Sunday, February 26, 2012

मेरी कलाई पर घडी मत बांधो, अपने कहे में वक्त को बाँधा करते हैं हम

चिंता की कोई बात नहीं। उल्टी नहीं हुई बस थोड़ा सा मुंह खुला किया और चुल्लू भर नमकीन पानी निकला। और निकल कर भी रूका कहां ? बिस्तर ने फटाफट सोख लिया। ये प्यास भी बड़ी संक्रामक चीज़ होती है बाबू। मेरी जिंदगी की तरह ही मेरे बिस्तर और तकिए तक प्यासे हैं ये आंसू तो आंसू मेरी नींद तक सोख लेते हैं। कुछ भी यहां नहीं टिकता। हमने कितनी रातें साथ गुज़ारी मगर ये हसरत ही रह गई कि तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे देह की गंध इसमें बसी रहे और मैं तुम्हारे होने को, तुम्हारे बदन की खूशबू से मालूम कर सकूं। मुझे लगा करे कि जैसे एक अंधे को किसी लम्बी टहनी का सहारा मिला है मैं तुम्हारे रोम रूपी हरेक कांटों को टटोलता चलूं। कितनी ही पी ली आज लेकिन अंदर की खराश मिट नहीं रही। लगता है दिल की दीवार पर किसी मौकापरस्त बिल्ली ने अपने पिछले पंजों से खुरच कर चंद निशान छोड़े हैं।
हां अब मैं अपने दिल को देख पा रहा हूं। नाजी सैनिकों की देखरेख में काम करता किसी यहूदी सा, हाड़ तोड़ मेहनत करता, कोयले खदान में भागता, किसी दवाई के कारखाने में तैयार शीशियों पर लगतार लेबल लगाता। जून महीने में कुंए का जलस्तर कम देख रात में ही खेत को सींचने का जिम्मा लिए। पुनः हरेक मेड़ से टकराता, ढलानों की तरफ बहता, कोई मजबूर जीवन। सस्ते बाज़ारों में शाम तलक हाथ पर लटकाया गए पुराने कपड़ों का गठ्ठर बेच डालने का निर्णय। अनथक। दिल। इस क्षण कितना दयनीय! असहाय। कोई सहारे की उंगली लटकाओ तो बच्चे की तरह थोड़ी ढ़ीली सी पकड़ से उस सहारे को अपनी नर्म उंगलियों से घेर भर ले।


मैंने आज नशे में अक्षर बना कर तुम्हारा नाम भर लिखने की कोशिश की है। लेकिन तुम न भीड़ में मेरी थी और न अकेलेपन में। मैं हर सुबह जब वो काग़ज़ देखता हूं तो बस एक जिग जैक लाइन भर मिलता है जैसे मेरे ही धड़कनों का ग्राफ हो। ये अमूर्त चीज़ बनाने वाले ने क्यों नहीं देखी ? या फिर अगर देखी भी तो क्यों महसूसने भर को छोड़ दिया?


उसको कहो, जिंदगी के अखाड़े में यूं हरेक बात पर भरी बोतल का इनाम न दिया करे। मैं हर बार वो दांव बस इसलिए खेल जाता हूं कि मुझे उसमें जवान होती लड़की दिख जाती है, जिसके बाल स्टेप कट में कटे हैं और जिसने अपने मैरून रंग की लम्बी स्कर्ट के नीचे कुछ नहीं पहन रखा है। जानबूझ कर ही न? मेरे बदन से उतना ही पसीना गिरने लगता है। ये कौन सा अक्स उभरता है जिसका गुरूत्व इतना ज्यादा है, जो अपने नाभिक में ही भारी लगती है? ये कौन है यार जिसके चारों तरफ हम चक्कर लगाते रहते हैं?


आसमान से समंदर क्यों नहीं बरसता ? तलवों से शराब क्यों नहीं रिसती ? सिर में एक कान की जगह खिड़की क्यों नहीं है ? टूटे हुए दिल में कोई सीढ़ीघर क्यों नहीं होता ? ये झूठा ढोल पीट पीट कर किसने अफवाह उड़ाई कि प्यार करने के बाद मैं चैन से रह लूंगा?


प्राॅब्लम ये है कि दिल एक चूर चूर हो चुका आईना है जिसको अब सीमित दायरे में रखने की हम रात दिन कोशिश करते रहते हैं। वहां ये खुद में ही चुभन का बायस बनती है। कोई न कोई सिरा इस शिकायत के साथ बैठा मिलता है कि सर मैं ठीक से नहीं हूं, मुझे किसी और कैम्प में भेजो। आह ! मेरा दिल भी क्या चीज़ है फिलस्तीन का समर्थक या कश्मीरी पंडित? अपने ही देश में शरणार्थी !

Friday, February 17, 2012

रानों पर के नीले दाग




दोपहर आज अपने जिस्म में नहीं थी। घर की बनी रोटी ढ़ाबे पर सख्त आटे से बना तंदूरी रोटी सा लगता रहा जिसे बनने के चार घंटे बाद खा रहा हूं। खाने के कौर खाए नहीं चबाये जा रहे थे। लगता था कुछ शापित सा समय जबड़ों में फंसा था जो छूटता नहीं था। एक एक निवाला नतीजे पर पहुंचने की तलाश में जानबूझ कर ज्यादा चबाया गया था लेकिन फिर भी हलक में अटक जाता। कई बार ऐसा भी लगा जैसे थाली में चूइंगम परोसा हो। 

उन ऊबाउ से कुछ घंटों में वक्त ठहर गया था। पहाड़ हो गया था या यों कहें महासागर हो गया था। प्यास बहुत लगती थी और घूंट-घूंट पानी गटकते हुए दीवार और छत के मिलन स्थल को देखा करता रहा। हथेली यूं गीली हो जाती जैसे क्लास से भाग कर सिनेमा हाॅल में बैठे हों और हाथ में साइकिल के पार्किंग का मुड़ा-तुड़ा छोटा सा रसीद हो। 

कमरे के इस कोने से उस कोने तक ठीक बीचोंबीच एक रस्सी तनी थी। वो हमारे रिश्तों के तनाव जैसा प्रतीत होता रहा। अगर उंगली रख कर छोड़ दो तो थोड़ी देर कंपन के साथ हिलता रहता। यह तनाव जड़ी रस्सी लोगों के अंदेशों और अंदाजे के बोझ को उठाया करती। कमरे के दोनों दीवारों में धंसे हम उन दो कील जैसे थे जिसमें हमारे रिश्ते की रस्सी उमेठ कर लपेटी गई थी। हम एक हो नहीं सकते थे। किसी आमदकद के टहलने पर रस्सी उसके माथे, कान गले से टकरा बार-बार टकराती। कितने सारे काम बिखरे थे कि उठकर शहर भर के लोगों से मिला जा सकता था, टी. वी. देखा जा सकता था और तो और कल जो उसने झेंपते हुए अपना हेयर बैंड खींच कर मुझ पर मारा था उसमें उंगलियां फंसा कर मुलायम प्रदेश की सैर की जा सकती थी। ऐसे में फिर जाने कैसे होंठ के कोने का एक किनारा बगावत करता और बेबहर शेर छलकते...

सुब्ह से जुदा तुम्हारा चेहरा अच्छा लगा 
दोपहर की ऊब में तुम्हारा होना सच्चा लगा

क्या हिज्र के महज़ दो बरस और आठ मौसम गुज़रे ?
बाद मुद्दत एस. एम. एस. में उसका नाम लिखना अच्छा लगा

गैस पर चढ़ी चावल में सीटी लगता रहा
इतना पका कि सारा खाना कच्चा लगा

किससे हम क्या पूछें कि कौन जवाब देगा
इसी उम्र में तजुर्बे इतने कि हर आदमी बच्चा लगा

लेकिन अंदर से अनिच्छा इस कदर थक कर बलवान हुई कि................

आखिर आमने-सामने होकर दूर दूर होना एक खिंची रस्सी के तनाव सा ही होता है। और दोनों तरफ कील जब एक एक दिल रखता हो प्यार इसी रस्सी पर नकली दाढ़ी मूंछ बना बनाकर करतब दिखाते हुए दिल्लगी करता है।

Thursday, February 16, 2012

आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई



तुम कहोगे 
तीक है - तीक है 
जबकि तुम्हारे मुंह में 
तारीफ से ज्यादा 
पान की पीक है ----- धूमिल 

मैं जानता हूं, सेकेण्ड फलोर पर वन रूम सेट में रहने वाला मैं, एक  'ऐब - नोर्मल' आदमी के रूप में अपने मुहल्ले में जाना जाता हूं जिसके आवाज़ का उतार चढ़ाव बहुत अधिक है। जो रूमानी बातें बड़े मिसरी जैसे लहजे में कहता है और अपने विरोध का हस्ताक्षर ऊंचे आवाज़ में दर्ज़ करवा कर चुप्पी साध लेता है। पिछले एक साल से मैंने जीने का यह एक नया तरीका ईजाद किया है कि विरोध जता लेने के बाद मैं उस आदमी को दोस्त बना देता हूं जो गलत है। विरोध जता लेने से मेरे मन का बोझ हल्का हो जाता है और मैं अपने आप को सामान्य मनुष्य की श्रेणी में खड़ा पाता हूं। यह मैंने अपना ज़मीर जिंदा रखने के लिए एक रास्ता खोजा है। 

हां यह सच है कि पहले मेरे अंदर विनम्रता नहीं थी लेकिन अब वादा करता हूं जब भी आपसे मुखातिब होऊंगा तो मेरे शरीर का एक हिस्सा हमेशा आगे की ओर अदब से झुकता महसूस होगा। मैं पहले आपके हर चीज़ की तारीफ करूंगा, उक्त दिशा में उठाए जा रहे आपके कदमों का स्वागत करूंगा और अंततः आपके प्रयासों की सराहना करूंगा। साथ ही साथ मैं इन सब बातों को कहने के लिए एक स्वस्थ वातावरण तैयार करूंगा और विनम्रता भरे शब्दों की तलाश तो करूंगा ही। मैं कसम खाता हूं कि मैं अब हर वाक्य कुछ इस तरह से कहने की कोशिश करूंगा - ‘‘महाशय आपका कहना सर्वथा उचित है इस परिस्थिति में सिर्फ यही एक राह उपयुक्त जान पड़ती है। आपकी जगह मैं होता तो भी यही करता"। (गौर करें इसमें शायद शब्द का इस्तेमाल कहीं नहीं होगा) 

अपने मकान मालकिन को मैं यह कदापि न कहूंगा कि पांच गमलों में से सिर्फ तुलसी के गमलों में ही पानी क्यो डाली जाती है? क्या तब भी जब वो ओवर फ्लो हो रहा हो ? बाकी गमलों की हालत दरार फटे बंज़र जमीन जैसी क्यों ? मैं ईश्वर की कसम खा कर कहता हूं कि मैं यह सत्य हरगिज़ नहीं कहूंगा कि अन्य पौधों में ईश्वर के होने की परम्परा (पूर्वाग्रह) नहीं है अतः वे उपेक्षित हैं। हमारे समाज में अधिकांश इंसान डर कर कुछ भले काम कर लेता है। बढ़ती प्रसिद्धि यदि धूमिल होने का खतरा न हो तो लोग आसमान में आग मूतेंगे। यह डर ही है जो कई लोगों से आज पूजा करवा रहा है, अतः कई लोग ईश्वर को भी मिला कर चलते हैं।

पुनः मैं उसे अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करूंगा। जिस वक्त मैं उनका यह एहसान जता रहा होऊंगा, मेरी आंखों में उनके लिए अपार स्नेह और प्रेम होगा। किसी की कृतज्ञा जताने के लिए मुख मंडल पर जो लाली लगाई जाती है मैं उसका पूर्णतः अभिनय करना चाहूंगा।

फिर मैं सब कुछ अच्छा अच्छा फील करूंगा और चुनिंदा चीज़ें आपको बताऊंगा ताकि यह सब कुछ इंटरेस्टिंग लगे। वैसे रियल जिंदगी तो बहुत बोरिंग होती है। क्षमा करें मैं फिर सच कहने की हिमाकत कर बैठा। क्या करें जब नहीं था कुछ करने और कहने को तो गली में दो रोटी की गुहार लगाते बच्चे की पुकार में भी एक संगीत खोजना हुआ। जिंदगी का आनंद दोगुना हुआ। भई यों थोड़े ना 'ऐब - नोर्मल'  कहलाता हूं ? 

Monday, February 13, 2012

कुछ तो करो सुनीता !

ठंड की दुपहरी में क्या भात खा कर बैठी हो 
जो शोव्ल में कांपती हो 
बच्चे की ज़रा मालिश ही कर दो 
या फिर किसी से लड़ ही पड़ो 
कुछ तो करो... 

चापाकल इतना चलाओ कि लगे 
खुद से ही पानी गिरने लगा हो 
साफ कपड़ों को ही धो लो फिर से 
या फिर काले बाल ही फिर से काले करवा लो 
कुछ तो करो... 

देहरी पर बैठ कर साफ चावल चुनो 
संतोषी माता के कथा में चली जाओ 
चलो सुनना नहीं तुम पाठ ही कर देना 
आंच तेज़ कर दूध की उबाल फूको 
कुछ तो करो... 

ना सुनीता, 
पेंट मत करो, 
कविता ना लिखो 
न ही पढ़ो उपन्यास कोई 
किसी चाहने वाले को फोन कर कहो कि 
तुम्हें चूमे यहां वहां 
पड़ोसी से वादे लो कि आज रात तुम्हें मिले 
कोई गंदी सी फिल्म देख लो 
सुनो, फटे कपड़ों की इस्त्री कर लो सुनीता! 
...कुछ तो करो।

Friday, February 10, 2012

वक़्त को स्टेचयू कहा है हमने, जरुरत क्या तस्वीर की; फुर्सत की



Chubby cheeks, dimple chin 
Rosy lips, teeth within, 
Curly hair, very fair, 
Eyes are blue, lovely too, 
Mama's pet, is that you?? 
Yes! Yes! Yes!

बहती नाक में इत्ते सारे काम गिल्ली ही संभाल सकती है। गिल्ली। इस नाम के पीछे सीधा सा परिचय यह कि महादेवी वर्मा के एक कविता की आधार पर यह नाम रखा गया है। लंबे  से एक नेवी ब्लू स्कर्ट और सफेद कमीज़ में डेढ़ हाथ की गिल्ली। बदन पर एक तिहाई कमीज और दो तिहाई बहुमत में लिपटी गिल्ली। प्यारी गिल्ली। दुलारी गिल्ली। मोटू गिल्ली। ऐसी गिल्ली, वैसी गिल्ली। जाने, कैसी कैसी गिल्ली। पूरे घर में बस गिल्ल ही गिल्ली।

मां-पापा ने कुछ सोच कर रही इत्ता लंबा स्कर्ट खरीदा है कि कम से कम इस खेप से ही वो दसवीं कर लेगी। कम से आठवीं का टारगेट तो पूरा कर ही लेगी! करना कुछ नहीं है, अगर कमर का साइज ठीक रहा तो बस नीचे के बंधन बढ़ती उम्र के साथ खोलती जाएगी। स्कर्ट ऑटोमेटिक रूप से उसकी लंबाई को कवर करता चलेगा। एक सौ सत्तर रूपए में एक ही थान से भाई के लिए हाफ पैंट और बहन के लिए स्कर्ट खरीदी गई है। खैर...!

एनुअल फंक्शन के लिए रिहर्सल कर रही है। स्कर्ट ऐसी है कि पूरे रास्ते को बुहारती चलती है। अक्सर अपने ही जूता उसकी स्कर्ट को दबाता और गिर जाती। गिर जाती तो पीठ पर लगा बस्ता आगे की ओर निकल आता। झुके हुए में चेहरे पर भार पड़ता तो ढीली डंडी वाला चश्मा नाक पर उतर आती। उसे अक्सर लगता कि किसी ने उसे धक्का दिया है, उसी हालत में झटके से पीछे देखती। चेहरा गोया  गिल्ली  नहीं, पूरी एक लिंक बेस्ड साॅफ्टवेयर लगती जहां एक गड़बड़ हुई तो पूरे गिल्ली रूपी द्वीप पर उथल पुथल मच जाता।

स्कूल की आखिरी पिरीयड् है सो कंधे पर बस्ता भी है। छुट्टी की घंटी बजेगी तो बच्चे सीधे वहीं से अपने अपने घर को जाएंगे। जिम्मेदारी का यह भार गिल्ली ही उठा सकती है। जुकाम से परेशान गिल्ली के शरीर में इस वक्त कई सारी नसें तनी हुई दिखती है। सांस खींचती है तो माथे, गले सबकी नसें तन जाती है। वैसे अपनी गिल्ली है बड़ी जुझारू। आप देख रहे हैं न उसे ऊपर लिखी राइम्स पढ़ते वो भी पूरे भाव में। कैसे वो जब चब्बी चिक्स बोल रही है तो अपने स्पंजी गुलगुले गाल को तर्जनी और अंगूठे से पकड़ती है ! अब आप समझ गए होंगे कि इस राइम्स के लिए गिल्ली ही क्यों चुनी गई। तो कहना ये कि सारा का सारा क्यूटनेस गिल्ली में ही समा गया है और बहती नाक उसके इस कविता पाठ में चार चार चांद लगा रही है।

चोकलेट खाने के मामले में गिल्ली और उसके भाई में यह एक बेसिक सा फर्क है। उसके भाई में धैर्य नहीं है। वो टॉफी मुंह में रखते ही चबा डालता है। उसका वश चले तो रैपर सहित चाॅकलेट चबा ले लेकिन टीचर ने जब से बताया है कि रैपर पेट में गलता नहीं बल्कि वहां जम जाता है और आंतों का नुकसान करता है तब से वह इस आविष्कार में जुटा है कि वह बड़ा होकर ऐसी कंपनी खोलेगा जिसमें रैपर सहित चोकलेट खाने के थीम पर काम हो। हालांकि क्लास के अमीर बच्चे कहते हैं ऐसी चोकलेट भी होती है लेकिन वो महंगी है। उन बच्चों के इसी बात में उसके इस आविष्कार का उत्तर छिपा है। 


लेकिन इसके उलट गिल्ली में अपार धैर्य है। वो एक टॉफी को मनचाहे समय तक जुबान पर घुलाती है। उसे पता है तालु पर कितनी देर में पिघलेगी, कंठ पर रोके तो कितना समय लगेगा। जीभ के नीचे रख लिया जाए तो थोड़े देर तक पता नहीं चलेगा लेकिन लार अगर जमा किया जाए तो मीठा ही मिलेगा। गालों में दबा लेने से तो खैर किसी को पता ही नहीं लगना। हां लेकिन थोड़ी थोड़ी देर पर इधर से उधर ट्रांसफर करते रहना है। दांतों के बीच फंसा लेने का कोन्सेप्ट भी इसी प्रयास से आया था और जिस दिन से आया गिल्ली को अपने दो दांत कम होने का कोई मलाल नहीं।

अब इसी दृश्य में आगे चलते हैं। जब वो टीथ विद इन पर पहुंचती है तो भरसक कोशिश कर रही है कि उसके पूरे दांत नहीं दिखें। यहां टिथ विद इन पूरी तरह उसकी इस समझ से जुड़ा है कि यहां उसे अपने दांतों को दिखाना है और बचाना भी। पूरी तरह दिखाने से टीचर के नज़र में भी यह चीज़ आ जाएगी और डांट तो पड़ेगी ही। मोनिटर होकर सब बच्चों के सामने डांट खाना ! गिल्ली के लिए तौहीन है। अरे इज्जत है भाई उसकी! अपने रूतबे का पूरा ख्याल है उसे। अपनी सारी जिम्मेदारियों से वाकिफ है वो, आप ना समझाईए उसे। 

दांत दिखाने में भी दांत बचाना। दरअसल इस एक समस्या में उसके लिए आनंद भी छुपा है। दरअसल उसके जबड़े में दो दांत गायब हैं। सो वहां एक फांक है और इस क्लास में घुसने से पहले खाई गई इक्लीयर्स को बाकायदा उपयुक्त फ्रेम में ढ़ाल कर वहां बिठाया गया है ताकि जब तब वहां जीभ फिरा कर टॉफी का अधिकतम आनंद लिया जा सके। 

गिल्ली का वश चले तो वह घुला कर ही पेट में की गई टॉफी को गाय भैसों की तरह फुर्सत से पेट में से वापस ला जुगाली किया करे। माफ कीजिए मैं जानता हूं यह कुछ ज्यादा हो गया लेकिन देर रात अक्सर मुस्कुराते हुए अपने बिस्तर पर गिल्ली ऐसी कल्पनाएं किया करती है।

तो मुंह बना बना कर उपयुक्त से ज्यादा हाव भाव के साथ वह यह राइम्स का अभ्यास कर रही है। अगर वह बड़ी होती तो आप ओवर एक्टिंग कह देते लेकिन उस पर तो मासूमियत का नूर है। देख नहीं रहे हैं कैसे कर्ली हेयर पर वह अपने बालों को उंगली में लपेट कर अपने गालों पर ले आती है। और वेरी फेयर पर अपने आप को पूरे दस में दस मार्क्स वाला परफेक्ट का एक्सप्रेशन देती है। लवली टू पर आते ही वह अपने आप को ही फलाईंग किस देती है। और इन सब के बीच आंखें द्रुत गति से इधर उधर, जाने किधर किधर भागती रहती है। अपने ही जगह पर वह गोल गोल काली, भागती आंखें कितनी जीवंत है! फैलाव से से सिकुड़न तक, अभाव से उदारता तक, गुरूर से मासूमियत तक सब यहीं और इसी में है।

आईए, हम भी दर्शक  दीर्घा में बैठ उसकी इस तरह राइम्स पढ़ने की ट्रीटमेंट पर उम्माह कर फलाईंग किस भेजें। क्योंकि खुदा तो इधरईच है उधर नहीं जहां हम जबरदस्ती खोज रहे हैं।

Wednesday, February 8, 2012

काले धुंआ सा तवील तहरीर है ज़हन में, हम अपना अहवाल कुछ यूँ बयां करेंगे




पूरे तीन बरस से बिस्तर पर सो रही है कविता । उसका नींद में होना यों भी थोड़ा अल्हड़ सा लगता। लटें बेतरतीब होकर यहां वहां फैल गए हैं । एक गुच्छा बायीं पलक में फंसा रहा। सोते सोते कभी कभी उसकी पलकें थरथरातीं, मुझे उसके आंख अब खोल देने का भ्रम होता। कई बार ऐसा भी दिल हुआ कि मैं अपने होंठ उसके चांद जैसे माथे पर रख दूं ताकि प्यार और दुआ का यह एहसास त्वचा उसके मस्तिष्क को संप्रेषित करे। कविता नींद में कितनी सुदंर लगती है। हां, कपड़े ज़रा बहके हुए हो जाते हैं जो कि होना भी चाहिए। तभी अपने शानदार और गरिमामयी व्यक्तित्व एक लापरवाही अंदाज़ में लिपटा नज़र आ आपको खूब आकर्षित करता है। तो कविता जो कि एक बेहद सुंदर देहयष्टि काया वाली लड़की जो मेरे अंदर करीब करीब औरत भी बन चुकने हो है अब इस अंदाज़ से सोई है कि उसके कंधे पर की  गाउन की किनारी ज़रा खिसक गई है और उसे ब्रा के स्ट्रेप्स भी उसके बदन पर नींद में ऊंघता सा है।

मैंने उसके सोने की अदा के एक एक फ्रेम को अपनी आंखों में संजोया है।  मगर वो गरहोश सोती रही। नींद कितनी भयंकर आई कि जिस करवट लेती फिर बेहोश हो जाती। मैं फिर से पास जाता हूं। मेरी छाया उसको ढंकती है। मैं उसकी सांसों के पास कान लगा कर ज़रा सुनने की कोशिश करता हूं। कुछ फर्र-फर्र की सी आवाज़ आ रही है। खर्राटा नहीं लेकिन एक ज़रा सी खरखराहट। फरवरी की ठंडी सुबह है। धूप में तो गर्मी है लेकिन हवा में ठंडक है। गला ज़रा-ज़रा फंस रहा है कविता का। नाक से सुबकन आती है। हल्की जुकाम जैसी आवाज़ है, लोच भरी। शायद मौसम का असर है। उसे चादर मुंह पर रख कर सोना पसंद नहीं।

मुझे लग रहा है जैसे अब वह जग जाएगी। ऐसा लगता है जैसे उसकी इंद्रियां अब जाग चुकी है और बचपना शेष होने के कारण वो बस अब वो अंठा कर पड़ी हो। बदन में हरकत भी जल्दी जल्दी होने लगी है। बस किसी भी पल अब आंखें खोल देगी, बार्बी डाॅल की तरह। इस ख्याल भर से ही मेरे दिल की धड़कन तेज़ हुई जा रही है कि कैसा होगा वो पल जैसे ही उसकी आंखें खुलेंगी ! जिसे तीन बरस किसी वैज्ञानिक के होते शोध की तरह मैंने सोते देखा, क्या उस एक क्षण में मुझे मारे खुशी के हार्ट अटैक नहीं आ जाएगा? अचानक से मेरा शरीर झूठा पड़ने लगा है। इस वक्त अगर मुझ पर कोई डंडे भी बरसाए तो मुझे कोई अहसास नहीं होगा, हां चोट का इल्म और निशान क्रमशः एक-आध घंटे बाद (तकरीबन) होगी।

कहीं वो उठेगी तो बिस्तर छोड़ने से पहले मेरे गले में दोनों हाथ डाल बिस्तर के उतारने का जिद तो नहीं करेगी ? और अगर उठाया तो मेरे नाक में उसके बालों की एक तीखी प्राकृतिक गंध होगी, जैसे औषधि के जंगल में चेतनायुक्त जुगनू उड़ रहा हो, ऐसी कल्पनामात्र से ही मैं सिहर उठता हूं। थोड़ी और अपनी हदें तोड़ूं तो कविता मेरे ऊपर होगी और उसकी देह से उठती एक मादक मादा गंध मुझे जाने कहां बहा ले जाएगी। मैं उसके साथ शायद रोमांस करना चाहता हूं और करूंगा भी पर उसके होशमंद होने पर, पर यह तय रहा नींद में उसे सिर्फ निहारूंगा, उसके जगने का इंतज़ार करूंगा।

कविता यह सुन कितनी खुश होगी जब तुम यह बताओगे कि कल गिलानी ने कहा कि हमारा देश अब एक और युद्ध नहीं झेल सकता। तो क्या अब पाकिस्तान सचमुच कश्मीर की जिद छोड़ देगा ? 

कितना कुछ तो मैंने सोच रखा है उसे बताने को कि इस दौरान क्या कुछ हुआ। ईमान के पक्के मुसलमानों ने पांचों वक्त का नमाज़ रोज़ पढ़ा, सियासतदां ने वक्त की नज़ाकत देख ताज़े वायदे किए, चुनाव को नजदीक आता देख विधानसभा में सामूहिक बलात्कार का वीडियो देखने वाले दोनों मंत्रियों से इस्तीफे भी दिलवाए गए। कविता को यह भी बताऊंगा कि लोग तुमसे अभी भी प्यार तो बहुत करते हैं लेकिन तुम्हारे होने के मकसद को अपना कर चलने से और भी दूर होते जा रहे हैं। शायद यह सुन कविता को अफसोस होगा जब वह जानेगी कि हिन्दी लेखकों की हालत बुरी है और वो सिर्फ छिनाल प्रकरण पर अपनी बेबाक और दिली राय विभिन्न अकादमियों में अपना हित अनहित देख रखते हैं। अन्ना आंदोलन मुंबई में असफल हो गया क्योंकि किसी ने फेसबुक पर यह चेताया कि भाग लेने वाले को जेल हो सकती है और इससे उनके करियर पर असर हो सकता है। सुख सुविधाओं का भोगी युवा, नित अनुभव और ज्ञान से भरता जाता बुद्धिजीवी और मौकापरस्त मीडिया सभी पैकेजबेस्ड दुनिया तैयार कर रहे हैं। इसी तर्ज पर बगावत को हवा देने वाले लेखक जो प्रेरणा हो सकते थे वे भी जयपुर से भाग निकले। कविता यह जानकर कितनी दुखी होगी कि लोग उससे ऊर्जा बस अब योग की तरह ही स्वहित में ले रहे हैं। 

पर सागर मियां इन सब के बाद कविता एक प्याली चाय के बाद जब मेरे मंुह से अपनी  खूबसूरती की तारीफ सुनेगी तो अपने रूई जैसे उंगलियों से मेरे बाल बिगाड़ कर अपनी आंखों में तैरती शरमाहट लिए यह भी तो कहेगी कि चल अब काम पर चलते हैं।

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