Friday, July 27, 2012

चांदी की पतली तार फंसी गर्दन में... बौखलाया सिंह भागता जंगल में...





थरथराती पलकों की अजब बेबसी है। इनमें माज़ी का कोई पैकर फंसा है। कुछ इस तरह कि किसी बच्चे की पतंग किसी झाड़ी के झुटपुटे में फंसना लगे। नदी के इस पार बड़े से गुलाबी गेंद का उफक से नदी में गिर जाना लगे। हिचकी लेती उन पलकों में फंसा पैकर जीभ के लिए किस कदर अकेला ठौर कि जबड़ों में कहीं अटके इलाइची के छिलके को जीभ की नोंक से उसका पता लगाना। बार बार मिलना फिर खोजना मगर उंगलियों से टटोलना तो कहां फंसा है यह सही सही पता न लगना। बालिग होते किसी बच्चे का बिजली के तारों के बीच फंसी पतंग, खिड़ - खिड़ करती, फट जाती। बाजार से हर बार गुज़रता और हरसत से उस पतंग को तकना। आज़ाद करने की तमन्ना जैसे कैद में कोई राजकुमारी। 

पूरा पतंग जैसे तुम्हारा चेहरा। पुकारने को लब, आंखे - पुकारने को लबे दरिया। मगर हकीकत में बड़े बड़े हर्फों में लिखी उर्दू की आयतें। जिसके ज़ेरो जबर और नुक्ते सब आपस में इस कदर लिपटे जैसे नथ में बेतरबीत फंसे गेशु की एक लंबी डोर...। जैसे मुंडर पर कट चुके पतंग की उजली सूत का सिरा, शायर हाथों से दुःशासन हाथों तक खींचते जाओ बस.... जब बहुत खींच लो और अंत का इंतज़ार खत्म न हो तो पीछे खींचे गए अनसुलझे धागों का ढ़ेर जैसे अभी अभी अपनी पेटीकोट उतारकर नहाने गई किसी औरत का ख्याल....

पतंग है कि बहुत नचाता, ...हाथ नहीं आता।

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