Monday, May 28, 2012

सुन दर्जी! तेरे सिले कपड़ों की फिटिंग सही नहीं आती।



सूरज की तरफ पीठ किए मैं एक पूरा-पूरा दिन तुम्हें सोचता रहता हूं। ऐसा लगता है तुम पीछे कुछ दूरी पर बैठी मुझे लगातार देख रही हो। तुम्हारी आंखों की नज़र मेरी गर्दन पर एकटक चुभा हुआ है। इस गड़ने वाली नज़र से जो गर्मी निकलती है उससे मेरी कनपटी, गर्दन, कंधे और पीठ में अकड़न शुरू हो जाती है। इन जगहों के नसों में झुरझुरी होने लगती है। किसी रहस्यमयी सिनेमा में तनाव के समान तुम्हारा ख्याल हावी होता जाता है और मैं धूप में कांपने लगता हूं। प्यार में आदमी कहीं नहीं जाता। वहीं रहता है सदियों तलक। तुमने आज सुबह सुबह पिछले साल क्रिसमस की जो तस्वीर भेजी है, गोवा 2011 के नाम से सेव है। मैं यहां बैठा बैठा भी 2011 का ख्याल नहीं कर पाता। हालत किसी जख्मी परिंदे जैसा है जो भूलवश किसी गुंबद के अवशेष में आ गया है और अब चोटिल हो चारों दीवारों पर अपने पंजे मार कांय कांय किया करता है।


XXXXX

प्रचंड गर्मी में सर पर जो थका हुआ पंखा अपने पूरे वेग से घूमता है जिसे कैमरे की नज़र से स्लो मोशन में घूमता नज़र आता है, वो भी सन्नाटा नहीं काट पाता। बाहर का तो क्या अंदर का सन्नाटा पूरा महफूज रहता है। कोई यकीन करेगा इस सिलकाॅन वैली में शहर के बीचोबीच ऐसी जगह भी जहां एक लड़की कुछ कमरों में बेहिसाब तनहाई में रेंगती रहती है। सच रसूल मियां मैंने सोचा था कि वो बहुत खुशमिज़ाज दिखेगी लेकिन वो तो किसी असायलम में मंदबुद्धि बच्चे (बच्ची भी नहीं) सा दिखी। हालांकि उसके चश्मे का पाॅवर बहुत अधिक है और दिखता होगा उसे पूरे चश्मे से ही लेकिन मुझे तो लगा जैसे इसमें भी किसी खास कोण या बिंदु पर आने वाले वस्तु ही उसे नज़र आती है। या फिर दृश्यों की भूखी वो अपने तरीके से चीज़ों को देखने का तरीका ईजाद किए हुए है। मुझे लगता है कभी कभी वो अपने गैलरी में घिसटती होती और अपने जांघों पर चाकू घोंप उससे रेत का समंदर निकालती होगी।

XXXXX


कमरे में हवा तक फ्रीज है। सन्नाटे के एक-एक शोर को कांच के मर्तबान में रख दिया गया है। गुमां होता है जैसे उसने इसे लेमिनेट करवा रखा है। टेपरिकाॅर्डर से कुछ संगीत के कतरे बहते हैं। एक-एक आवाज़ टूटी हुई है जिनमें समझ में न आने वाली धुनें हैं, आलाप है। भाषा अलग है, गुहार वही है जो हर बार किसी लेखक/निर्देशक/कवि/अभिनेता/पेंटर/चित्रकार के दिल के दिल में हर रचना के बाद बच जाती है। एक अमिट प्यास, जो उकेर कर भी रह गई जैसे मर कर भी बच गए। वही खालीपन, सूनेपन और तकलीफ का अथाह समंदर। खेती वाले इलाके में जहां रात भर कुंए से सिंचाई होती है। सुबह तक कुंआ खाली हो जाता है, जलस्तर इतना घट जाता है कि दस-पंद्रह बाल्टी उजले गीले रेत भर दिखते हैं। मगर बारह घंटे बाद ही कुंआ फिर से लबालब ! धरती से सीधे जुड़े उस जलस्तर जैसा ही है अपनी तकलीफ जो हर उत्सव के बाद दोगुने वेग से बढ़ती है।

दिल से निकलती हूक का अनुवाद दिल कर ही लेता है। शुक्र है खुदा ने विरह की कोई जात नहीं बनाई। दुःख और दर्द किसी ट्रांशलेशन के मुहताज नहीं। चेहरे और आवाज़ के भाव इन सब को जीत लेता है। इस पहर आवाज़ वायलिन की पार पर चढ़ उसके माथे से अपना माथा, कंधे से कंधे, सीना से सीना, नाभि से नाभि, कमर से कमर से अपनी कमर, जांघ से जांघ, घुटने से घुटना, और अंगूठे से अंगूठा मिलाकर आदमकद रूप में सहवास करती है। यही वह समय है जब आवाज़ का दर्द इतना तीक्ष्ण हो जाता है जैसे हर लम्हा जीना नागवार गुज़रने लगता है। हर संस्कृति में प्रेम उतना ही तड़पाता है जैसे नुकीली और कसी चोली वाली किसी औरत के हाथ पीछे बंधे हों और वो बारिश में अपनी ऐडि़यां रगड़ती हो।

जो कालखंड संगीत के उस करते में बजता है वही मन में घटता है। कोई है जो मुझे मेरी जिंदगी के स्क्रिप्ट नैरेट करके कुछ यूं सुनाता है-

हम दिखाते हैं कि आपका दिल आपके फेफड़े से निकल कर किसी रेलवे लाइन की पटरी के ठीक बगल में गिरा हुआ है। दूर दूर तक कोई स्टेशन नहीं है और शताब्दी एक्सप्रेस रास्ता क्लियर पा पूरे वेग से गुज़र रही है। आपका दिल जो खून में नहाया है और पूंछ कटी छिपकली के समान डमरू की भांति बज रहा है। दिल अपनी एक आंख से पटरी पर का शोर सुनता है। अंधरे को चीरती हुए गाड़ी के डिब्बे दर डब्बे गुज़र रहे हैं। हर डब्बे के खत्म होने और दूसरे के शुरू होने के बीच का अंतराल हावी है। लगता है कोई परदा बीचों बीच चीड़ा जा रहा हो।

ब्लैक आउट

/कट टू /

हम दिखाते हैं कि किसी खेत में बरसात का थोड़ा सा पानी ढ़लान वाले कोने की तरफ जमी हुई है। मुहसर बच्चे मछली मार कर जा चुके हैं लेकिन उसे बचे हुए पानी में कुछ बच गई मछलियां अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं। हम यह दिखाते हैं कि हर बार अलग अलग मछली अपनी सतह छोड़ ऊपर तक आती है और नीचे इंतज़ार करता बचे हुए मछलियों का परिवार किसी बड़े इंतज़ार में परेशान है। फिलहाल ऊपर को आयी मछली तेजी से अपनी पूंछ पानी की सतह पर फेरती हुई नीचे लौटती है। पानी में हरकत होती है फिर एक बुलबुला उसमें धीरे धीरे गुम होता है।

ब्लैक आउट

/कट टू /

कोई औरत अपना ब्लाउज खुद सिलना शुरू करती है। दो हिस्सों को जोड़ते वक्त रूक कर सोचती है काश टूटे दिल भी इसी तरह जोड़े जा सकते! फिर जब उभारों का हिस्सा निकाल अलग करती है तो ख्याल आता है काश ! कोई हमें भी बे-दिल कर देता!
XXXXX

दिमाग सोचना बंद नहीं करता और दिल जज्बाती होना।

तो क्या बचे हुए का नाम जीवन है ? तो क्या जिंदगी का हासिल इंतज़ार है ? तो क्या फिर हमें कोई थपकियां देकर, लोरी सुना कर, सहला कर, पुचकार कोई सुला देगा या फिर भूख से रोते-रोते हमारे दिमाग की मांसपेशियों में आॅक्सीजन कम जाएगा तो हम खुद सो जाएंगे।

(डायरी अंश)

Saturday, May 26, 2012

बालिग़ सिर्फ उम्र से ही नहीं हो रहे थे



क्या करूं उम्म... उससे पैसे मांगू या नहीं ?

कपिल से तो ले नहीं सकता। उसकी खुद की हज़ार समस्याएं हैं। गौतम दे सकता है लेकिन देगा नहीं। सुनीती आज देगी तो कल मांगने लगेगी। अविनाश एक सौ देता है तो दो घंटे बाद खुद उसे डेढ़ सौ की जरूरत पड़ जाती है। सौमित्र के पास पान गुटके खाने के लिए तो पैसे जुट जाएंगे लेकिन मेरे मामले में वो लाचार है, जुगाड़ नहीं कर सकेगा। रोहित से कहूंगा कि पैसे चाहिए तो तुरंत नया बैट दिखा देगा कि अभी अभी छाबड़ा स्पोर्टस् से खरीद कर लाया हूं, मेरा बजट तो सोलह सौ का ही था लेकिन इसमें स्ट्रोक है और साथ ही हल्का भी सो पसंद भी यही आया इसके लिए चैबीस सौ का इंतजाम करना पड़ा। सो तुम्हें क्या तो दूंगा उल्टे आठ सौ रूपिया उधार ही लगवा के आया हूं।

घर के रिश्तेदारों में कौन दे सकता है उम्मम... संजन दीदी ! ना उसके अंटी से तो पैसे निकलते ही नहीं हैं। अंजन दीदी मुंह देखते ही अपना रोना रोने लगती है। उसके मन में यही डर बैठा रहता है कि कोई हमको देखते ही पैसे ना मांगना शुरू कर दे सो बेहतर है पहले मैं ही शुरू हो जाऊं। दिनेश भैया को मालूम है कि मुझे पैसे चाहिए सो वो आंख ही नहीं मिला रहे। थोड़ी जरूरत पर भी अब सब आदमीयता छोड़ रहे हैं। पैसे नहीं हैं या इंतजाम नहीं कर सकते तो आंख चुराना कैसा रास्ता है ?

घर में आधे से ज्यादा लोगों को पता है कि मुझे पैसों की सख्त जरूरत है। छोटकी चाची सामने ही नहीं पड़ रही। मुकंद भैया से तो बात नहीं होती फिर भी गिर कर उनसे बोलने... (गला सूखता है) गया तो अनसुना करते हुए आगे बढ़ गए। कहते हैं थाली नहीं लांघना चाहिए लेकिन मेरी बात सुनने से बचने के लिए सामने रखा परोसे हुए थाली तक लांघ के चल दिए।

संध्या मौसी दे सकती है क्या ? ना। सवाले नहीं उठता है। वो तो जले पर नमक छिड़कने लगेगी कि अभी अभी प्रशांत का पेरिस से गोवा तक का फ्लाईट कराना पड़ा। चालीस लग गए। बस इसी पर पलट के पूछ दूंगा कि चालीस हजार हैं आपके पास और साढ़े तीन सौ नहीं है ? तो बात का बतंगड़, मैं मुंहफट हूं, जाने क्या क्या करता रहता हूं, गलत आदत लगा ली है, कोई लड़की पटाई है, आवारगी बढ़ी हुई है, परसों रात आंख लाल देखे थे सिगरेट का चस्का लगा है। अरे नहीं है ये सब शौक पूरा करने का औकात तो आदत भी नहीं डालना चाहिए ना। अब हमसे पूछ कर तो लड़कीबाजी शुरू नहीं किया थे ना नवाब साहब! क्ुल मिला कर जो भी घर में नहीं जान रहा है जान जाएगा। चूहा बिल्ली तक को पता लग जाएगा। दे तो नहीं ही सकती है लेकिन चार आंगन तक बाजा जरूर बजा देगी। फिर चाचा मेरी खाल उतारेंगे सो अलग। ये और बात है कि फिर शाम को मन करेगा तो दो-तीन फिरोजी कलर की साड़ी के लिए भी पैसे निकल आएंगे। 

ऐसा नहीं है कि पैसे कोई दे नहीं सकता या किसी के पास है नहीं। बात यह है कि कोई देना नहीं चाहता। किससे मांगू मदद ? दुनिया साथ में हंस लेती है, बड़ी बड़ी बातें बना लेती है, घनिष्ठ मित्रता का गांठ जोड़ लेती है लेकिन मौका आया तो सब नदारद। जब मेरे पास थे मैंने किसको नहीं दिए थे। अपना बर्थ डे के पैसे भूल कर सन्नी की बहन तक के लिए केक लाया। आज सन्नी अपनी बहन से कहलवा रहा है कि कह देना तीन दिन के लिए सोनवर्षा गया है। डींग हांकने कहो तो पच-पच मधु थूकते हुए कहेगा कि दोस्त तू आधी रात में भी याद करेगा ना तो सबसे पहले खड़े दिखेंगे।

मचान पर का मुखिया दे सकता है लेकिन वो भी पहले यहां वहां छूऐगा। नकद वसूलेने से पहले तक सब जानेगा लौटा दूंगा तो किसी को नहीं बताएगा।

कितनी शर्मिंदगी हुई थी जब परसों शाम ढ़लान पर ट्यूशन सेंटर के सामने खड़े होकर एक बच्चे से पूछा - हमसे पढ़ लोगे, अच्छा पढ़ा देंगे (थूक निकगल कर) वो भी यहां से फीस से आधे पैसे में। गर्वनर का औलाद साला! मुंह देखते हुए निकल गया। क्या दुनिया है जहां फीस ज्यादा है वहां भीड़ है। पढ़ाई भी क्या होती है वहां पर एस एम एस का खेल होता है। बड़े बड़े गुब्बारे फुलाकर गंदे गंदे इशारे करते हैं।

हम ईमानदारी से दोगुना मेहनत करके पढ़ा देंगे तो ये प्रस्ताव नहीं भाया। आजकल होटल का भी यही हाल है लोग लाइन में लग कर महंगी चीज़ खरीदेंगे, उसके लिए टोकन लेकर उत्साहित खड़े रहेगे लेकिन वही चीज़ सामने सस्ते कीमत पर मिलेगी तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त की सस्ती है तो घटिया होगी। फिर रोना रोएंगे कि महंगाई हो गई है। हर चीज़ में आग लगी हुई है। कभी कभी तो लगता है जैसे दो लोग मौसम के बहाने बात करते हैं वैसे ही यह भी बातचीत करने का एक बड़ा मौंजू विषय है। लोग परेशान क्या होंगे मजे लेते हैं, क्यों नहीं ये महंगे होटल खत्म हो रहे हैं? उल्टे इनके नए नए ब्रांच दूसरे शहरों में खुल रहे हैं।

किसी को मेरी बात सुनने में दिलचस्पी नहीं हैं। पूरे घर के लोग शक की नज़र से देखते हैं। ज़रा सा सामान मिला नहीं कि चोरी का अंदेशा कर रहे हैं। ठीक है मुझे पैसे चाहिए इसका मतलब यह थोड़े है कि मैं अपने ही घर की चीज़ चुरा लूंगा। साहिल भैया ठीक हैं अपने ही घर में डकैती कर लेते हैं और इनको पता तक नहीं चलता। मैं भी कहूं ये रोज़ शाम को चाय समोसा कैसे मेंटेंन करते हैं ! कभी गेहूं पिसवाने निकले तो आधा किलो आटा बेच दिया कभी एक पाव दूध कम ले लिया। 

बहुत दिन तक ऐसा रहा तो घर छोड़ दूंगा। दुनिया भर के नौंवी पास लड़के काम करते हैं मैं भी कर लूंगा। आखिर कब तक यह व्यवहार बर्दाश्त करूंगा...

... लेकिन पैसे?
 अभी किससे मांगू ... कौन दे सकता है उम्म...

Monday, May 21, 2012

कटेगा बेतरतीब तो रहेगा मौलिक...





बड़ी अच्छी थी जवानी सागर। अच्छे बनने के चक्कर में खामखां मारे गए और अब देखो खरामा-खरामा हो गया। अरे कम से कम अपना नज़रिया तो था। माना एक संकीर्ण सोच वाले कांटी थे लेकिन दीवार के पक्केपन को गहरे ड्रिल तो करते थे। आज हालत ये है कि अच्छे बनने के फेर में अपने बुराईयों में शहंशाह की पदवी भी खो बैठे। कितने खोखले लगते हो, ओढ़ी हुई विनम्रता, अहिंसा और परिपक्व बुद्धि। तुम भी अमांयार क्या ठीक से बिगड़े नहीं थे जो सुधरने की गलती कर बैठे? अरे मेरी मानो गर्मी और आम दोनों का समय है। लाल मिर्च की बुकनी, कच्ची घानी सरसों तेल, धनिया की गर्दी आदि मिलाओ और अपने अच्छाई को मर्तबान में डाल उसका अचार बना लो। महीने में एक आध बार खा लेना। वैसे तुम्हारे लिए तो यह अचार भी नुकसानदायक है। यह मुहांसे और स्वप्नदोष के कारक और कारण हैं। 

चलो बिगड़ते हैं कि कुछ रूहों को वहीं सूकून मिलना है। याद है किसी संपादक ने तुम्हें तुम्हारी औकात बताते हुए कहा था कि तुम्हारे मरने की खबर देर रात के प्रादेशिक बुलेटिनों में भी नहीं होगी। बड़े बड़े नेताओं को तो हम तीन लाइन में निपटाते हैं। आह कितना सुंदर नापा था उसने मुझे। इससे तसल्लीबख्श मौत और क्या हो सकती है!

लो आ गए तेरी गलियों में फिर गर्क होने को हम
मौत तू भूखी इस कदर आ मेरी तरफ 
जैसे स्वीमिंग पूल में किसी भावी विश्वविजयी तैराक की बाहें 
पानी में डूबती निकलती आती है
आ लील ले मुझको इस कदर 
कि तेरी देह की जंगल के इक इक डाल पकड़ झूम लूं मैं

बेहतर बना मैं हर बार मरा मैं
कुचली गई आत्मा मेरी, कई उम्मीदों ने अनचाहा गर्भ दिया।
बुरा बना हूं, सहमति से संभोग हुआ। 
मैं जिया, संतुष्ट हुआ।

चल निकाल दे तलवे से कांटा अब बबूल का। हर पग पे चुभन, देख तो कैसा पिलपिला हो गया है!

Friday, May 18, 2012

उड़े उकाब, लटके चमगादड़ नतीजा सिफ़र




फिर बुखार...!


बस उठ कर कुर्सी पर बैठा हूँ। बैठा कुर्सी पर हूँ लेकिन खुद को बिस्तर पर ही सजीव पा रहा हूँ। आखिर बीमार क्या है दिमाग या शरीर ? अभी-अभी ऐसे में उसे प्यार करके उठा हूँ।  बिस्तर की सलवट मेरी ही बूढ़ी झुर्रीदार, नर्म, सिकुड़ी हुयी त्वचा की तरह लग रही है। पैर में ताकत नहीं है, अंदर से खोखला महसूस कर रहा हूँ लेकिन अब भी उसे प्यार करने का मन है।



ढीली सी चादर ने उसे यूं लपेट रखा है कि उसका रंग और अल्हड़ सा हो आया है। ऐसा लगता है जैसे उसने अपने अंगों की खूबसूरती का दसवां हिस्सा चादर को दे दिया है और जबकि उसके और चादर के बीच कुछ नहीं है लेकिन खुद उसकी कमर ही कुछ अलंघ्य रेखाएं खींच रही है। चादर कोई प्यासा बेबस सा प्रेमी बन आया है जिसे उसकी कमर अपनी हिलारों से थोड़ा थोड़ा भिगो उसकी प्यास अपनी मर्जी से बुझाती है।


कैसी दो गोरी गुदाज़ बाँहें खुली हैं! आधी नींद में लरज़तीं, पास जाओ तो वो किसी दुधमुंहें बच्चे की तरह अंगूठा चूसने में लीन हो जायें। वो बाँहें और पैर मुझे ऐसे ही घेरते हैं। वो बाँहें जो अपने रौ में हों तो पूरे का पूरा मुझे ही लील जायें और यूं आधी कच्ची पक्की नींद में हों तो जिनका सौंदर्य अपने आकर्षण के चरम पर हो।



यह कैसी वासना है ? एक मिनट रूकिए, क्या यह वासना है ? आपको क्यों लगता है कि यह वासना है ? वासना होती तो दस मिनट बाद भी लिपटे रहने का मन नहीं होता। मेरी हालत तो तीसरे माले पर रस्सी से चढ़ते मनी प्लांट सी है जिसे छोड़ दो तो लगे अपनी ही रीढ़ की हड्डी से सीझे हुए मछली की तरह अलग हुआ है।



सच है माशूका, भारी हो आए सरसों तेल की तरह तुम्हारे तांबई पीठ पर फिसला हूं। गर्दन और कंधे के जोड़ पर हौले हौले मुक्के से वर्जिश कर तुम्हें मदहोश किया है। तुम्हारे बदन को मानचित्र मान मैं नाविक बन सोने चांदी से भरे द्वीप, नए नए प्रदेशों की खोज की है तो कभी चुनौती मान सैनिक की तरह उन पहाड़ों की चढ़ाई की है। इस दरम्यान जो फूंका है वो है अपना फेफड़ा, जो सुलगाया है वो है अपना होंठ। मैं तो खनिज संपन्न क्षेत्र में होठों से माचिस मारता बाकी आग गर्भ में दबी प्यास खुद ब खुद पकड़ लेती।



अब मैं कुर्सी पर बैठा हूँ और सलवट पड़ा यह बिस्तर अब भी किसी सक्रिय ज्वालामुखी सा धधक रहा है।
सूकून कहाँ है? जिसे देह में आदमी खोजता रहता है लेकिन वहाँ भी नहीं ठहर पाता, हमेशा के लिए टिक भी जाए तो कोई बात हो। वहाँ बार बार स्खलन के बाद फिर से प्यार करने को मन होना क्या बार बार मरकर जीने के मन जैसा नहीं होता।



अपनी जिंदगी की प्यास बुझाने में मैं भी खुद को ऐसा ही बेबस पाता हूँ।

Monday, May 14, 2012

एक ही रंग दिखाता है सात रंग भी


 सच बता निक्की, वो जानबूझ कर ऐसा करता होगा ना?

आखिर कितने दिन तुम किसी को अनदेखा कर सकती हो ? कभी, कभी तो, किसी भी पल, एक बार भी, थोड़ा सा भी, एक्को पैसा, एकदम रत्ती भर भी, कभी तो उसको लगता होगा कि हम उसके लिए मरे जा रहे हैं, क्या बार भी वो आंख भर के देख नहीं सकता है, और सबको तो देखता है, गली में शाम ढ़ले लाइन कटने पर बगल वाले बाउंड्री पर बैठ सबके साथ अंतराक्षरी खेलने का टाइम निकाल लेता है पर मेरे लिए समय नहीं है ! ऐसा कैसे हो सकता है यार?

साला बड़ा शाहरूख खान बना फिरता है। सिमरन ने पूछा - मेरी शादी में आओगे? बस आंख नचाकर बंदर सा मुंह बना कर कह दिया - उन्हूं और उल्टे कदम स्टाईल मार चलता बना। और हमलोग भी क्या फालतू चीज़ होते हैं यार ! यही इग्नोरेन्श पसंद आ जाता है कि साला सारी दुनिया के छोकरे बिछे रहते हैं, एक इशारा जिसे कर दूं तो शहर में चाकू निकल आए लेकिन हम हैं कि जो हमें हर्ट करेगा उसी से प्यार होगा।

अब उसी दिन की बात ले। बीच आंगन में मैं पानी का ग्लास दे रही हूं तो नहीं ले रहा। भाभी से लेगा, सुनीता से भी चाहे कोईयो और डोमिन, चमारिन रहे सबके हाथ से ले लेगा लेकिन हम देंगे तो नाह ! पहले तो आंख उठाके देखेगा तक नहीं, पैर और छाया से पहचान भी लेगा तो अब पियासे नहीं है, अभी अभी चाय पिए हैं दांत में लगेगा, पहले बड़े को पूछा जाता है, काकी को दो ना, जो दिन पड़ेगा उसी का व्रत लगा लेगा कि हम तो यह उपवास निराजली ही करते हैं। फिर सरक लेगा। हम कहते हैं निक्की कि भले पानी ना पिए पर ऐसे बहाने बनाता हुआ भी सामने बैठा रहे तो क्या चला चाएगा। लेकिन नहीं, हमारे सामने बहाने से भी बैठने का टाइम नहीं है ऐसे लुक्खागिरी करता रहेगा। हर समय शक्ल चोर जैसा बनाए रहेगा जैसे बस अभी अभी कोई कॉलर पकड़ लेगा।

एक दिन मंझले पापा वाले कमरे में मिल गया। था तो दिन ही, हम पलंग के नीचे से आलू निकाल कर निकले ही थे कि वो गाने गाते घुसा। एकदम से दोनों आमने सामने! मुंह ऐसा हो गया जैसे किसी का हत्या किया हो। अब बोलो ऐसे में क्या किसी से बात करें। लेकिन सारी गलती अपनी ही क्यों माने। मन ही दिमाग दौड़ाया कि घर में कौन हो सकता है। रंभा की मधुश्रावणी थी सो सब वहां गए थे, उसको भी याद आया। बस अब मसखरी शुरू। लगा हें हें हें हें करने। वो अपने में होता है तो उसपर कितना प्यार आता है यार! मजबूरी है उसकी भी, हमीं नहीं समझते। पर हम समझते तो हैं निक्की मेरा मन नहीं समझ पाता। मैं अपने मन को समझा नहीं पाती रे। रोटी बेलते बेलते रोना आ जाता है, और वो गोल नहीं हो पाता। जानता है कि रात का खाना मैं पकाती हूं, तारीफ एक दिन नहीं करेगा लेकिन किसी दिन नमक तेज़ पड़ा नहीं कि सबसे पहले चीखेगा। मुझसे नमक ज्यादा पड़ता नहीं उसी को सोच के रोती हूं उसी से सब्जी खारा लगता होगा। आदमी समझदार हो तो चूड़ी बजने की आवाज़ में बदलाव और नजरअंदाज़ करने के तरीके से भी पकड़ में आ जाता है।

सच निक्की इतना चूहा मर्द किसी की जि़ंदगी में नहीं होगा। अकेले में उसे कहीं भागने की जल्दी नहीं होती। गलती का एहसास तो उसको होता ही है, तभी सूनापन पाकर एक दिन गले लगाकर यूं भींचा कि मेरी बीच की सारी हड्डी बज गई। मेरा भी मन बावरा सा हो उठा दिल किया कि अपनी हथेली उसके गाल के नीचे रखूं लेकिन हिम्मत न कर पाई। इन लड़कों को कितना कुछ करने का मन होता है लेकिन देख हम कस कर उसकी कलाई भी पकड़ पाते। फिर मेरी आंखों में गहरे झांका जैसे कह रहा हो नज़रअंदाज़ करने के लिए कितनी ताकत चाहिए तू जानती है? फिर मेरे कंधे पर ब्रा के उल्टे हो आए स्ट्रेप्स में उंगली डाल उसे घिसते हुए और सीधा करते हुए बोला - "हमारा कहीं घर नहीं हो सकेगा। हम ऐसे ही मिलेंगे इसी दुनिया में कई अपनी छोटी छोटी दुनिया बनाकर।"

तू ही बोल निक्की, मैं कितने दिन हूं यहां रे ? मैं कहां मन लगाऊं ? जिस दिन एक नज़र देख लेता है उस दिन दूगने जोश से चापाकल का हैंडिल चलाती हूं पानी इतना गिरता है कि लगता है तिगुना जोर से वो हंसा है। और पानी भी कैसा... तो एकदम मीठा! उसे तो जाने कित्ते काम ! खेत खलिहान, अड्डा बगीचा, यार दोस्त, चौपाल-संगीत, सब जगह मिलेगा वो भी पूरी तसल्ली से... ऐसा खेल कैसे कर लेता है रे ? कैसे किया जाता है, और क्या मिलता है इससे ? लेकिन मेरी... मेरी तो दुनिया ही वही रे ! जितना वो उतनी मैं, फिर भी कैसे उसके कोई काम नहीं रूकते और मैं जैसे वहीं उसी से बंधी हूं। गाय हो गई हूं सारी परिधि उसी से बनती है । क्या करूं निक्की, क्या करूं आखिर मैं, ये बेगानापन बर्दाश्त नहीं होता मुझसे ? अपने हाथों जान से मार ही क्यों नहीं देता वो मुझे ?

(निक्की की ठुड्डी उठाकर नायिका पूछती है। रोना तेज़ होता है। एक सिसकारी उसमें और घुल रही होती है। धीरे-धीरे पूरा माहौल ही सुबकने लगता है।)

*****

अजीब-अजीब बीमारी हो गयी है मुझको भी
जिसमें ये याद भी शामिल है तुम्हें भूल गया हूँ.
हेयरबैंड पहन कर सोने लगा हूँ रातों में 
बाल अलबत्ता कोई समेटने नहीं आता.
आधी रात रेंग के चढ़ता है कोई लम्स
मुझे ये लगे कि कोई दूसरी है.
हर 'मूव ऑन' के बाद लगे कि वहीँ हैं अभी
तुम्हारी जुल्फों में गिरफ्तार, तुम्हारी बदन में गुम
जब भी वहम हुआ है कि 
चलो अच्छा है कि भूल गया तुमको
एक ही रंग दिखाता है सात रंग भी.

Saturday, May 12, 2012

बूंदाबांदी से केवाल मिट्टी फिसलन भरी हो गई है। संभलकर बाबू ! कमर चटख सकती है।



रात भर रोता रहा पानी। टंकी किसी मोटे शामियाने में कोई आदमकद अक्स छुपाता रहा। छत की छाती गीले जूते सी सूज गई। सीढि़यां बूंद बूंद कर अवसाद से भर गई। पानी काले कोलतार सा लेई की तरह लरज़ती रही। सुरंग के मुहाने पर पानी छन छन कर गिरता रहा। बीच रास्ते मैं पड़ा-पड़ा सड़क पर ख्याल करता रहा कि वो नहा रही है और केशों से होते हुए पानी भारी हो उसके कंधे भिगो रहे हैं। 
 
रेल की पटरियों के ब्लाउज के हूक किसी ने आज शाम ढ़ले खोले हैं। दिन भर उमस से अपने गंध में डूबी पटरियों के सीने से अब नर्म नर्म धुंआ उठ रहा है। मुसाफिर कहां रहा इत्ते दिन ! रोज मुझपर से गुज़रता रहा और मेरी ही सुध न रही। ये कौन सा शिकायत का लहज़ा लरजा है उसके सीने के बीच से ? जिसे सुन कर दोनों स्तनों के बीच की सिलाई उधेड़ कुछ हीरे छुपा देने का मन होता है उनमें। 
 
दोनों कोहनियों को पेट में चुभा कोई काला बच्चा रो रहा है। दूर रखी डबल रोटी की टोकरी भींग कर मांस का लोथड़ा बन गया है। वाह रे कुदरत! मुंह लगाओ अनाज और पानी साथ मिलेगा। 
 
रेल के डिब्बों पर बरस रहा है पानी। बीच की मांग फाड़े शायद कोई लड़का नहा रहा है। थर्ड ए सी वाली बोगी में खिड़की किनारे बैठी हैदराबादी लड़की मुस्कुराती है।
 
कारखाने से जल्दी छूटा है मोहना। गरजते बादल को देख कहता है मजदूरों को सुहाने दिन छुट्टी नहीं होनी चाहिए। लछमी की याद आती है। इस मुहल्ले का सोनार तो रोज़ ही सोने का भाव बढ़ा हुआ बताता है। दैब ही जाने अबकी बार मंडी में कैथा तर वाले खेत का साढ़े तीन क्विंटल सोना कौन से भाव बिका होगा!
 
शहर की मोबाइलों में रोमांटिक एस एम एस आने लगे हैं। निकिता देखती है इनबाॅक्स - दिल के पास रहने वाले उस छोटे से कपड़े को छत से उतार लो जानेमन, मेरी ही तरह भींग रहा होगा, साथ में एक स्माइली भी है।
 
याद के जंगल से कोई आदिवासी बच्चा गा कर अपने बाबा से पूछ रहा है -
रेलगाड़ी मा खीड़-खीड़ 
मोटरगाड़ी गूड़-गूड़ 
दा अचितन लोकम बागुम खाद-खाद
चीका ते होपेन बागुम तैनो मकान
अब बाबा अपनी रूंधी हुई आवाज़ में जवाब देते हैं - 
ओले ओ पढ़हा ते होंए गोमेन
चासा बासा ते होएं तोइनोमेन
गोगोदादा ते होंए खोटोएन
रींगा इते मारान बाबा तैनो मकान
रींगा इते मारान बाबा तैनो मकान
छत के गड्ढ़ों में जमे पानी थोड़ा थोड़ा अंदर जमी बर्फ सी खामोशी तोड़ रही है। पैर डालता हूं तो और पत्थर बन जाता हूं, यदि तलवों से उड़ा देता हूं याद बिखर जाती है। याद रक्तबीज है और मैं काली नहीं बन पाता। क्षण- क्षण में पैदा हुए प्रेत चारों तरफ अब नाच रहे हैं।
 
इंसान रेत है कई सदी से पानी पी रहा है फिर भी याद इतना रख पाता है कि बहुत प्यासा है।

हलाल



रात भर बकरा टातिये के साथ बंधा म्महें - म्महें करता रहा। प्लास्टिक की रस्सी से बंधे अपनी गर्दन दिन भर झुड़ाने की कोशिश करता रहाबकरा बेचने वाले ने खुद मुझे सलाह दी थी कि ऐसे सड़क पर घसीट कर ले जाने से कोमल गर्दन में निशान पड़ जाएंगे जो उसकी खराब तबीयत का बायस होगा। सो उसने खुद उसके खुर के बीच से रस्सी लेते हुए एक गांठ उसके पिछले बांए पैर में बांध दी। मैंने मालिक को उसके बाकी रह गए पैसे दिए और मैंने ले जाने के लिए जैसे ही रस्सी को झटका दिया, खींचा बकरे ने जोरदार बगावत कर दी। बकरे का मालिक जो कि अपने शर्ट का चार बटन खोले बैठा था और जिसके दांतों के बीच फांक में पान का कतरा अब भी फंसा था ऐसे में हंस रहा था। चूंकि मैं ऊंची जाति से आता हूं और वो मेरा देनदार रहा है सो वह मेरे सामने नीम की एक पतली सींक ले जोकि अमूमन खाने के बाद दांत में फंसे अनाज के टुकड़े को छुड़ाने के लिए किसी मुठ्ठा बनाकर छप्पड़ में टांगा जाता है वह उससे अपने कान की अंदर की सतह पर वो टुकड़ा घुमा सहलाने का आनंद ले रहा था। बकरा अब भी मुझसे अपरिचित की तरह व्यवहार कर रही थी। वह अपने चारों पैरों को फैलाकर जाने से इंकार कर रही थी। बकरा मालिक ने अबकी थोड़ा अपना रौब दिखाया और अपने बकरे  के माथे पर दो बार हाथ ठोक कर कहा - जो यानी जाओ। इस रस्म के बाद मैंने नई उम्मीद से फिर रस्सी खींची बकरी ने डरावनी डकार मारते हुए फिर इंकार में गर्दन झकटा। मुझे परेशान और खासी मशक्कत करते देख अबकी पहले थोड़ा हंसा और फिर गुस्से में भर कर उसका माथा ठोककर कहा - जाओ न रे बहनचोद ! जाओ! बकरे ने अपनी नर्म, गुदगुदी लगाते जीभ से मालिक का पैर एक बार फिर चाटा और चल पड़ा
पूरे रास्ते अब मुझे उसके लिए कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ी। आलम यह था कि सड़क पर हांकने की जरूरत ही नहीं थी। मेरे और उसके बीच रस्सी में कभी खिंचाव नहीं आया। बल्कि मैं तो बस नाम मात्र को डोरी पकड़े भर था और मेरे और बकरे के पैर के बीच की रस्सी माला की तरह नीचे की गोलाई लिए हुए थी जिसमें समझौता कहीं नहीं था। 
अपने घर के आंगन में जब मैं उसे लेकर दाखिल हुआ तो घर वालों के लिए एक नई दिलचस्पी का सामान था। बच्चे कौतुक से उसे देख हंस रहे थे। कोई पीठ पर हाथ फेरता कोई उसकी म्महें म्महें सुन कर हंसते हंसते दोहरा हो जाता। एक तुतलाते हुए बच्चे ने तो बाकायदा नकल तक उतारनी शुरू कर दी जो कोयल की तरह वाद प्रतिवाद के स्वर में थोड़ी देर कर चला। 
घर के बड़ों ने अनुमान लगाना शुरू किया। पंद्रह किलो तो निकल ही जाएगा। एक ने बीच में ही टोकते हुए याद दिलाया कि पंद्रह में तो दो- ढाई किलो बोटी और बेकार माल ही निकलेगा।
फैसला हुआ कि इसे हफ्ते भर बाद हलाल किया जाएगा। तब तक इसे सुबह शाम आधे आधे किलो नया गेहूं खिलाया जाए जिससे इसका शरीर भरे। ऐसे में एक ने अंदाजा लगाया कि तब शायद सत्रह से अठ्ठारह किलो तक मांस मिले।
एक बालिग हो रहे लड़के को इस काम पर लगाया गया कि उसे सूप में गेहूं और और लोटे में पानी दिया करे। साथ ही साथ केले के पत्ते काट कर दिया जाए पर सबसे पहले खूंटे में बांधा जाए। फिर खाली जगह में एक - सवा हाथ का लकड़ी का टुकड़ा ज़मीन पर रखा गया और बांस के बल्ले से जैसे जैसे ठोंका जाता और ज़मीन में पैठता गया। बकरा अब उससे बंधा था। 
एक हफ्ते बाद घर के पिछवाड़े एक जगह को पुराने छोटे बांस और जूट के बोरे से घेरा गया। हलाल करने को लेकर लोगों में बड़ा उत्साह था, लोगों ने निर्णय भी ले लिया था कि मैं फलाना फलाना हिस्सा लूंगा। कलेजी पर पहले ही मुहर लग चुकी थी। खबर मुहल्ले के डोम टोले तक भी पहंुच गई थी और वहां से एक बुढि़या आंतों को लेने के लिए वक्त से घंटे पहले ही आ कर बैठ गई थी।
बकरी को काटने को लेकर सबमें बड़ा उत्साह था। ये कोई वीरता भरा काम था। मसाला पीसने वाले सिल्ले पर तलवार नुमा बड़ा चाकू तेज़ किया गया। यह बलि नहीं था फिर भी कुशलता से एक झटके में हलाल करना तारीफ योग्य काम था। जिसने झटके के बजाए ज्यादा वक्त लिया वो ओछी नजर से देखा जाता था। संयोज कुछ ऐसा बना कि मुझे उतारा गया।
घर के बच्चे आंगन में कैद अपनी कल्पना से काम ले रहे थे। औरतें अपने काम में मशगूल थीं। मैं हंसिया लेकर बोरे से घिरे उस जगह में घुसा। दो लोग आए और उन्होंने बकरे को ज़मीन से उपर उल्टा लटकाया। उसका गला अब कपड़े की हल्का मोटा मुलायम रस्से सा लग रहा था जो एक और रस्से से बंधी खिंची थी। ताकीद की गई कि देर न की जाए जिससे बकरे का चिल्लाने का अंतराल जल्दी जल्दी हो। कोई वेग आया बिल्कुल एक झोंके की तरह और उसका सर अब अपने थुथनों से ज़मीन खोद रहा था। आंखें उल्टी हो गई थीं।

मैं खून में बिल्कुल सना हुआ बाहर निकला। खून के छींटे यू ं तो पूरे बदन पर था लेकिन वो एक जगह जो मुझे महसूस हो रहा था वो था जहां मैं चश्मा पहनता हूं तो जिस जगह मेरे नाक पर ऐनक ठहरती थी। यहां खून का यह कतरा दिखता भी था और तीन आयामों में बंट कर दिखता था। मैं चाहता था जल्द से जल्द अपनी कोहनी लगा कर इस कतरे को पोंछ डालूं। 

मुझे सब इकठ्ठा करने में कुल दो से ढ़ाई घंटे लग गए थे। यह पहली बार था जब मैंने खुद को मारा था और मेरी कंुआरी आंखों की झिल्ली एकदम से फट पड़ी थी और तब से मैं एक पेशेवर हलाकू हूं।

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...