Wednesday, November 30, 2011

सूरजमुखी के फूल का एक पत्ता हिलता रहता है... क्या मर्सिया पढता है या चूमने का आमंत्रण देता है.



वक्त हो गया जानम, अब अपने हल्के ऊनी कपड़े उतार कर मुझे दे दो। जो तुमने दिन भर पहन कर इधर उधर भागदौड़ की। तुमने दौड़ कर बस पकड़ी, हमारे भविष्य को सोच सोच कर लिफ्ट में पसीने पसीने हुई। ना ना बाथरूम के शीशे में अपने चेहरे पर जमी इस चिकनाई को धोना मत। मैं दिली तमन्ना थी कि तुम खूब थको। इस दुनिया के तमाम रंगो बू तुममें शामिल हो जाए। हाईवे के किनारे उग कर फैल जाने वाले मालती के फूलों जैसी। बेतरबीब और नैसर्गिक सौंदर्य। जब कभी मैं तुम्हारे तांबाई नीम उरियां गुदाज़ बाहों के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि शराब के बाद का संबल देने वाला बस यही एक हहराती डाल है जो इस वक्त ठहरी है। मैं जनम का प्यासा, नींद में प्यास लिए जब यह ख्याल करता हूं कि तुम्हारे इन बाहों पर दिन पर एक नमकीन नदी तैरी होगी जो अब सूख कर तुम्हें और नमकीन बना चुका है तभी तुम्हारी तुलना खुद से कर सकने में समर्थ होता हूं। इंसानों में क्लास वैसे भी कभी नहीं पसंद आया। इन दिनों दिन भी कैसा लगता है। कुछ चेता और बेसुध सा। जैसे नींद में गला सूख रहा हो। कोई परेशान करने वाला सपना देख रहा होऊं, जिसे तोड़ नहीं पा रहा होऊं और सूखे हलक पर खाली घूंट लेकर गला तर करने की कोशिश कर रहा होऊं।

ज़रा अपने बेबसी की सिसकारियां अपने चेहरे से उतार नीचे बहने दो। मैं भारी पलकों से देखूं कि वो तुम्हारे नेकलाइन में कैसे अपनी जगह बनाती है। इस पल में वो सब जो रूक रूक कर तुम्हारे संकोच, मौन मिश्रित इंकार में घुल नीचे उतरता आ रहा है वो मैं दरार भरी होंठों से चुग लेना चाहता हूं। जिसके लिए मैंने जिंदगी की रात का इंतज़ार किया है। दिन भर खुद को धूप में सुखाया है शाम को जलावन की तरह चूल्हे में डाला गया हूं। और तब भी जो नमी अंदर रह गई थी जिसके बायस धुंआ बन लोगों के आंखे गीली कर जल रहा हूं। मैंने इस लम्हे के लिए एक रोशनदानों भरी मीनार पर रात-रात भर पहरा दिया है। जिस पल तुम सबके लिए घृणा का पात्र हो, मेरे लिए हसीन हो। तो इस रात में इस लम्हे को जब तुम्हारी नंगी बाहों पर बस मेरी तर्जनी उंगली वहां रूकी हुई है। गौर से देखो इस उंगली को ये सोए रहने का भ्रम देते हुए जगी हुई हैं। मेरे मन की सारी उलझन उसमें समा आई है। जाने दो इसे ये जिस भी रस्ते जाना चाहती है।

यह जब कहते हुए जब भी मैं अपने ठंडे गाल तुम्हारे कपोल पर रख देता हूं वे लाल हो अपने दहकने की इत्तला देती है। रगों में खून का गर्म होकर दौड़ना तेज़ हो जाता है। मुझे चाकू से काटा हुआ टमाटर याद आता है कि जिसका एक सिरा काटे जाने के बाद भी अंत में जुड़ा हो जैसे तुम्हारा हृदय। तुम बिल्कुल वैसी ही हो जानेमन। पैमान में शराब सी लबरेज, जज्बात का तूफान लिए एक फल...... सुकून की पल सौंपती एक औरत। 

हुए उतारो अब अपना पैरहन जानम। उतारो भी... 

Saturday, November 26, 2011

आँखों के लाल डोरे में तैरती है शराब. बेजोड़ उदहारण में शराब और नशे का ये वाहियात जोड़ है.





सुबह आंख खुलते ही जो सबसे पहले चीज़ सोची वो यह कि आज पीना है। पीने को लेकर इतना मूड बनाकर नहीं पिया। हमेशा सोचा और पिया। यह बिल्कुल वैसा है जैसे 15 को मेरी शादी हो यह सोच की बात है लेकिन अगर आज 15 ही हो तो आज शादी का काम करना है। अतः आज पीना है। इसके लिए मैं कल रात से ही मूड बना रहा हूं। यह क्या उम्र है कि मुझे हर चीज़ के लिए अब तैयारी करनी पड़ती है। आज की शाम चाहता हूं कि सारी दुनिया शराब में डूब जाए। दिल करता है अखबार में इश्तेहार दे दूं जैसे एनजीओ संस्थाएं आठ से साढ़े आठ लाईट, पंखा बंद करने का आहवान करती हैं। शराब मेरी नस नस में उतर आए। मैं क्या पीयूंगा यह दोस्तों पर छोड़ता हूं लेकिन पीने में मज़ा तभी है जब मैं अपने हलक में थोड़ी थोड़ी देर रोक कर घंूट लूं। जैसे पुराने भोथरे ब्लेड से चेहरे के नीचे शेविंग करते समय कई जगह से खून की धार बह निकले और बहुत इत्मीनान से उस पर फिटकरी लगाई जाए। होता अक्सर ये है कि पी लेने के बाद मैं एक स्त्री में तब्दील हो जाता हूं, एक पतित स्त्री में। नहीं नहीं मीना कुमारी को याद मत कीजिए।

पीना और लिखना बादशादत देती है। कितना भी बूढ़ा हो जाऊं लेकिन शराब और कलम मुझे शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब की तरह मुझे शेर बना देता है। तमाम विनम्रता के बाद भी दबंगई उभर आती है। दरअसल इन दोनों के दायरे में मैं अपनी कुंठाएं जीता हूं। इसका मतलब वो सारे वर्जित और गैर मुनासिब इलाकों की सैर और शिकार पर निकलना है जो मुझे हरे हरे पत्तों के आड़ में बैठ छुपने का भरम देते हैं। 

पीने के इलाके के रडार एरिया में आते ही मेरे अंतर्मन को एक खास किस्म का सिग्नल मिलने लगता है। मुझे सड़क पर भी जैज़ सुनाई देने लगता है। समुद्र उत्पलावन बल का शिकार हो सारी पृथ्वी को ढ़क लेता है। इंसानी रक्त, वीर्य, वासना, जीवन में गहरी आस्था, कर्म और मोह मिलकर एकाकार हो जाते हैं। एक खास कोण पर उपर से पड़ते लाईट की तरह में आठ दस भागों में विभक्त हो जाता हूं। अपने को किसी रंचमंच पर पाता हूं। जहां मंच पर एक धुंधला प्रकाश गिर रहा है। मैं कोने में घुटनों के बल लेटा चीख रहा हूं। जब चीत्कार खत्म हो जाती है, आंसू खत्म हो जाते हैं। चुप्पी की नदी बह निकलती है और सामने बैठे दर्शकों के घुटने तक जम जाती है। वो खुद को बाढ़ से घिरा पाते हैं। वो मुझे बधाई देते हैं कि मैंने उन्हें घुटने तक इस नदी में डाल दिया। हुंह कितने अंजान हैं वो लोग कि मेरे चीत्कार में उनकी चीख भी शामिल थी और वे जहां डूबे हैं वे उनके ही भाव हैं। कैसा परायापन है कि वे अपने अंदर से निकले हुए उन कै को नहीं पहचान पा रहे हैं ! फिर क्यों इंसान इतने मुगालते में जीता है ? 

इसी तरह मेरा हरेक अक्स प्रेमी, छात्र, इंसान, बेटा, भाई और दोस्त में तब्दील हो जाता है। परस्पर वार्तालाप होता है। सभी अपनी पहचान मांगते हैं। सब मैं ही हूं, मुझसे ही सब है। फिर मैं कह हूं? वो मैं कौन था जो शराब पीता है ? क्या मैं शराबी हूं ? नशे में फिर यह कौन झूम रहा है ? क्या मुझे व्यसन है? क्या इस आदत को धिक्कार भेजा जाए ? 
योगगुरू साक्षात् हो जाते हैं -

श्रीभगवानुवाच - इसलिए हे अर्जुन ! तू इस धरती पर जीवन का कारण जान। सहस्त्रों वर्षों से यहां जो इहलोकवासी कर्म कर रहे हैं, उन्हें करते रहना होगा। जो दुनिया इस भरम में जी रही है कि यहां सब कुछ एक दिन बदल जाएगा वो नहीं होने वाला। क्योंकि अगर वो हो गया तो मानव का औचित्य ही क्या रहेगा ? मैंने उन्हें इसलिए रचा क्योंकि अपनी परिस्थितियों में वो क्या बेहतर कर पाते हैं यह देख सकूं। यह जो अधिकार, शोषण, डर, असभ्यता, आंसू, खुशी, भेदभाव और कत्र्तव्यों की लड़ी है वो निर्बाध चलता रहेगा। यही लड़ाई इस पृथ्वी पर के जीवन की आत्मा है। यह क्षेत्रविशेष में शरीर जरूर बदलेगी पर हर क्षेत्र हर रूप में मूलतः यही लड़ाई उपस्थित ही रहेगी। अत: हे पार्थ तू मुक्तिबोध की कविता 'क्योंकि जो है उससे बेहतर चाहिए' को मूल मान संघर्ष करता जा।

अज्ञान में आनंद उभरता है, आज की मुक्ति मिलती है। 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥
भावार्थ :  अर्जुन बोले. हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा॥73॥

Friday, November 25, 2011

घंटी


चार बजे स्कूल की घंटी बजती है। इसको बजते बहुत कम बच्चों ने देखा है। कुछ उन बच्चों ने जिन्हें मास्टर जी की क्यास निहायत ऊबाउ लगता है, जो अपनी कक्षा में 92 की वल्र्ड कप के हीरो इमरान खान की बात नहीं करते। कुछ उन बच्चों ने जिन्होंने सबक नहीं बनाया हो, अपना नंबर आता देख 3ः55 पर रोनी सूरत बना कर हाथ की कानी उंगली उठा देता, कुछ उन लड़कों ने जिनके लिए पढ़ाई मायने नहीं रखती, कंठ फूट रहा हो, बगलों पर मुलायम बाल आने शुरू हुए हों और रात को स्वप्नदोष की बातें जब अपने दोस्तों को बताए तो साथी नफरत से पेश आते हुए उसे सही जगह उपयोग करने की राय दे।

स्कूल के पीछे की गली में बहता अविरल पेशाब महकता रहता और कुछ चार चार साल से अपनी ही कक्षा में जमे बच्चे अपनी-अपनी वाली को (जो कि कोई एक हो तय नहीं था) यथा संभव चूम रहे होते। 

वक्त के उन कीमती पलों को आज जिसने भी संजो कर रखा है उस माहौल और उस गंध की तलाश में आज भी मारा मारा फिर रहा है। 

वैसे कई बच्चों ने घंटी को गौर से नहीं देखा था। घंटी उनके लिए एक आनंद की लड़ी थी। बिना देखे वो कल्पना कर लेते कि लोहे का दो मोटा लंबा सा छेद वाला राॅड है जिसमें एक और लोहे का राॅड फंस इधर उधर टकराता है और स्कूल के कोलाहल को तोड़ता हुआ कैम्पस में एक अलग ही सुरलहरी छेड़ता है। इस छुट्टी से कई काम जुड़े होते। यों कहें कि सारे काम इसी छुट्टी से जुड़ते थे। आइसक्रीम वाले के पास लाइन लगती थी। चार रूपए की दूध वाली क्रीम पैसे होते हुए भी कम बिकती। अठन्नी वाले लाल गुलाबी आइसक्रीम का बोलबाला था। बच्चे ईदगाह की कहानी की तरह एक दूसरे को विश्वास में लेते कि कप वाली आइसक्रीम ! देखने में चूसा हुआ उजला रंग, पिघल भी जल्दी जाती है ऊपर से अलग सा स्वाद। चार रूपए महंगी वाली बात सभी छुपा जाते। सच यह था कि यह उनके सलेबस में ही नहीं था तो जो था उसे सही ठहरा रहे थे। कोई गलती से ध्यान भी दिला देता तो - घर पर तो दूध दही मिल ही जाती है तो क्यों ये मिलावट भरी आइसक्रीम खाई जाए, क्यों मोटू ? मोटू मुफ्त में मिलने वाली संभावनाओं पर पानी नहीं फेरना चाहता सो सहमति में सिर हिला देता साथ ही जोड़ता - परसों अखिल ने खाया था, बता रहा था कि पेट दर्द होने लगा। अखिल ने च्यूटी काट बताया कि वो मामा जी के जेब से चुराई थी और घर में रख नहीं सकता था उस पैसे को जल्द से जल्द खर्च करना जरूरी था, इसलिए खाई और अंग्रजी का क्वेश्चन आंनसर याद नहीं हुआ (सरे शाम नींद आने से लालटेन पर ही गिरे जा रहे थे) इसलिए पेट दर्द हुआ।

... और बच्चों की दुनिया में किसन चाचा जब गोद में छुटकु को लेकर आइसक्रीम दिलाने आए तभी पहली बार अब्दाल को यह पता चला था कि उसका कौम पाकिस्तान से एक शदीद  किस्म की सिम्पैथी रखता है।

Wednesday, November 23, 2011

जिस्म एक सपाट पार्क है




वो पार्क वहीं है, और आज मेरा मन भी सुबह से वहीं है। पार्क स्थिर किंतु मैं अस्थिर। पार्क में बदलाव बस इतना हुआ है कि वो आजकल सुबह और शाम धुंध के घेरे में रहती है। यों पार्क का बदन भी देखा जाए तो वो भी तुम्हारे जिस्म सा ही लगता है। बहुत हरा भरा पर खाली। हरी हरी दूब जैसे भरा पूरा तुम्हारा शरीर। पार्क के बीचों बीच एक लंबा लैम्पपोस्ट जैसे तुम्हारे मस्तिष्क रूपी ज्ञानेंद्रिय। थोड़ी थोड़ी दूर पर दो सरमाएदार पेड़ जैसे तुम्हारे उभार। चारों ओर नीम, अशोक, शीशम, गंधराज और रातरानी के पेड जैसे तुम्हारे आंख, नाक, जीभ और त्वचा जैसी ़ सभी इतने संवेदनशील। 

किनारे पर कुछ सीमेंट के टेढ़े बेंच भी बने हैं जहां तुमसे घंटों बातें करते हुए मेरी कमर में दर्द हो उठता था मगर अब उनपर लगातार बैठने वाला कोई नहीं। सभी कुछ क्षणों के खुदगर्ज। रात साढ़े आठ बजे उस पार्क को अक्सर बस से देखता हूं। एक सिनेमाई स्लो मोशन में ज़हन वहां से गुज़रता है। आकाश से शीत बरस रहा है। बीचोंबीच के लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी एक गर्द से भरी है जो तिरछे होकर दूर तक जाती हुई ज़मीन को छूती है। तुम्हारा अक्स बहुत उदास उदास किसी की याद में तिरता, कोई दर्द जीता, किसी दुःख में जीता लगता है जैसे सारी दुनिया का शीत किसी याद या दर्द की तरह बरस रहा है और तुम पर चादर का घेरा डाले बैठा है।

तुम किसी यातना में डूबी, आग का लहक अपने चेहरे पर लिए, घर से निकाली गई, खुले आसमान के नीचे चुपचाप समाज का दण्ड सहती लगती हो।

क्या हमारी दृष्टि में मनःस्थिति समाहित होती है या हमारा मन हमारी दृष्टि पर राज करता है? यह क्या है कि हर दृश्य के हज़ारों रंग होते हैं? रात में सहस्त्रों सालों से बेलगाम बरसता ओस अपरिमित वियोग की कहानी कहता प्रतीत होता है जबकि सुबह वही क्षणिक बूंद सा सृष्टि के सातों रंग को प्रतिबिंबित करता है। 

क्यों ना कहूं तुम्हें उस पार्क जैसा हर सुबह इतना कुछ गुज़रने के बाद फिर तुम उतनी ही ताज़ी हो जाती हो जैसे सारे दूबों पर एक ओस की बूंद ठहरी होती है और उनसे हज़ारों हजार छवियां प्रतिबिंबित होती हैं। 

काश कि ऐसे में तुम्हारी आवाज़ की दीवार मिल जाती तो मैं टटोलता हुआ टेक लगाता फिर से खड़ा हो जाता। सालों बाद कोई खोज खबर लेने के लिए, एक तंज़ ही मारना चाहता हूं कि तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया आए। क्यों न तुम्हारे निर्णय या प्यार पर ही उंगली उठा दूं, शायद तब तुम तड़प कर अपनी चुप्पी तोड़ दो और तुम्हारी आवाज़ से मेरे बेचैन दिल को सुकून नसीब हो। लेकिन मैं जानता हूं जो रिश्तो और प्यार में इतनी दूर तक निकल गया हो वो अब कभी, किसी कदर भी चैनो-आराम नहीं पाएगा। मेरे पास लौटने का कोई रास्ता नहीं है। तुम्हारा ख्याल बढ़ने नहीं देता और अपना स्वभाव लौटने नहीं देता। 

पार्क पल रहा है मेरे अंदर, तुम्हारी तरह। तुम होगी तो पार्क भी होगा। पार्क जैसे सदियों पुराना, कोई वीरान हवेली और बासी होता नित नया। प्रतिपल।

Tuesday, November 22, 2011

वक़्त के गर्म बाज़ार में एक हम ही तही-दस्त हैं


आई ओफेन सी यू इन माय बालकनी
इन द डिफरेंट पोजेज़
समटाइम्स विद काॅफी मग इन केजुअल
समटाइम्स व्हेन यू आर  नॉट  ओनली यू
इवेन नो, डैट इज़ योर इमेजि़ज,  नॉट यू
बट देयर इज़ समवन इन माय हार्ट 
हू डिक्लेयर्ड - यू आर माय हनी
आई  ओफेन  सी यू इन माय बालकनी...
ओ.. ओ.. ओ ...

कैसे कैसे बुनती हूं, क्या क्या गुनती हूं। दो कांटों के बीच ऊन का धागा उंगली से झगड़ता रहता है जैसे कोई लम्बी बहस हो या जैसे मेरी ही बेटी हो और यह शिकायत लेकर मायके आई हो कि कैसे घर में मुझे ब्याह दिया। हर फुर्सत में लड़ती हो। मैंने सर्दियों में कई कई स्वेटर बस इसी ख्याल में बुने हैं, तुम्हें सोचते हुए। तुम जो कि एक मसला हो बड़े भी बस ख्याल में ही हुए। तुम्हारे जितना स्वेटर तैयार हो जाता है मगर तुम वही के वही बने रहते हो। 

इन दिनों आसमान मटमैला रहता है और पूरा वातावरण धूल से भरा लगता है मानो परले गली में कोई जोर जोर से झाड़ू लगा रहा हो। नीबूं के पेड़ों पर पत्ते नहीं हैं और वे ठूंठ बन गए है। तुम्हारा राह तकते मेरे पत्थर हो जाती आंखों सी। देखना कोई आधी रात काट ले जाएगा इसे अलाव के वास्ते। 

इसी खिड़की पर बैठे कितने मंज़र तैरते, बहते हैं और छूटे भी जा रहे हैं। वक्त का कुछ गर्म सिरा हमारे बीच बचा रहे इसकी कोशिश में लगी रहती हूं।

वो देखो तुम खड़े हो, हंसते हुए तुम्हारे खुरदुरे दांत दिख रहे हैं। वो देखो तुम दिख रहे हो जब अपने कमरे में चिल्ला रहे हो, खिड़कियों पर के सारे शीशे चटख चुके हैं। तुम्हारी आवाज़ चिपकी है उनसे। आक्रोश में डूबी एक बेहद मासूम आवाज़। सुनने में एक शेर की दहाड़ पर हकीकत में एक मेमने का मिमियाना।

स्वेटर बुनते हुए इसके हर खाने में तुम्हें देखा है और चाहती हूं कि जब तुम इसे पहनो तो पूरे रेशे में मेरी उंगलियों का लम्स ताउम्र बसा रहे।

आॅलदो यू आर नॉट हीयर
स्टिल आई  ओफेन  सी यू इन माय बालकनी
ओ.. ओ.. ओ ...

Monday, November 21, 2011

मुलाक़ात


sushant:  Namaste !

 Keshav:  ha ji

kaha rehte hai janab

aap


sushant:  yahin rehte hain

farmaayen

sarkaar


Keshav:  yaar tu bata

baal bacha ser pe yere


 sushant:  duniya kahan se kahan chali gayi

aap baal par hi hain!!!

hairat hai

maalik


Keshav:  aur Vidya ke saadi mai gaya tha


sushant:  nahi dost

aap bhi gye / padhare?


Sushant: Jai ho !

Keshav:  aur tu bata

tu kab kar raha hai ?


sushant:  kya???


Keshav:  jaan rahe the

ki puchega hi


sushant:  hehehe


Keshav:  seedh seedha jawab nahi diya jaata

tere ko nahi pata naa ki kya kya hai


sushant:  maai -baap aap to hamein jaante hain


Keshav:  to jawab de


sushant:  ji


Keshav:  kab kar raha hai


sushant:  kya

u mean shaadi ?


 Keshav:  gaandu


 sushant:  oh no


 Keshav:  ha ji


 sushant:  fuck off


 Keshav:  shaadi


 sushant:  betichod


Keshav:  hahahaha

aa gaya aukaat pe


sushant:  ji

aapko dekh kar aana padta hai

warna aap maante nahi

meri shaadi 2020 mein  hogi

vision APJ Abdul kalam hai

jab India Gazzab ho jaayega


Keshav:  oh yaar ye sab samajh mai nahi aata


sushant:  pata hai


Keshav:  kab tak haath se kaam chalayega


sushant:  hmm

chinta wajib hai aapki


Keshav: aur tu suna

life kaisa chal raha hai


sushant:  bas

jiye jaa rahe hain

hamesha ki tarah


Keshav:  yaar kabhi to dailog change kar le


sushant:  tu Chandigarh mein hai?


Keshav:  ha


sushant:  achcha chal


Keshav:  abhi to yahi hu


sushant:  change kar rahe hain

Mast hain

diwali mein ghar gaya tha?


Keshav:  accha, to aisa kya hua life mai jis karan se mast hai

ha gaye the


sushant:  hmm

tere shadi mein bhi koi nahi aayega betta !


Keshav:  tu aayega na

bas aur koi nahi chahiye


sushant:  mere se hi karega shadi?


Keshav:  na na,

tere hi jaati ka hai wo


sushant:  hmm


Keshav:  PANDIT


sushant:  meri jaati nahi hai

mere se down hai

betichod hai wo,

bhosri hai

jaise tu hai


Keshav:  hahahaha

par alag tareh ke bhosri hain hum

bhai

uske jaisa nahi


sushant:  gaali sun ke man buland ho jaata hai naa tera?

haan so to hai

tu alag wala descent bhosdi hai


Keshav:  tere ko bhi sunane ka maan kar raha hai


sushant:  chup be

Keshav:  par de nahi raha hai


sushant:  *^$$^$(&^%$#$#

chal bata

kaam kaisa chal raha hai

sune bahut paisa peet rahe ho


Keshav:  hahahahahaha

saale aa gaya form mai


 sushant:  is saal chandigarh mein ghar banwa hi loge ?


Keshav:  chup kar

bakwas maare jaa raha hai

daily majdoori kar raha hai

jo aata hai

kha jaate hai

bas

aisa hi chal raha hai


 sushant:  hmm

sabka yahi haal hai


 sushant:  वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया


 Keshav:  hahaaha


 Keshav:  aur ye kis ka pic lagaya hai profile mein

saale kahi saadi to nahi kar liya?

apani bachchi ka pic to nahi laga ya hai?


sushant:  itna jaldi sale!!!

website banane ka kaam samjha hai kya ?


Keshav:  tu to saale ya kaam jaldi hi karega


 sushant:  haan par


 Keshav:  hahahahahha


 sushant:  itni badi thoda na ho jaayegi

itna jaldi


Keshav:  saale


 Sent at 5:30 AM on Thursday

 sushant:  ham Vidya ko bole ki Priyanka (uski hone wali wife) par ham log line maare hi honge

aaj teri biwi  ban rahi hain

aur ek ladki thi Priyanka naam ki bahut pehle

wo uski fantasy thi

usi naam ke ladki se shaadi kar raha tha


 Keshav:  abe wo patna ki hai kya


 sushant:  sochega usi se ……………..

haan be


 Keshav:  hahahahahahha

saale tera dimag bada chalta hai


 sushant:  daaru ka asar hai, betta


 Keshav:  tere ko dusari wali priyanka yaad thi


 sushant:  tu bhi piya kar

sust mind


 Keshav:  accha tu matlab daaru baaz ho gaya hai


 sushant:  arey mere ko to sab yaad rehti hai

ab kya kahen dost

daaru sabse achcha bhi hai aur bura bhi

matlab jo hai sab daaru hi hai


 Keshav:  accha to tu theek peene wala ho gaya hai

shayar to tu tha hi

bas daru ka kami tha

ao bhi lag gaya mhu ko

tune rockstar dekhi hai?


 sushant:  haan dekhi


 Keshav:  kaisa laga

tere jaise admi pe hi bana hai


 sushant:  7/10

haan

par wo bahut bada star ban jaata hai

ham mara rehe hain


 Keshav:  jo kaho


 sushant:  hmm

wahi to

jaante ho dard ko jeena ek art hai

kala hai

sabke boote ki baat nahi

jo dooba so paar wali baat hai ye

kahe naa

ham log kuch ishq kiye kuch kaam kiye

aur dono ko latka kar chodhh diye


 Keshav:  bhai maine to bas kaam hi kiya

ishq wala to chapter hi nahi tha

book mai life ke


 sushant:  tu samajik prani hai

tu Arastu ke niyam par fit nahi baithta hai

wo pashu hai

jaanwar

wehsi bhediya

tere ko pyar shaadi ke baad hoga

matlab jab teri wife pregnent hogi

tab

tere andar ka insaan jaagega


 Keshav:  hahahahahaha

pregnenet ho ke baad

accha


 sushant:  abhi life ke maze le

aur aish kar

aur B.F. dekh raha hai

headfon laga ke ?


 Keshav:  bhai


 sushant:  C++ ke bahane


 Keshav:  daily ka kaam hai

paisa aaye ya na aaye


 sushant:  hehehhehe

sahi hai be

teri jawani isi mein jaani hai

chal chalte hain

daaru peene

peeta hai ki nahi ?


 Keshav:  bhai, ab realty mai nahi ho sakta to fantasy mai hi jee lene do


 sushant:  haan


 Keshav:  ha


 sushant:  ye bhi hai


 Keshav:  ab kabhi kabhi


sushant:  sahi hai

nahi to saale abhi guilt se bhar dete


Keshav:  par daru raas nahi aaya


 sushant:  fir

cigrate

le le

heroin le le

chars, gaanja,

tilchatta

kokin


 Keshav:  ab jada ho raha hai


 sushant:  kuch bhi le le


 Keshav:  bhai itana capicity nahi hai


 sushant:  Devesh ke saath reh bhi ye haal hai

laanat hai tum par be


 Keshav:  tere saat aa jaun

tu sikha de

ye sab to khud kuch nahi jaante

bas cigrate peene aata hai


 sushant:  chal tere bas nahi hai

mere saath hone ke liye ek basic to chahiye


 Keshav:  hmmmm


 sushant:  jaise tu Yashwant Kanitkar ko padhne wale ko padhata hai

waise hi

chal calte hain

yaar

man nahi lag raha

apna khayal rakhiyo


 Keshav:  tu bhi bhai

chal bye


 sushant:  bye


नोट : प्रस्तुत चैट को बस एक कहानी या स्क्रिप्ट की तरह लें कि गालियों का अपना वितान और व्याकरण है और केरेक्टर गाली दे रहा है. उसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ कर ना देखें....

(ऐसा कहने की जरुरत तो नहीं थी ना कभी रही है. अपनी छवि की फ़िक्र नहीं थी (इस कहानी में यहाँ सुशांत मैं हूँ) लेकिन अपने प्रिय मित्र की छवि का प्रश्न है इसलिए लिख दिया) 

as you know : Image is Everything, and Everything is Image (Saabhar : Rockstar film)

Friends

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