Friday, June 24, 2011

ऑफ स्टंप से चार ऊँगली दूर गुड लेंथ गेंद, पॉइंट में चौका मारने का प्रयास, बल्ले का बाहरी किनारा .... और गेंद स्लिपर के हाथ में!



सुबह साढ़े तीन बजे सोया और सवा नौ बजे उठना हुआ। फिर भी अभी नींद आ रही है। पलके आधी मूंदी हुई हैं और ऐसे में गौतमबुद्ध नगर से गाड़ी होती हुई दफ्तर आई। जाने कितना तो विशाल है भारत। कहीं दो सिलसिलेवार मकानों की लड़ी के बीच पार्क होता है जहां कोई बैठने वाला नहीं होता फिर भी माली दिल्ली विकास प्राधिकरण माली लगाते हैं जिनकी तनख्वाह चौदह हज़ार होती है तो कहीं मकानों का ऐसा जमात होता है जिनपर प्लास्तर नहीं चढ़ा होता। उनके बीच कीचड़ भरे रास्ते होते हैं। वो कीचड़ भी गहरा ज़ख्म लिए होता है कि पता चलता है काला पानी दूर तक छींटे के रूप में उड़ा होता है कि अभी अभी कोई ट्रैक्टर उनको रौंदता हुआ गया है। शहर को परखना इन्हीं अलसाए हुए पलों में होता है। शहर तभी चुपके से हमारी रगों में दाखिल हो जाता है। जहां पाॅश इलाकों के रास्तों पर कमर में हाथ डाले, जाॅगिंग करते फिरंगी टाइप लोग घूमते हैं। या बेदखल किए हुए बौद्धिक बुजुर्ग वहीं गंदी मकानों की श्रृंखला में जिंदगी सांस लेती है। सायकल के टायर घुमाते नंगे बच्चों की बाजियां हैं। एक मधुर टुन टुन सा संगीत है। मौसी का किरोसिन लाना है और फलाने का पोता आया है तो दो सेर दूध भिजवाने तक की चिंता है वहीं धनाढ्यों के बंगलों में एक सन्नाटा पसरा रहता है। कई कई मकानों की खिड़कियां महीनों नहीं खुलते। एक में झुकासो इनन अगर खुल भी जाता है तो दूसरा भी ग्राउंड फ्लोर पर आहूजा रिजेंसी खुलवा लेता है।

हम सभी अपने अपने लेवल के हिसाब से बाहर भागते हैं। कोई मधुबनी, सहरसा से पटना आता है। तो पटना वाला दिल्ली, मुंबई। दिल्ली वाले न्यूयार्क, आॅस्ट्रेलिया जाते हैं। सबके अपने बंटे हुए सरोकार हैं।

कितने तो पेड़ हैं, विलुप्त होते पक्षी हैं। आवाज़े हैं। राग है। भोर का गाढ़ा मेघ है। सारस की लम्बी चोंच है। दिन के हल्के नीले बादल हैं। साफ आसमान है उनमें फटे हुए दूध की तरह उजले उजले बादलों का फाहा है।

शहर को महसूस करने के लिए वहां इश्क होना बहुत लाजमी है। क्योंकि इश्क के बुखार में हर चेहरे में वही नज़र आता है और वही देखने के लिए हम मारे मारे फिरते हैं। इस गली से उस मोड़ तक। जाने कौन कौन से अनजाने और अनचीन्हे रास्तों पर भटकते हैं। जाने कहां कहां जाकर क्या क्या तलाश करते हैं। पता करते हैं कौन सी जगह सिगरेट फूंकने और दारू पीने के लिए मुफीद जगह रहेगी। कौन सा और किस जगह का पेड़ उनका नाम लिखने के लिए उपयुक्त रहेगा। अमरूद का स्वाद जीभ की नोक पर कैसा लगता है और तालु पर जाकर कितना हल्का हो जाता है। उनसे मिलकर आने पर धतूरा को फूल बैण्ड बाजे वाला का साजो सामान लगता है और उमस भरी दुपहरी में किसी काली मिट्टी वाले खेत में उतर कर लाल साग वाले खेत में डूब जाने का मन होता है। घर से थोड़ी दूर किसी झोपड़ी से आते विविध भारती, मुंबई से आती दिलकश आवाज़ें रह रह कर अटकती है और गुमां होता है कि जैसे उद्घोषक को हमारा हाले दिल मालूम हो। ऐसा लगता है वो हमारे लिए ही यह सब गाने बजा रहा हो। हम ट्यूशन पढ़ाते हैं, पैसे बचाते हैं और दूसरे महीने के वेतन से एक रेडियो ख्चारीद कर लाते हैं। फिर सुबह पांच - पचास के वंदे मातरम् से रात के ग्यारह दस तक का जय हिंद सुनते हैं। इस दौरान शहर मिलता है और परिवेश की आबोहवा में हमारा जिस्म सिचंता है। पोर पोर भींगता है। गोया यह कोई बूढ़ों प्यार थोड़े ही है कि बस पार्क में कुर्सी लगा कर बैठ किसी दूब के खिलने में प्रेम खोज रहे हैं ? 

शहर यूं खड़ा होता है। ऐसे नहीं कि ढ़ाई बजे रात को रिज रोड पर के जंगल के पास उतार दिया जाए और लाॅरी वाले से मिन्नत कर उसमें पीछे बैठना पड़े और महसूस हो कि अप्रवासी भारतीय हों और गुलाम बना कर गुलामी करने माॅरीशस भेजा जा रहा हो।

Thursday, June 23, 2011

इस मँझधार में...



ये क्या उमर है कि अब हम प्रेम नहीं करते सिर्फ प्यार से जुड़ी बातें करते है। स्याह खोह से बिस्तर गर्म करती औरतें नहीं है मगर उनके दिए हुए वे पल और ख्याल हैं। ऐसा अब नहीं होता कि तुम देर तक साथ में बैठो तो मैं उठ कर तुम्हारा कंधा दबाने लगूं और थोड़ी देर बाद तुम उठ कर मेरी आंखों में गहरे झांको। हमारी सांसे उलझती। मैं कमरे की दीवार पर तुम्हें घेर दूं और छिपकली की तरह हम दोनों दीवार से चिपक जाएं। हवा का एक कतरा भी फिर हमारे बीच से पार ना होने पाए। अब नहीं होता ऐसा। 

XXXXX

एक किसी किताब पर हम घंटों बातें करते हैं। तुम्हारी सोच किसी रहस्य किताब की तरह खुलती जाती है और मेरी उमर की उंगलियां उसे पलटते पलटते घिसती जाती है। क्या प्यार में गर्क होना या फिर तबाह हो जाना, उमर बीताना इसे ही तो नहीं कहते कि हो और मेरी किसी पार्क में बैठ कर जिंदगी पर पूरी पूरी शाम बातें करते हैं। जवानी अच्छी थी, एक जूनून हुआ करता था।

जवानी अच्छी थी एक जूनून हुआ करता था। कंठ फूटने के दिन थे और खाली वक्त में बाज ख्याल ऐसे आते थे कि जिनसे निजात ना मिले तो किसी चैराहे पर खुद पर किरोसिन छिड़क आग लगा ली जाए। जाने कौन सा नशा ना किया धतूरा से लेकर कनेल का फल और सिगरेट में चूरण भरने से लेकर तिलचट्टा मार कर खाने तक मगर दिमाग में जो जहाज रूपी ढलान था उस पर कीड़े रेंगना ना छूटा। 

लैम्पपोस्ट पर बैठा किसी कौवे के मांनिंद हमें पता था कि पानी किस घड़े में रखा है जहां जहां यह प्यास बुझती हुई लगी वहीं इसकी संभावना भी बनी रही कि यह प्यास लगती रहेगी। यह प्यास मंजूर नहीं था। अंत तक किसी ने साथ नहीं निभाया। निर्जीव ने नहीं निभाया , आदम देह तो यकीनन दूर की बात थी। शराब का शर्त पैसा था तो आदमी का शर्त पैसे से लेकर रहने के सलीके तक। ऐसे में समाज का शर्त क्या है ?

खालिश आवारगी के दिन में दोपहर को अजियाए हुए कुत्तों तक से गड्ढ़े में लोट कर लड़ते थे आज जिसने हक मारा है उससे दो बात कहने में असभ्यता लगता है। हम कितने स्वार्थी हैं सब कुछ अपने लिए करते हैं! 
समझने के लिए यकीनन तुम्हारा जीवन भी चाहिए और तुम्हारे कारनामे भी। यह तकरीबन उन्नीस-बीस का मामला है जहां तुम्हारे शाहकार बीस बैठेंगे।

देखा जाए तो जीने का आकर्षण हमेशा किसी ढ़ीले कपड़ों में लिपटा जवान औरत के सीने पर के दूधिया उभार सा था लेकिन हम ही व्हील चेयर पर थे सो तमाम एहसास घुटन में निकलता रहा।

(ग़ालिब, गोर्की, मंटो और मजाज़ के लिए)

*सुबह दर्पण का शेयर किया हुआ लिंक देखा जा सकता है यहाँ और यहाँ. और देखने से ज्यादा यहाँ कहा हुआ सुना जा सकता है. तो उसी का एक इक्को.

Wednesday, June 22, 2011

सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं




शरणार्थी तो हम थे ही, यह हमें भलिभांति ज्ञात था लेकिन वो होता है न कि किसी दोस्त के जन्मदिन की पार्टी में हम भूलने की कोशिश करते हैं कि हमारे साथ पिछला क्या बुरा हुआ है। तो बस आधी रात को वही थोड़ी के लिए भुला बैठे थे। पानी भरने के लिए जगने का अलार्म लगाया था। कभी कभी ऐसा होता है न कि बिस्तर पर पूरी रात बिताने के बाद भी लगता है दिमाग जागा रहा और हम बस आंखे मूंदे पड़े रहे इस इंतज़ार में कि अब नींद आ जाएगी। अंधेरे में अंधेरा ज्यादा होता है। कोई दोस्त कमरे की लाइट जला दे तो पलकों के पर्दे के पार अंधेरा हल्का हो जाता। ऐसे में आंखें जोर से भींच लेते। मस्तिष्क पर एक अतिरिक्त दवाब बनता और सवेरे लगता है जागते हुए ही रात कटी है। लगता लेकिन नींद तयशुदा वक्त से पांच मिनट पहले खुल गई। मन हुआ नल चेक करें क्या पता पानी आना शुरू हो गया हो। पीठ पसीने से तर थी। बिस्तर पर के चादर में चिपटी हुई..... गीली। उचाट सा उठा, किचन गया, नल खोली। पानी नहीं था लेकिन उसने आने की आहट थी। आधी रात के सन्नाटे में सांय सांय की शोर करता नल... कहने को शांति में खलल डालता लेकिन जिसके मधुर आमद का स्वर... ऐसा ही लगा जैसे सूरज डूबने के बाद किसी समुद्र तट पर चला गया होऊं... नंगे पैर नम रेतों पर चलता ... दूर बहोत दूर तक निकल गया हूं ....और एक सांस सांय की आवाज़ घेरे है। 

यह दुलर्भ है। नहीं मिलता है। हमें हर वो चीज़ नहीं मिलती है जो हमें मिलनी चाहिए। जिसकी बुनियादी जरूरत हमारी है। रोष यहीं से उपजता है। हमारे तर्क भी नहीं सुने जाते। एक अंधेरी सुरंग में लिटा कर बस छोड़ दिया जाता है। हम हाथ पांव मारते हैं। आवाज़ लगाते हैं। शायद सुरंग के मुहाने पर के उजाले तक हमारी आवाज़ पहंुचती भी हो। आवाज़ गूंजती है लेकिन तब पता लगता है कि कुछ आदमियों ने ही उस आवाज़ को दबा दिया। इस तरह संघर्ष वर्गों में बंट जाता है।

शहर की नल में पानी का इंतजार करते हमने खुद को एक पल के लिए मानसूनी प्रदेश का कोई गरीब किसान मान लिया जैसे पानी आएगा तो सारे दुख दूर हो जाएंगे। इस शरणार्थी होने का दंश सिर्फ हम अकेले नहीं सह रहे थे। सामने वाले दरवाज़े की जब सिटकनी सरकी तो उससे निकली लड़की भी बाल्टी लेकर बाथरूम में चली गई। नल खोला। पानी आ गया। लेकिन एक ही फ्लोर पर पानी दो भागों में बंट कर आ रहा था। बाल्टी में पानी यूं गिर रहा था जैसे मोटे कपड़े का अवरोध लगा दिया गया हो। मैंने इंतजार किचन में खड़े होकर बोझिल पलकों में काटी उसने तीसरी मंजिल और आकाश की ओर खुलने वाले सीढ़ी पर बैठकर। दूर एक बेहद धीमी रेलगाड़ी चल रही थी... बहुत धीमी। रेलगाड़ी क्यों इसे मालगाड़ी कहिए। जिसे बस यह संकेत मिलता है कि अपनी गाड़ी किनारे कर लें फलाना एक्सप्रेस गाड़ी आने वाली है।

आखिरकार मैंने जैसे तैसे पानी भरा। मन हुआ बालकनी में थोड़ा रूकें। नज़र घुमाई तो छोटे छोटे अंधेरे छज्जों पर खामोश कबूतर बैठे थे। रात की निस्तब्धता में एकदम खामोश किसी मूर्ति की भांति। थोड़ी नीचे और नज़र सरकी तो बिजली के तारों पर दो कबूतर बैठे थे। एक दूसरे की विपरीत दिशा में मानो कह रहे हो - क्यों रोती हो ? अरी हम ही नहीं, धरती पर राज करने वाला इंसानों के बीच भी कुछ इंसान निष्कासित हैं। जब वे शरणार्थी की तरह जी सकते हैं तो अपना तो छोटा सा जीवन है। 

कबूतरी उसकी बातों को सुनकर पंख फैला देती थी मानो इन बातों को सुनकर असहज हो रही हो और असहमति में प्रतिक्रिया यह दे रही हो।

जीने को प्राथमिकता देने में हमने सारे सकारात्मक तर्क इसके साथ जोड़ दिया. हमारे पास नहीं था कोई उचित जवाब तो जीना सबसे आसान लगा.

Tuesday, June 21, 2011

उड़ जा सानू नई तेरी परवा...



INT. CAFÉ COFFEE DAY - DAY.

चंडीगढ़ के इस कॉफ़ी हाउस में मेज़ के इधर उधर, आमने सामने एक जोड़ा बैठा है। पीने की इच्छा कुछ भी नहीं है फिर भी बात ज़ारी रखने के लिए एक एक कप कॉफ़ी ली जा रही है। जूनी (लड़का) लगभग बेफिक्र है और इकरा (लड़की) कॉफ़ी का सिप लेकर जब टेबल पर स्लो मोशन में रख रही होती है तो हल्की रोशनी में सफेद टेबल कवर पर काली छाया दिखती है। लगभत यही रंग लड़की के आंखों के नीचे भी गहरे काले धब्बे के रूप में मौजूद है। बैकग्राउंड में जैज़ जैसी मद्धम धुन बज रही है।


जूनी:       नो......  नॉट इम्पोस्सिबल  ईरू... अब... नहीं हो सकता

इकरा:       हाऊ इज़ इट पॉसिबल जूनी ? तुमने कहा था ना हम घर छोड़ देंगे ?

जूनी:             नो... आई कांट... मैं घर के अगेंस्ट नहीं जा सकता। इसका रिजल्ट ठीक नहीं होगा।

इकरा: बट आई विल गो.... लिसन जूनी.... यू नो आई विल डाई। यू नो ना...

जूनी:                ऐसा नहीं होता... इनफैक्ट होगा। हमने साल भर साथ में बिताए ना... ईनफ है। (एक सांस में) सी ईरू !  ऐसे केसेज में हम अपने दिल में ही ग्राऊंड रिएलिटी को ईग्नोर कर रहे होते हैं। टू बी फ्रेंक... हर फ्यूचर भी जानते होते हैं।

(थोड़ा रूक कर)

             एण्ड टेल मी ओनेस्टली, क्या तुम नहीं जानती थी ?

इकरा : यू नो व्हाट, मेरे जानने का  होराइजन कम है और एक बार जान लिया कि क्या करना है तो फिर क्या नहीं करना है यह नहीं सोचती। ऐसा करो तुम मुझे बदनाम कर देना लेकिन शादी कर लेते हैं।

जूनी:           तुम्हारी बदनामी मुझसे अलग नहीं होगी। 

इकरा: (बात काटते हुए) लेकिन तुम्हारे बिना आगे जीना... क्या वो तुमसे अलग होगा ? 

जूनी:        तुमने कहा था आज हम बहस नहीं करेंगे। ईट वुड बी बेटर कि हम कोई साफ रास्ता निकाल लें। 

इकरा: कोई क्यों ? एक क्यों नहीं

जूनी: हां वही... एक.... 

(जूनी बहुत हिम्मत करके अपनी मुठ्ठी कसता है। चेहरा लाल हो आता है। माथे के किनारे से पसीने की बूंद धार की तरह नीचे गिरती है और कहता है) 

जूनी:       ...और वो एक ‘ना‘ है। यही लास्ट है।

(इकरा अपना सर मेज़ पर दे मारती है। खुले हुए बाल आगे की ओर गिर जाते हैं। जूनी दो सेकेण्ड देखता है फिर उठ खड़ा होता है। कुर्सी पीछे खींचते हुए इकरा को सुनाई देता है।)

जूनी:           नेवर कॉल मी अगेन।

(इकरा फफककर रोती है, पर रोना सुनाई नहीं देता, पेट में झटके पड़ते हैं और कोहनी के धक्के से टेबल हिलता है। जूनी शीशे के दरवाज़े के करीब आ गया है। दरवाज़े पर उसका हल्का सा अक्स उभरता है। वो दरवाज़ा खींचता है और बाहर निकल जाता है। खींचने और दरवाज़े के फिर से लगने में उस पर कई चेहरे डिजाल्व हो जाते हैं।

इकरा अब सर उठाती है। जूनी अपनी इनटाईसर के शीशे में जेल लगे बाल को ऊपर उठा कर नुकीला बनाता है और बाईक पीछे लेता है। इकरा को वो थोड़ी दूर तक नज़र आता है फिर एक मोड़ के बाद आंखों से ओझल हो जाता है।
इकरा अपने चेहरे से बाल सुलझाती हुई हटाते हुए मुस्कुराती है।)

इकरा: मदर फकर ! शादी की बात ना करो तो लीच की तरह चिपका ही रहता है।

Saturday, June 18, 2011

एक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब, जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब



जिस तरह का दिल है लगता है थोड़ा बीमार हूं और अब बिस्तर छोड़कर उठ जाने में दो चार दिन ही बचे हैं। कफ सीरफ से चम्मच पर निकाल की दवाई दी जा रही है। मीठी दवाई जिसमें थोड़ी कड़वाहट का पुट मिश्रण भी है उस चम्मच में एक जहाज की भांति हिचकोले खाती हुई लगती है। बहुत गहरे में पैठ बनाती हुई। अत्यंत कलात्मक दृश्य जैसे गदराए समतल पेट पर से फिसलते हुए पानी की एक बूंद नाभि प्रदेश की ओर गमन करती हुई उसमें प्रवेश करती है।

क्यों लगता है जैसे बहुत कुछ कर सकता हूं पर हो नहीं रहा ? क्यों लगता है अब सब कुछ अच्छा हो जाएगा लेकिन वैसे का बना रहता है। देर तक कबूतर आकाश में उड़ा तो हमें भी उड़ने का मन हो आया। हमने जी भर का नृत्य किया। नाचने के दौरान हर खुद का पक्षी भी मान लिया और भाव भंगिमा पक्षी जैसी बना कर उड़ने की नकल भी की। गोया सब कुछ कर लिया उड़ने की अनुभूति भी हुई लेकिन उड़ नहीं सका। हम हर बार लौट कर घर को ही क्यों आ जाते हैं ? एक इंसान भावनाओं से इतना लबालब क्यों होता है कि हर बार कल्पना का सहारा लेकर ही खुद को सुकून देना पड़ता है। पढ़ा लेकिन ऐसा कि लगा पूरा नहीं समझ सका। जिया लेकिन अब भी प्यास बाकी है। चूमा, वो भी ऐसा कि अपनी जीभ सामने वाले के हलक में उतार दी फिर भी तलाश बाकी है। कल का दिन निकल गया लेकिन अब भी जेब टटोलना पड़ रहा है कि पैकेट में एक आधा बुझी सिगरेट बच गई होती तो क्या बात था। आखिर तुमने किया क्या कि कुछ भी सलीके से नहीं कर सके और ढेर सारी शिकायतें बची रह गई। जब सुनहरे दिन याद करते हो फिर अफसोस क्यों हावी हो जाता है ? तर्क तो देते हो कि टूट कर चाहा जिंदगी को, डूब कर प्यार किया, जंगल जंगल भटके और सात घाट का पानी पिए बैठे हैं। वैसे भी ग़ौर करो तो सात घाट कर पानी जिसने पी लिया वो आखिरकार बैठ ही जाते हैं, फिर बैठे ही रहते हैं।

यहां कोई इतना करीब नहीं मिलता कि सबको गौर से देखें। बस दूर बैठ कर एक उड़ती सी नज़र डालनी होती है और काॅमन फीचर्स और स्वभाव से समझ लिया जाता है कि आम इंसानी फितरत क्या है। लेकिन उसमें से जिस किसी एक को थोड़ा जान रहे होते हैं वो भी अपने तो आप में विभिन्न वनस्पतियों से भरा जंगल हुआ करता है। अगर एहसासों से भरा आदमी हो और तुम्हारी ही तरह तलबगार तो देखोगे कि उसके यहां भी बौने बांस के पेड़ से लेकर मध्यम आकार का अलता का पौधा उगता है। नुकीले, पथरीले, जीवट रास्ते हैं और बहुत मुलायम समझौतों का सूती आंचल भी। ऐसा नहीं होता किसी के साथ भी कि लगातार दुख या यंत्रणा ही मिलता हो। अगर प्रायोगिक तौर पर वो बाहर तकलीफ महसूस करते हैं तो फिर उन्हें अपने तरीके से जुटाए हुए भाव, दृश्य, सोच और बरतते हुए काम से ही प्यार हो जाता है।

जिंदगी किसी सस्ते किस्म की सर्फ सी है इसमें नींबू की मात्रा ज्यादा है इससे हाथ खुरदुरे हो जाते हैं मगर कभी कोई स्पर्श करता है तो गुदगुदाहट ज्यादा लगती है।

*****

Monday, June 13, 2011

जन्मदिन पर एकांत कोरस




तुम्हीं कहो आज तुम्हारे जन्मदिन पर क्या लिखा जाए? क्या नाम किया जाए तुम्हारे ? कम पड़ती ऊंगलियों के खानों पर तुम्हारे एहसान गिन कर पल्ला झाड़ लूं या कि किसी दीवार के सहारे पीठ टिकाकर अतीत का कोई दुख भरा दिन याद कर लूं। औपचारिकताएं तो मुझसे होंगी नहीं सो बेहतर है कि तुम मेरे बिना जीना सीख लो। आंख मत मूंदो कि हम हमेशा साथ रहेंगे। सच तुम्हें भी पता है लेकिन मैं जानता हूं कि लड़कियां थोड़ी अंधविश्वासी होती हैं और उनकी समझ में यही रहता है कि क्या बुरा है अगर कुछ करने या मान लेने से उसके मन का वहम बना रहता हो। आखिरकार सभी तरह के खटकरम लोग अपने चैन के लिए ही तो लोग करते हैं।

इस बार कुछ ज्यादा ही अलग और अजीब तरीके से तुम्हारा जन्मदिन आया है। मुझे खुद नहीं पता मैं ऐसा कैसे हो गया। मैं ऐसा हुआ या दुनिया ही बदल गई। भद्र पुरूष किसे कहते हैं। उसका पैमाना क्या है और मेरे कथन इतने निर्दयी कैसे हो गए। ऐसा क्या था मेरे और दुनिया के बीच जो नहीं बदल सका। पोल्ट्री फॉर्म में घुटने भर रेत में अंडे तो पड़े थे। दुनिया ने मुर्गी बन उसी डैने से वही आबो हवा मुझे भी दिया। फिर क्या था जो रह गया और सही तरीके से मेरा निषेचन नहीं हो पाया ?

लो तुम्हारे जन्म दिन पर मैं अपनी ही बकवास लेकर बैठ गया और अपने बारे में ही बताने लगा। क्रोस वर्ड की तरह सुंदर शब्दों की लाइन तो लगा दूं पर वो लिखना नहीं चाहता। दिमाग के सारे खाने खाली हैं और क्लोजअप देता हूं तो नज़र आता है छत पर ईंट के टुकड़े से खींचा चौकोर  खाना जिसमें तुम ‘कित-कित‘ खेलती नज़र आती हो। और अंतिम खाने पर जाने के बाद तुम्हें पूरी तरह से पलटना होता है। ऐसा कई बार होता है कि जीने और जीतने के लिए अपने को पूरी तरह बदलना होता है। वक्त के साथ चलना होता है। कई बार चाहकर भी कई बार घसीटे जाने पर भी। कई बार हम बदलते हुए भी मन में हारे होते हैं। लेकिन यह गलाकाट प्रतियोगिता का युग है। टूटता हुआ घमंड रात के अंधेरे के लिए बचा कर रखना होता है और दिन भर अकड़ कर रहना होता है।

चलो ऐसा करते हैं कि हम दोनों दो अलग अलग कमरों में बंद हो, अंधेरे में एक दूसरे को आवाज़ दें। सभी इंद्रियों की सारी चेतना तुम्हारे आवाज़ की लोच की ओर मोड़ दें। कान अपनी आंखें खोले हैरान सा एकटक देखे अंधरे से आती हमारे नाम की पुकार को। अब सब कुछ इतना देख लिया है कि सब कुछ अंधेरे में देखने का मन होता है। दृश्य नए नहीं लगते।

ऐसे कई पेड़ हैं जिनके नाम मुझे नहीं मालूम। एक ऐसा ही पेड़ देखा था जब हम गले में थर्मस लटकाए स्कूल से रास्ते भर किसी गिट्टी को पैर से मारते मारते लौटते थे, पाटलीपुत्रा में किसी मकान के अहाते में एक पेड़ है सालों भर हरा रहने वाला, बिखरे हुए महीन पत्तों वाला एक छरहरा पेड़, चिकने फर्श पर लगने वाला फूलझाड़ू सा उदास...

यह हकीकत है कि अब 'जन्मदिन मुबारक हो' कहना बस एक हवाई जुमला भर लगता है। .... आखिरकार कोई रीत हम कहां तक ढोएं...

काश तुम्हारे साथ फिर से वहीं से जी पाता। कमर भर बाढ़ के पानी में दवाई लाता हुआ और तुम सर्दी की किसी आधी को अपना चप्पल मुझे दे देती। फिर तुम्हारे चेहरे पर संतोष की एक परछाई देखता।

मैं जानता हूँ यह पतंग कोई नहीं काट सकेगा पर इसके मांझे हुए धागों से ही ऊँगली कटते हैं.

Friday, June 10, 2011

बैक लो, बैक लो, और पीछे. हाँ वहां से बाएं !



बूंद जो रूकी होगी गुलमोहर के डंठल पर उसे कहना मेरा इंतज़ार करे। पेड़ के तनों का रंग लिए जो मटमैला सा गिरगिट होगा उसे कहना भुरभुरी मिट्टी देख कर ही अंडे दे। गंगा पार जब सफेद बालू पर परवल पीले फूलों वाला मिनी स्कर्ट पहन कर सीप में मोती सा पड़ा हो तो उसे कहना तुम कुछ दिन और हरे रहो। राजेंद्र प्रसाद के पुण्य स्थल पर अलसुबह हुए बारिश में अपनी ऊंगली से उन सफेद संगमरमर पर कोई नया ताज़ा शेर लिख जाना। इस शहर में दशहरे के वक्त आसमान लाल नहीं होता। अव्वल तो आसमान देखना ही नहीं होता। अपना शहर अच्छा है शिकायत होते ही आकाश तकते हैं। यहां यह शाम के लिए बचा कर रखना पड़ता है।

छत पर वाली बाथरूम के बगल वाली जगह खाली रखना जहां हमने न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण वाले नियम की परख की थी। यहां के मकानमालिक उस गज पर भी नोट कमाना चाहते हैं। पाल पोस कर बड़ा किया हुआ जगह अंतर्मन में अपने कुछ स्थान छोड़ जाता है। कई दिनों बाद जब वहां जाना हो तो चार आदमियों से बात करते हुए भी कनखियों से देख लेना होता है। वो शिवालय पर 'शिवम-शिवम' का लिखा होना, महावीर मंदिर पर 'महावीर विनउ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना' देख लेना, मोड़ पर का ढ़लान, द्वार पर वाले चौड़े गड्ढ़े में लहलहाता अलता का पेड़। और बहुत जज्बाती होकर यूकिलिप्टस के चिकने सादे से कागज़ जैसे तने पर उकेरे गए अजीज़ लोगों के नाम। किसी अच्छे ख्याल पर झूलते आम जैसे समर्थन करते हों और बाहों में भर कर एक जोरदार चुंबन लेने पर बेलों का झूमते देखना।

अड़हुल के फूल से लकदक डालियों से लाल लाल फूल तोड़ डलिए में रखना। बेवजह भैया के कोहबर में जा कर सुहाग वाला कोई गीत भूला भूला से गुनगुनाना। ओसरा के कमरे में चौखट के बाद गहरे नंगे पैरों की धमक और गाने का रफ्तार पकड़ना। दादी को यूं याद करना कि अपना ही अचरा जांच लेना। मिलते थे ना विक्टोरिया के सिक्के वहां पर पिंकी जो तुमने इनारे पर गोयठा (उपला) के नीचे छुपा कर रखती थी। कागज़ में लपेट कर एक बिसरा हुआ स्वाद वाला अचार भी लाना .... कच्ची सरसों तेल वाला और दाग ऐसा जो अब कभी ना छूटे।

पिंकी, धूप तो तेज़ हुई जाती है पर हमारा कद उस तरह से नहीं घट रहा।

Wednesday, June 8, 2011

इस किले के नीचे किसकी सल्तनत है




पांव तो पार्क से ही कांप रहे थे। ज़मीन समतल थी लेकिन चार कदम आगे पर उठी हुई लगती मानो किसी और का चश्मा लगा कर आसपास का जायजा ले रहे हों। कहीं ढ़लान भी लगता तो लेकिन ज़मीन तो समतल थी तो पूरे बदन में एक चोट सी लगती। सब झूठा पड़ रहा था अपने अंदर भी और सामने से देख रही होती दुनिया के सामने मैं भी। यकायक उसे देखा तो एक तेज़ प्यास लगी। बस गुदाज़ बाहों वाली लड़की को थाम लेना चाहता था। विकल्प बस दो ही थे या तो अपने बाजू में उसे तौल लूं या कि खुद बुरादा बन बिखर जाऊं। खत सामने आया तो यही लगा कि सामने रखा वो चेहरा मंजिल को सामने पा कर रो रहा है पर कागज़ों को हथेली से रगड़ने भर से कब प्यास बुझती है ? शिद्दत में गालों के मसाम खड़े हो गए। 

हर्फ महके तो लगा कत्ल-ओ-गारत की ज़मीन पर खड़े हैं। यहीं कहीं खुदा भी रहता होगा। वैसे खतों में हमने कई खुदाओं को छोटा होते देखा है। अपना वजूद खोते आशिक देखे हैं और अदृश्य सीढ़ी के आखिरी पायदान पर लटके रिश्ते देखे हैं। कुछ और भी देखा है जो हाशिए पर पर था मगर अब वो वहां भी रहा रही। पता नहीं मुंह के बल किसी पठार पर गिरा होगा या किसी दलदल वाली खाई में। 

गर खतों में नाम नहीं लिखे जाते हैं तो वो यूनिवर्सल हो जाता है। तो मानो कभी मैंने तुम्हें भी कुछ लिखा हो। उसमें जो लिखा था उसका कोई मुकम्मल जवाब तो तुम्हारी जानिब से नहीं आया। मैं उम्मीद करूं अबकी इस सवाल का जवाब दोगी। तमाशाबीन दुनिया ने जब देखा कि कुंए में पानी की चिकनी सतह पर एक सांप फिसल रहा था तो उसे पत्थर मारा गया (गौर करो यहां सांप सामने नहीं है जो यह तरकीब अपनाई जाए कि पहले उसकी रीढ़ तोड़ी जाए) क्या वो सांप किसी दो ईंट के बीच जगह खोज पाया जो अंतिम दूरी तक रेंग कर खुद को बचा सके? जहां डर विहीन माहौल हो?

मजमून को परे रखो और बताओ कि कभी रोते हुए संभोग किया है? और किया है तो फिर उसके बाद क्या किया ? क्या खलास होने के बाद तुमने कमरे की छत देखते हुए उसके बालों में कुछ खोजने की कोशिश की थी और उसने क्या  इतने के बाद भी तुम्हारे ही गर्भ में छुपने की कोशिश की थी कि रोज़ का ये टंटा खत्म हो ?

तुम्हारे आगोश में है क्या ऐसी तरावट
डूबे जाते हैं, उबरे जाते हैं और 
मुसलसल ये दोनों वहम भी काबिज रहता है।


{चित्र/ख़त : गुरुदत्त का लिखा ख़त जिसे उपलब्ध कराया लहरें वाली पूजा ने. काहे का शुक्रिया !}

Friday, June 3, 2011

ये खूं की महक है कि लब-ए-यार की खुशबू




इक तरफ ज़िन्दगी, इक तरफ तनहाई
दो औरतों के बीच लेटा हुआ हूं मैं
--- बशीर बद्र


*****

एक भयंकर ऊब और चिड़चिड़ापन, शरीर की मुद्रा किसी भी पोजीशन में सहज नहीं मगर मन अपने से बाहर जाए भी तो कहां ? भरी दुपहरी फुटबाल खेलने की ज़िद और आज्ञा न मिलने पर खुद को सज़ा देना जैसे खुदा जानता हो कि अब खेलने को नहीं मिला तो पढ़ने में या और भी जो तसल्लीबख्श काम हों उनमें मन लगेगा। तो जि़द बांधकर ज़मीन पर ही लोटने लगा। 


/CUT TO:/

एक दृश्य, ज़मीन पर लोटने का 

/CUT TO:/

दूसरा, बुखार में गर्म और सुस्त बदन माथे में अमृतांजन लगा पसीने पसीने हो तकिए में सर रगड़ना 

... यातना और याचना के दो शदीद मंज़र। 

कुछ ऐसा ही रेगिस्तान फैला होगा। यहां से वहां तक सुनहरे बदन लिए एक हसीन औरत, पूरा जिस्म खोले और रेत की टोलियां ऐसे कि समतल पेट पर नाभि का एहसास...कि जिस पर इंसानी ख्वाब चमकते हैं, कि जिस पर पानी का भी गुमां होता है कि जिस पर धोखा भी तैरता है।

सूरज का प्रकाश छल्ले से जब कट कर आता है तो घट रही कहानियों पर क्या प्रभाव पड़ता होगा ?

फफक कर रो ही लो तो कौन माथा सहलाता है ? आकाशवाणी होनी बंद हो गई। इसकी छोड़ो, कौन इस तरह हर चीज़ को समझने की ही कुव्वत रखता है? कुछ शब्दों मे ढ़ाल भर ही देने से कोई कुछ बांट तो नहीं लेता ? लिपटकर मां के साथ सोना याद आता है जिससे दुख छुपाते थे लेकिन उसके कलेजे से लगकर एक संबल मिलता था। उसका पैदा करने के बाद भी दर्द खींचना जारी रहा। खींचना ऐसे जैसे उसे लत हो, एक हुक्के की नली से गुड़ गुड़ करते हुए खींचना (कि सींचना ?) तुम जिसे फ़रियाद करना कहते हो तो ऐसे क्षितिज को देखकर गला ही फाड़ लो तो कौन सुनता है ?

... अजीब बात है वो शाइर कैसे फकीरों सी दुआ देता था। अपने चिथड़े पहनाकर घर भेजना चाहता था। बातों के वक्त ठुड्डी पर के दाढ़ी हिलते थे और जुबां से फलसफे गिरते थे।

...ये कैसे हो जाता है या खुदा! कि दरख्त गुम हुए जाते हैं मगर उसके पत्ते हरे रह गए

आज़ाद बदन के मुल्क में तुमने जीने के लिए इतनी शर्तें दीं कि हम ताउम्र गुलाम रहे.

...(चंद शाइरों के नाम)

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...