Thursday, March 22, 2012

बक रहा हूँ जुनूं में क्या क्या कुछ, कुछ ना समझे खुदा करे कोई


सुख था। इतना कि लोग सुखरोग कहने लगे थे। उन सुखों को हाय लग गई। सुख था जब पापा प्रेस से चार बजे सुबह लौटते थे और मैं जागता हुआ, पापा और अखबार दोनों का इंतज़ार कर रहा होता था। सुबह सात बजे जब प्रसाद अंकल अपने गेट से अखबार उठाते हुए कहते - पता है सागर, आज के अखबार से ताज़ी कोई खबर और कल के अखबार से पुराना कोई अखबार नहीं, तो मेरे अंदर उनसे भी तीन घंटे पहले अखबार पढ़ जाने का सुख था। रात भर की जिज्ञासा के बाद दोस्तों को सबसे पहले शारजाह में सचिन का अपने जन्मदिन पर 143 रन बनाए जाने के समाचार सुनाने का सुख था। 

सुख था कि मुहल्ले में मृदुला द्विवेदी के आए सात महीने हो गए थे और संवाद कायम के तमाम रास्ते नाकाम रहे थे तो अचानक एक सुबह द्विवेदी अंकल ने साहबजादी को मैट्रिक के सेंटर पर उसे साथ ले जाने को कहना, आश्चर्यजनक रूप से एक अप्रत्याशित सुख था। पापा का अपने अनुभव से यह कहना कि दुख नैसर्गिक है और लिखा है यह मान कर चलो और यदि ऐसे में सुख मिले तो उसे भी घी लगी दुख समझना, पापा के रूंधे गले से घुटी घुटी दोशीज़ा आवाज़ को यूं अंर्तमन में तब सहेजना भी सुख था। आज भी जब अकेलेपन में जिंदगी के कैसेट की साइड बी लगाता हूं तो भूरी भूरी चमकीली रील यहीं फंसती है।

हाथ से बनाए हुए टेबल लैम्प का अपनी बुनियाद से बार बार ढ़लक कर लुढ़क जाना सुख था। विविध भारती को ख्याल कर तब मन में स्टूडियो कहां उभरता था? सिरहाने रेडियो रख दस बजे छायागीत वाला एंकर गले में कोहरा भर बोलता था, उसकी आवाज़ शीत वाली सुबह में कारों के शीशे पर की नमी सी लगती थी कि जिसके कशिश में आप अपनी मनचाही माशुका नाम लिख तो अभी चमकने लगेगा। कम जानने में उत्सुकतावश कल्पना करते रहना, सुख था।

देहरी बुहार कर भांसो उठाते वक्त दोस्त के ना आए हुए चार दिन बीत का अनकहा शिकायत सुख था। बालिग होते दिनों में आम के बौर को पेड़ से तोड़ अपने ही कलाई और गाल पर सहलाने में दिलीप कुमार और मधुबाला को याद करने कर स्पर्श को समझने का सुख था। मई महीने की निचाट धूल भरे आंधी के बीच बगीचे में सायकिल सीखने का सुख था।

हां सातवीं जमात में पढ़ता हमारा ग्रुप रसायनशास्त्र में कमज़ोर था जिसकी वजह से एक बार दसवीं जमात से हम पोटेशियम परमैगनेट का अणुसूत्र नहीं बता पाए थे, सो हार गए। सो अगले ही दिन बारहवीं की कोचिंग कर सिंदूर तक के अणुसूत्र रट जाना हुआ। तो इस तरह हर बात को दिल पर ले लेने और जान लगा देने का सुख था। 

बल्ला भांजते हुए स्वाभिमान देखने का सुख था। सुंदर के फेंके रिवर्स स्विंग गेंद को पांच खूबसूरत लैलाओं वाली छत पर रवाना करना सुख था। यदि मैच जीत जाने के बाद समोसे की दुकान पर विपक्षी टीम को बेइज्जत करना आनंद था तो किसी शाम हार कर अपमानित होना भी सुख था।

फूटते गले और लड़कियों का ख्याल आते ही पसीने पसीने हो जाने के दिनों में पड़ोस वाली आंटी का झुक कर उठने में हिम्मत कर पहली बार उनके उभार को देखना, पढ़ते वक्त प्रकार से विभिन्न कोण बनाते हुए उस उभार का बार बार उभरना, अपराध बोध से भर जाना, मन ही मन उनसे माफी मांगना और अपने को कभी माफ ना कर पाने का संकल्प करना। सरल रेखा खींचने की कोशिश में उसका वक्र हो जाना, अंर्तद्वंद्व से रात दिन यूं गुज़रना, सुख था। 

डरते डरते होर्रर फिल्मों को देख जाना, सुख था। डरना, और फिर एक डरावनी फिल्म देखने की ईच्छा होना, सुख था। दादी को उल जूलूल तरीकों से कहानी को नया मोड़ देना, जितना वो सुनाए उसमें अपनी कल्पना की नमक मिर्च लगा कर और बढ़ा चढ़ा कर सोचना, सुख था।

सुख था कि बहुत सारी चीज़ों से अंजान थे और पहली बार गुज़र रहे थे सो उसका रद्दो अमल भी कंवारा था।

गांव में पापा की चिठ्ठी में अपनी जज्बाती शैली में सबसे पहला, दिखने में अधूरा मगर पूरा, चिरंजीव सागर पढ़ना, सुख था। सुख था कि गुलाबों के कलमें लगाना आता था। देर से आने पर की डांट थी, कहीं ना जाने की हांक थी, ये अधिकार सुख था।

आज सुख महज सुविधा का पर्यायवाची शब्द है। आॅनलाइन पैसे ट्रांसफर की सुविधा सुख है। बस स्टाॅप के ठीक सामने मेट्रो के होने की सुविधा, सुख है। भौतिकवाद और पूंजीवाद ने सुख की परिभाषा से खिलवाड़ कर लिया है। शब्दों में हेर फेर हो गया है। सुविधा से सुख को रिप्लेस कर दिया है।

दफ्तर से निकलने के बाद सारे रास्ते खुले हैं मगर कहीं जाने का दिल नहीं होता। घर में कैद रहते थे तो बड़ा जोश रहता था अब आज़ाद हैं तो हमेशा थके थके रहते हैं। अतीत में लौटने का रास्ता सिर्फ यादों में ही सीमित है। रेडियो था तो मन टीवी के लिए ललकता था अब कम्पयूटर है मगर स्विच आॅन करने से चिढ़न होती है। 

शराब है, मगर कच्ची भांग का सुख था। कि अपनी गली के लौटते रास्तों में महुए की गंध है, रबड़ के पेड़ों से टपकते कच्चे गाढ़े दूध का टप टप गिरना है, पैरों में कई बनैले लिपटती झाडि़यां हैं, मदहोश कर देने वाली गंध है कि  चौखट से पहले ही रास्तों को याद कर होश खोया जाता हूं।

हिचकियां आती हैं मगर सांस रूकती नहीं


 *****
[एकदम इरादतन. पर हमारा दोष नहीं. नीरा के लिखे ने उकसाया. आभार उनका. ऐसी चीजों को लिखना और याद करना भी तो शिकायत श्रृंखला 'काहे को ब्याहे बिदेस' श्रेणी के  अंतर्गत ही तो आता है. ऐसी शिकायत करते हुए हम भी स्त्री में बदल जाते हैं और ईश्वर से यही कहते हैं - 'काहे को ब्याहे बिदेस' ]

Monday, March 12, 2012

रूठ कर गया है जो बच्चा अभी अभी



दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक ज़ाऊँ उन को दिखला दूँ 

उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूंचकां अपना 

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे 
बेसबब हुआ "ग़ालिब" दुश्मन आसमां अपना

***
बू-ए-गुल, नाला-ए-दिल, दूद-ए-चिराग-ए-मेहफ़िल 
जो तेरी बज़्म से निकला सो परेशाँ निकला. ----- चचा

*****




उंगलियों से उनका नाम दीवार पर लिखते रहे और दीवार था कि खुद उनका आशिक था। जिसकी दुआ थी बुत से इन्सा में बदल कर सांस लूं वो बस इक मेरा नाम लिखने से आमीन हुआ। लिखा जिनके नाम खत सुब्हों शाम सागर, वो खुद ही सोचा किये मेरे यार के मुताल्लिक। इश्क की पेंचदार गलियां हैं, किसी के हो जाने से पहले जिनसे कुर्बत की तमन्ना थी वो फिदा होने के बाद जि़ना कर गया। कहां सर फोड़े और अपनी जज्बातों की रूई धुना करें, आईए कहीं ज़ार ज़ार बैठ रोएं, दारू पिएं। पीएं के यह भी तय था हमने नहीं चाहा था। जो चाहा था वो भी अपना होना कब तय था। गर जिंदगी मुहब्बत है तो इसकी कोई वसीयत नहीं होती। अगर यह नफरत ही है तो इसका अंजाम मुझको मालूम है। नुक्श तो जहान में है काफिर फिर क्यों सोचता है सर खुजाते हुए आखिर। दिल उसी पर आया किया जो किसी और के हो चुके और जो बचे हैं उनके लब पर हां की कोई डाली नहीं झुकती। किस किस को दिल दिखाएं औ, फिर क्यूं दुखाएं, सबने दांत लगाए हैं खूं से लबरेज उस सेब में आखिर। हर सिम्त मगरिब है अपने हां, क्या करेंगे हम अपना अच्छे बनकर। अब क्या करोगे मिरे शदीद प्यास के किस्से सुनकर, लाजि़म ही था अशर्फी के बदले भी मुहब्बत का ना मिलना। 

सागर कहां बैठ कर मर्सिया पढ़ें आज की रात]  एक शम्मा जलाओ औ' रूह खाक कर दो। खुदाया होता ऐसा भी कि चिरागों को जलाने पर भी अंधेरा होता। दिल ही था मायूस तो उसका भी दिल रह जाता। तूने पूरा पूरा कुछ भी नहीं बनाया, मिला करता है हर कोई मुझे अधूरा क्यों। लेट कर देर तक छतों को तका करते हैं, मायूस हैं इंसानों की गुमां मिले हदों को लेकर। हमारे नाम भी कर दे निज़ाम कोई पेंशन की सहूलियत, कोहसारों से हम भी पर्चे उड़ाया करें। क्यों करें दुनियां को बदलने की दुआ अब सागर, जब अपना हां कुछ भी न रहा तो सामान समेटे चलिए। क्यों हाय हाय करें और किसके लिए करें, रोती है मेरी गली में इफ्तिखार की अम्मा भी। 

कहां हम प्यार उड़ेलें अपने दिल का बेशुमार। एक ही इश्क था और महबूबा पराई हुई। रोटी ही नहीं है अब मसला जिंदगी में, आज़ादी के बाद दिल ज्यादा ज़हीन हुआ।

फिकरा ही कसा है ये होशो हवाश में, महज़ मतला है पूरी गज़ल है अभी औंधी पड़ी हुई। 

Monday, March 5, 2012

इतिहास पलटो नदी का जहां खड़े हो कभी वहीँ से बहा करती थी



मुझे लगता है हमारे प्यार में अब वो स्थिति आ चुकी है जब मैं तुम्हें उस पुल पर बुला, बिना कुछ कहे ईशारा मात्र करूंगा और तुम वोल्गा में छलांग लगा दोगी। अरी पगली! जितनी सीधी तुम थी उतने हम कहां थे। तुम प्रेम जीने लगी थी और मैं प्रेम खेलने लगा था। सकर्स के किसी कुशल खिलाड़ी की तरह मैं एक ही वक्त पर कई प्रेम को गेंद की तरह हवा में खिला रहा था। उन दिनों मेरा आत्मविश्वास देखते ही बनता था। तुम दायरे के बाहर से मुझे मंत्रमुग्ध होकर देखती रहती और मैं उन गेंदों के साथ सालसा कर रहा होता। सर्कस की नियमित परिधि को एक अलग दुनिया जो ठीक तुम्हारे सामानांतर चल रही होती उस पर मैं अपने काम में तल्लीनता से लगा होता। मुग्ध हो जाने को बस वही एकमात्र क्षण था जब मैं अपने कर्म में रत था। ठीक निराला की तरह जब वह पत्थर तोड़ रही थी कवि उस पर मुग्ध था। वो पत्थरों को आकार दे रही थी और कविता का आधार रच रही थी, उधर वो कवि उस पर मुग्ध था। उस मुग्धता में भी जाने उसने अपनी कौन सी इंद्रिय बचा रखी थी जो उसके दर्द की परतें उधेड़ता है। मैं भी वही था एक कर्मयोगी सा चेहरा जिससे तुम प्यार कर बैठी थी, था तो आखिर वो आदमी का ही चेहरा। और जब भी वो अपने कर्म से विरत होता एक आदमी में तब्दील हो जाता। 

औरतें मुझसे संभलती नहीं और उनका अंबार लगा है। सोचता हूं बाढ़ के इन दिनों से इतर क्या जीवन में वो दिन भी आएगा जब मैं इनके लिए बिल्कुल ही तरस जाऊंगा ? 

सिंगल सिंगल नदियां अकेला अकेला आदमी लगता है। नदियों को जोड़ देना चाहिए। तभी तुम्हें ना वोल्गा होने का अधूरापन होगा ना मुझे अमेजन होने पर अपनी भरपूरता का एहसास का भ्रम। रानी, तुम दुबली, पतली, सीमित होते हुए भी एक कल्चर हो मैं भरा पूरा फैला - एक बर्बर आदिम जाति। 

अगर जीवन एक तलाश है तो वोल्गा में कूद पड़ने से पहले तक जो तुम्हारी पलकें अब बूढ़ी हो चली हैं, तुम अपने पैरों में मेंहदी लगा कर आई हो। वो मेंहदी जो अभी तक गीली-हरी हैं, तुमने अपने स्कर्ट को अपने पैरों से सटने नहीं दिया है। 

तुम मेरे प्यार में जान दे रही हो तो कायदे से तो सफेद पलकें अब फिर से हरी हो जानी चाहिए लेकिन मर जाने के बाद हमारी उम्र घट नहीं जाती। एक काम तो करो ही तुम कूद पड़ो लेकिन मेरी तलाश अभी पूरी नहीं हुई है रानी। लेकिन इत्मीनान रखना ही मैं भी कभी न कभी किसी न किसी के आंखों से ही मारा जाऊंगा। दुनिया ऐसे ही चल रही है, चलेगी। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि तुम प्रेम में सिद्धस्त खिलाड़ी के प्रेम पाश में मर मिटोगी और मैं इस स्वाद से बिल्कुल बेखबर, एकदम अल्हड़ लड़की पर फिदा हो जाऊंगा। तुम स्त्रियां हमेशा उच्च कोटि के चीज़ तलाशती हो अगर नहीं मिलता है तो कमियों से भरे बुत को तराशती हो लेकिन हम डूबेंगे उसी लड़की के भंवर में जो चाक के सामने बैठी हो, जिसकी उंगलियां गीली मिट्टी में लिथड़ी हो, वो भी अपने कर्म में रत हो, सामने की एक लट गालों पर झूल रही हो और बाल का एक टुकड़ा गीली मिट्टी में सन जाए। इन सब के बीच हल्की हवा उसके जांघों पर की फ्राॅक छेड़ जाती हो।

मैंने उस दिन कूदने के लिए इस तरह का ही कोई दृश्य अपनी आंखों में सजा रखी है। प्रेम का खेल खेलते खेलते अब मैं उस स्तर पर पहुंच चुका हूं जहां अब अगर कोई मेरे लिए कोई बड़ा से बड़ा त्याग करता है, मैं खुद ही उसकी हत्या कर देता हूं या जान देता है तो मुझ पर अब कोई असर नहीं होता। हमें ऐसे ही जाना है रानी। तुम मेरे प्रेम में तृप्त हो कूद रही हो मैं भी किसी न किसी के प्यार में आत्म विसर्जन कर लूंगा।

इसी तरह सबका जीवन जाया होगा और किसी का भी जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। जि़ंदगी को लेकर हमारे ऊहापोह तो देखो रानी कि जो है उसी में हर बार नई नज़र तलाशते रहते हैं।

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