Tuesday, December 20, 2011

सांस भर भर कर निकालो मुझसे के जैसे समंदर में डूबते बचाया हो



बाबा, मेरी कतई ईच्छा नहीं थी। हम तो  धुंध  में गुम रेल की पटरियां देख रहे थे। उस पर काम करते  ग्रुप- डी के गैंगमैन से बातें कर रहे थे। फिर वो बताने लगा कि 'सर ठंड में ना सुबह-सुबह काम पर जाना होता है।' एक ने बताया कि 'मैं बी. ए. पास हूं और डिपार्टमेंटल एक्जाम देकर आगे बढ़ जाऊंगा।  पिछले दिसंबर में ही चार साथी ट्रैक पर कोहरे में काम कर रहे थे, गाड़ी कब उनको काट कर चली गई, पता नहीं चला सर। हम ठीक आधे किलोमीटर दूर पर काम कर रहे थे लेकिन जब सीटी मारने पर कोई जवाब नहीं आया तो जाकर देखा। ... तो चारों आठ टुकड़ों में यहां वहां बिखरे थे।'

अब बताईए हम किसी दृश्य में इतना अंदर तक घुसे हुए थे और वो आई। वो आई और पता नहीं कैसे तो एहसास दिलाया। हम जो कि खुद पापा हुआ करते थे और मेरे बच्चे से दिन रात कोई ना कोई जि़द बांधे रहते थे, तो मैं उसे समझदार आदमी की तरह इस काम से सुनता और उस कान से निकालता रहता था, आज खुद बच्चा बन उसकी जि़द पकड़ कर बैठ गया हूं। 

कोई डर है क्या कि जिस बोतल से दूध पीने से मना किया था वही उठा बैठा हूं ? 

होठों पर ज़हर लगाकर उसने मुझे चूमा। और मेरे पैरों के अंगूठे तक सुलग उठे। अब मुझे उसके बदन का ताप चाहिए बाबा। अच्छा बाबा एक बात बताओ क्या सचमुच मुझे  उसके प्यार से ज्यादा उसके देह से लगाव है ? 

बाबा, मेरी तो कतई ईच्छा नहीं थी। हम तो  धुंध  में गुम रेल की......... होठों पर ज़हर लगाकर उसने मुझे चूमा....

ताप


"गहरे दुख में स्त्री देह एक शरण है। चूल्हे की आंच में जैसे कोई कच्ची चीज परिपक्व होती है उसी तरह पुरुष के क्षत- . विक्षत खंडित अस्तित्व को वह देह संभालती है धीरे . धीरे अपनी आंच में फिर से पका कर जीवन देती है। स्त्री देह कितनी ही बार चुपचाप कितनी ही तरह से पुरुष को जीवन देती है पुरुष को नहीं पता होता।"  
 --- दर्शक, प्रियंवद.

लैम्पपोस्ट के नीचे बैठा हूं। नोयडा में विजि़बिलिटी शून्य है। डेढ़ सिगरेट पी जा चुकी है। आधी बचा कर रखी है। जेब में मेरे अरमानों की तरह मुड़ा तुड़ा कहीं पड़ा होगा। वही असमंजस में फंसा, मेरे दिल की तरह छोड़ दिया जाए या फूंक दिया जाए सा। किसी दड़बे में पड़े चिकेन सा जो अपने सारे साथियों को बारी बारी खींचा जाता देख दूर पिंजरे से और सटता जाता है और गला रेते जाने से पहले ही उसकी आंखे कई खून देखकर मर जाती हैं। गौर से देखो तो आज तकरीबन हर आदमी भी इसी तरह जी रहा है कि मेरी बारी नहीं आएगी से बचता हुआ। और इसी भ्रम में मौत से पहले बेमौत मरता हुआ।
इस जगह पर पीछे मुड़ कर तुम्हें याद कर रहा हूं और यह किसी सिनेमा का क्लाइमेक्स लग रहा है। क्या वह दुनिया मेरे लिए है जहां तुम हो ? 
तुम्हारा प्यार, थोड़ा सा अतीत और कुछ कसैले रिश्तों की गर्मी के अलावा आज रात की जमा पूंजी यही है। ठंड हड्डियों तक मार कर रही है। तुम्हारे गले में सोने की चेन का ख्याल आया है। वो कहां तक जाती होगी ? एक अनैतिक सा फैसला यह कि ऐसे में सिर्फ प्यार से क्या होगा। तुम्हारे बदन का ताप मिले तो आज शायद बच जाऊं।

Monday, December 19, 2011

रोना


 
अपने पिछले दिनों की डायरी पढ़ी, पढ़कर मन में संतोष हुआ कि मन की बातें लिखी हैं। मैं रात में अपने आप से ही किया वादा सुबह होते होते भूल जाता हूं। मेरी जो हालत है वो आज पढ़ी गई 'यारोस्लाव पुतीक' की एक कहानी ‘इतने बड़े धब्बे'  से बयां होती है। इसमें नायक को पता नहीं चलता कि क्या हो गया है। वो अचेतावस्था में सारे काम करता है। कोई चीज़ उस पर असर नहीं करती। हालांकि वह सोचता बहुत है पर वह करने से काफी अलग है। सबको खुश रखने के लिए वो पहले ही वे सारे काम कर देता है जो उससे पूछा तक नहीं जाता ताकि लोग वक्त से पहले ही चुप हो जाएं जिससे उसके अंतर्मन में चलने वाला दृश्य या उलझन में खलल ना पड़े। मनोवैज्ञानिक स्तर से यह मेरे काफी करीब है। 
मैं बहुत परेशान हूं। रोना आ रहा है। जब सारी उत्तेजना, खून का उबाल, गुस्सा, तनाव, निराशा और अवसाद निकल आता है तब व्यथित होकर आंख से थोड़ा सा आंसू निकलता है। कितना अच्छे वे दिन थे जब दिन-दिन भर आंख से निर्मल आंसू झरते रहते थे। कमरे में, पार्क में, मंदिर-मजिस्द में, आॅफिस में, किताब में... कहीं भी बैठ कर खूब-खूब रोते थे। कोई रोकने वाला नहीं था। आंसू भी तब बड़ा साथ देता था। पूरी वफादारी से निर्बाध रूप से झरता रहता था। रोने की भी कोई सीमा नहीं थी। कई बार रोते रोते दुनिया साफ दिखने लगती थी जबकि दुनिया की नज़र में अंधे हो जाने से अवगत कराया जाता था। 

रोने के बहुत से कारण भी नहीं थे लेकिन जो दो चार थे उससे कई और कारण खड़े हो जाते थे। एक बार याद है कि रोते-रोते आंखों का रंग भावुक हो गया था। पिया जाने वाला पानी पिशाब में ना बदल कर आंसू में बदल जाया करता था। 

दो-दो, ढ़ाई-ढ़ाई दिन लगातार रोना, भादो महीने की किसी शापित झड़ी की याद दिलाता था। रो कर फ्रेश हो जाते थे। बीच में जब संदेह होता कि क्या वाकई रो रहे हैं! तो नाक और गाल का छू कर जांच लेते थे। उंगलियांया फिर तकिया, दीवार, हथेली, बेंच, कालीन और पन्नों पर गीली हो जाए तो यकीन हो जाता था। रोते रोते खुशी मिलती थी। यह खुशी हंसी के रूप में नहीं बल्कि सुख और संतुष्टि के रूप में होती थी। 

रोना कितना बड़ा सुख था ! एक मौलिक अधिकार। जो छिन गया है। पहले प्रेम करके रोते थे अब खीझ कर रोना चाहते हैं। पहले रोते थे अब जतन करते हैं।

क्या आने वाले दिनो में हमस सारे मौलिक गुण और अधिकार छीन जाएंगे ? ऐसे बेसिक अधिकार जो फिर से बच्चे में तब्दील कर देने वाला, जोश से फिर से जुट जाने वाला, पवित्र कर देने वाला... इस तरह का जादुई उपहार भी क्या हमसे छिन जाएगा?

क्या ठीक से रोना भूल गए हैं हमलोग ? जैसे बड़ों की हंसी में सूनापन, उसकी मनोदशा, खीझ, संताप, दुःख और निराशा का मिश्रण होता है, क्या वही उसके रोने में भी अब नहीं होता ? 

रोना, रोना कहां रहा ? वह भी रोते रहेने में बदलकर उपहास का पात्र बन गया है। रोना स्नेहिल ना होकर ‘रोते रहने‘, टूेसू बहाने, दुखड़ा रोने, गाते रहते, आलापते रहने, रैया गाने आदि मुहावरों में तब्दील हो गया है।

मां तुम्हारी अलता लगी फटी ऐडि़यां याद आ रही है। एक किनारे से पैर की पायल भी झांक रही है। तुम बहोत सुंदर लग रही हो और अब तुम्हारी अमानत का माथा चूम कर रोते रोते मैं भी सुंदर हो जाने की प्रार्थना कर रहा हूं।

Friday, December 16, 2011

नाऊ द टीयर्स आर माई वाइन एंड ग्रीफ इज माई ब्रेड/ईच सन्डे इज ग्लूमी, व्हिच फील्स मी विद डेथ




आओ आबिदा हमारे परेशां दिल को अपनी आवाज़ की प्रत्यंचा पर चढ़ा दूर तक फेंको। मुझे सुर बना कर अपने तरन्नुम में ढ़ाल लो। मेरा अस्तित्व जो कि महज एक छोटा सा पत्थर है आधी ज़मीन गड़ी हुई कि जिससे आने जाने वालों लोगों के लिए एक बाधक बना हर रहगुजर को ठेस लगाता रहता है। आओ आबिदा।

आओ सिर्फ तुम्हारी आवाज़ का सामना करने के लिए मैंने सारी तैयारी कर ली है। आज हमारे और तुम्हारी आवाज़ के बीच मेरे कोई जज्बात नहीं कोई अल्फाज़ नहीं, कोई एहसास नहीं। मैं तो क्या तुम भी नहीं। मगर बस तुम्हारी आवाज़...!

आओ आबिदा। मैंने अपनी ही सिंहासन तोड़ने की तैयारी कर ली है। मुझे आज नदियों, पहाड़ों, खाईयों, फूलों की जलवागर जज़ीरों को याद नहीं करना। मुझे तुम्हारी आवाज़ के मार्फत बस इतना जानना है कि जिन्हें खोने का इल्म मुझे है, जिसे जाने के सदमे को मैंने यह सांत्वना देकर जी लिया कि यादें कभी नहीं मरती, चेहरे अमर हो जाते हैं, वो हमारी दिल में रहेगा, ज़़रा अपनी आवाज़ से वो सब झूठा साबित कर दो, सारे जख्म हरे कर दो, वही दर्द उकेर दो। एक मूर्तिकार की मानिंद अपने रूतबेदार आवाज़ को पलती छेनी बना मेरी गले और छाती से होते हुए दिल पर चलाते हुए अपने गले की सख्त लोच से हथौड़ी बना टांक दो। मगर देखना जब जब उन जागे हुए ज़ख्मों को वापस सिल कर छोड़ना जब अंतिम धागे का टुकड़ा मेरे जिस्म से बड़े प्यार से काटना जैसे मेरी दर्जिन मां रात दो बजे लिए गए आॅर्डर की अंतिम कपड़े को सिलकर तैयार करती है। तब उसके चेहरे पर टारगेट पूरा कर लेने का जो संतोष होता है।

वर्ना तो तुम जानती ही हो आबिदा कि जैसे खाने के बाद दांतों के बीच फंसे चने के छिलके पर जीभ बार-बार जाती है, जैसे सर्दियां शुरू होते ही हाथ की उंगलियों के नाखूनों के पास के पतले चमड़े हल्के से निकलकर खुरचने की इच्छा बलवती करती है। वैसे ही गर आबिदा तुमने थोड़ा सा भी अपनी आवाज़ मेरे जिस्म के बाहर छोड़ा तो मैं उल्टा एक एक रेशा उधेड़ते हुए वापस अपने सारे ज़ख्मों को खोल दूंगा और तुम तो जानती ही हो कि मैं जितना आगे ही सिम्त दौड़ने में जितना दुर्बल हूं उल्टा और पीछे भागने और माज़ी को खोलने कुतरने में उतना ही माहिर हूं। और तब इतनी ही इल्तजा फिर फिर करूंगा। 

कहो तो खुद को एक रिकाॅर्ड बना ग्रामोफोन पर चढ़ा दूं। कोई तो आवाज़ आएगी मेरे वजूद से। कुछ तो गा दोगी मेरे अंदर का... खुद को तुम्हारी आवाज़ पर कसे जाने के लिए मैं बेकरार हूं। 

Friends

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