरस सके
वैसे 
जिंदगी का गर तुर्जबा हो तो 
विज्ञान के कई नियम फेल होते नज़र आते हैं।
और 
जवाब, प्रश्नों से बढ़कर होते हैं 
कई बार फिर से सवाल पूछने लायक नहीं छोड़ते.

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