Saturday, October 29, 2011

इश्क के जिस्म का घुटना आगे से सख्त मगर पीछे से चिकना, बिना रोओं का रंदा पड़ा और अनछुआ है




(अंजुमन-ए-इस्लामिया के पार्क में बैठकर ...)

नज़ाकत बस नाम का ही नज़ाकत है। नाजुकी तो उसमें है ही नहीं। अल्ला झूठ न बुलाए यास्मीन लेकिन मुझे शक होता है कि मियां खत भी दूसरों का ख्याल सुनकर ही लिखते होंगे। हुस्ना के चेहरे पर का नमक नाक के पास तेज़ हो आया है। मिलावट भरी खफगी से संगुफ्ता से कहती है। खुदा जाने लिखते हैं या दूसरों से लिखवाते हैं। गोया यह भी कोई उमर है सैनिक की तरह सलामी देने की! अरे इतना भी नहीं जानते कि मुहब्बत को सलाम करना भी इश्क का एक रूमानी अंदाज़ है। सलाम यूं हो कि वजूद का पूरा हाल बयां हो जाए। हाल-ए-दिल नुमायां हो जाए और दिल के गोशे-गोशे में सिमटा पाक मुहब्बत इत्र बन पूरी वादी को महका जाए। पाकीज़गी का एहसास हो और... और मैं तो कहती हूं सलाम ऐसा हो कि बस यूं लगे कि कुछ पल के लिए सांस रूके भी, थमे भी। इक ज़रा देर दम घुटे, सांस खींचू और महसूस हो कि वो रूखसार को छूते छूते रह गया। 

बेशक वो रह जाए लेकिन एक शदीद किस्म की छूअन का एहसास हो। संगुफ्ता ने ऊपर कहे पान में जर्दा लगाया।
संगुफ्ता, संगुफ्ता यास्मीन जो अभी जाहिद के अचानक दिख जाने के बाद हुस्ना को कोहनी मारने ही वाली थी। लेकिन हुस्ना का संजीदा सा चेहरा देखने के बाद यह इरादा मुल्तवी कर दिया और बेइरादा ही कहने लगी साहबजादे तो मुझे भी बकायदा ठोक बजा कर सलाम करते हैं। कसम से हम तो तरस जाते हैं कि कोई हमें इस तरह सलाम करे जैसे बड़ी बेकरारी से पूरे महीने रोज़ा रखने के बाद चांद का दीदार करता हो। 

अच्छा एक बात बता हुस्ना यह इश्क जिसके बारे में हम अपनी अपनी तनहाईयों में सोचते हुए इतने शब गुज़ारे हैं कभी कभी जिस्म थरथरा उठता है, ऐसी ज़ालिम चीज़ क्या सबके साथ होती है या हमीं सोचे जाते हैं या हमारे आशिक के साथ भी होते होंगे ? संगुफ्ता कहती जाती है और हंसती जाती है। हुस्ना कहती है - भीड़ में तो तू बड़ी शर्माती फिरती है और यहां मेरे सामने बड़ी बेहया हुई जाती है। वैसे भी जाहिद मियां तो माशाअल्लाह बड़े करम वाले हैं, तेरे खातिर इश्किया शाइरी लिखते हैं वो क्या था - 

"तेरे पाजेब से रश्क होता है महजबीं, 
उसके चूमे से तेरे पैरों की हिना की सुर्ख हुई जाती है।
खुदाया एक हमीं है जो चाह कर भी दीद को तरसे हैं, 
वरना सारा शहर तो तिरे जिक्र की वादी में जीता है।"

मरहबा ! काश कि मैं बयां कर पाती तेरे दर्दीले जुबां से यह नज़्म सुनना हुस्ना कितना सुकून देता है। कितना बेहतर होता कि जाहिद मियां खुद यूनिवसिर्टी के जलसे में यह मेरी जानिब देखकर सुनाते !

हां तो फिर सिर्फ तू ही क्यों कई और नाजनीन उनपर आशिक ना हो जाती।

*****

हंसी बह चली है, पेड़ों में सरसराहट हो रही है। वक्त बह रहा है, पुरानी दिल्ली की तंग गलियों के मुहाने पर रिक्शे का जोरदार कटाव और अचानक से किसी पर्दानशीं का खुद पर झुक आता है। एकदम फिल्मी सीन जलेबी, समोसे की दुकान के जंगल से मस्जिद की रोशन मीनारों से छनकर निकलते बस किसी को देखने की फुरसत नहीं कमबख्त आती सर्दी में भी पान के चस्के लगने वाले दिनों में ले आता है। यहां से आगे बस दो दरवाज़े ही खुलते हैं। अब इसे उमर का दोष ही कहिए जो दिल जवान होने की जिद लिए बैठा है। यूनिवसिर्टी भाभी को छेड़कर देवर की तरह हंस उठा है। उमर का यह कौन सा दौर है जब हकीकत से हम कोसों दूर हो जाते हैं?

उम्र का यह कौन सा दौर है जब ख्याल गुलाबी होकर यूं नर्म हो जाते हैं ? उन लड़कियों को देखकर मैं भी सोच में पड़ गया हूं कि इसी धरती पर, इसी जीवन में क्या कुछ हो जाता है, होता जाता है! 

Friday, October 28, 2011

पेड़ के तने और फुनगी में बहुत विरोधाभास है




किसी टेसन से कोई कोयले वाली गाड़ी छूटने की अंतिम चेतावनी देती है।

प्रभाती गाई जा चुकी है। कोई टूटा सा राग याद आता है। पहले मन में गुनगुनाती है फिर आधार लेती हुई मैया शुरू करती है - उम्महूुं, हूं हूं हूं हूं, ला ला ला ला लाला ला ला...

अनाचक लय पकड़ में आ जाता है और अबकी दूसरी लाइन से शुरू करती है।

'कि रानी बेटी राज करेगी।
महलों का राजा मिला रानी बेटी राज करेगी।'

सर्दियों की सुबह है। धूप खिली है। आंगन में खटिया पर मैया अपने अपनी दोनों पैरों को सामने सीधा करके बैठी है। और पैरों पर ही रानी बेटी लेटी है। आंखें में काजल, बाईं तरफ माथे पर काजल का गोल टीका, हाथ-पांव फेंकते, हल्की जुकाम से परेशान, अनमयस्क सी। बीच बीच में मन बहल जाता है तो पैर के अंगूठे को उठा कर मुंह में रख लेती है। सरसों तेल की मालिश हो रही है। मैया बड़े जतन से बहलाती हुई, कभी डांट कर कभी ध्यान बंटा कर मालिश कर रही है। एक हथेली जित्ता पेट, दो अंगुल का माथा, थोड़ा लंबा घुंघराले केश, कुल मिला कर एक गोल तकिए जैसी आकृति, गुल गुल करती, स्पंजी। गुंधे हुए गीले आटे के स्पर्श सी। कभी कभी हैरान होती हुई कि क्या आदमी कभी इतना भी छोटा होता है। सामने बैठा बड़ा भाई जो कि खुद 5-6 साल है। कहता है -मुन्नी तो अभी बहुत छोटी है । हां तू तो जैसे बूढ़ा पीपल हो गया है - मैया कहती है। मुन्ना खुद उसके मुंह में उंगली फिरा कर जब तब जांचता रहता है कि उसके दांत आ रहे हैं या नहीं! तुतलाते हुए कहता है- अत्ता  मैया! इचको भी दांत आएका तो पेट खलाब होगा ना ! मैया बस आंख तरेरती है बस उसको आगे नहीं बोलना है इसका पता चल जाता है।

आंगन के परले तरफ मंगल किसान का बेटा सोमू पानी को अभी अभी दाई तरफ मिट्टी की रोका लगा कर खेत की मेड़ पर बैठा है। उसकी कहानी अब भी थोड़ी बची हुई है। पहलवान सुबह की ताजगी में काली मंदिर के सामने वाली अखाड़े में तेल पिलाई मिट्टी पर लंगोट पहन मुगदर घुमा रहा है। बाहर सड़क पर टमटम वाला अब भी हांक लगा रहा है, हालांकि टमटम पर की दोनों पंगत भर चुकी है। बाज़ार तक के साढ़े तीन रूपए और कमा लेगा। एक सवारी कहता है - हमारे कपार पर भी एक बैठा दो। घोड़ा सूख कर कांटा हुआ जा रहा है और तेरा तोंद पसरा जा रहा है। अरे जिससे रोज़ी चले उसका ख्याल रखा कर। 

काकी अपनी बहूओं को चाय पर जुटा अपनी वही पुरानी घुटने के दर्द वाली आलाप छेड़े हुए है। दही वाली पैसे का तगादा कर गई है। गोयठा वाली ममानी सी अधिकारवश गरिया गई है कि उसके पति को ही इस बार इमली वाले खेत की बटाई मिलनी चाहिए। 

गांव का मुखिया परब- त्यौहार के बखत कुछ ज्यादा ही मेल जोल बढ़ाने लगता है, हमदर्द बनने लगता है। जानता है इस घर पर इकठ्ठा दो महीना का छुट्टी लेकर छोटका आने वाला है, हल्ला है कि अबकी वो सेना में सूबेदार हो गया है तो हर सुबह किबाड़ की झंझीट पीट कर पूछ लेता है कि छोटका आया कि नहीं ? सबको पता है कि जितना छोटका से उसको मतलब नहीं है उससे ज्यादा उसको सेना की ट्रिपुल एक्स रम से लगाव है। पूरे गांव भर में यह फैला है कि छोटका नेता की तरह कसम खाया था कि एक बार फौज में भरती हो जाए तो सगरे गांव भर के बुर्जुगन को सेना की दारू का स्वाद चखाएगा। तब्बे से जब इसके घर पर परका रहता है। वैसे खुद छोटका अभी तक मास और दारू से दूर रहता है। चाहे उसकी पोस्टिंग सियाचिन में हो श्रीलंका में।

किस्से... किस्से और बेशुमार किस्सा...। पैर की कानी ऊंगलियों की बिछिया से लेकर, अलता के हल्के होते रंग तक, दादी नम्बर एक नाटकबाज़। उसका काम बस पुराना बात याद करते हुए चाय सुड़कना। हर बात पर कहानी, लेकिन कहते हुए सजल होती आंखें। एकदम जीवंत। कभी मटकती, कभी शून्य में खो जाती हुई। हंसी की बात सुनाते हुए रो देती और रोते रूलाते अचानक से बातों का सिरा जाने कैसे तो घूमता कि पूरा घर हंसने लगता। जब सारी बहूंए हंसने में लीन हो तो अचानक से फटकार - बेसरम औरत सब, लाज लिहाज बिसरा कर ही-ही- ठी- ठी में केतना मन रमता है!
बड़की ताना देती है - काकी आज के जमाने को दूषने में नंबर एक उस्ताद। हमारे टाइम तो दही इतना शुद्ध कि हाथ में लेकर पड़ोस में दे आते थे। आज ? आज तो पानी का झोल। काकी कड़क कर टोकती है- ए बड़की! ढ़ेर मुंह खुल रहा है तुम्हारा। सब दांत तोड़कर पेट में डाल देंगे। 

ठहाका।

पर मैया कुछ नहीं बोलती। वो खुश है उसके कानों में इस फलते फूलते बाग की खबर आ रही है उसके लिए बहुत है। रानी बेटी को पलटती है। पीठ पर की रीढ़ की हड्डी पर लंबे लंबे मालिश करती है। दोनों पैरों को लपेट लपेट कर धुले हुए कपड़े सी मोड़ती है। इससे घुटना मजबूत होता है। एक तो सरसों का तेल और धूप दोनों देह चुस्त दुरूस्त बनाए रखेगा।

छोटकी आश्चर्य से कह रही है को सुनाते हुए कह रही है - मैया आज भी पूरा गांव नंगे पैर चलती है, कुदाल चला लेती है। चश्मा नहीं लगा फिर भी दाल चावल चुन लेती है। बीस किलो का बोरी उठा कर मिल से आटा पीसवा (यही कहते हैं) लेती है। 

मैया अपनी तारीफ सुन कर मुस्कुराती है। रानी बेटी की बांहों पर पकड़ थोड़ी कस जाती है। गाना फिर शुरू कर देती है - 'खुशी खुशी कर दो विदा, कि रानी बेटी राज करेगी।'

Thursday, October 27, 2011

महज़ छाती भर ही नहीं, ना पसली का पिंजरा ही, अन्दर एक विला है




पूअर काॅन्शनट्रेशन का शिकार हो गए हो तुम। कि जब एक पूरी कविता तुम्हारी सामने खड़ी होती है तो तुम कभी उसके होंठ देखते हो कभी आंखें। डूब कर देख पाने का तुममें वो आत्मविश्वास जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि वो अब तुम्हारे सामने झुकती नहीं लेकिन तुमने अपने जिंदगी को ही कुछ इस कदर उलझा और जंजालों के भरा बना लिया है कि उसके उभारों के कटाव को देर तक नहीं पाते। बेशक तुम वही देखने की कामना लिए फिरते हो लेकिन तुम्हारा दिमाग यंत्रवत हो गया है। तालाब में उतरते हो लेकिन डूब नहीं पाते, तुमने झुकना बंद कर दिया है। घुटने मोड़ने से परहेज करते हो और इस यंत्रवत दिमाग में संदर्भों से भरा उदाहरण है जो अब मौलिकता पर काबिज हो रही है। करना तो तुम्हें यह चाहिए कि... छोड़ो मैं क्या बताऊं तुम्हें, तुम्हें खुद यह पता है।

पर प्रभु लौटना भी तो इसी जनम में होता है न? आखिर किसी के भटकते रहने की अधिकतम उम्र क्या डिसाइड कर रखी है आपने ? खासकर तब जब सभी सामने से अपने रस्ते जा रहे हों। भले ही वो सभी अच्छे इंसान हैं मगर ऐसा क्यों लगता है कि नए घर में घुसने से ठीक पहले वो मुझे ठेंगा दिखा जाते हैं ? यह क्या होता है ? क्या सेटल हो जाने का संतोष ? 

तुम्हीं तो आम के बौर बन जाना चाहते हो ? अपनी खूशबू परले मुहल्ले तक फेंक आना चाहते हो ! जब तुम स्वस्थ महसूस करते हो (जो कि तुम्हारे अपने हिसाब की परिभाषा है) तो सच कहो कि क्या नहीं देखना चाहते केसर के खेत, कोमल से ठंडल पर हल्की हवा में हिलती, थरथराती सरसों का फूल और मोटे ठंडल पर गर्दन में उठे दर्द की तरह धीरे धीरे सुरज के साथ मुंह मिलाते पूरब से पश्चिम हो जाते हुए सूरजमुखी?

दास्तोएवस्की ने कहा था ''तुम अपनी समस्याओं में लिथड़े हुए हो।'' मगर तुम सिर्फ नहाना चाहते हो। मुझे इस कथन में थोड़े संशोधन की जरूरत है। इसे ऐसे कहो कि तुम सिर्फ अपना बदन भीगाना चाहते हो। किसी कुंए में चढ़ आए पानी में बस ऊपर की राॅड पकड़ कर शरीर गीला करने का नित्य कर्म भर का कर्मकांड। एक स्वांग। और इसके बाद शिकायत लिए बैठ जाते हो कि तुमने बहुत कुछ किया। 

तो यह कहां का लिख्खा है कि हर छोटी से छोटी चीज को पाने के लिए हर बार सब कुछ दांव पर लगाना ही होगा ? मसलन एक अमरूद खाना हो तो हाथ तोड़ कर पाया जाए, शेविंग करनी हो तो ब्लेड हर बार कुछ खून बेसिन के हवाले करे ? 
जीने से जुड़ी और जीने में बहुत सारे उलझन हैं। एक फालतू सोचता हुआ दिमाग ना होता तो अपने लिए भी दिन एचीव करने जैसा और रात एन्जाॅय करने के लिए होती। शिव खेड़ा और स्वेड माॅर्डन के मुखारविंद से झरते कथनों में जीवन का सच्चा स्वार्गिक आनंद नज़र आता और मुंबईया फिल्मों की तर्ज पर प्रेम के टूटने की सालगिरह नए कपड़े पहन, बुके लिए हाथ में गिटार लिए मनाते।

तो यह तय रहा न कि वो सचमुच समझदार है जिन्हें पता है कि उन्हें जीवन से क्या चाहिए? तो फिर हम जैसा चूतिया क्यों बनाया ? महज इंसानी रिचर्स के लिए या फिर जब जाना हो तो ताल्लुक में रहे लोग सामने एक समझदार चुप्पी, पीठ पीछे एक कुटिल मुस्कान के साथ इन्वर्टेड कोमा में अनेक शब्दों का एक शब्द और चले जाने के बाद याद करके आह च्च ! जैसी ध्वनि निकाला करें।

*    बच्चा पूछता है। बच्चा परेशान है। अम्मी ने कल देर रात उसके हाफ शर्ट में कोई चमकदार अठन्नी जैसा विक्टोरिया का सिक्का दिया था। इसके बावजूद रो कर सोया था। इतना रोया कि दिमागी मांसपेशियां थक गई और जैसे चिंता करते हुए नींद आती है वैसे ही रोते रोते सो गया। सुबह गोली खेलते हुए वो सिक्का किसी सुराख में गिर गया। गिर गया और बुलबुला तक नहीं फूटा। मां को बकवास तो सुनाई जा सकती है लेकिन कई सवालों को जवाब उसके पास भी नहीं होता। एक शीतल सा ठौर होता है कि वो अपनी बांहों में उदास आंखों के उलट उम्मीद भरी बात करती बच्चे को अपने ही जैसा पाते हुए छुपा लेती है।

अब हमारे सहारे की आदत ही कहिए कि अभी ना सिक्का पास में है ना मां तो बच्चा प्रभु को लपेट रहा है। तकलीफ इतनी कि साला कुछ इंसान इतना भरा हुआ क्यों पाया जाता है ?

महज़ छाती भर ही नहीं, ना पसली का पिंजरा ही, अन्दर एक विला है
सुक्कर बाज़ार का हाट है, सौदा बिके ना बिके चीख जरूर लेता है. 

Friday, October 14, 2011

हर कण की मर्ज़ी थी आत्महत्या. यह देर-सवेर सबका अपना-अपना समवेत निर्णय था.


गांव आने के बाद सब कुछ नया नया लग रहा था। नया नया गांव लग रहा था। गांव भी नया-नया ही लग रहा था। नीले आसमान में कहीं कहीं ठहरे हुए उजले बादलों का थक्का तो पुराना था लेकिन उससे रूई की तरह एक-एक टुकड़े का छूटना नया था। ज़मीन सामान्यतः समतल ही थी लेकिन कदमों को ढ़लान लगना नया था। उसमें छिछले भंवर बन चार मुठ्ठी पानी का जमाव का लगना नया था। पेड़ में लगे हुए पत्ते नए लग रहे थे। दोनों तरफ घास लगी हुई पतले से रास्ते पर पगडंडी भी नई लग रही थी। रास्तों से ज़रा सा पैर भटका तो पैर को खेत में आया हुआ पाया। पैर के साथ साथ शरीर भी खेत में आ गया। पैर पहले आया फिर शरीर आया। फिर नएपन का एहसास और ज्यादा आया। रबड़ के पेड़ के पत्ते छूने पर कुछ ऐसे लगे जैसे ये दो चार दिन पेड़ से टूट गिर भी जाएंगे तो बेजान नहीं लगेंगे। मटर की छीमियों के पेट चीरे तो गोल गोल दाने थे। कुछ छोटे छोटे दाने भी थो जो काग़ज़ पर एक मोटे बिन्दु की तरह लगते थे। अब मन भी नया हो आया था। मैं भी अपने आप को नया लग रहा रहा था। जैसे ही इस नएपन का यकीन हुआ तो अचानक यह यकीन खो बैठा। इस संदेह को दूर करने के लिए मन से सहसा इसे बोलने का इरादा किया। मुंह से बहुत तोड़ तोड़ कर कहा - नsss याsss आ आ आsssssss - न या आ आ। यह बोलना नए नए बोलना सीखे बच्चे जैसा था। अतः इसे बोलने पर नयापन और ज्यादा लगा। पीछे से हवा का एक तेज़ झोंका नयापन लिए आया। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक लोटा हवा पीछे के बालों के हिस्से में ज़ोर से मार दी हो। इससे सिर के पिछले हिस्से में कुछ नए उजले रास्ते बन गए। यह वहां का नयापन था। 

परती खेत, बोए खेत और पानी भरे खेत, रास्ते, पगडंडी और ढ़लान, गाय - गाय और बकरी भी, नीम, शहतूत, कदंब, गुल्हड़ और साथ में सखुआ के पेड़। पेड़, छाया और कहीं-कहीं उनसे झांकती धूप। बोरिंग और पतले, लचीले तलवारों जैसे मक्के के पौधे, इतने सारे नए दृश्यों को महसूस कर यकीन फिर उग आया कि शायद आंखों पर हरे रंग का चश्मा निकल आया है। मन ने फिर इस यकीन को संदेह से दृष्टि से देखा। और संदेह है या यकीन इसे परखने के लिए आंख पर हाथ फेरी। एकबारगी हाथ झूठा लगा। और फिर पूरा शरीर ही झूठा लगने लगा। इस वक्त अगर वज़न नापा जाता तो सूई शून्य से आगे नहीं बढ़ती। इतने सारे नएपन से संदेह का यकीन गहराता गया। यकीन और संदेह में फर्क करना मुश्किल हो चला था। हर यकीन संदेह लगता फिर उस शक को मिटाने के लिए कि संदेह ही है या यकीन संदेहपूर्वक एक यकीन भरा कदम उठाया जाता। 

जहां आया था पूरी तरह नई दुनिया थी। नयापन कुछ इस तरह था कि दुनिया, दुनिया न होकर कल्पनालोक थी। कल्पनालोक की दुनिया थी जो इसी दुनिया में था। स्तब्धता हावी थी, भौंचक्के से जीभ ऐंठे हुए लगते थे। ऐसा लगना क्षणिक ही रहा क्योंकि पहले यह यकीन आया फिर संदेह आया। ऐसे में पहले जीभ को बाहर निकाला सूखे हुए होंठों पर फिराई और पहले यह यकीन दिलाई कि हां जीभ पर जगह पर है वरना स्थिति यह थी कि बिना जीभ की शरीर की कल्पना भी इस दुनिया में संभव था। संदेह पर यकीन के लिए जीभ को दांत से काटा गया। जीभ सुन्न। संदेह का पलड़ा भारी हो गया। अबकी ज़ोर से काटा गया तो जीभ लहुलुहान हो आया। जीभ का लहुलुहान होना शरीर का अपने में लौटना में वापस लौटना  था। अब जा यकीन हुआ कि वो संदेह ही था। 

संदेह जो यकीन हो गया था। अब जाकर फिर इसका यकीन हुआ। पर नई दुनिया में ही  हर यकीन पर संदेह होना और संदेह को यकीन मानना संभव था। 

आश्चर्य यह लगा कि नई दुनिया इसी दुनिया में थी लेकिन दिन ब दिन इस पर संदेह गहराता जा रहा था। यकीन का बहुत अंदर तक गहरा यकीन था। संदेह की पुष्टि तुरंत की जाने की कोशिश की जाती है। ऐसे में नज़र नई नहीं थी इस पर जब यकीन होने लगा तो  तो संदेह हुआ। तो एक नए यकीन का सामना हुआ जो अब सारे सामान्य यकीन पर संदेह का पर्दा डाल अंतिम यकीन से रू ब रू करवा रहा है। 

इसके बाद यह संदेह फिर से बलवती हो गई है कि क्या मैं बोलना जानता हूं। बोल कर देखता हूं नsss याsss आ आ आ आ आsssssssssssssss..........................

Thursday, October 13, 2011

कहना खुदा के साथ संगत करना था





पुरानी झील का पानी हवा से इत्तेफाक रख रही थी। छोटी छोटी नावों में बैठे जोड़े हौले हौले पैडल मार रहे थे। मुहाने पर बांस को ज़वान होता पेड़ था। थोड़ी सी हवा लगने पर ही खिलखिला कर हंसा करता। एक डाली लरज कर पानी में गिर आई थी। जब हवा तेज़ चलती पानी से डाॅल्फिन की तरह निकलती और पास के बोट में बैठे जोड़े पर छींटा मार उसका स्वागत करती। बांस का पेड़ उभयचर बन गया था। जैसे मेंढ़क, मगर और कछुआ होता है। जल और ज़मीन दोनों पर रहने वाला। थोड़ा ऊपर अड़हुल का छोटा सा पौधा था। लेकिन कहने भर को छोटा। हुस्न टूट कर बरसा है उस पर। पत्तों से ज्यादा फूल खिले हैं। सुर्ख। हवा तेज़ होती। सब आपस में लड़ने लगते। ऐसा भी लगता जैसे किसी ने चुटकुला सुनाया हो और हँस हँस कर पेट दर्द हो रहा हो। कई बार ऐसा भी लगता एक ही घने पेड़ में ख्वाहिशों भरी कई कई पतंग फंसे हों। गोया पूरा नज़ारा ही ईश्क से फल फूल रहा हो। 

और किले के ऊपरी खिड़की पर जहां से पूरा आसमान दिखता है और नीचे से सिर्फ खिड़की देखो तो एक आसमान का एक टुकड़ा दिखता है। एक संगत बैठती है। कुछ हस्सास तो कुछ कद्रदान की मंडली। शायर से पेशकश की जाती है। बहुत मान मनौव्वल के बाद वादी ताकते शायर के होंठ मटर की छीमियों से फटते हैं। होना तो नज़्म चाहिए था लेकिन मुआ शेर पढ़ता है। पढ़ने का अंदाज़ यों जुदा कि दो लाइन के एक शेर नाटक के तीन अंक में ढ़ल जाते। आसपास कई नौजवान फसाने बैठे थे जिन्हें कुछ समझाने की जद्दोजहद नहीं होनी थी।

मिसरे के पहले दो लफ्ज़ फसाने को बुलंद करते हुए वालिद की पालते पोषते से दिखते। साथ ही इनमें मुहब्बत, यार की गली, वस्ल, हिज्र, हस्सास लम्हें, दर्द के साज़, याद की रोशन शम्मा जलती हुई दिलचस्प रास्तों की ओर जाने का इशारा भी होता। शुरूआती महज़ दो लफ्ज़ एक बुनियाद भी होती और अपनी अपनी तरह से मंजिल पहुंचने की चाहत भी। लेकिन शायर को अपनी कहनी थी अपने बहाने सबकी कहनी थी। कहना कम में था लेकिन सबका  ज्यादा कहना था। यह कहन पूरी जिंदगी, इश्क और एहसासात को जी लेने के बाद दिल के दरवाज़ों और खिड़की से निकलना था। जो खिड़की से निकलती वो घुटन का कहन होता। जो दरवाजों से निकलता वो सबके जीने की हक में दुआ होती।

शायर की कोशिश होती कि ग़ालिब, मीर, अदम, फि़राक, फैज़, जोश, मजाज़, जाफ़री वगैरह को पढ़ने के बाद जो शेर कही जाए वो एहसास का लिहाफ ओढ़े हालात, इंसानी मनोभाव और उसमें अपना एटिट्यूड भी समेटा जाए। शेर कहना बिछी हुई बिसात पर खुदा के साथ संगत करना था। कभी सजदा करना था तो कभी जुगलबंदी। कभी उसे चुनौती भी देना था।

पहली लाइन पूरी होती दूसरे को अधूरे पर बार-बार दोहराता। लोग तब तक जुड़ चुके होते। शायर तब कोई देवदूत या आवामी नेता लगने लगता। साथी पूरी रोचकता से सुनते और आखिर तुरूप का पत्ता फेंक दिया जाता। नाटक के तीनों अंक - आरंभ, मध्य और अंत संपन्न होते। 

हमजुबां मिले तो शायर फट पड़ा। एक के बाद एक कई तीर छोड़े गए। कमोबेश सभी निशाने पर लगे। दर्दमंद यार-दोस्त मदमस्त हो गए। ढ़लती शाम के साए में पेचीदगीयों बादल जम कर आसान हो बरसे। पूरा शहर नहा उठा।

मैं भी उन्हीं यारों में से था। वहां से गुज़रते हुए जब ऊपर किले की खुली खिड़की देखता हूं तो एक टुकड़ा जुदा आसमान दिख्ता है। उस शाम की याद आज भी आती है। आंख बरबस सुख के आंसू से गीली हो जाती है। 

Wednesday, October 12, 2011

Vomit



मन पर एक बड़ा भारी बोझ रखा है। मैं जी भर कर शराब पी लूं। अत्यधिक नींद की गोलियां खा लूं, तुम्हें बेतहाशा चूम लूं और इन सब में भी कहीं, कोई कमी रह जाए तो कलाई दुखने तक लिख लूं। मसलन आजकल चीन का रवैया ऐसा है कि अंटार्कटिका को भी अपनी ज़मीन का हिस्सा बता दे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति कितने बेबस हैं, यात्रा ही करते रहते हैं। उनका देश क्या से क्या हो गया। उन बला की खूबसूरत पठानी औरतों को क्यों नहीं आज़ादी दी जाती ?  मैं जी भर कर लिख लूं। मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है। 

आखिर हमारा स्पर्श इतना पराया सा क्यों है? क्या जो चीजें हैं उनके सामने होने पर भी मुझे संशय होता रहता है ? किसी भी चीज या घटना को सर्वाधिक महत्व देकर या फिर नगण्य मान ही तो चला करता हूं। स्वार्थ इतना कि अंजुमन में देर तक ठहाकों के इक्को सुनाई दे। आत्मा की एक भटकन होती है, जिस्म अपने अंदर एक बड़ा झाड़ू लिए घूमता है। रोज़ सुबह शरीर कई भागों में बंट जाता है और नियमित रूप से सारे शहर को बुहारता चलता है। सारी स्मृतियों को साफ-साफ कर देता है। दैनिक कार्यों में कितनी ही भूलें होती रहे लेकिन जो बुनावट की याददाश्त है उसकी धार कभी मंद नहीं पड़ती। बाबूजी कहा करते हैं - सुख जिसको कि कई बार भोग भी कहते हैं। तो भोग को तुम क्या भोगोगे, वह तुम्हें भोग लेगा। कैसा होगा वो दिन जिस दिन शराबी तो शराबी, शराब जैसी जैसी निष्पक्ष कौम से भरोसा उठ जाए ? क्या बचेगा फिर ? कच्चा भांग कहां मयस्सर है ? कल जिसका इंतज़ार अब होता नहीं और कल जोकि अब हो ही जाएगा। आज जितना बीतना था रीत चुका हूं। ज़हन में सबसे अपने खांचे हैं। सबका चेहरा गड्डमड्ड है। मैं एक रंगीन दुपट्टा पकड़ता हूं वो जाने कितनी हथेलियों से फिसलता निकलता जाता है। चढ़ते नशे का अगर दिमागी चित्र लिया जाए तो बहुत संभव है कि हल्की लाल पृष्ठभूमि में पुराने समय का लंबा चाौड़ा पोस्टर होगा जिसमें किसी कोने पर कोई किरदान या वक्त विलेन बना चेहरे पर गुस्सा लिए पिस्तौल ताने होगा। किसी कोने में मुठ्ठी भर भीड़ होगी। एक कोने पर अपनी ही प्रेम की कोई गुलाबी सी नायिका होगी। लेकिन इन सब के बीच से ठीक बीचोंबीच हमारा एक और चेहरा होगा। शायद यही होलसम जीवन होगा जिससे हम निकलते हैं, इन लोगों के बीच से। कभी चुपचाप से तो कभी आतंकित करते व्यक्तित्व के साथ। मैं जी भर का शराब पी लूं। मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है।

मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है। नींद की गोलियां खा लूं। आज तक हर गोली बड़ी तैयारी से खाई। फूल प्रूफ्ड प्लान के तहत। यह तैयारी मानसिक थी। दिखने के लिए तो बस दराज़ खोला था और एक घूंट पानी के साथ गोली उतर गई। लेकिन साहब आप तो चैन की नींद के लिए गोली खाते हैं न ? आखिर आप सोना चाहते हैं, बहोत लंबी नींद। क्योंकि सपने देखे कई दिन हो गए। क्योंकि मन के गांव में इतवार को बाइस्कोप लगाने वाला अब इधर का रूख नहीं करता और इस बायस अब सपना देखना खुद में एक सपने सरीखा हो चला है। तो फिलहाल गोली निगलने से जुड़ा आपका सपना, माफ कीजिए ख्वाहिश सिर्फ इतनी है तो मस्त नींद आए और कल जब उठें तो कालीन रूपी ज़मीन जो कि इंसानी कदमों की धूल से भारी हो गई है और जिसे सरकाना अब सिर्फ आपके बूते की बात नहीं रही, आप चाहते हैं कि वही ज़मीन कल घड़ी की सूईयों के तरह सरकता हुआ लगे। पार्क में लगे पौधे सफर करते दिखें, पेड़ों पर की जमी हुई हरियाली थोड़ी फिजां में भी घुला करे। एक छुपा ख्याल ये भी यहीं से अगर दुसरी दुनिया के लिए भी रूखस्त हो जाएं तो क्या बुरा हो ! तो इतना सोच कर जब वो दाना मात्र का ज़ालिक हलक के नीचे उतर जिस्म में घुलता है तो देखता क्या हूं कि बिडिल्ंग की पाइप के सहारे ऊपर चढ़ रहा हूं। क्या कोई माशूका से मिलने, किसी फैंटसी में रहने वाली राजकुमारी के कपड़े चुराने, खत पहुंचाने, चोरी से मिलने, पैसे छुपाने ? कहां, क्या, किसके यह कुछ नहीं मालूम। बस चढ़ रहा हूं। चढ़ रहा हूं इस उम्मीद में कि कहीं पत्तों के बीच छुपा होगा एक मटका। टप टप उसमें गिर रही होगी ठंडी ताड़ी! हाय रब्बा ! यह कैसी सोच है, यह कैसा ख्वाब है एक नशे से दूसरे नशे में उतरने का सपना !!! नींद की गोलियां खा लूं। मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है।

मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है। तुम्हें बेतहाशा चूम लूं। चूम लूं जैसे कोई कच्ची उम्र का बच्चा अपनी पड़ोस की लड़की को घर के आसपास ही छुप कर चूमता है। इस चुंबन में चूमने का रस ना हो बस सुनी सुनाई बातों, देखे हुए दृश्यों की पुररावृत्ति करने की कोशिश हो। बचपन कितना अच्छा था ! जब थोक के भाव चुंबन मिलते थे। कभी एक टुकड़ा इमली की के एवज में, कभी नींबू के अचार की शर्त पर, कभी उसके बदले मास्टर से मार खा लेने पर। जब सुख की परिभाषा नहीं जानते तो थोक के भाव अनजाने में मिलता है जब उसकी चाह में मारे मारे फिरो तो अकाल में सारस की सी स्थिति! तुम्हें बेतहाशा चूम लूं। मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है।

मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है कि चूमने के मुताल्लिक काफी कुछ लिख चुका हूं और लिखा जा चुका है। सदियों से यह फिर भी वर्जनीय है। एक बड़ा वर्ग है जो चूम कर आने के बाद इसका विरोध करते है। लिखना इस पर भी था लेकिन रह गया। जी भर लिखना, जी भर कर खेलना होता है। एक फुटबाॅल लेकर गोल पोस्ट के पास मन भर गोल दागना होता है। खुद से पैनेल्टी काॅनर लेना होता है। यकीनन गोलकीपर अदृश्य होता है लेकिन फिर भी उसे वहां मानकर छकाते हुए गोल करना होता है। जाल में गेंद का जा समाना अंतिम लक्ष्य होता है। हसरत यह होती है कि कौन सी गोल किस आकर्षक अंदाज़ में जाल में जा फंसती है। गोल कैसे दागा गया है जिंदगी भी तो ऐसी ही होती है, लोग जीने की कोशिश भी इसी तरह करते हैं। बात कोई भी कहीं भी करो जिंदगी से जुड़ ही आती है। लिखना सारी बेबसी के बाद का कदम है। यह ज़ाम खाली करने के बाद लुढ़का दिए जाने जैसा है। खूब सारा लिखना कै करने जैसा है। 

...तो कलाई दुखने तक लिख लूं। मन पर बड़ा भारी बोझ रखा है।

Saturday, October 8, 2011

मरियम...





तुम जानते हो सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन फिर भी उसके आसपास का सच महसूस करती हूं। वैसे भी इंसानी एहसासों को पूरी तरह से जानने का दावा कौन कर सकता है? बड़े बड़े मनोवैज्ञानिक भी ग्राफ चार्ट की मदद, सर्वे, प्रतिशतों का खेल, औसत लोगों पर किए गए अध्ययन से ही अनुमान लगाते हैं। पूरी तरह से जानने का दावा वो भी नहीं कर पाता। कभी उनके कथनों पर गौर करना तुम्हें मैं सोचता हूं कि, मुझे लगता है कि, ऐसे मामलों में मुख्यतः ऐसा होता है कि, सामान्यतः लोग ऐसा कहते/करते हैं, मेरा अनुभव या अध्ययन फलाना कहता है, मिस्टर एम के साथ इसी हालात में चिलाना कदम उठाया था, कई इंसान औरत की तरह भी हो सकते हैं, वो पानी की तरह हो सकते हैं, जो ढ़लान देखकर उधर की ओर सरक जाता है। ब्ला...  ब्ला... ब्ला...

मैं अपनी हाल-ए-दिल कहूं तो मुझे आज तक नहीं लगा कि मैं प्यार में हूं। वो जब मेरे साथ होता है तो मुझे बस अच्छा लगता है। जरूरी नहीं है कि मैं उसका चेहरा देखती रहूं। हम पार्क में एक दूसरे से उलट अपनी पीठ सटाए मूंगफली खाते हैं तो भी मुझे सूकून रहता है। और उसके आस पास होने का भ्रम भी मुझे संतुष्ट रखता है।

मुझे उसके लिए चिंता करके अच्छा लगता है। बड़ा सुख मिलता है जब वो बहुत देर से आने के बाद भी मुझसे लिपट जाता है। मेरे सीने में उठती गर्म गुस्से की धधक कुछ ही सेकेण्ड में गाइब हो जाती है। मैं उस पर गुस्सा होना चाहती हूं। कई बार तो बस इसलिए मैं उस पर किए गए गुस्से को महसूस करना चाहती हूं। गुस्सा करने के क्रम में उसके चेहरे पर उगते भावों को देख उसे पूरी तरह समझना चाहती हूं। मैं इसका नाटक भी करती हूं। लेकिन मेरे शब्दों में वज़न नहीं पड़ते। वो आकर मुझे ऐसे थाम लेता है कि मैं घनीभूत बादल की तरह बेशुमार प्रेम बरसाने लगती हूं। उसके पाश एक मर्दाना बरगद की पाश नहीं अलबत्ता एक नवजात शिशु के हाथ की सबसे कनिष्ठा उंगली की तरह हैं जो भूले से कभी किसी अंजान से स्पर्श पर उसमें नेह और अथाह प्रेम का समंदर लुढ़का देती है। लौकी के नए और कोमल लटों की तरह जो सहारा पाने की चाह में घुंघराले हुए जाते हैं।

देर रात जब भी वो मेरे पास सरकता है तो हल्की की रोशनी में वो एक घर से भटका एक बच्चा सा लगता है जो आधी रात की गम की बारिश में मुझे एक गुलमोहर का पेड़ समझ मेरे नीचे पनाह पाने आ जाता है। कई बार तो घुप्प अंधेरे में भी मैं उसका चेहरा देख लेती हूं। वह परेशान मेमने की तरह मुझमें घुसता है, मुझे सर से पांव तक चूमता है। मुझे संभोग के लिए उकसाता है। मेरे स्तनों को यूं दबाता है जैसे उसके जिंदगी में कोई बड़ी भारी कमी हो। वह कितनी ही कोशिश करता है। मेरे उरोजों को हौले से सहलाते हुए मेरी आंखों में देखता है, मुझपर बहुत गर्म सांसे छोड़ता है, मेरी जांघें गुदगुदाता है, नाभि में थिरकन पैदा करता है। मैं उसके खो जाने के लिए क्षेत्र का विस्तार अपनी बाहें और पैर फैला कर करने की कोशिश करती हूं। (यह उसकी नज़र से वासना का क्षण हो सकता है)

पर ऐन वक्त मुझे यह भी लगता है कि कहीं वो मुझको ठंडा समझ छोड़ ना दे। मैं उससे नज़रे मिलाने से बचती हूं ताकि उसकी चाहत अधूरी ना रह जाए। कई बार मैं उस क्षण का आनंद लेने का नाटक भर करती हूं कि ऐसे मामलों में अगर सहयोग ना करो साथी भी ऊब कर निराश हो जाता है। स्तन वैसे भी है क्या ? अगर जोश, वासना और जवानी का उन्माद गैर हाजिर हो तो बस एक मांस का थक्का, बड़ा टुकड़ा भर! अन्य भौतिक चीजों की पूर्ति के बाद का सौंदर्यबोध! मुझे मामूल है जब वो इस क्षणिक तूफान से निकलेगा तो स्तन के पास मेरे दिल में चैन से छुप कर सो जाने की कोशिश करेगा।

मैं तब भी प्रेम, करूणा और वात्सल्य से भरी होती हूं। मेरे हाथ बरबस ही उसके सर के बालों में घुस कंघियां करने लगती हैं। वह मुझे हिलोरे मारता है जैसे सुबह के बाद, शाम को बछड़े को खूंटे से खोला जाता है तो वह चैकड़ी भरते हुए गाय के पास आता है और उसके थनों को जोर जोर से धक्के देता है। शायद पहले कुछ मिनट तक वह खुद को यकीन दिलाता है कि हां मैं सही जगह हूं - अपनी मां की पनाह में। फिर इत्मीनान से दूध पीता है। आंखें बंद कर चुपचाप। उस पर उसके चेहरे पर वो नीरव शांति देखने लायक होती है। परम शांति। लेखक का एकांत। एक पेड़ से टूटकर गिरता हुआ पत्ता भी सुनाई दे। सृष्टि थम जाती है। शाम की रंग और खुशनुमा, गहरी और वज़न में हल्की होती हुई। उसी पल में मैं उसे पुचकारती हूं जैसे गाय अपनी लंबी गर्दन पीछे कर उसके पीठ को जीभ से चाट रही होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी और उभर आती है।

मुझे लगता है कि मेरे अंदर मातृत्व का भाव ज्यादा है। मैं प्रेमिका के रूप में मां का किरदार निभाती हूं। इस पंक्ति का सुधारती हूं। मैं प्रेमिका से ज्यादा मां का किरदार निभाती हूं। मुझे लगता है अधिकांश औरतें ऐसी ही होती होंगी। 

यह बिल्कुल वैसा ही होता है जब किसी सज्जन व्यक्ति माहौल देख कर सोच समझ कर अपनी मुंह से गाली निकालता है तो उसका दोस्त टोक देता है कि तेरे मुंह पर गाली नहीं जंचता क्योंकि तू उसका व्याकरण, वितान और लय नहीं जानता। तू बस इस माहौल में फिट होने की कोशिश करने में, खुद को बड़ा समझे जाने की कोशिश में यह कर रहा है। ठीक ऐसा ही हाल कुछ शराबियों के बीच नए नौसिखियों का हाल भी होता है।

तुम खुद को बहुत बड़ा, दुनियादार, और समझदार दिखाने की कोशिश  करते हो । ऐसा करते हुए तुम बहुत निदर्यी, क्रूर प्रतीत होते हो। पर अगर तुम सचमुच उसे जानते हो तो घटनाएं घटित होने के बाद वह बिल्कुल मासूम भोला सा बच्चा लगता है।

हां तो तुम पूछ रहे थे कि सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन........ ब्ला.........  ब्ला....... ब्ला...

Tuesday, October 4, 2011

मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूँ



हां बाबूजी, पचास का नोट मैंने पूरा का पूरा बचा रखा है। बेशक दो दिन हो गए, मैंने अभी तक कुछ नहीं खाया है और अभी कम से कम तीन दिन इस बात की नौबत नहीं आने दूंगा कि इसके खुल्ले कराने पड़ जाएं। दिन के डेढ़ बज रहे हैं। और मैं ट्रेन के जनरल बोगी से लगे स्पीलर क्लास की बोगी से सटे बाथरूम के बाईं ओर दरवाज़े पर खड़ा हूं। 

हवा लू के गर्म थपेड़े लगाते हुए उल्टी बह रही है। मेरे बालों की मांग रोजमर्रा के की गई कंघी से उलटे दिशा में हो गई है। मैं राॅड पकड़ कर झूल रहा हूं। थोड़ी थोड़ी देर पर चक्कर आते हैं और बहुत संभव है मैं गिर कर बेहोश भी हो जाऊं लेकिन मैं इस बात की यकीन दिला देना चाहता हूं कि बेशक मैं कहीं भी गिरूं, चाहे वो नदी हो, पहाड़ हो, पुल हो, बाड़ा हो, खाई हो, या जंगल हो मैं अपनी मुठ्ठी से यह पचास रूपए का नोट छूटने न दूंगा। यह मेरा अपने पर असीम भरोसा ही कह लो कि मैं इस मामले में अपनी जेब पर भी भरोसा नहीं कर रहा। जेब से जुड़े अपने खतरे हैं। कोई जेब मार सकता है। मेरे पैसे खुद-ब-खुद कहीं गिर सकते हैं लेकिन अगर कोई मेरे इस मुठ्ठी में बंधा पचास का नोट छीनना भी चाहेगा तो उसे पहले मुझसे लड़ना होगा। मेरे बाजू में अभी उतनी तो ताकत नहीं, हो सकता है कि मैं मारा भी जाऊं। लेकिन मेरी मौत के बाद भी अगर मेरे हाथ से वो नोट खींचेगा तो दो टूकड़े में होकर ही उसके पास आएंगे। 

इससे पहले मैं आपको बता दूं कि मैंने यह मुंबई-कुर्ला एक्सप्रेस रेलगाड़ी पास के स्टेशन से नहीं बल्कि डेढ़ मील दूर वाले हाल्ट से पकड़ी। हालांकि वो हाल्ट है इस कारण वहां एक्सप्रेस गाडि़या नहीं रूकती अलबत्ता गाड़ी धीमे जरूर हो जाती है। रहा सहा काम बिना फाटक रेलवे क्रोसिंग पर थोड़ा थमकर चलने का ईशारा देते मेरे झंडे दिखाने वाले दोस्त ने कर दिया। यकीन जानो बाबूजी चलती ट्रेन से ज्यादा खतरनाक कोई विलेन नहीं होता। उसकी सीढि़यां कहीं भी सुविधाजनक नहीं होती। कई मीटर दौड़ने के बाद मैं उसका ऊपरी पायदान पकड़कर लटक गया। मेरे घुटने और जांघों पर उसके कस कर लिए गए चुंबन के निशान अब तक ताज़ा हैं और यह गहरे सुर्ख लिपस्टिक से भी ज्यादा लाल, रक्तिम और छलछलाई हुई हैं। और ताजादम इतना कि जैसे नदी के अभी-अभी पकड़ी गई मछली के गुलाबी-लाल गलफड़े। 

कुल मिला कर मेरी अब तक की यात्रा बेहद सुरक्षित, सफल और आरामदायक रही है जैसा कि प्लेटफाॅर्म पर उद्घोषिका कामना करती रहती है। सेम टू सेम। यह सब मैं आपको इसी दरवाज़े की राॅड पकड़ कर इस पर लरज़ता हुआ सुना रहा हूं। यह कोई हसीन लम्हा सा लग रहा है ऐसा कि मैं अपने पहले प्यार में हूं और बड़ी कोशिशों के बाद आज जब प्रेमिका को प्रपोज किया तो वो पहले थोड़ा शरमा कर, फिर हंस कर मान गई हो और अब मैं जो जीता वही सिंकदर में आमिर खान की भांति पहला नशा, पहला खुमार के अंदाज़ में पेड़ की डाल पकड़ कर हवा में उड़ने की कोशिश वाले सीन की नकल कर रहा होऊं।

रह रह कर ट्रेन हिलती है। जैसा भूखा इंजन चलता है। जैसे बहुत ही खटारा बस या आॅटो लोगों के लदी हुई बिना नकली पेट्रोल और बिन मोबिल की चिकनाई सा चलता हो। एक पटरी को छोड़ कर दूसरे से जा मिलती है। रास्ते जि़ंदगी की नई राह खुलते जैसे चलते हैं। आप गौर से पटरियों को देखते रहो और अचानक से वो उस सिरे को छोड़ देती है। अभी आप इस किनारे यानी सबसे आखिरी लेन में चल रहे हो तो अगले ही पल अपने को पटरियों के मझधार में पाओगे, फिर एकदम बाईं तरफ। तय किए गए सफर को पीछे पलट कर देखो तो यह स्टेज पर खेले जा चुके नाटक के बाद गिरा हुआ ताजातरीन पर्दा लगता है।यह भारी सी मशीन बड़ी ज़ालिम सी चीज़ होती है बाबूजी! यह काॅमिक्स के किरदारों के दिमाग में अचानक से नया आईडिया आने जैसा लगता है। रेल आशिक है कई पटरियों के साथ बेवफाई करती चलती है। यह गोन विद दि विंड के टाइटल जैसी है, खुद मंजिल पर पहुंचने के चक्कर में बड़ी ही प्रैक्टिकल लेकिन सबको नोस्टोल्जिक करने वाली। 

मुझे यह दिन सा प्रतीत हो रहा है कि मेरे चेहरे पर एक स्मित सी मुस्कान है। हालांकि मेरा गला सूख रहा है लेकिन मैं इस समय एक बेहद मीठा सपना देख रहा हूं। देख रहा हूं कि सड़क पर रहने, भूख पर विजय पाने और बेमतलब समंदर किनारे बेरोज़गार बैठे रहने के एक महीने बाद मुझे एक काम के एवज में बतौर एडवांस कुछ पैसे मिले हैं। मैं सदियो बाद ढ़ाबे के बाहर एक बेंच पर दोनों तरफ पैर लटकाए चाय बिस्कुट लिए बैठा हूं। खाने से ज्यादा उन दोनों को देखना हो रहा है। जि़दगी की रेलगाड़ी जाने किस प्लेटफाॅर्म पर ठहरी है कि गरीबी की सोहबत में पले बढ़े आदमी को ओबेराय होटल के सुईट न॰ 234 पर कहानी लिखने को मिला है। 

मैं कुछ भी करूंगा बाबूजी। इस काम को भी उस पचास रूपए की तरह पकड़ लूंगा। हरगिज़ इसे हाथ से जाने न दूंगा। यह सीन बिल्कुल असली है। माना कि वक्त उस्ताद है और इस नाते वह वज़नी राग छेड़ डरा रहा है। लेकिन मैं भी जुगलबंदी कर दिखा दूंगा कि मैं भी तुमसे ज्यादा नहीं तो बराबर का उस्ताद हूं।

शीशे के ग्लास की अंतिम घूंट पी कर बेंच पर रख रहा हूं, काठ की बेंच पर ग्लास की गोलाई उभर आई है। एक लहजे के लिए लगता है, सरकार ने जो नई वाली एक रूपए का सिक्का चलाया है, रखा है। काश कि उठा सकता। 

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