Thursday, December 20, 2012

मुकालमा


बैकग्राउंड में इंटरसिटी की सीटी, छक छक छुक छुक। अब ट्रेन धुंआ नहीं उड़ाता मगर ले जाता है आज भी अपनी रफ्तार के साथ। साथ तो क्या सफर करेगा लेकिन पीछे छूटते चीजों का मलाल रहता जाता है।

सर्दियों में आग के सामने मत बैठो। आग कोढ़ी करता है। देर रात शीतलहर में सर्द हाथ आग के आगे करो तो वो भी पुरलुफ्त अंदाज़ में किसी आत्मीय की तरह हाथ थामता है...... और फिर बातों का सिलसिला जो चलता तो मुंह पर बिना गुना वाला ताला लग जाता है....बातें झरते बेहिसाब और यादों के नरम नरम, हौले हौले गिरते पत्ते। आदमी कहां कहां प्रेजेंट रहता है। कैसे कैसे बहता है कि बहते हुए भी कहीं न कहीं ठहरा ही होता है।

कच्चे से दो टुकड़ों में ऐसे ही पाॅडकाॅस्ट, देर रात इंटरसिटी की सीटी, अंगीठी में आग तापना और प्रवासी मज़दूर की याद। घर कहां है की पड़ताल अब क्या बस बोली में रच बस कर रह गई है?






 सजनी मिलन का नाटक तो न खेल सके, विरह को मगर जी गए।

 

Monday, December 17, 2012

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर।


गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे कांटों के बीच खिला इतना लाल कि जैसे काला गुलाब, दिल जिसे शिवलिंग मान गाढ़ा, लाल टप टप करता अभिषेक करता है। जैसे बनैले जंगल में अमरलता। जैसे बेबसी में कैद जिंदगी, जैसे ढ़ीले वसन में अस्त व्यस्त औरत। जैसे शैतान जादूगर के डिब्बे में खूबसूरत राजकुमारी।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे बदहवासी में मुंह से गिरता लार। सुनहला, गाढ़ा। रंग और स्वाद एक से। पर बोतल की बीयर ठंडी और मुंह का लार गर्म। तुम्हारे लिए अन-हाईजेनिक लेकिन मेरे लिए असली तुम।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे रात की राख। अपने वक्त का मास्टर फिर सिफर। अपनी उम्र के उरूज में सब कुछ और फिर जिंदगी का एक हिस्सा भर।

तुम्हारे लिए मैं अंधा होकर तिलचट्टे सा रडार लगाए घूम रहा हूं। कोई जंगली चूहा किसी घर के रसाई में घुस आया है। कोई सूअर गुज़रे वक्त के सारे गजालत भरे पलों को अपने नथुनों से घिनौना मान दरकिनार कर रहा है। मन का कीड़ा चलते चलते ऊब कर उलट जाता है, पीठ के बल चलता है थोड़ी दूर, उभयचर भी कहलाता है।

रात रेंगती है नसों में। माहवारी से गुज़र रहा हूं मैं, पेडू में दर्द होता हैं। रीढ़ की हड्डी संग लिपट कर बैठ गया है कोई। जबरदस्ती कोई संभोग करता है और फिर जबरदस्ती की आदत हो जाती है।

मारो इसके गाल सूजा दो। बदन के हिस्सों को अलग अलग सजा दो। कोचो, देखो कि किसी विधि रूला दो। कहां है प्यास सही पता दो।

आदमकद होने तक बदन तोड़ दो फिर से मेरा।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। बोतल, फेन, दिमाग की नसों में कैद। पपीते में काले बीज सा। कच्चे आमों में मौजूद खिच्चे बिया सा। शाम ढ़ले ताखे पर रखा डिबिया सा।

पता था आदम को कि बीयर था करता इंतज़ार उसका। होठों का असली चंुबन। होठों का असली काम - चुनाव। होठों का असली काम - अपनाना।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर।

Monday, December 10, 2012

चेहरे की किताबों का ये इश्क याद रहे, आबाद रहे



खबर है सबको
हाज़िर नहीं एक साथ हम दोनों
फिर भी कुछ है जो दोनों में चल रहा है (ऐसा कमेंट्स बताते हैं)
वो मेरा तुम्हारी खूबसूरती के बारे में बीस बोलना
वो तुम्हारा उसको कभी स्पैम कर
कभी मैसेज कर कहना "इसे हटा लीजिये, प्लीज़"
एक दिल जीते बादशाह को किसी कनीज़ कर कहना लगता है। 
वो कभी कुछ भी लिख कर मेरे लेटेस्ट कमेन्ट को तह कर के छुपा देना 

हाज़िर नहीं एक साथ हम दोनों
फिर भी, कोई एक्टिविटी कहीं देखता तो लगता था 
तुमने ये "हरकत" साथ रह कर की है।

अब भी जाता हूँ तुम्हारे वाल पर मैं
कोई स्टेटस अपडेट किये महीनों हुए 
मगर लगता है एक सदी यहाँ रुकी पड़ी है।
यूँ तो मेरे ज़ेहन में तुम सबस्क्राइब हो 
मगर अपनी वाल पर भी कुछ कह दिया करो तो 
मेरे अन्दर का रुका वक्त भी चल पड़े 
इस उम्र की आवारगी की प्यास बुझे
ताकि चेहरे की किताबों का ये इश्क याद रहे, आबाद रहे.


(हाँ बाबा ! गुलज़ार के इश्कटाइल में )

Friday, December 7, 2012

जलावतन


कमरे में कोई भी नहीं था। सो कान की तट से समंदर का शोर उठता है। यही अकेलापन मूर्त रूप में बाहर भी था और इसी के बायस तनहाई का आलम अंदर और भी ज्यादा लगता था। गलत कहते हैं लोग कि हम लिखने वालों के लिए कल्पनाशीलता सबसे जरूरी है कि अंधे भी हों तो कल्पना के आधार पर बाकी सब कुछ देखा अनदेखा साकार कर लेगें। जबकि हकीकत यह है कि हमारे लिए आंखें अंधों के बनिस्पत ज्यादा जरूरी है। हम दृश्यों के भूखे। जन्मजात जिद्दी और लतखोर। उंगली करने में माहिर। आप दीवार में कोई बिल दिखा कर कह दीजिए कि इसमें सांप रहता है, लेकिन हमारी जिज्ञासा हो जाएगी कि हम उसमें हाथ थोड़ा आजमा लेते हैं। तो डरते भी जाएंगे और उसमें उंगली भी डालते जाएंगे। सांप से डंसवा कर रोएंगे भी रोना बिलखना भी होगा, कलेजा पीट पीट कर अपने को कोसेगें भी। मगर दिल में कहीं यह ख्याल भी जरूर रहेगा कि ये भी जरूरी ही था, चलो हो गया। उतना बुरा भी नहीं डंसा। पिछली बार वाले हादसे से कम है कि दोनों बार बच ही गए। हमें अंदर से पता होता है कि बाकी चाहे जो हो जाए, अभी हम इस दुनिया से जाने वाले नहीं हैं। बहुत कुछ देख लेते हैं तब कहीं जाकर हमारी कल्पनाशीलता जागती है और उनमें थोड़ी सी सच्चाई मिलाकर उसे लिखते हैं। हम नहीं देखेंगे तो हमारा दिमाग भी अंधा होगा। लिख तो खैर तब भी लेंगे लेकिन विविधता आने के लिए देखना बहुत जरूरी है। देखना और वो भी भूखी आंखों से। आंखों को जीभ बना कर उसके सारे रंध्रों को जगाकर रखना पड़ता है। कई बार लगता है कि क्रांतिकारी अगर सियासी मुजरिम होते हैं तो हम रचनात्मक मुजरिम होते हैं। हमें रोज़ का कम से कम चार अखबार, एक सिनेमा, उपन्यास का कुछेक अंश, कुछ बेहद सुंदर कविताएं तो चाहिए ही। हमारा दिमाग यहीं के बाद शुरू होता है। अपवाद छोड़ दें तो कई बार इसका ठीक उल्टा होता है। ये जो इतना बिम्ब मिलता है हमारे लिखे को पढ़ने में वो देखने से ही तो उपजता है। सूरदार होते होंगे मगर कितने कि सिर्फ वात्सल्य को अपनाकर कविता की ? दिल के मासूमियत को समझा। 
 
तो असल बात शुरू होती है कमरे में किसी अन्य के न होने से। और इससे उपजने वाले घनघोर अकेलेपन से। हम कुछ घोषित पाप और निर्देश फिर भी बचा कर रख लेते हैं कि जीवन के किसी पल उसके बारे में सोच लेना एक खास तरह का सुकून देता है। कई बार वो बातें जो इस कदर जल्दबाज़ी में घट जाती हैं कि हम उस पर समय नहीं दे पाते, सो उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं, मगर पूरी तरह नहीं। हम उसे मन में बुकमार्क कर लेते हैं। फिर किसी उबाऊ दोपहर में किसी गाय, भैंस या बकरी की तरह पार्क में जाकर, गीले, ठंडे, गहरे कीचड़ पैठ कर, उन जल्दबाजी में आंख से खाए गए दृश्यों, कान से सुने गए बातों को पहले चुभलाते हुए निकालते हैं और फिर उसकी जुगाली करते हैं। इसकी जुगाली हमें कई बार आनंद देती है क्योंकि वो गै़र कभी हमारा माज़ी रहा है। हम अपने हिसाब से उन लिखी जा चुकी पटकथा और मंचित किए जा चुके नाटक में कुछ फेर बदल भी कर लेते हैं।
 
बाइस साल की लड़की सर्दी की किसी इतवार को चावल खा कर हल्की सिहरन लिए छत पर आती है अपने होठों पर वेसलीन लगाने के दौरान उसे बरबस बीते बुध को हिन्दी के प्रोफेसर का आत्मीय स्पर्श याद आ जाता है। रात को डायरी लिखते समय सत्रह साला किशोरी को उसके हैंडसम कमउम्र मैथ्स टीचर का तुम्हारा अब तक कोई राजकुमार है कि नहीं याद आ जाता है जिसमें वह यह जोड़ लेती है कि वह मेरा वह राजकुमार यह मैथ्स टीचर ही तो है।

कोई तलाकशुदा औरत बारिश के दिनों में गुमसाए हुए चाौकी पर के बिछे गद्दे की सिलाई को पकड़ अपने अतीत के उन पन्नों को खोलती जाती है जो उसके लिए बेइंतहा तकलीफ का बायस है। अगर वो वाकया नहीं हुआ होता, अगर मैं ही थोड़ी सहनशील हो गई होती, अगर उस दिन वो ही चुप रह गया होता तो.... की अंतहीन घटनाएं। ऐसे में उसे खुद भी पता नहीं चलता कि कब उसने पूरे बिस्तर की सिलाई अपने नाखूनों से उधेड़ दी। 
जि़ंदगी चुनौती। रोज़ एक कोहसार की मानिंद। रोज़ सुरसा की तरह मुंह बाए अवरोधक। बहुत कोशिश भी करें तो कहां भूल पाते हैं कि हमारी चाभी उसकी हेयरपिन थी। वो उससे कपपटी पर ऐसा खेलती कि बाकी काम परे हो जाते। कहां भूल पाते हैं कि उस लड़की को होंठ चूमना आता था। जाने किस अदा से चूमती थी मेरे बालाई होंठ को कि मेरी सारी शर्तें चकनाचूर हो जाती थी। किस कदर की उष्मा थी उसके बदन में कि मुझ जैसे गीले जलावन को अपने धौंकनी में सांस भर भर कर चिलम की तरह सुलगा देती थी। वरना मैं तो ऐसा जरना हूं जो जलता तो नहीं अलबत्ता धुंआ ज्यादा देकर लोगों के आंखों में आंसू ज्यादा लाता हूं।
 
और उधर कहां भूल पाती है वो औरत भी जिसे यू ंतो जिंदगी में सब कुछ मिला है इसके बाद भी जब गाउन उतार कर बाथरूम जाती है, शैम्पू के अपने बाल धोती है और कंडीशनर का ढ़क्कन खोलते वक्त ज़हन रिबर्व करता है कि ‘तुम्हारा वजूद कंडीशनर सा महकता है’ किसने कहा था? किसने कहा था यह जो आज भी ताज़ा लगता है। हमारे अंदर कौन और कौन कौन रहता है? पति ने तो नहीं कही थी ऐसी बातें कभी। कुछ अंतरंग कमेंट्स जो कभी किसी सड़कछाप आवारे ने छेड़ते हुए कही, कैसे मालूम उसे हमारे बारे में ऐसा! जो कि सचमुच ही है मेरे अंदर! बाथरूम के आदमकद आईने में ही अपने भरे पूरे बदन को निहारती है और खुद ही रीझती है फिर कहां से आवाज़ आती है - मोरा जीनगी अकारथ राजा। कौन गाता है यह विरह गीत जो कई बार सामूहिम स्वर में उभरता है। 
 
आखिर कितने पाटों में बंटते और पिसते हैं हम? पति ने जो सब कुछ दिया जनून भरा प्यार न दे पाया। आशिक ने जो प्यार दिया अधिकार न दे पाया। पति है तो आशिक नहीं भूलता। सब कहते हैं तो काहे बहस करना। होगा गलत पर मन क्यों नहीं मानता?
 
सैंया जियरा दरद कोई न जाने 
उठे हिलोर मोर दिल मा बवंडर मचावे
बोझा बोझा लोर गिराउं हर रिस्ते में 
कोसे कहूं कि कोई न पतियावे।

तो क्या करता है मन ऐसी हालत में ? रूमाल पर उसका नाम काढ़ कर देख लिया, कागज़ पर उसका हजार बार उसका नाम लिख लिया, उसके मज़ाक में कहे बात को सच मान चोली में उसकी तस्वीर डाल कर सो गई। सोलह सोमवारी का व्रत भी रख लिया। सुकून मिला मगर समस्या जड़मूल खत्म न हुई। हर मोर्चे पर हर सलाह को मान लिया।
 
आज क्या किया ?
 
इस दोपहर तुम्हारा नाम ही पच्चीस तीस बार उचार लिया। चार बार के बाद आराम मिलने लगा। लगा कोई सूफी संत हो गया बदन। सच्चा, खरा सोना मन। आंख से झर झर झरने लगे आंसू। अंदर जाने कैसी पहाड़ जैसी उलझन थी, तुम्हारा नाम उचारते गई और पहाड़ बुरादे की धूस बन उड़ता गया। इस अकेले में तुम्हारा नाम लेना कितना कितना नया था जैसे पहला परिचय हो और पानी की घूंट की तरह वह आंतों में उतर गया। 
 
इस कदर पा लिया तुमको कि यह संतोष हो गया कि तुम्हें हमेशा के लिए त्याग दिया। 

Thursday, November 29, 2012

144, हरि नगर, आश्रम


डियर सर,

जो एक गुमनाम चिठ्ठी आज सुबह लेटर बाॅक्स की अंदरूनी दीवार से होकर नीचे गिरी है, उस पर धुंधली सी अर्द्धचंद्रकार मुहर बताती है कि वह जंगपुरा डाकघर को कल दोपहर प्राप्त हुई है, जैसा कि रिवाज़ और कहावत है कि लिफाफा देखकर ही खत का मजमून जान लेते हैं तो प्रथम दृष्ट्या अनुमान यह लगता है कि यह चिठ्ठी आपके किसी जानने वाले ने ही आपको भेजी है, स्पष्ट है कि प्रेषक का नाम इसमें कहीं नहीं लिखा जो कि जानबूझ कर किया गया लगता है, लेकिन जोड़ना चाहूंगा कि ऐसा कर प्रेषक अक्सर यह समझते हैं कि वे पहचान में नहीं आएंगे लेकिन होता इसका उल्टा है। बस फ्राॅम वाले काॅलम में घसीटे हुए अक्षर में एम का इनिशियल लिखा है जो आगे चलकर आर में बदल गया है। लेकिन सर, मैं जानता हूं कि हम भारत में हैं और आप जेम्स बांड नहीं हैं जिससे यह ज्ञात हो कि यह खत आपके बाॅस का है। वैसे भी आपकी बाॅस आपको खत भेजकर बुलाने से रही (वो आपको आधी रात निक्कर में ही आपको अपनी गाड़ी में उठाकर आॅफिस लाने का माद्दा रखती है)

पीले रंग की लिफाफे में जोकि अंदर से प्लास्टिक कोटेड है जो यह बताता है कि कोई ऐसे अक्षर उनमें लिखे हैं जिसे कि बारिश-पानी से बचाए जाने की चाहत रखी गई है। चूंकि मैंने चारों तरफ से मोड़ से देख लिया है और इसमें कोई नुकीली चीज़ मसलन उनका झुमका तो नहीं ही हो सकता है। अंदर ब्राउन कलर का एक और बेहद पतला लिफाफा है जो सुरक्षा की लचर परत बनाती है, बहुत संभव है कि भेजने वाला या वाली थोड़े डरपोक किस्म का है, मेरा मतलब बहुत एहतियाती। इससे यह भी साफ हो जाता है कि अगर यह किसी लड़की ने लिखा हो और वह अब तक आपसे अपनी दोस्ती का दम भरती है तो बहुत हद तक उसने अपने खत की शुरूआत दोस्ती की बुनियाद, उसकी जरूरत, जिंदगी में उसका भरोसा आपसे हुई आत्मीयता के पल आदि की यात्रा से होते हुए एक ऐसे कोण पर समाप्त हुई होगी कि जहां यह साफ परिलक्षित होता होगा कि आप उसके दिल में घर तो नहीं कर चुके पर उस दहलीज पर हैं जहां उसे थोड़ा इंतज़ार कराना अच्छा भी लग रहा होगा और आप चले ना जाएं यह अंदेशा भी सता रहा होगा।

अंतिम पैरे में यह एक कबड्डी का खेल होगा जहां प्यार और गहरे अनुभूतियों में पगे शब्दों और दिल से काढ़े हुए अक्षरें अपनी सांस की अंतिम बाजी लगा कर भी कबड्डी- कबड्डी कर रही होगी। आपको उन पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लगेगा कि पंक्ति प्यार के स्वीकार के लिए जीवित बची है या...... लेकिन हर शब्द संशय और उम्मीद से लबरेज़ होगा, इसी कारण संतुलित भी, इसी कारण आपके दिल की धड़कन बढ़ाती हुई भी और इसी कारण आपके चेहरे पर एक खिसियानी मुस्कुराहट और हथेली में पसीने का बायस भी और.... और जब आप यह पढ़ रहे होंगे तो आप इसे कई तरह से पढ़ेंगे।

सबसे पहले तो दिलचस्पी और धुकधुकी में सरसरी निगाह से पूरी पढ़ जाएंगे। लेकिन आपको लगेगा कि कुछ रह गया, अतः फिर पढ़ेंगे। क्या मैंने सही समझा? यह सोच कर एक बार फिर पढ़ेंगे। इससे निष्कर्ष क्या निकला यह सोचकर एक बार फिर पढेंगे। आपकी हालत गर्मी के दिनों में हल्का सुषुम पानी पी लेने वाले जैसी होगी अतः आप उसे फिर फिर पढ़ेंगे।

इतने पर भी अगर मेरे जैसा आदमी हुआ तो उसे खैनी की डिबिया यानि चुनौटी की शक्ल में मोड़ कर अपने लुंगी के साथ कमर में बांध लेगा और घर लौटने के लिए लंबा रास्ता चुनेगा जिसमें यह इत्मीनान से यह सोच सके कि सार तहिने! खत लिखने में हम अपने को तोप समझते थे, लेकिन यह देखो इस खत ने जिसको नामालूम कौन अदना सा अमदी लिखा है लेकिन कैसी बारीकी से लिख गया, साला हमारे दिल से खेल गया। हमारे हम जोकि इस फन में उस्ताद थे, विशारद और मास्टर तक थे। इससे यह साबित होता है कि लिखना बस दिल से होना चाहिए जो हमारे दिल की धड़कनों और भाव को दुलरा दे। खैर...!

बहरहाल सर, खत की लिखावट देखकर लिखने का जो मन में चेहरा उभर रहा है वो यूं है कि वह बहुत भरी पूरी औरत है मगर आप जब से उसके जीवन में आए हैं वो किशोरावस्था की ओर लौट रही है, शायद उसने यह जीवन जिया ही नहीं था, अपने भारतीय समाज को देखते हुए यह बहुत हद तक संभव भी है, हमारे यहां ज्यादातर लड़कियां शादी के बाद जवान होती हैं

ऐसा भी लगता है कि लिखते समय उसकी हथेली का निचला हिस्सा और कनिष्ठा उंगली काग़ज़ पर ठीक से बैठ नहीं पाती है और इसलिए कुछ अक्षर पर अनामिका उंगली का जा़ेर दिखता है, इससे लिखने में उसका कच्चापन झलकता है। बहुत संभव है कि वह कागज़ कलम का इस्तेमाल नहीं करती हो। आप उसके लिखे शब्दों से कुछ अक्षरों को अलग अलग निकालकर मिलाईए मसलन 'त' और आकार की मात्रा। 'त' शब्द में जहां भी हो शब्द को बखूबी पकड़े रहता है लेकिन 'आ' की मात्रा लापरवाही से नाममात्र के लिए लगाई गई है। उसके दिमाग से बचपने का एहसास 'छ' के गोल छल्ले, 'ओ' की मात्रा और 'ख' के फैलाव से होता है

यह भी स्पष्ट है कि उसका मन आपके साथ होने और रहने को ज्यादा चाहता है यह खत मजबूरी में ही लिखी गई है। खतबाजी, रिश्तेदारी की तरह होती है, अगर एकतरफा हो तो इसका सिलसिला नहीं चलता। अतः यह सिलसिला लंबा नहीं चलेगा।

बाकी ब्लेसिंगस् और विसेज़ के कोई मायने नहीं नहीं है, बस जगह भरने के लिए खोखले जुमले हैं जिससे आप भलिभांति वाकिफ होंगे ही। हां अंत में खत के दाहिने तरफ जो उनका घसीटा हुआ सिग्नेचर वो अपने पूरे वजूद से साथ यहीं छूट गई लगती हैं। उसके नीचे खींची गई दो लकीरें बताती हैं कि वो भावुक के साथ साथ अपने होने को लगातार नकारती चलती हैं।

और यह प्यार में ही संभव होता है सर।

Wednesday, November 28, 2012

किताबों से जुड़ाव हमारा कोई पुश्तैनी शौक नहीं अभाव से उपजा एक रोग है


वो आई और चली गई।

मेरे पास अब सिर्फ यह तसल्ली बची है कि वो अपने जीवनकाल के कुछ क्षण मेरे साथ और मेरे लिए बिता कर गई। और जब से वह गई है मैं मरा हुआ महसूस कर रहा हूं। लेकिन मैं जानता हूं कि वो जी रही होगी कहीं। उसे जीना आता है और मुझे मरना। वो भी थोड़ा थोड़ा मर लेती है मगर मैं जी नहीं पाता। मैं मरे हुए में जीता हूं। वो जीते जीते ज़रा ज़रा मर लेती है।

वो गई है और मुझे लगता है कि नहीं गई है। हर उजले उपन्यास के कुछ पृष्ठ काले होते हैं या कालेपन से संबंध रखते हैं। आज रम पीते हुए और उसके साथ मूंग की सूखी दाल चबाते हुए मैं सोच रहा हूं कि कई बार हम किसी उजले शक्स के लिए एक टेस्ट होते हैं जिसे गले से उतारना खासा चुनौतीपूर्ण होता है। और इसी कारण यह एक थ्रिल भी होता है। जीवन के किसी कोने में सबका स्थान होता है। बेहद कड़वी शराब पीने की जगह भी हमें अवचेतन में मालूम होती है। सामने वाले की आंखों में कातरता देख अपनी जि़ल्लत भरी कहानी के पन्ने खोलने को भी हम तैयार हो जाते हैं। अंदर कुछ ऐसा भी होता है कई बार जो हमारे मूल नाम के साथ लिखने को तैयार नहीं होता मगर वो जो अमर्यादित और अनैतिक पंक्तियां हैं वो लिखना चाहता है। हालांकि प्रथम संभोग करते हुए साथी के असहनीय पीड़ा के बावजूद सर में कोई नुक्स सवार हो जाता है और कमर बेकाबू सैलाब की तरह सारे बांधों को तोड़ती आती है।

ये सब क्षणिक होते हैं लेकिन हमारे मन में पलते हैं। कम से कम एक बार गलती कर जाने की हिम्मत, कर गुज़रने की भावना और वापस अपने खोल में फिट हो जाना। पुल के उपर जहां खुशगवार जिंदगी गुजारने वाले, खूबसूरत सनसेट देखने वाले, लांग ड्रायविंग पर जाने वाले और अपनी माशूकाओं के साथ बहती लहरों को देखने वाले लोग होते हैं तो वहीं उसके नीचे अपने स्याह धब्बों के साथ जीने वाले लोग होते हैं, जिंदगी जिनके लिए बोझ है। एक लड़की याद आती है जो सिर्फ दस रूपए पाने के खातिर एड्स के शिकार मर्द से बिना कंडोम संबंध बनाने को बाखुशी तैयार है।

अंदर कुछ है जो लिखना चाहता हूं। मगर क्या मालूम नहीं। कुछ तो शायद यह कि आर टी आई का इस्तेमाल उसके बुनियादी मकसद के लिए कम विभीषणगिरी के लिए ज्यादा हो रहा है। नहीं यह नहीं। तो फिर क्या ? मालूम नहीं। क्या यही नहीं बेहतर होता कि किसी कागज़ की चैथाई पर आड़ी तिरछी उलझी लकीरें ही खींच लेते। क्या लिखने के लिए कलम की निब दो पहले से खिंची लाइनों के बीच जूझती रहती है, इन दो लाइनों की हद तोड़ती दिखती है। आदमी क्या चीज़ है आखिर?

दो किडनी, एक दिल और धड़कन के साथ आदमी क्या चीज़ है आखिर। बेशुमार आदमी के बीच हैं फिर भी आदमी की तलाश है। अरावली की दोहरी हो चुकी कमर पर हों या नीले आसमान की जद में, दिमाग बिना आदमी के पुर नहीं होता।

वो आई और चली गई।

उसके हाथ के कागज़ी स्पर्श वैसे ही जिंदा हैं। शराब का नशा दिमाग में खिंचे नसों को  भींगोते हुए आगे बढ़ रहा है। उसका होना कैसा है। शायद बांह पर दागे हुए किसी सूई की तरह। उसे चूमना कैसा है। शायद बादाम के छिलके का एहतियात से टूट जाना। उसका जाना कैसा है। शायद बिस्तर पर लिटाकर, पैर की सबसे छोटी उंगली में छिले हुए तांबे की नंगी तार को लपेटकर उसमें करंट दौड़ा देना।

Monday, November 26, 2012

पीली बत्ती


इस वक्त, हां इसी वक्त जब नवंबर अपने पैरों में लगती ठंड से बचने के लिए रजाई में अपने पैर सिकोड़ रही है। इसी वक्त जब मैं माज़ी में घटे हालात पर हैरां होता हुआ चीनी मिट्टी में तेज़ी से ठंडे होते हुए चाय के घूंट सुड़क रहा हूं। इसी वक्त जब कम्प्यूटर की स्क्रीन अपने तकनीकी खराबी के बायस अपनी पलकें झपका रही है और ऐसा लग रहा है जैसे इतनी रात गए मैं माॅनिटर के नहीं आईने के सामने बैठा हूं।

दिल में रह रह कर सवाल उठ रहा है कि जिंदगी किसलिए ? इतने दोस्त क्यों, हम कहां तक? किसी का साथ कब तक? कैसे हो गया इतना सब कुछ कि अब तक यही लगता रहा कि कुछ भी तो नहीं हुआ है। आज क्या हुआ है कि सबके चेहरे यकायक पराए लगने लगे हैं। तस्वीरें खिंचवाता हुआ आदमी उस वक्त खुद को किस आवरण में ढ़कता है ? क्या यकायक लापरवाही से यह नहीं मान लेता है कि जिं़दगी सुंदर है। दो मिनट दो तो किसी आत्मीय या किसी आशिक की कही बातें याद करता है कि तुम्हारा मुकम्मल वजूद हंसने में ही छंक पाता है। हंसी का बर्तन कैसा आयतन रखता है। तो क्या सन्तानवे फीसदी लोग हंसने से ही अलग हो पाते हैं और इतने ही प्रतिशत लोग अगर उदास हों तो सारी शक्लें एक जैसी है।

जब हम खुश होते हैं तो हमसे ज्यादा सुखी कोई नहीं जब हम ग़मज़दा होते हैं तो हमसे ज्यादा दुखी कोई नहीं।
तुम हमेशा से वहां जान चाहते थे, ऐसा तुम्हें वहां देखकर ही लगा। हाल की जिंदगी में एक जमात ऐसी हो रही है जो विश्व नागरिक बनना चाहती है। बेहतर जीवनस्तर राष्ट्रीयता के मुकाबले थोड़ी दूसरे दर्जे पर चली गई है। सिर्फ अच्छा ही अच्छा है के विकल्प हैं, इसके लिए अच्छों का चयन हो रहा है और अच्छी बात तो नहीं है मगर बाकी सब कुछ अच्छा है की तर्ज पर निर्णय लिए जा रहे हैं।

एक जेनेरल स्वीकारोक्ति यह भी है कि चूंकि अच्छी बात नहीं है यह मानना परंपरा है अतः हम इसे मानेंगे। मगर दिल में यह बात दबी हुई है कि सिर्फ अच्छी बातें होने भर से जिंदगी अच्छी नहीं होती। बुरे होकर भी अगर जिंदगी का स्तर बहुत अच्छा है तो क्या बुरा है? आप बस उत्तम जीवन शैली बनाए रखिए लोग आपकी बुरी परंपराएं भी आजमाने लगेंगे। मैं कहता हूं कि किसी बारिश के देस में आप बारिश के आनंद को कितनी देर तक पचा सकेंगे? मज़ा तो तब है जब आप कम से कम 24 घंटे में दस मिनट मिनट उदास हों, आपके टेस्ट की उदासी मिलेगी, झक रंगीन और फैशेनेबल। और साहब आपकी हैंडसम और डिसेंट पर्सनैलिटी पर सूटेबल।

आधी रात गए ज़हन में एक चेहरे में बची रह गई सिर्फ दो आंखें उग रही हैं जो मन को इतना अकेला कर गई है कि कुंए से पानी भर कर जैसे डोल उठता हो और अपने ईंट भरे पहचाने निशानों पर टकराए जाने की आवाज़ को सुन रहा हो।

वो छलके हुए पानी जैसे लौट कर वापस आते हैं कुंए में थोड़ी सी उम्मीद की उदास छिड़कन अब भी उन आंखों में है इस उम्मीद में कि एक दिन जब मेरी जिंदगी के तमाम कांटे मुलायम हो जाएंगे मैं भी तुम पर आ गिरूंगा।

गलत कहावत है कि मेरा जन्म हुआ है। मैं तो खोया हुआ कोख हूं।

मेरी जां लोग विश्वव्यापी भ्रमण को निकलते हैं मैं तो ब्रह्मांड भर के जाने अनजाने भटकन पर निकला हूं।

Wednesday, November 21, 2012

निरक्षर लिखता है पहला अक्षर



स्याही में जो इत्र की खुशबू घुली है 
उनमें रक्त, पसीने और आंसू के मिश्रण हैं 
जिसने ख़त भेजे हैं
अक्षरों में उनका चेहरा उगता है
उनकी आँखें कच्चे जवान आम की महकती फांके हैं
खटमिट्ठी सी महकती हैं वे आँखें
और तब 
निरक्षर लिखता है पहला अक्षर।
*****

प्रिय ब,

आईने में किसी वस्तु का प्रतिबिंब उतनी ही दूरी पर बनता है जिस दूरी पर वह वस्तु वास्तव में रखी हुई है।

आज दिन भर तुम्हारे मेल्स पढ़े। पढ़े, पढ़े और फिर से पढ़े। पढ़े हुओं को फिर से पढ़ा। पढ़ते पढते तुम्हारी अनामिका और कनिष्ठा उंगली दिखाई देने लगी। दिन भर किसी के इस्तेमाल किए हुए शब्दों के साथ होना वैसा ही लगा जैसे कोई परीक्षार्थी किसी दूर के रिश्तेदार के यहां परीक्षा के दौरान रूकता है और उस दौरान उसके घर के तेल, साबुन, शैम्पू, तौलिये का इस्तेमाल करता है। 

मैं भी जाते नवंबर की गरमाती धूप की तरफ पीठ करके दिन भर तुम्हें पढ़ता और सोचता रहा। और अब ऐसा लग रहा है मैंने तुम्हारे ही कपड़े पहने हैं, ज़रा ज़रा गुमसाया हुआ जिसमें तुम्हारे बदन की गंध घुली है, कुरती के पीठ वाले हिस्से पर तुम्हारे बालों की खूशबू रखी है। बगलों के पास के पसीनों की महक, कपड़ों को जिस तरह तुम बरतती हो, ज्यादा सूखे, थोड़े कच्चे, थोड़ा पाउडर, डियो और परफ्यूम की गंध, थोड़ी सी बारिश में भीगी और जानबूझ कर इतना सुखाना कि हल्का कच्चापन रह जाए। कपड़ों का ऐसे फींचना कि उसमें अपना अंश बचा रह जाए। कि धोते समय ही यह सोचना कि कल को वो इसे पहनेगा।

तुम सोच सकती हो ऐसा कैसा लगा होगा। कायदे से तो मुझे बहुत अच्छा लगना चाहिए, सुकून से भर जाना चाहिए। मानने के लेवल पर तो मुझे भी अच्छा लग रहा है लेकिन अंदर ही अंदर मन एक अजीब से कड़वेपन से भर गया है। हालांकि मैंने लगातार तुम्हें सोचना ज़ारी रखा हुआ है और मैं ऐसा ही करता हुआ बाकी जिंदगी भी गुज़ार देना चाहता हूं। लेकिन मुंह के स्वाद का आलम बिगड़ आया है। ऐसा लगता है जीभ उठा उसके तले एक बार दांत काट कर निंबोली रख ली हो। तीतापन रिस रहा है लेकिन जब इस तीतेपन को लंबे समय में महसूसना शुरू किया तो जीभ के रंध्रों के पास तो कड़वापन रहा पर गाल के दूर के किनारे, टान्सिल और हलक के पास यह हल्का मीठा मीठा लगा। मेरा मन खट्टा हो आया है। होता है न कुछ रिश्ता कसैला! लेकिन हमारी जिंदगी में कुछ इतना अंदर तक घुस जाता है कि कई बार उसका ख्याल हम डर से करते हैं, कई बार एहतियातन और कई बार कर्तव्यवश भी। कई बार कुछ रिश्ते इस तरह के भी हो जाते हैं जो सार्वजनिक रूप से घोषित गलती हैं, निभाए जाने पर पाप, सुने जाने पर अनैतिक और उसके परिणाम भोगे जाने पर न्याय के रूप में दण्ड और जुर्माना भोग लिए जाने पर प्रायश्चित।

फिलहाल मैं अभी भोग जिए जाने वाले निर्णयों के स्तर पर नहीं पहुंचा हूं। 

तुमने ठीक कहा था, हम दूसरी दुनिया के लोग हैं, हमारा हर काम उल्टा होगा। तभी तो जहां लोग सार्वजनिक जीवन से प्यार उठाकर व्यक्तिगत हो जाते हैं हमें अपने प्यार को सार्वजनिक करना पड़ रहा है।

कई बार मैं सोचता हूं कि जिस तरह तुम्हारे लिखे से मेरे जेहन में तुम्हारी सूरत बनती है वैसे ही मेरे लिखे से भी तुम्हारे दिलो दिमाग में भी मेरे अक्स उभरते होंगे। मगर तुम कहां रेशमी शाॅल सी मुलायम भरी फिसलन और मैं कहां उसी शाॅल के नीचे गांठ लगे डोरे जैसा। तुम कहां अरमान भरी खुली हथेली में कांपती ओस की बूंद और मैं बाज़ार की धूल बिठाने के लिए फेंका गया कैसा भी पानी। तुम कहां पोशीदा लिबास में एक भरा पूरा बदन छुपाए जानलेवा औरत और मैं कहां एक जबरदस्ती निर्माणाधीन खंडहर....

तो मन अगर एक आईना है और लिखे जाने में अगर वो एकदम पास प्रतिबिंब हो रही है तो  वास्तव में वह वस्तु कहां रखी है? 

तुम आईने के सामने रखी एक सेब हो जिसके दो होने का भरम होता है जिसके दोनो आकार व गुण सजातीय हैं। फिर भी एक झूठा है मगर इस कदर झूठा कि दोनों सच्चा। इस कदर सच्चा कि दोनों ही कल्पना के बुलबुले। इस कदर प्राप्य कि हकीकतन खाली और इस कदर धनी जो सिर्फ तुम्हें सोचता ही रहा। इस कदर संवेदनशील कि जैसे तलवे में स्पर्श के तरंगन से उभार थरथराते हैं।

तब पीठ में आंच लगने लग जाती है और लगता है पैदा होने को आतुर कोई बच्चा वहां बंधा है। 

तुमसे रिश्ता है या कि लपटों में आने वाला गठ्ठर है?
तुम हो या कि बदन के  चूल्हे में कोई सीला जलावन है!

Monday, November 19, 2012

कोई जिस्म के ताखे पर रखी डिबिया आँखों की रास कम कर दे



एक ने अपना भाई खोया तो दूसरे ने अपना घर। कभी कभी मन थकने, उसमें शून्य भरने और दुनिया बोझिल लगने के लिए दिन भर के दुख की जरूरत नहीं होती। खबर मात्र ही वो खालीपन का भारीपन ला देता है। कोई पैर झटक कर चला जाता है और पहले से खोखली चौखट के पास उसकी धमक बची रह जाती है जो उसके अनुपस्थिति में सुनाई दे जाती है।

एक ही हांडी में दो अलग अलग जगह के चावल के दाने सीझ रहे थे। तल में वे सीझ रहे थे और ऊपर उनके सीझने का अक्स उबाल में तब्दील हो रहा था। ऐसा भी नहीं था कि वे सबसे नीचे थे। सबसे नीचे तो आंच थी जो उन्हें उबाल रही थी। बदन जब सोने का बन रहा था तो मन तप रहा था। शरीर इस्तेमाल होते हुए भी निरपेक्ष था। शरीर भी क्या अजीब चीज़ है, भक्ति में डालो ढ़ल जाता है, वासना में ढ़ालो उतर जाता है। कई बार उस मजदूर की तरह लगता है जो घुटनों तक उस गाढ़े मिट्टी और पानी के मिश्रण में सना है, एक ऐसी दीवार खड़ा करता जिसमें न गिट्टी है और न ही सीमेंट ही।

क्या दुख पर कोई कवर नहीं होता या हर कवर के नीचे दुख ही सोया रहता है? क्या दुख हमारे सिरहाने तकिया बनकर नहीं रखा जिसपर हम कभी बेचैन और कभी सुकून की नींद कवर और करवट बदल बदल कर सोते हैं।

आज तकलीफ ऐसे ही पेड़ में मरोड़ की तरह उठा। इतना केंद्रित कर गया जैसे जिस्म के बहुत संवेदनशील और उत्तेजित करने वाले हिस्से पर अपनी जीभ से पेशेवर खिलाड़ी की तरह खेल गया। संगीत के किसी अनजाने लय पर हौले हौले, गोल गोल घूमता। और इस दरम्यान हम जो अपनी दांत पर दांत रखकर, तकिये को अपनी उंगलियों से भींचे रहे। सोचिए तो क्या हम यही चाहते थे कि कोई हमें बेबस कर दे। अपनी बांहों में भर कर चकनाचूर कर दे। ख्याल जो हल्दी की गांठ की तरह मेरी जड़ में है उसे सिलबट्टे पर रख कर पीस दे। कि जैसे श्लोक झरते हैं  विद्वान के मुंह से। कि जैसे कोई तुतलाता हुआ बच्चा अपने पूरे नाम को दोहराता है कोई हमें भी वैसे ही घोर कर पी जाए। एक ज़रा अपनी साड़ी उठाए और हमें अपने जांघों पर रख मरोड़ कर डिबिए की बाती बना दे। उसे हटाने और आनंद लेने के बीच मेरा मन। ताकत नहीं जिस्म में कि इंकार कर सकूं। इच्छा नहीं ऐसे समय में ऐसा महसूस हो। तो अंदर के सूनेपन को हम कई बार बाहर से भर लेते हैं।

मन जो हुलस कर ज्वार की तरह उठता है और नाउम्मीद होकर भाटे की तरह गिरता है। शरीर जो चाहता है कि कोई शेरनी आए और हमें अपने दांतों में पकड़ किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ आए। तो ऐसी तो कोई जगह नहीं। हमें शेरनी नहीं बिल्लियों से प्यार होता रहा। मगर ऐसा क्यों होता है बाबू कि प्यार उसी से होता है जो दिल पर चोट लगाता रहता है। हमारे दिल पर अपने पंजों के निशान छोड़ जाता है।

वो ऐसी थी कि उसने होश में कभी संसर्ग नहीं जाना था। मैं ऐसा हूं कि अपने होश उस पल के लिए बचाकर रखता कि मेरी बांहों में पागल होने पर वो कैसी दिखती है। मैं अपनी होश खोने का नाटक कर उसे बेहोश करता और होशमंद बना रहता। क्या मैं कोई नाटककार हूं जिसमें कई चरित्र हैं फिर भी मेरी नज़र में सब सफेद हैं? उसका एक किरदार था फिर भी उसने कई रंग दिखाए।

डायरी - अंश

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