Wednesday, July 20, 2011

आत्मकथ्य : एक कविता

जुदाईयों के जंगल हैं। नज़र के इस छोर से दूर औकात तक विचित्र अनगिन प्रजाति के वनस्पति हैं। कुछ अंतराल सपाट मैदान हैं। पेशाब किए जाने के बाद जूझता घास का पीलापन है। बीच से गुजरती छोटी लाइन की सीटी है। सालों से कार्य प्रगति पर है का बोर्ड लगाए सुस्ताते और हवा में तिरते, भूले से भटके और कभी किसी सोचे समझे शातिर मुजरिम की चाल कर बिसरे से लय पकड़ते, तंबाकू खाते, जानबूझ कर छींकते, कभी सिसकारी तो कभी  अंगुलियां क्रास कर ज़मीन पर तीन लकीर खींचते, तो कभी गैरतमंद सा पसीना पोंछते, मुंह ढंके शिकायत और तौबा करते गैंगमैन हैं। बीड़ी पीते सुख बांटने की धुन है। सबका सबसे ज्यादा रोना है। 


मेहनत से उगाया हुआ सत्य है कि इरादतन पाॅजीवीटी की शुरूआत तब हुई जब सामने वाला हमसे ज्यादा रो रहा था। उनके रोने से हम मजबूत हुए और हिम्मत बढ़ाने लगे। एक पैर का दर्द असह्य होने को चला तो दूसरे को लहूलुहान कर लिया गरज ये कि पहले पैर के दर्द से निजात मिले। कम से कम ध्यान तो भटके ! 


अंधेरे में किसी का चेहरा पकड़ा और गीली मिट्टी में ढाल दिया। बूढ़ी हथेलियों से गले को गुंथा गया फिर कई शक्ल बने। अनुभव ने कई बार हलाल किया। आसमान के बादल से एक बाल्टी बादल चुराई फिर बारी बारी सबके पत्तल में एक एक कलछुल परोसा। कभी नेह का गीला बादल गुलाल बना किसी के गाल पर लगा होली मुबारक गाया। अजीज़ को बिना देखे ऐसे मिले कि आखिरी मुलाकात हो। आंख भर देखने के बाद पलक से उस पर दस्तखत किए। छोटे कद के थे और बस्ता लिए फुर्र फुर्र भागे। नदी, नालों में कूदे, सूखते दुपट्टे चीड़ते हुए निकले और बेरोज़गारी की ऊंचाई पर भागलपुर से भोपाल तक का सफर लोहे की राॅड पकड़कर तै की। 

सीधी सी लंबी जुल्फों में ख्याल लपेट लपेट कर कविताएं कीं और उसे घुंघराले बना डाले। वक्त के खामोश पियानो पर हुस्न से कदम ताल करते हुए फिर उल्टा पियानो पर टिकाया। अनपढ़ था लेकिन कई नवयौवनाओं के धड़कनों का आॅपरेशन मरीज को जिंदा रखते हुए और हंसाते हुए कर डाला।

साबुत था मगर सफहे पर भी हाले दिल रखने में विकलांगता का एहसास था और बाज शामें जब फरेबी मौसम को देखकर निसार होते और व्हील चेयर घिसकाते, ‘क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन‘ गाते किसी अंतिम छोर पर पहंुचते तो उसके बाद फिर साबुत हो कुदरत की बनाई शतरंज सी वादी के हर खाने पर गेंद की तरह टिप्पा खाते। 
नूरानी सा चेहरा था। हमारे व्यक्तित्व में जो भी कसक थी जो कभी तेरा सरमाया था तुम्हें एकांत में खींचने की खातिर था। एक नीम चाल वाली मोम की कपूर से स्पर्श वाली बाहें देर तक गले में घेरा बना झूलती रही। मूंदी पलकें यां आनंद में लीन थी जैसे अपने शिशु को प्रथम बार स्तनपान कराती महिला एक आत्मिक सुख और रोमांच भरे कंपन में लीन हो। ऐसे में गर दोनो तलवे हमारे ही पैरों पर हो तो कहा जा सकता है कि जान तुम्हारी दुनिया इस वक्त अब हमारे हिस्से है और इस एहसान के बदले में तुम मुझको कहीं अपना खुदा लिखना। 

कहना ये कि कत्थक के नृत्य सा मैं ही नायक हूं और मैं ही नायिका। अर्द्धनारीश्वर हूं। 
दर्प ये कि चंद लम्हे तुम्हारे साथ होने के बाद अब तुम्हारी जरूरत नहीं, अनलहक का एहसास है। 

Friday, July 15, 2011

माँ, तुलसी के गले का रोआं सिहरता है क्या...!


मां जब तुम थोड़ा डरती हो और तुम्हारा दिल धक से रह जाता है तो शर्मीला टैगोर जैसी लगती हो। तुम्हारी आंखें और आंचल भी उसी जैसा लगता है। प्रकाश तुम्हारी आंखों से परावर्तित होकर ज्यादा चमकदार लगती है। पापा को शक हो न हो मुझे हमेशा लगता रहा है तुम पर कोई दूसरे घर की बालकनी से कोई आइना चमकाता रहता है। मेरी आंखें चैंधिया जाती हैं मां। हां ये सच है कि सबसे टपका तो मां पर अटका। अपनी शादी के लिए दसियों लड़की से प्रेम करने, और तमाम लड़कियों को जानने के बाद मैं भी पापा की तरह ही तुम्हें चिठ्ठी लिख रहा हूं कि तुम्हारे जैसी नहीं मिल रही।

ऐसा नहीं था कि मिलने वाली बुरी हैं बल्कि वो बेमिसाल हैं। नहीं-नहीं तुम्हें बहलाने के लिए ऐसा नहीं कह रहा, ना ही अपनी नादानी परोस रहा हूं। गहराई से बेसिक सा अंतर बतला रहा हूं कि उनकी आवाज़ में खनक तो था पर झोले में सूप से झर-झर गिरते गेहूं जैसी आवाज़ का रहस्य नदारद था। लड़कियां मिली जिन्होंने प्यार दिया लेकिन किसी ने अपने जुल्फों को सहलाते हुए यह नहीं कहा कि सैंया भोर को होने दे, तू तो रात बन कर मेरे साथ रह।

मां कोई तुम जैसा बहरूपिया नहीं मिला। गाए जा चुके गीत के बाद की लम्बी चुप्पी ना बन सका। मैं भी नहीं। हर बार दोहरा लिए जाने के बाद भी मरना मुकम्मल चाहा लेकिन चीख की गुंजाईश बनी रही। हम प्रेम में भी थे और उससे बाहर भी लेकिन होना हर बार सिर्फ प्रेम में चाहते रहे। यही वजह रहा कि मैं ता-उम्र प्रेम में रहा।

मां मैंने बहुत कोशिश की, गली-गली की खाक छानी, पहाड़ में रहने वाली लड़की हो या सरकारी स्कूल में गिनती से दसवीं तक पढ़ने वाली जिसके कि मां बाप पहले ही सोच चुके थे कि यह हाई स्कूल नहीं जाएगी उससे तक प्रेम किया। लड़की तो क्या मैंने शराब तक से प्रेम की और आदतन तुम जानती होगी कि मैं इन शर्तों के बाद कैसे जिया होऊंगा। तुम्हारे जमाने में धमेंद्र चुन-चुन कर मारता था, लोग खोज खोज कर बदला लेते हैं। मकान मालिक किराया बढ़ाने का मौका तलाशता है। बाॅस एवज में एक्ट्रा काम लेने का सोचता है। सरकार गैस, डीजल से लेकर पानी तक का दाम बढ़ाने बैठी है। सभी अवसर की तलाश में हैं। मुझे कोई हड़बड़ी नहीं। मैं किसी महान लक्ष्य के लिए पैदा भी नहीं हुआ। तुम्ही बताओ मैंने अपने स्कूली दिनों में भी - नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं कभी गाया ? नहीं गाया ना। मैंने भी केवल प्रेम किया है।

ईश्वर में हमारे जड़ों में दुख कुछ वैसे ही डाला जैसे तुम बड़ी श्रद्धा से सीधा आंचल कर तुलसी में जल देती हो। मैं लाख अभागा सही लेकिन तुम शर्मीला टैगोर की तरह दिल पर हाथ रख कर कह सकती हो कि तुम्हें मेरी यह तारीफ पसंद नहीं आई? आखिर तुम भी एक लड़की हो। एक उम्रदराज़ खूबसूरत औरत जिसके अंदर एक लड़की के अनगिनत ख्वाब पोशीदा है।

... ना-ना आज मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। हालांकि मैं शादी की उम्र का हो गया हूं फिर भी। तुम ये भी मत समझना कि मैं अपने बड़े हो जाने का सबूत तुम्हारे ही साथ फ्लर्ट करके दे रहा हूं। 

सची माता गो, आमि जुगे जुगे होई जनोमो दुखिनी।


(सुबह से आज तुम बिलकुल याद नहीं आई)

Thursday, July 14, 2011

आ मेरी जान, मुझे धोखा दे

घंटों टेबल पर झुके रहने के बाद, अपने हथेली से उसने छुप कर ढेर सारी दयनीयता आंखों में डाली और आखिरकार सर उठा कर हाथ जोड़ते हुए बड़े की कमज़ोर लहजे में कुल छः शब्द कहा - मैं परमेश्वर से डरती हूं, प्लीज़। इन छः शब्दों में ढेर सारे चीज़े छुपी हुई थी जो वो मुझसे मांग रही थी। जैसे उसका खुदा मैं ही हो आया था जो उस पर उपकार कर दूं। यह एहसान उसे छोड़ देने का था। महबूब आशिक से अपने को छोड़ दिए की याचना लिए बैठी थी। दिखने में बैठी थी दरअसल वो हाथ जोड़े उल्टा लटकी थी। बड़े पद पर बैठी महिला एक कैजुअल के आगे प्रेम में छोटी साबित हुई थी। 

स्पर्श के लिए बीच के मेज़ की दूरी हमने कभी नहीं पार की लेकिन कभी कभार उसके कम्पयूटर की तकनीकी समस्या दूर करने, किसी विभाग के आला अफसरों के घुमावदार अक्षरों में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचने वाली नोट को पढ़ने, एक्सेल की डाटा शीट को थोड़ा और चैड़ा करने। वर्ड की फाइल में टेबल की फाॅरमेटिंग करने के दौरान मैं उसके सिरहाने खड़ा हो जाया करता था। बाज लम्हे ऐसे होते जब सधे कंधों से चलने वाली और दिखने में पुष्ट सीना लिए उसपर एक पंखे की एक पंखी का गुज़रते हुए हवा का एक दस्तक, एक  उड़ती नज़र मार लेना होता। ऐसे में कुरते के तहो में जाती लाॅकेट वी आकार लिए एक खास गहराई तक जाती थी। थोड़ी बहुत तो दिखाई देती लेकिन उसके बाद कल्पना को थामे वो जगह सोच ली जाती। तब कुछ मुख्तसर से ख्याल यह उठते कि बदन की पतली दीवार के ठीक बार उस पार ऐसा क्या है जहां धमनी और शिरा नाम के दो मजदूर कोयला खदान के श्रमिक की तरह हाड़ तोड़ मेहनत कर ऐसा क्या पहंुचाते हैं जिससे वह रक्तिम लाल फल एहसास के इतना लबालब रहता है।। पता लगा कि वह एक उदास बदन वाली हंसमुख महिला है। यहां यह कैसी दीवार थी?

मकसद यह देखना नहीं होता देखना तो होता कि समाधान के बाद वह कैसे पुलक उठती है। जैसे मेट्रो में कोई प्रेमी युगल चहकते हुए एक दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं और भीड़ के कारण तड़प कर एक दूसरे के गले नहीं लग पाते फिर उसकी प्रतिक्रिया एक दूसरे से बातें करते वक्त, उसकी नाक, भवें, आंखों की चैड़ाई, माथे की शिकन, पलकों का थरथराना, किसी इस्पात के राॅड को शिद्दत से टटोलना होता है। 

यह मन की प्यास थी, स्पेनिश सांढ़ की तरह बेलगाम। ताकतवर, गंवार और आवारा बैल।

ऐसा नहीं था कि उसे मैं पसंद नहीं था अथवा मेरी बातों में उसे कोई सुख नहीं मिलता था। फाइल बांधते वक्त गुदगुदे हथेलियों को देखकर जब भी कहा जाता - तुम जैसा कोई नहीं मिला इसलिए शादी नहीं की तो खिड़की पर टंगे टाट से सोंधी खुशबू आने लगती, तलवों के नीचे का फर्श थोड़ा और शीतल हो जाता और उसे देखते हुए जब चाय की सिप मारी जाती तो कैण्टीन की सादी चाय में इलायची का स्वाद आता... इतना तो पक्का था कि सातों दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं थे। हमें कमरा तो चाहिए होता है पर एक रोशनदान हो तो ज्यादा हसीन हो जाता है जहां से याद, अवसाद, चांदनी और ताज़ी हवा भी रिस जाया करता है। यह अलग बात है कि मौसम के सुविधानुसार हम उसे बंद कर देते हैं। निर्जीव चीजे जब चुपचाप स्पंदनहीन होकर धड़कती हैं तो बेइज्जती सहना उसका स्वभाव हो जाता है।

रस मिलते रहना अच्छा होता है, रसदार होना बुरा। रस में डूब कर उसे पीते पीते बीमार होना सबसे बुरा। और चाहत की पीक पर हाथ जोड़ना ! सबसे आसान, कठिन कर्म।

Thursday, July 7, 2011

रिफ्लेक्शन... बर्फीले पहाड़ के गालों पर धूप और बादलों का रंग




कल्पना वास्तविक कैसे हो सकती है ? इसमें संदेह नहीं कि मुझे जिस तरह की चित्र की दरकार है उसकी पूर्ति विश्व सिनेमा करती है लेकिन मेरा मन सप्ताहांत ब्लू फिल्में देखने का भी होता है। कुछ अन्य चित्रों के अलावा मैं जो चित्र बनाना चाहता हूं वो इस तरह कि कोई लंबे से महीन श्वेत वस्त्र में नायिका लिपटी हो। वस्त्र अधखुली हो और जैसे तैसे उसके कमर के आस पास लिपटी हो। एक नज़र में अल्हड़पन का रिफलेक्शन आता हो। जिसके पैर आगे की ओर खुले हों, एक सीधी हो दूसरी टांग घुटने से मुड़ कर सतह से चार इंच ऊपर हो। पीठ पीछे की ओर ढुलकी और दोनों हाथों की हथेलियां ज़मीन से लगी हो जिसके सारी उंगलियां उठी हुई हो। उंगलियां लम्बी और पतली हो। केश खुले हों (ये सीधे हो या घुंघराले इस पर अभी मुझे सोचना है) और आधे आधे आगे पीछे बंटे हों। सीना बिल्कुल अनावृत्त हो। नायिका उम्रदराज़ हो और स्तन हल्के लचर होते हुए भी बेहद आकर्षक हो। कुचाग्र युग्म (निप्पल) नहा कर दस मिनट पहले सोए हुए नवजात शिशु से हों। होंठ एक विशेष प्रकार के संबोधन के उच्चारण में रूके हुए। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे हों। चेहरे पर जाते हुए सांवले यौवन का नमक विद्यमान हो। आंखें वो नहीं कहती हो जैसा दिखती हो। एक रहस्यात्मकता हो। जैसे पर्यटन स्थल पर मेरे हाथ पर हाथ रख दे तो स्पर्श के मायने बदल जाएं। सेक्सोफोन पर एकांत राग बज उठे और एकांत नायिका के उपस्थिति से भी विलग हो जाए।

मुझे आम जीवन में ऐसी नायिका नहीं मिलती। इसलिए ब्लू फिल्म देखने के बारे में सोचना कई बार मुझे बुरा नहीं लगता। वहां मेरी इच्छा उस पागलपन को महसूस करने की नहीं है क्योंकि वो मुझमें प्रकृति प्रदत्त पहले से विद्यमान है। लेकिन वहां बेख्याली में कुछ ऐसे चित्र बन जाते हैं जो कला के अंतर्गत नारी सौंदर्य को उकेरने में मददगार होते हैं। मेरा मकसद किसी का देह साधना नहीं, कामुक क्रीड़ा से तो बिल्कुल नहीं अपितु जो खाके खिंचते हैं और जिन पर चित्र बनाना है उस कल्पना को वास्वविकता के निकटस्थ लाना है। मैं यह सफाई अभी किसको और क्यों दूं? तारकोवोस्की का कहना - 'आखिरकार एक कलाकार ही जानता है उसे क्या बनाना है।'

लेकिन जाहिर है इसके लिए हमारे बीच बहुत गहरी समझदारी होना निहायत ही जरूरी है। और जो नायिका ऐसी होगी उसके प्रति हमारा आभार भी सबसे ज्यादा होगा। और ऐसी चित्र बना नहीं सकता इसलिए उन चित्रों को फिलहाल शब्द दिया जा रहा है। 

*क्योंकि जैसा कि आप देख सकते हैं, लिखना... अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो इससे सारे दुख मिट जाते हैं। 

(ओरहान ने ऐसा कहना यहां से सिखाया। शुक्रिया।)

Wednesday, July 6, 2011

रूई का एक गीला फाहा, जादू और हथेली का ग़मगीन होना.



दुनिया जब हमें तनहा समझ रही थी हम कोहरे वाले पहाड़ पर किसी के प्रेम में गुम थे।



अंर्तमन से एक आवाज़ आती। कोई पुकारता मगर उसमें आने या बुलाने का आग्रह लेशमात्र भी नहीं होता। पर कुछ वजह रही होगी कि हम ओवर कोट पहन पहाड़ के आखिरी सिरे तक चले जाते। तुम वहीं मिलती। किसी पत्थर पर बैठे एक धंुधली सी तस्वीर की तरह तुम नज़र आती। एक चुप्पी भरा मौसम था। बहुत ठंडा प्रदेश और मैं रात भर का जागा था। सोने की कोई वजह नहीं थी। खिड़की की ज्यादा पारदर्शी और थोड़े धुंधले शीशे के पार से रात भर होते बर्फबारी या थोड़े थोड़े अंतराल पर होते बारिश को देखते देखते ही जैसे रात कटी हो। सोफे पर कोहनी के नीचे एक तकिया और इंतज़ार थोड़ी सुबह होने का। तुम्हारी आवाज़ जिसे रात भर खिड़की के उस पार घटते/होते देखना था। कभी कभी कैसा होता है प्रेम कि यही हमें अनंत, अतल धैर्य भी दे जाता है। मैं मानता हूं कि अभी स्थिति वैसी नहीं आई है कि तुम्हारे वियोग में ज़हर खा ली जाए या फिर अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर माचिस मार ली जाए।

जैसे मस्तिष्क में कोई आॅडियो कैसेट चलता हो। हम रिवाईंड कर के सुनते हैं। भोर पहर नींद में किसी सुखद सपने जैसा कि कोई अचानक अधूरे ख्वाब पर उठा भी दे तो उसे जवाब दे करे फिर से सोने की कोशिश करते हुए सपने का छूटा सिरा फिर से पकड़ें। 

सिर्फ दो पैग पर काटी गई रात के बाद आंखों के सामने रात भर खिड़की पार तुम्हारी आवाज़। क्या तुम सोच सकती हो मेरी आंखें प्रतिक्रियास्वरूप कैसी हो सकती हैं? थोड़ी लाल? थोड़ी बोझिल ? होंठो पर हल्के हाथ लगाई गई लिपस्टिक का पहली लकीर ? मेरी चाल में कोई उद्विग्नता नहीं। मुझे कहीं और नहीं जाना। वहीं आना है उसी आखिरी सिरे पर जहां से दस कदम दूर तुम दिखो फजां में गुम सी। खुले बालों को अपने पीठ से हटाए एक कंधे के नीचे सरकाए हुए। थोड़ी झुकी हुई। और हल्की अधखुली पीठ। किसी खिड़की से झांकती हुई एक प्याली चाय का आमंत्रण देती आंखें। 

वादी की क्षितिज से बादलों के साथ उठती एक अति तीक्ष्ण सिम्फनी सी धुन ! तुम्हारे आर्कषण का डोर का अदृश्य धागा। चलना, चलना और दूर तक चलते जाना...। ओवर कोट में हाथ की अंगुलियों से उलझता लाईटर। किसी विश्वस्तरीय सिनेमा में का उस तरह का सीन जब कोई किरदार आत्महत्या के लिए बढ़ रहा हो और किसी अपरिभाषित मोह में।

धुंए का एक छल्ला निर्वात में मेरे ही सिर पर एक वृत्त बनता हुआ। दो कदम आगे बढ़ फिर पलट कर देखो तो वो वृत्त रूका हुआ। कोई हलचल नहीं। स्पंदनहीन। गवाह बनते चीड़ और देवदार। नुकीली पत्तियों पर रूकने का संघर्ष करता बर्फ। चिनारों के बीच आज कोई फुसफुसाहट नहीं, सबको मालूम कि कदम किस ओर मुड़े हैं। अत्यंत खुले वातावरण में भी एक आवरण में बंद पूरा अस्तित्व। भारहीनता का अनुभव जैसे अंतरिक्ष यान में...!

बहुत रेशमी फर वाले पक्षी का टूट कर गिरता हुआ पंख.... धीमे- धीमे तैरते हुए ज़मीन की ओर अग्रसर....

              ... निर्वाण।



सचमुच,

दुनिया जब हमें तनहा समझ रही थी हम कोहरे वाले पहाड़ पर किसी के प्रेम में गुम थे। 
और जब नहीं समझ रही थी तब हम अकेलेपन के सर्वोच्च शिखर पर थे और पहाड़ का नुकीलापन हमारे तलवों में चुभ रहा था।

Monday, July 4, 2011

घूँट-घूँट सिहरन...





जीने के मानी उतने ही होते हैं जितने में जी भर जाए। जी लेने के तुरंत बाद मरना मंजूर है। मरते हुए जीने के लिए भाग रहे हैं। जिन क्षणों में मर रहे हैं वह सिर्फ जिस्म को मार रहा है। बेचैनी हर बार बच निकलती है। एक मुकम्मल मौत चाहिए। पूरा का पूरा। वक्त की प्रकार में कसे पेंच पर पेंसिल सा लगा मैं हल्के हाथ से पूरा घूम जाना चाहता हूं। 

जिस्म एक समतल पार्क है। वक्त की डायल वहां माली सा घूमता रहता है। जब भी कुछ उठाओ बड़ी निर्ममता से छांट देता है। एकांत में बैठकर दो उंगली अपनी पलक पर रखो तो थरथराती प्रतीत होती है जैसे हल्की रोशनी में अधजगे से सो रहे हों। पलकें आंखे छोड़ कर भाग जाना चाहती है। आंखें लाचार और बीमार दिमाग छोड़कर। क्या ऐसा होगा कि यदि मेरी आंखें किसी को लगा दी जाए तो उसमें फिर उस व्यक्ति का मस्तिष्क प्रतिबिंबित होगा ?

एक सड़क दीखती है। लम्बी और आगे जाकर मुड़ती सी। दोपहर का सूरज तेज़ है। उसकी गर्मी से सड़क पर का पूरा कोलतार पिघल गया है। रास्ता काले मैग्मे का पूरा नदी बन गया है। नंगे पैर उस पर चलना होता है। पहला पग रखते ही तलवे की नर्म परत की छाल शरीर से अलग हो रास्ते पर चिपक जाते हैं। अगला पग रखते हुए जब पीछे देखता हूं तो तुरफ-फुरत का न्याय लगता है। एक मासूम सज़ा। एक क्षण में घटा हुआ और अपने लाल लाल हिलते दिल पर बूंद बूंद टपक टपक कर गिरता हुआ गर्म कोलतार सा। आंखें भीतर तक भींच लो कि यह जलन गूंगा कर देगा। इसकी सजा की प्रतिक्रिया चीख रूपी प्रत्युत्तर में नहीं निकलने वाली। कहा था - एक क्षण का दण्ड। चुप रहकर बर्दाश्त कर लो तो ठीक और न कर पाए तो पूरा जीवन ढेर सारा रोना - धोना। एक आसान उदाहरण से समझो तो बस की भीड़ में किसी का पर्स मार लेना। अगर तुम्हें पता चल गया और तुमने मंुह बंद कर ली तो ठीक है... अब वो दुख बर्दाश्त करो।

सबको बताना समाधान था ही कब ?

आज तो मरने की तम्मना जागी है। और यह काम अनुशासनपूर्वक करने का दिल हो आया है। बस किसी बिस्तर पर जाकर चप्पल खोल चादर ओढ़ कर सो जाने जैसा। जीना अनुशासन में नहीं हुआ। जन्म अनुशासित ही था। जीने के बीच मरना वैसे कई बार हुआ था कभी जोर का कभी रिस रिसा कर... मरना, मुर्गें की मौत की तरह नहीं चाहिए कि पंख नुच कर भी रह रह कर बदन कांपे, दोनों पैर बार बार झटकना पड़े और गला रेते जाने के बाद भी कुछ मिनट बाद तिलमिलाते हुए खत्म हों। मछली की तरह तो और भी नहीं कि कोई पहले गलफड़े की लाली जांचे क्योंकि बेचैनी ही कुछ इस तरह की वसीयत में मिली है कि उम्मीद है कि पका कर खाए जाने तक भी किसी की थाली में हिलता डुलता मिलूंगा।

मुझे एक इत्मीनान भरी मौत चाहिए। जो मुझे सुकून तो दे ही सभी के जीवन में जिससे राहत आए। जहर का प्याला कबूतर के गले की नीली गोटी जैसा होना चाहिए। हल्का गाढ़ा, पानी के ऊपर किरोसिन तेल सा तैरता हुआ। जीने में मरने की मिली हुई गंध सी और मृत्यु इतनी पुख्ता कि बीच का बचा जीवन...

...24 कैरेट का खालिस सोना।

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...