Tuesday, May 31, 2011

सम्मन जारी किया गया





पुराने किले से सदा आती है। हवा उन दीवारों को छूते हुए आती है, किसी घुमावदार सुरंग तो तय करती। हवा इनमें जब भी घुसती या निकलती है मानो को काई अजगर पैठ या निकल रहा हो। बहुत सारा वज़न लिए। मुहाने पर निगरानी करता नीम का पेड़ बारिश का पानी पी कर मदमस्त हो चला है। तने ऐसे सूजे हैं जैसे किसी नींद में एक पुष्ठ छाती वाली  औरत लेटी हो जिसके बच्चे ने उसका ब्लाउज सरका दूध मन भर पिया हो। 

xxxxx

पीपल के पत्ते की तरह नज़र आते हैं कुछ लोग। अपनी जगह पर हिलते, हवा के चलने पर सरसराते। हवा कोई खबर लिए पेड़ में घुसती है और तने को पनघट मान सारे पत्ते एक दूसरे से सटकर वो खबर सुनने गुनने लगते हैं। ये बड़े क्षणिक पत्ते हैं। जीते जागते हुए भी एक मरियल हथेली से। अपनी जड़ों से तुरंत उखड़ आने वाले। एक दिखावटी टा टा करता, हिलता कोई हाथ। पलट कर देखो तो ऐसा ही लगे कि किसी अपने की तलाश में पराए घर में आया था। मेहमान होते हुए खुद खर्च किया और जाते वक्त पूरा घर लाज लिहाज के मारे हाथ रूख्स्त कर रहा हो। 

xxxxx

एक दयनीय सी स्थिति यह है कि हमारे चारो ओर दलदल है, पीठ के नीचे कांटे हैं, दिमाग में रेंगता कोई तलाश है और तलवों मे लगती गुदगुदी है। अपने अंधकार में खुद को एडजस्ट करने की कला खोज रहे हैं हम। कभी कुछ पढ़ा है, कभी कुछ देखा है और थोड़ा सा सुख कभी भोगा है। ये मेले में हीलियम की गुब्बारों के लिए तलवे उठाते बच्चों की तरह जिद करते हैं। 

xxxxx

अमीर और गरीब लोगों के बीच एक बड़ा बारीक सा फर्क यह है कि अमीर के घर कोई काम नहीं रूकता। चार महीने की बिना तनख्वाह पाया ट्यूशन मास्टर देखता है कि कैसे दीवारों के बीच नया दीवार सेट किया जाता है। पुरानी टी.वी. के जगह फ्लैट टी.वी. कैसे रिप्लेस होता है। दशहरे पर नए डिजायनदार कपड़े लिए जाते हैं। बड़ा बेटा  फोन पर ट्रेवल एजेंट से मुंबई की फ्लाइट की टिकट के लिए बहस करता है। इसके उलट गरीब के घर में एक काम के बदले सारी चीज रोकी जाती है। अगर स्कूल का फीस भरना है तो सुबह का एक पाव दूध रोकना होगा, लकडि़यां ज्यादा चीरनी होगी और रात को बाप का डिक्लोज करना कि आजकल नींद नहीं आती सो कल से काम के बाद चार किलोमीटर पैदल चल लिया जाए तो अच्छी थकान हो जाएगी।

xxxxx

सफेद, बहुत साफ कमरा। दूधिया ट्यूब लाइट की रोशनी में नहाया हुआ। उज्जवलता दिमाग के किसी कोने में विंड चाइम्स सा बजा रहा है। क्रिसमस के पेड़, बड़े बेमौसम, सुस्ताई पत्तियां नीम बेहोशी में.... फूलझाड़ू के हल्के बुहार की तरह। और कोने में नया लगता कोई जाला जिसकी अभी बस शुरूआत भर ही हो। अगर किसी ने अपने गर्लफ्रेंड को बचपन से बड़े होते देखा हो तो उसके बगलों पर उगता हुआ बाल जैसा... बेहद चिकना, नर्म और मुलायम, हल्के काले-सुनहले बाल, संगमरमर की सफेदी के बीच.... आखिरकार एक लोभ संवरण।

xxxxx

हथेलियां रगड़ो, कोई तसल्ली दिलाओ मुझे।

(डायरी- अंश)

Tuesday, May 24, 2011

अपने ही दिल से उठ्ठे, अपने ही दिल पर बरसे


Photo of Dutch oven cooking on campfire


जैसे खिजाब लगा कर तुम्हारे साथ इस उम्र में नाचने की गुज़ारिश की हो, एक लम्बा वक़्त बीता लेकिन हमारे बीच की खाई पर ये किसने कामगार लगाये ? हम कहने, दिखने और लगने को पति पत्नी हैं लेकिन तुम मुझसे बड़ी ही रह गयी, मैं खूँटी पर पर टंगा याचना ही करता रहा,  एक आत्मसम्मानी भुक्तभोगी जिसने एक जीवन भर आत्मसम्मान लटका दिया, विवाह से सत्रह साल होने को आये लेकिन रास्ते में करबद्ध खड़ा एक स्वागत कर्मी लगता हूँ, मुद्रा प्रणाम की है लेकिन उसी में सबको रास्ता भी दिखाना हो रहा है, तुम्हारी पेंचदार जुल्फें नसीब हैं लेकिन किराए का लगता है. चूम सकता हूँ लेकिन  पराया महसूस होता है. प्रतिक्रिया में कई बार वो कम्पन, वो सिसकारियां नहीं मिलती और तो और जब लम्बे प्रवास पर जाता हूँ तो आँखों में वो पुलकित और उमड़ता नेह भी नहीं दीखता. 

एक ज़ालिम ज़माने से लड़ना क्या कम था, एक बे-इज्ज़त करता समाज क्या कम था जो पाँव तले नाव की पाट भी डगमगाती हुई लगती है ? खुद से बहुत ऊब कर और ग्लानि में कभी गले भी लगती हो तो समझता हूं कि इस तरह मिलना एक आदरपूर्वक गले लगना है। हद है कि मैं बनावट हमेशा कठोर चीजों की ही समझ पाया। कल्पना में हाथों में रूई होता था लेकिन हकीकत में कोई पत्थर। मैंने सपने देखना छोड़ा नहीं लेकिन जब सपना सिमटकर सिर्फ एक से जुड़ जाए तो वो ऐसे में क्या देखे ?

समय की आंच पर शिकायतों की हांडी उबलती रहती है और ज्यादा जोर मारकर जब खुद से आती है तो भी आखिरकार अपना ही बदन पकाती है। देखती हो होगी ही किचन में अक्सर जब हांडी उबलती होगी तो कैसे खौलता पानी बर्तन के चारों ओर से जलाता गिरता है।

तुम्हारे मौसम को कभी जी नहीं पाया, बेहतर होता यह शिकायत ना होती. 

तो कुछ भी कहाँ होता ?

Monday, May 23, 2011

अलखि, तुम्हारे अक्षर तो सुग्गा मैना के कौर से लगते हैं !




ज़मीन पर बोरा बिछा, अलखि उस पर पालथी मार कर बैठी है। दोपहर चार बजे का समय है। धूप छप्पर पर से वापस लौट रही है। आंगन के बाईं ओर गोशाला है और दाहिनी तरफ मिट्टी से घिरे किंतु थोड़ी ऊंचाई पर गिलावे पर ईंट से घेरा पूजा स्थान। इसपर गोबर से लिपाई की हुई है। बीच में हनुमान जी की ध्वजा है जो हर साल रामनवमी पर बदली जाती है। अलखि ऊपर देख कर सोचती है। अभी-अभी तक तो नया था क्योंकि चैत्र गुज़रे ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन रंग थोड़ा धूसर हो रहा है। एक बारिश गिरेगी ना, तो ध्वजा का लाल रंग और हल्का हो जाएगा। सफेद, उजला आकाश कितना सूना है। लगता है खराब हो गए कपास रखे हों। 


बोरे पर पिचहत्तर फीसदी जगह घेर कर अलखि बैठी है। शेष पच्चीस प्रतिशत स्थान पर उसकी किताब कॉपी है। कॉपी क्या है एक नमूना है। अगर पलट कर देखी जाए तो मालूम होता है जैसे नितांत उलझन में लिखी गई हो। जैसे कोई जवान लड़का किसी किशोरी को प्रपोज़ कर रहा हो तो शर्म और उलझन में जो आरी तिरछी लकीरें खिचेंगी, उसकी पूरीकॉपी कुछ ऐसी ही लगती है लेकिन ठहरिए जिसे आप इस कुंवारे और अनछुए रूपक द्वारा तौल रहे हैं अगर अलखि के पास यह उदाहरण रख दें तो उसका एक जोरदार पंजा आपके मुंह पर पड़ेगा और उसका तेज़ नाखून आपके चेहरे की सारी रौनक हमेशा के लिए छीन लेगा। और ख़ुदा न खास्ता अगर उस झपेटे में आपकी आंखें आ गईं तो फिर आप जीवन भर इतराते हुए कोई दूसरा रूपक न ढूंढ़ पाएंगे। क्योंकि अलखि के लिए उसकी कॉपी बहुत सारे इक्कठा किए हुए मेहनत का नतीज़ा है। गोशाला में गाय को लताड़ मारते देख, क्योंकि उसके पैर पर बैठी मखियां उसे तंग कर रही हैं, ध्वजा का आसमान में लहराता देख और सामने की गेट पर आम की उस स्थिति का कल्पना करना जैसे कि पढ़ कर उठने के बाद उसे वहां दो चार आम गिरे मिलेंगे (हालांकि इसमें यह अड़चन है कि अभी आम ना टूटने की स्थिति में है ना ही पकने की) थोड़ी देर तक आसमान देख कर अपने को एकाग्र कर बीच की मांग फाड़े, (सच ये कि उसके बालों का और कोई ढब है ही नहीं लेकिन खबरदार (इस चेतावनी के लिए कृपया पैरादेखें ... ) अपने हाथ के कड़े को वो ऐसे नीचे करती है जैसे सचिन हर बॉल फेंकने से पहले करता है ताकि सुंदर लिखावट में वो बाधा ना बने। लिखने के लिए अलखि जब सर झुकाती है तो पहले कॉपी और उसके बीच आदर्श दूरी होती है और यह दूरी क्रमशः घटती जाती है। लिखने में मगन अलखि की जीभ पहले बाहर आती हैं, फिर धीरे धीरे ऊपरी होंठ को भिगाती हैं और फिर और ऊपर चढ़ते हुए नाक पर चढ़ आती है। 

लोग उससे डरते हैं क्योंकि उस अंचल में ऐसा माना जाता है कि जिसकी जीभ नाक छुए उसका कहा सच होता है और उसे गुस्सा मत दिलाओ ऐसे में उसके श्रीमुख से जो भी निकलेगा सच हो जाएगा। इसलिए सभी उसे अलखि बेटा और दबी ज़बान से अपनी चिढ़न दबाते हुए काली माई कहते हैं।

नाक पर जीभ चढ़ाने का गुण उसे खानदानी विरासत में मिला है। यह एक पैतृक दाय है। जब लट्टू घुमाने के लिए उसका भाई उस पर रस्सी लपेटता है आपको उसके इस गुण के दर्शन हो सकते हैं। वहीं उसके पिता में यह तब दर्शित होता है जब वे एक-आध किलोमीटर खेत जोत चुके होते हैं। मां चापाकल के पास बैठी तन्मयता से बर्तन धोने में यह गुण दिखाती है, कपड़े धोने में भी लेकिन तब यह गुण ज्यादा देर तक नहीं रहता क्योंकि सर्फ घुले पानी की बूंद जल्द ही जीभ पर पड़ती है और स्वाद बिगड़ने से यह तन्मयता टूट जाती है।

अलखि के अक्षर वैसे गोल गोल हैं। लिखना लिखते लिखते वो कई बार उस पन्ने की चैथाई में सूरज चंदा बना देती है। और क्या शानदार कि उसकी गोलाई एकदम गोल। पहली ही घुमाव में एक वृत्त तैयार। उसे इसमें मास्टरी है और आत्मनिर्भरता भी कि उसे इन टुच्चे कामों के लिए प्रकाल या कम्पास का सहारा नहीं लेना पड़ता। लिखना छोड़ धीरे-धीरे फिर सूरज चांद के बाल निकल आते। आसपास काले-काले बादल घिर आते। नीचे घास का मैदान भी झटपट तैयार कर लिया जाता और खेत में मक्का उगाना उसका फेवरेट शगल है तो मक्का हो तो और उसमें यदि उसके बाल न हों तो कुछ अधूरा सा लगता है। सो वो भी तैयार। ज़ाहिर है इस मगजमारी में अलखि के सर पर बल पड़ता और उसका सिर झुकते झुकते एकदम कॉपी पर आ टिकता। अगर इस समय अलखि को कोई देखे तो लगेगा कि यह दूसरा ही जीव है, जैसे कोई पिल्ला कुतिया के पहलू में घुसने के लिए मनुहार कर रहा है। 

अलखि के लगभर हर पन्ने पर ऐसे कारनामों के दर्शन हो जाते हैं जहां कभी इंदिरा गांधी नुमा कोई औरत भीड़ को भाषण दे रही होती (मूल में यह समझा जाए कि अलखि ही वो भावी महिला है, लेकिन फिलहाल यह सिर्फ समझिए कहने की जहमत मत उठाईए वो भी इस तरह कि बड़ा अपने को इंदिरा गांधी समझती है ! हुंह! वरना...  (दंड विधान: कृप्या देखें - पैरा नं॰... ) कबड्डी का कप उठाए उसका भाई, ट्रैक्टर पर बैठा उसका पूरा परिवार, खेत में भिंडी और उसके एक सूखे डाल पर झूलता, हरी मिर्च खाता, एक टेढ़े नाक वाला सुग्गा... सभी बारी बारी उसकी कॉपी पर उगने लगते। 

इधर लोगों का यह भरम बना रहता कि ‘‘श्श्श्.... अलखि मन लगा कर पढ़ रही है।‘‘

लेकिन जैसा कि बता चुका हूं कि वैसे अलखि के अक्षर बड़े गोल गोल हैं। सुडौल। एक एक हर्फ बोलता हुआ सा लगता है जैसे कोई झककोर कर आपका नाम ले ले कर आपसे बात कर रहा हो। सवाल कर रहा हो। लोग उसकी लिखावट से तुरंत कनेक्ट हो जाते हैं जैसे कोई मौन संवाद चल रहा हो। उसके अक्षरों में वो जादू है कि हमें अपना बचपन नज़र आता है और हम अपनी खोई दुनिया तलाशने लगते हैं। उसकी लिखावट में वो कच्चापन और परिवक्वता का मिश्रण है जो सबसे जुड़ती है। गोया पेंसिल उसकी उंगलियों में धड़कने लगती है। 

यही कारण है कि उसके अक्षर कभी बासी नहीं होते और स्कूल में वह अपने मास्टर को रोज़ रोज़ एक ही पेज लिखा हुआ दिखा कर बच निकलने में सफल हो जाती है।

अलखि के लिखे शब्दों में ताज़गी की महक है। उसमें कोई तितली अपने पंख खोलती है मानो कह रही हो - इस फूल का पूरा रस पी लिया है और बस अब उड़ने की तैयारी है।

Wednesday, May 18, 2011

अमलतास, गुलमोहर और चाँद के देस में गुम एक जाति





तुम्हारे शहर में कोई और लड़की देखना अपने आप में क्या कुछ है। समझौता, मजबूरी, गुस्सा, बदला या कि तुमको फिर से तलाश करना। रिडिस्कवरी। दो गुदाज बाहें जब नंगी हथेलियों में थरथराए, तेज़ तेज़ सांसों का उतार चढ़ाव से ज्यादा हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार एकाग्र हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार में खत्म होना हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार को जी सकें, प्यास बुझा सकें। बेकाबू धड़कनों का आरोह अवरोह किसी सनकी खूनी के तरह दलदल में चमकीले खंज़र लेकर उतर आए तो सीने पर उठता गिरता चांदी का चेन जिस जिस उलझन टकराता हो। इससे इतर तुम्हारे बगैर सोचना क्या है ? बिना गुलमोहर के पाटलीपुत्रा की कल्पना, बिना बेलपत्र महाशिवरात्रि का दिन या कि बिना भांग के होली।




एल

ठंढ़ी बहुत ठंढ़ी... कोई बर्फ का टुकड़ा स्मृति में फूटता, बारिश वाले दिन में ढ़लान भरी बिजली के तारों पर ढ़कलती चमकीली बूंद, कहीं पलते हुए जब हम बड़े होते हैं अमुक अमुक स्थान के कारण वो शहर हमें याद नहीं होता बल्कि अपने बेतरतीब ढलानों में भी सौंदर्य छिपाए होता है। अपना शहर कोई तीर्थ स्थल नहीं होता जो स्थान विशेष के कारण याद रहे। वहां विपरीत दिशा से आ रही आॅटो में दो लड़कियों के बीच बैठी महबूबा की भवहों की मुस्कुराहट पहचान में आ जाती है।





आई
ऐसे तस्वीर की कल्पना तुममें हरगिज हरगिज नहीं की जा सकती है। छाया भर बस पड़ सकती है। सांझ ढ़ले घर से अलग स्टोर रूम में डरते हुए बस दीया दिखाने भर जैसा। पत्थर की बड़ी सी सिल्ली पर एक कदम रख रौशनी को वहां महसूस भर करने जैसा। एक संजीदा छाया। किसी नमाज़ की वाजिब रूह लेकिन जुदा शक्ल होगी तुम। हू ब हू वैसा नहीं हो सकती हो जैसी तस्वीर में कल्पना की गई है। थोड़ा शार्ट दुपट्टा में थोड़ी दूर का संतुलन, एक टिंच बैलेंस रिश्ते और आकर्षण का।



कायनात पर फैली चांदनी अपने खूबसूरती के शबाब में भी अकेला है। इस कदर अमीर जैसे सबसे गरीब। कोई सानी नहीं, मगर कोई मानी भी नहीं। बस इतना कि चमकते सूरज का ताप रेगिस्तान के हर रेत को सुलगा रहा है। लेकिन वहां पांव पकते हैं यहां तुम पर तरस आता है। पूछना कभी देर रात जब नींद ना आए कि शिखर पर अकेले बैठने में क्या कुछ खोना पड़ा और यहां तक पहुंचाने में हमें क्या कुछ चुकाना पड़ा। सारे जवाब तुम्हारे अंतर्मन ही देंगे। हम क्या आज हैं, कल कहीं, परसों नहीं।


एन

The mysterious girl-next-door.

इश्क पर गालिब का मुकम्मल सा शेर किंतु मेरे में अपाहिज सा बचा हुआ - ''देखना मेरे बाद यह बला कितनों के घर जाएगा।'' हम उन पर हंसते हैं जो खुद वही काम देर सवेर करते हैं। खून बहाने का उदाहरण भी उन्हीं में से एक था। रूमाल आज भी तह कर के रखी है और हाथ का कड़ा छह साल में लचीला हो चला है। इश्क का रेशा, गांठ बन चुका है। अब तो कांटों पर साल दर साल एक धागा चढ़ा कर स्वेटर बुन लेते हैं।

कितना मारते हो अपने आप को कि चोट हड्डियों में लग आई है। जो जितना पाक है खून से लथपथ है। यह कैसी गलतफहमी है कि चुपचाप किनारा कर लेना रक्तरंजित अंत नहीं कहलाता ?

(डायरी-अंश)

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...