Friday, December 27, 2013

अपने पसंद की विधा चुन लेना


मेरा कान है और फोन पर उसकी आवाज़ है। उसकी प्रवाहमयी क्रिस्टल क्लियर आवाज़। पर मेरे कान की श्रवण शक्ति जैसे मेरे शरीर में घूम रही है। वह मुझसे मुखातिब है लेकिन सुनती मेरी कलाई है। इस बात को उसने मेरे घुटने की हड्डी से कहा है। उसकी उस बात पर मेरे पैर के बाएं अंगूठे ने प्रतिक्रिया दी है। ये वाक्य कोहनी ने लपकी है और उसकी इस बात ने मेरे नाभि को चूमा है। अबकी उसने मेरी आंख से कुछ कहा और अब तो अब मुझसे भी बाहर जा चुकी है, देहरी पर सुस्ताता धूप भी यकायक उठ कर बात तो रसोई में तिरछी होकर घुस आई है।

तकनीकी रूप से कोई बैकग्राउंड शोर नहीं है मगर पृष्ठभूमि में कुछ अन्य शोर हैं। हम अपने अपने कुछ काम निपटाते जा रहे हैं। बैकग्राउंड में सिंक में धुल रहे बर्तन की आवाज़ है, वह पानी का शोर सुनती है और कुछ देर के लिए चुप हो जाती है। उस ओर भी कोई फेरी वाला आवाज़ लगा रहा है, वह खुद बीच बीच में अपनी मेड को कुछ बता रही है, मैं चुप हो जाता हूं। हमारे हलचल साझा हो जाते हैं।

किसी के प्यार में होना अच्छा है लेकिन मज़ा तब है जब वह संपर्क में न हो। मैं वहीं रहता है जहां मुझे पिछली दफे छोड़ा गया था। जीवन में एक दिन की भी तरक्की नहीं लगता। बस जहां थे, वहीं हैं। उसी मंझधार में उसी पत्ते पर हिचकोले खाते। जैसे ही किनारा लगने को होता हूं भूस्खलन हो जाता है।

तुमने देखे हैं कोसी के किनारे? मैं बारिश के मौसम में थाह पाता हूं, जब ये नदी कोछार काट कर बहती है, जब उठापटक में पता नहीं चलता कि ये कोसी का पानी है या सैलाब लिए सोन का, गंडक का या तालाब का।
सबसे बहुत सारे व्यवहार में कुछ अपने सिग्नेचर होते हैं। मैं उसके सिग्नेचर से मिलता हूं। वह लिखकर कलम घसीट डालती है मैं वहीं छूट जाता हूं। लापरवाही से विदा के साइन ऑफ में.....फिराओ एक बार उन बुहारे हुए लकीरों पे कलम।

सांस भारी हो जाती है और लगता है बाहर निःसांस काटे हुए उसी मनःस्थिति का कोहरा है। जो आस्तीन पर नहीं है मगर हर कुछ देर बाद बांह छूने पर लगता है जैसे उसने छुआ है। उसके छूने का ठंडापन उसके प्रेजेंट की पहचान है जो अभी अभी एब्सेंट हो गई है। कोई बर्फ का फाहा है, रूई की सी हल्की कतरन है। तस्तरी में उड़ेली गई चाय की लोच खाती भाप है, जो चार-छह सेंटीमीटर तक दृश्य है।

कुछ शब्दों की प्रवृत्ति अजीब होती है। जलना शब्द हर बार गर्माहट की प्रतिति देती है। तुम इसे अगर जमना समझो तो मैं इन दिनों बर्फ का तंदूर बना हुआ हूं, पर कोल्ड स्टोरेज नहीं। इसे विलासिता न जानो मगर दहलीज़ पर खड़े होकर सैकड़ों सिगरेट फूंकते और चाय का घूंट लेते हर आगत-अनागत देखता हूं।

हमारा माध्यम दृश्य-श्रव्य है, बिम्ब से अलंकार तक वीडियो है। मगर वीडियो सूख चुके फूलों की गंध नहीं दिखा सकता और ऑडियो का जादू इतना हैरान करता है कि झूठा लगता है इसलिए मैंने जो कम में कहा है उसे साहित्य में समझना।

तुम अपने पसंद की विधा चुन लेना।

Friday, November 22, 2013

इन दिनों.....

विगत डेढ़ महीन से रेडियो और टी.वी. के लिए स्क्रिप्टों पर काम कर रहा हूं। दिमाग भन्ना सा गया है। कुछ अपनी पसंद का नॉवेल पढ़ने, संगीत सुनने और डायरी लिखने का मन तभी होता है ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा होता हूं। 

दिमाग की हालत हमेशा से बदहवाशी की तरह रही है। सीखता बहुत देर से हूं लेकिन पानी तेज़ी से चढ़ता है। जिस चीज़ से गुज़र रहा होता हूं उसी फॉमेट में दिमाग दौड़ने और सोचने लगता है। अगर किसी उमेठ कर लिखे हुए दिलचस्प नॉवल के पांच पन्ने पढ़ने के बाद उसी तरह से दुनिया दिखने लगती है। आधे होते होते लगता है जैसे मेरी किताब है, उत्तेजना बनी रहती है और पूरा होते होते सारा जोश ठंडा हो जाता है जैसे ऐसी भी कोई खास बात नहीं थी मेरे लिखने में। यही वजह है कि कभी कभी शब्द फीके लगते हैं। 

विभिन्न जॉर्नर में और अलग अलग मीडियम के लिए लिखने में एक बड़ा खतरा एक खास तरह की बीमारी के शिकार हो जाने का खतरा रहता है जिसमें वहीं चीजों को जोकि कागज़ या कंप्यूटर पर लिखी जा रही होती है सामने घटती हुई प्रतीत होती है, लिखने वाला अपनी सोच के मार्फम अपनी कलम की रोशनाई से गुज़रता हुआ कागज़ पर लिखे जा रहे घटनाओं के बाज़ार की शोर में उतर जाता है। इसमें उसे कभी चीजों को दूर से भी देखना होता है तो कभी इतना अंदर जाना होता है कि पाठक/दर्शक/श्रोता को सच्चा लगने लगे। इसे परकाया प्रवेश कहते हैं। साथ ही उस तात्कालिकता मतलब कालखंड में लिखना होता है उस पर एक जिम्मेदारी ये भी कि उस समय भाषा चाहे वो जरूर रही हो लेकिन आपको सामंजस्य बिठाते हुए वो भाषा अंगीकार करनी हो जो बोझिल भी न लगे, जीवंत भी और ज्यादा से ज्यादा लोगों के समझ में भी आ जाए। उस पर से जिम्मेदारी यह कि मिस्टर फलाना और तलाकशुदा मैडम चिलानी के डॉयलॉग लिखने में इतना भी परकाया प्रवेश न कर लें कि स्क्रिप्ट अपनी तयशुदा समय से लंबी हो जाए। वैसे लिखते वक्त कई बार यह दिलचस्प एहसास भी होता है कि सीन दिमाग में फिल्टर होने लगते हैं और लगने लगता है ये वीडियो में ज्यादा इफेक्टिव होगा या ऑडियो में। और कई बार ये सारी बातें आपस में इस तरह गुंथ जाती हैं कि ऊपर लिखी सारी बातें गड्ड मड्ड हो जाती हैं। तब कलम और उंगली मशीन या बकवास करने वाला कोई मुंह बन जाता है और जाने क्या क्या बकने लगता है।

मेरी तमाम काहिली में एक खूबसूरत चीज़ यह भी है कि मैं लिखकर कुछ दिखाने से ज्यादा अच्छा लिखने संबंधी फीलिंग को महसूस कर सकता हूं, उस पर आपसे बातें कर सकता हूं। जैसे लिखना क्या है, लेखन में किन बातों को तवज्जो देना चाहिए, भाषा कैसी हो, उदाहरण कैसे हो, उन उदाहरणों से इंसानी मनोविज्ञान कैसे परिलक्षित हों, उसका रिएक्शन क्या हो, ऐसी भी प्रतिक्रिया न हो कि हमारा अकेले का दिल उसे अपना न सके बल्कि वो हो जो हम छुपा कर रखते हैं। लेखन कैसा हो, उसकी जिम्मेदारी क्या हो, क्या उसे सरोकारों से वास्ता रखना चाहिए?

आज ऐसे ही सुबह बाथरूम में बेसिन के नीचे का एकांत देखकर लगा कि ये कोना कितना तनहा है। पिछले कई दिनों में मैंने अपनी तनहाई कहां खो दी है। ये ठीक है कि अकेला ही लिखता रहा हूं लेकिन फिर भी लिखे जा रहे किसी न किसी घटनाओं के चिल्ल-पों के साथ ही रहा। लगा कि मैं कम से कम तीन मिनट के लिए भी अपने घुटने मोड़ कर उस छोटी सी जगह में बैठ जाऊं। 

असल में तकलीफ की आदत हो जाए तो यही मज़ा देने लगती है। एक नए गाने की तहत जिसकी ये लाइन सुनी तो लगा इस रचनात्मक दुनिया में दिल में छुपे विचारों की चोरी के लिए कहां शिकायत करने जाऊं। गाने के बोल हैं - लहू मुंह लग गया। 

फिलहाल स्टूडियो में कई वीओ आर्टिस्ट आई हुई हैं और दरवाज़े के बाहर उनकी ऊंची हील वाले सैंडिलें रखी हुई है। सपनों की बुनियाद ऊंची है। बहुत ही सख्त चीज़ें मुलायमतर को संभालती है। एक लाल रंग की ऊंची सैंडिल किसी प्यासे चिड़िया की तरह अपनी चोंच खोले हुए है। क्या अपनी व्यस्त जिंदगी में वो वीओ आर्टिस्ट ये सोच सकेगी कि आज किसी ने मेरी सैंडिल को वक्त दिया और फिर मेरे गुदगुदे, मांसल तलवों का ख्याल किया?

तो आप मेरे बिना लिखे समझ रहे हैं न कि लिखना क्या होता है? लिखना वो होता है कि...........

Friday, October 4, 2013

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास- दो



जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती. मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।
 

कितना कुछ समझा पाती है एक शिक्षिका भी? उतना ही जितना किताब बताता है और उसमें मिला अपना अनुभव। लेकिन ये एंडलेस है। चार लाइन फिर उसमें हम भी जोड़ते हैं। मुझे बहुत जोर का आवेगा जब दिल होता अपनी सीट से उठूं और जाकर एकदम से आपकी कलाई पकड़ लूं और कक्षा से बाहर बरामदे में, किसी खंभे के कोने में ले जाकर आपको कह दूं। और जब कह चूकूं तो चेतना इतनी शून्य हो जाए जैसे साइकिल की घंटी की बज चुकी ‘न्’ रहती है। फिर होश लौटे तो पता लगे कि मैंने जो कहा वो अटपटायी जबान में कुछ और था। ऐसे हिम्मत करके वही का वही कह पाने का मौका आखिर कितनी बार आता है।

किस्मत में लिखी ही थी नाकामी
कभी चुप रह कर पछताए, कभी बोल कर

सर्दियों की वो क्लास याद है जब काली साड़ी पर आप मरून रेशमी शाॅल लिपटा कर आई थीं? चैथी कक्षा तक आंचल से शाॅल पूरी तरह उलझ चुका था। आपने खीझ कर उसे अपने से अलग किया और आपके हाथ से वो फिसल कर नीचे मेरे पैर पर गिर पड़ा था। एक गरमाई लगी थी मुझे। एक विशुद्ध गंध। मैं जिससे चाहना रखता हूं। मैंने अचानक से कहा था - ज्यादा रेशमी क्या है। आपने शाॅल उठाकर पूछा था -what did you say?
और सकपका कर मैं - nothing mam

रात को बिस्तर पर जाकर मुझे अजब सी कमजोरी होती। वो बेआवाज़ रोना होता। मुझे अपने अंदर हर वक्त कुछ टूटता हुआ सा लगता। बेचैनी का आलम यूं था कि जब मैं करवट लेता तो लगता छाती के चूरे हो गए हैं और फेफड़े के पिंजड़ों में दरार आ गई है, वे बजते हुए से लगते जैसे कोई कबाड़ी वाला अपनी साइकिल पर इतवार को उबर-खाबड़ सड़क पर किसी झंखाड़ हो चुकी साइकिल को लिए चला रहा रहा है। उसे पुर्जे पुर्जे हिल हिल कर बज रहे होते हैं। धुंआधार बारिश की शाम एक किकियाती हुई आवाज़ जब किसी गर्भवती कुतिया को सीढ़ी के नीचे से भगा दिया जाए।

कक्षा में जब आप कविताओं को दृश्यों में घटित कर रही होंती, मैं एक उदात्त प्रेम का साक्षात्कार कर रहा होता। कविताओं को जीना, कविता में कही गई बात को साऊंड आॅफ म्यूजिक की अभिनेत्री की तरह उतार कर कुछ देर के लिए आप हमें कुलीन परिवार का फें्रच बना देती जो अब मृत्युपर्यंत जीवन का गौरव गान करेगा। ऐसा लगता आपने मेरे दिल की भुरभुरी मिट्टी में खुरपी लगाकर कोई बीज बोया है और अपने नर्म नर्म थपकी से बिठा रही हो। वे हाथ, वे उंगलियां जो डेस्क पर पड़ते, किताबों को पकड़ते, जो हल्के मांसल भी थे, हल्के सख्त भी, हल्के गरमाई लिए भी रहती। जो आपकी बांहों के रंग से मैच नहीं करते, मगर जब यह लगता कि यह आपकी ही जिस्म का हिस्सा है तो मेरी देह में एक झुरझुरी दौड़ जाती। तब कई तस्वीर सिर्फ इसलिए सुंदर हो जाती उससे आपका कोई न कोई वास्ता निकल आता।

वे क्या चीज़ होती है जब हमारे लिए असीम प्यार भी एक दिन गैर जरूरी हो जाता है और हमें लगने लगता है कि हम अब इसके बिना भी रह लेंगे। फिर वो क्या चीज़ होती है जब हमें लगता है कि अब इसे हटा दिया जाना ही बेहतर है? क्या ये आत्मविश्वास है? जिन चीज़ों को हम नसों में कभी दौड़ता महसूस करते हैं कैसे वो पराई हो जाने के बाद भी हमें स्वीकार करना ही पड़ता है। हम क्या हमेशा ही एक नई दुनिया बसाना चाहते हैं? क्या सचमुच ही हम इतने आत्मकेंद्रित होते हैं कि आखिरकार हमें अपनी ही इच्छा प्यारी लगती है? जो चीज़ें निजी जीवन में महत्वहीन हो जाती हैं क्या वे हमारी नफरत होती हैं?

मुझे हर वो चीज़, हर वो लोग जो आपसे रिश्ता रखते जादुई लगते। आपकी छोटी बेटी जब  वो आपके कंधे पकड़ कर खेल रही होती तो मुझे लगता कितना आराम मिलता होगा उसे जो इस कंधे को छू सकने के काबिल हैं। लगता प्यार कर लेने का नाम है, जी लेने को कहते हैं। उसके जीवन में आने से आए बदलाव या फिर कैसा महसूस करते हैं यह कह कर चूम लेने को कहते हैं। मैं प्यार में हाथ काटने, सांस छोड़ कर नदी में अपनी इच्छा के कई सेकेण्ड बाद तक डुबकी मारने, भूखे रहने की बात नहीं करूंगा। फिर भी एक चीज़ थी जो आपको स्पर्श करने के लिए भी प्रेरित करता था और हस्तमैथुन से भी दूर रखता था। एक जिद्दी कच्चा बीजू आम जो बैठी में आधा धंस कर भी दो फांक होने से इंकार करता है।

प्रेम हमारी जिंदगी में ऐसे ही धंसता है जिसे हम बहुत हद तो पूरी तरह जी भर पाने का दावा कर सकते हैं मगर जी नहीं सकते। जहां कुछ बाहरी मार लगती ही लगती है।

आज ज़ाहिर है आप मुझे राब्ता करेंगी तो मेरे कहे से प्रभावित हो सकेंगी। आप मेरे बारे में कोई भी राय रखें लेकिन मेरी कही बात कम से कम आपके मन में सवालों का तूफान उठाएगी, एक क्षण को सोचने का मौका देगी।


तब लगता आप ऐजलेस रहेंगी। मेरी चाहत पर वक्त की धूल नहीं जमेगी। मैं आपको अपनी हथेली में सुबह के ताज़ी ओस की बूंद की तरह थरथराता हुआ जीवित रख लूंगा।

ज़ारी

Monday, September 23, 2013

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास

वे कैसी मनःस्थितियां हुआ करती थी। समझाना तो बहुत चाहते थे मगर शब्द नहीं मिलते थे। अचानक से हकबका से जाते थे । अंग्रेजी की टीचर हुआ करती थीं। सात बजे सुबह सामुहिक प्रार्थना चल रहा होता था। हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें। और मन विजय नहीं बल्कि परास्त सा हो चुका था। आज सोचता हूं तो अंग्रेजी टीचर देर रात तक पढ़ती होंगी जभी प्रार्थना में जम्हाई ले रही होती थीं। लेकिन तब लगता था कि उनके पति ने उन्हें सोने नहीं दिया होगा। आखिर क्या कुछ करती रही होंगी इतनी रात तक? तब थोड़ी देर के लिए वे हमारे मन में बेवफा सी हो जातीं। दिल करता हाथ पकड़ कर कोने में ले जाऊं और समझाऊं, आपका पति आपसे उम्मीदें रखता है, आपको चूमता है, मैं कुछ नहीं कर पाता। उसके बनिस्पत मेरा प्यार ज्यादा सच्चा है। आप उसे मार नहीं सकतीं। जबकि मुझे अपने घरेलू झगड़े याद करके भी दस छड़ी ज्यादा मार सकती हैं। मैं कुछ हो सा गया है। आपको लेकर मैं रोता हूं, दोस्तों से बचता हूं। जब आप विलियम वर्डस्वर्थ और जाॅन कीट्स की किसी कविता का मर्म समझाती हैं तो शिद्दत से महसूसता हूं कि अभी तो मेरे पास आपकी समझ को छूने की काबिलयित नहीं है लेकिन शायद मैं आपसे प्रेमपूर्वक यह शास्त्रार्थ करने के लिए ही जन्मा हूं। मेरे लिए, बस मेरे लिए अपनी उम्र रोक लीजिए, मैं जल्द ही आपकी बराबरी आयु और विद्या में करने लगूंगा।

छी आप कैसे उस दिन शनिवार को हाफ डे में पारदर्शी ब्लाउज़ पहन कर आ गई थीं। मेरे सारे क्लासमेट आंखें मार कर कह रहे थे देख बड़ी शौकीन है मैम। अंदर ब्लू रंग का पहनकर आई है। और भी बहुत कुछ। वो सब सुनकर मैंने पहली बार अपने दिल को सिकुड़ता महसूस किया था। टीस की जोंक मेरे धमनी में उतर आई थी। कभी कभी आप पर भी गुस्सा आता था मगर जैसे ही आपको देखता दिल होता कि मैं आपसे माफी मांगू कि मुझे कुछ हो गया है, आप परेशान न हों, मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगा। अजीब अजीब तर्क मन में आते। आप संगीत की कक्षा में अपनी सैंडिल उतार कर अंदर जातीं तो मैं उन्हें चोरी चोरी छूता। मुझे लगता मेरे अंदर कोई बोझ है जो अब आराम पा रहा है।

यह संयोग ही था कि हमारी कक्षा में लंच से पहले पांचवीं क्लास आप लेती थीं। लंच में मैं चुपचाप उसी कुर्सी को बेंच के पास खिसका कर अपनी टिफिन खोल लेता था। मैं अपने अंदर तब धीरे धीरे कुछ बदलाव महसूस करता, कनपटी से पसीने की धार लुढ़कने लगती, मेरा शरीर आपमें ढ़लने लगता। आप बना मैं बेंच के उस तरफ खुद को देखता और जानबूझ कर अपने लिए सहानूभूति बटोरने की कोशिश करता। मैं सोचता कि आपने जानबूझकर मेरे माथे पर आज अपना हाथ फेरा है और अन्य विद्यार्थियों के बनिस्पत आप मेरे लिए थोड़ी बायस्ड हैं। मैं कुर्सी को पूरी तरह छेंक कर बैठने की कोशिश करता मुझे वे कुर्सी खास आपके बदन के स्पर्श से एक विशेष तरह की गर्माहट भरी लगती। मेरे मन को यह सोचकर बड़ा आराम मिलता कि कुर्सी के इस हत्थे पर हां यही आपकी तराशी हुई बांहें अभी कुछ देर पहले तक थी। पलट कर रखी गई किताब के उन पन्नों के अक्षर मुझे काग़जों में हल्के हल्के तैरते हुए लगते। लगता तालाब में जैसे कोई बत्तख डोल रहा हो। किताब के पन्ने बुखार में हल्के दहकते हुए महसूस होते। और एक दिन जब उस पर जल्दी में कोई और बैठ गया तो उस दिन मैंने छुट्टी के बाद छुपकर मैंने आधी ईंट का पूरा टूकड़ा उसके माथे पे दे मारा था।

उन दिनों रात को अपने घर पर टेबुल लैंप की रोशनी में अंग्रजी की कविताओं के पन्ने फाड़ मुंह में ठूंस कर बेआवाज़ रोता था। जिस रात मैं जितना रोता अगली सुबह आप मुझे उतनी ही धुली हुई मिलती। मुझे आप फिर थोड़ी से बेवफा लगती. मुझे इसमें कोई कनेक्शन लगा। इसलिए मैंने खुद को तकलीफ देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मैं आपकी कक्षाओं में भी रोने लगा।

ज़ारी


Thursday, September 19, 2013

गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे!

गौरी (गौरीशंकर) मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे। तू ही बता न ऐसे में मैं क्या करूं। काकी चूं चूं करती है। काकी बक बक करती है। कुत्ता भौं भौं करता है। भाभी की मुनिया भें भें रोती है। खुद भाभी भी घूंघट काढ़े भुन भुन करती रहती है। सचदेवा पिंगिल पढ़ता है। कठफोड़वा टक टक करता है। देहरी पर बंधी बकरी चकर चकर खाती रहती है, टप टप भेनारी गिराती रहती है और में में किए रहती है। अउर ऊ जो गईया है का नाम रखे हैं उसका कक्का दिन भर मों मों किए जाती है। हमको मरने के बाद बैतरनी का का जरूरत ? इसी हर हर कच कच में जिन्दे बैकुंठ है। आदमी तो आदमी जनावर तक सुरियाए रहता है।

भोर हुआ नहीं, पंछी बोला नहीं, अजान पड़ा नहीं, घरिघंट बजा नहीं, रत्ना ओसरा बुहारी नहीं, सुधीर घोड़ा वाला खाना चना गुड़ अंटी में दाब के दौड़ने निकला नहीं कि भर हंडी भात परोस दो बूढ़ा को। भकोस कर हम पर एहसान करेंगे। और उस पर भी मिनट दू मिनट सुई टसका नहीं कि सुनो रमायन। हमारा पेट गुड़ गुड़ करता है। मन हद मद करता है। चित्त थर थर करता है। बैठल ठमा बूढ़ा मौगी जेकां कथय छै।

बीनी से हांक रही गित्तु। गौरिया पर साल पारे गए कटहल के अचार संग गर्म भात मिलाकर कंठ के पास रखे जा रहा है। हर तरह से बहुत भूखा है गौरी। गित्तु की खबर कई साल से नहीं थी। उसका चेहरा कितना बदला, ससुराल कैसा मिला। अमरपुर से कल्हे सांझ को टमटम लिया था, एक थान कपड़ा बगल में दबाए। खाली हाथ कैसे आता न, बचपन की दोस्त जो ठहरी गित्तु। एक ही बात समझ में आया गौरी को कि गित्तु को चैन नहीं है। वह तसल्ली से उससे कहीं अकेले में उससे बात करना चाहता है। घर वाले मोहलत नहीं देते। गित्तु अकच्छ है। घिरनी की तरह नाचती रहती है।

गौरिया को अपने ऊपर ग्लानि होती है। मेरी वजह से सबके उलाहने सुन रही है गित्तु। नहीं ही आता तो क्या हो जाता? गित्तु है कि कुछ खिलाकर भेजना चाहती है, थाली तैयार था जिसमें दो फक्का अचार था और एक पुराने स्टील के लोटे में पानी। वैसे तो आंगन में हर कदम पर पैर से पीढ़ा टकराता है लेकिन समय पर पीढ़ा नहीं मिलता। गौरी संज्ञान लेता है, गित्तु घबराती है तो और भी ज्यादा बोलने लगती है। अपना उतावलापन छिपा रही है या ग्लानि। इस एक पंद्रह बीस मिनट में क्या कुछ कर लेना चाहती है? हमारे बीच यही पंद्रह बीस मिनट हैं और हमें इसी मिनट में सबकुछ हल कर लेना चाहिए।

नहीं समझती गित्तु। ससुराल में मेहमानवाजी की इज्जत बचाने पर तुली हुई है। नहीं ही मिलता पीढ़ा तो अपना पूजा करने वाला आसन ही दे देती है बैठने को।

तू कभी और नहीं आ सकता था ? इस बार तो रहने दे लेकिन फिर आएगा न? देख तेरे लिए कुछ कर भी नहीं सकी। मकई कटने का समय है न, सब खेत में उलझे हैं। बब्बू ट्यूशन गया है, सात बजे तक लौटेगा। है तो ट्यूशन ही पर कोचिंग जैसा पढ़ाता है मास्टर। अभी क्या बजा होगा? बीनी झुलाते गर्दन उचकाते हुए देखती है गित्तु। धूप  भंसा घर के खपरैल को पार कर रही है। सवा पांच बजा है। अब दिन भी लंबा........

गर्म गर्म भात और अचार का मसाला! एक तेज़ जलन उठती है गौरी को। आंखों में पानी आ जाता है। किसलिए गीली हुई ये आंखें? किसके लिए? अचार के झांस के बहाने थोड़ा रो लेता है, उसकी हाल पर। आंख चुराकर देखता है गित्तु को। उफ। कितने बहाने! बड़ बड़ करने की आड़ में जाने क्या क्या बोले जा रही है।

'आज रात रूक जाता गौरी।'
एक अनचाही सी मिन्नती जिसमें न रूकने की आस छुपी है। बचपन का दोस्त है, ताड़ लेता है गौरी भी। रेलवे में ए सी मेन्टेनर का रिजल्ट नहीं आया, इलाहाबाद परीक्षा में इंटरव्यू में छंट गया, भुवनेश्वर रेलवे में गु्रप-डी का फाइनल रिजल्ट आने ही वाला है। कहने को अभी तक बस इंतज़ार है, निठल्ला है, रूक सकता है, लेकिन रूकने से सवाल पर ही कौर निगलने से पहले ही ऐसा उत्तेजित होकर जवाब देता है - 'उन्....उन्....उन्नहूं, कल सुबह ही दीदी इंटरसीटी से बेगुसराय जा रही है। फिर साढ़े दस बजे बाबूजी के साथ गौरीपुर बैंक जाना है, पैसा निकालने। वहां से भागलपुर, खतौनी का रसीद कटाने अमीन से मिलना है। कित्ते तो काम हैं गित्तु! और फिर मकई कटने का मौसम वहां भी तो है....'

आंखें फिर एक पल को मिलती है। जैसे चार चोर नज़र मिलते हैं। पंखा झलना एक पल के लिए रूकता है फिर बातों में आई धीमेपन दुगनी तेज़ गति से चल पड़ता है। गौरी भी अपने कंठ में अकट गया निवाले को पानी के एक लंबे घूंट से नीचे ठेल देता है।

खाना हो गया। गौरी हाथ धोकर हवा में हाथ झाड़कर उसे सुखा रहा है। तब तक धोकर रखे गए कपड़े गित्तु रस्सी पर पसार रही है। उसे लगता है कि यह क्या है जो एक कोने से दूसरे कोने तक खुले आंगन में खिंचा हुआ है जिसपर अलग अलग नाप के कपड़े सूखते हैं, बारिश में भीगते हैं और धूप खाते हैं!

गित्तु मुस्कुराती आंखों से गौरी को देखती है, अब नहीं दे सकती हाथ पोंछने के लिए उसे अपना दुपट्टा। सिर्फ इतना कहती है- 'आंचल से अब गौरी पूजते हैं, रोज़।'

यह क्या बोल दिया उसने। अचानक में बोले गए वाक्य कितना सच हो आया है। सुनकर गौरी को टीस मिली खुशी महसूस हुई है। वह तिलमिला सा उठा है। जीभ बाहर कर लंबी लंबी सांस ले अंदर की लहर निकालता है।
विदा लेने का समय आ गया। कुछ बातें समझीं हुई, कुछ समझाई। कुछ बातें तमाम खुलेपन के बावजूद वर्जित। कुछ पर चुप रहना बेहतर। कुछ सवाल हत्या के प्रतिक्रियास्वरूप हैरानी भरी आंखों से ताकती हैं। कई सवालों का जवाब नहीं मिला है। जबकि मिलना जवाब के लिए ही हुआ था।

स्टील की छोटी प्लेट में मेहमान को चार लौंग, दो इलाइची, चार मिसरी, एक जनेऊ और कम से कम ग्यारह रूपया देकर विदा करने का रिवाज़ है। दोस्ती थोड़ा सा रिवाज़ निभाता है बहुत सा रिवाज़ तोड़ता हुआ बुझी आंखों से गित्तु को देखता हुआ बस इलाइची लिए निकल पड़ता है।

मुंह फेर कर आगे बढ़ आए गौरी को कच्चा रास्ता सूनी पगडंडी सा जान पड़ता है। लगता है वे गित्तु की आंखें हैं जिसमें वो अपना होकर भी गैर होकर चल पड़ा है। भुरभुरे ईंटों की गली से निकलते गौरी के मन में सांझ ढ़ले किसी आंगन से उठती लोकगीत सुनाई देती है -

सरसों के कली सिय जोत महान हे तीसी फूल
रंग दुलहा सोहान हे तीसी फूल
उगल चार चार चांद हे तीसी फूल
मोर सजना महान हे तीसी फूल

एक आवाज़ और उसमें आ मिलती है - गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचता है रे, तू ही बता न मैं क्या करूं?
वह तेज़ी से पीछे मुड़कर देखता है। गली का मोड़ तो कब का खत्म हो चुका है।

Thursday, September 12, 2013

उससे कहो कि आकर मुझसे लड़े


उसकी कोई खबर नहीं लगती। सूचना प्राद्यौगिकी के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रहने वाली के बारे में अब कहीं कोई जिंदा जानकारी नहीं है। चंद कतरे उसकी आवाज़ के अपनी जिंदगी में इक जगह सकेर रखा है। वहीं उसे थोड़ा बहुत पा लिया करता हूं। एक पोस्टकार्ड है, गहरे आसमानी काग़ज़ पर उसकी बचपने में लिखी कुछ सतरें हैं। एक फिल्म में काम करना भी। उसके अक्षर आंगन में ढुलकते लोटे जैसे लगते हैं। 

उसे कहां कहां नहीं ढूंढ़ता। कनुप्रिया की किताब में, इज़ाडोरा डंकन के जीवन में, आंखों से बोलती किसी म्यूजिकल ब्लैक एंड ह्वाईट फिल्म में जहां दृश्यों के बीच तेज़ पियानो बजता है। मैं उसे खोजता हूं सखुए के पेड़ों के बीच, बदहवाशी के घोंड़ों के बीच, नींद और सपने के जोड़ों के बीच, अपनों से घिरे गैरों के बीच, सेंट ऑफ़ अ वुमेन के डांसिंग सीन के बीच, ज़हन में बॉस से डांट खाते खौफ के रील के बीच, जैसे मुझे अपने शहर का गंगा किनारे बहता गंदला नाला भी पसंद है वह भी मुझे उतनी ही अज़ीज है।

भीड़ भरे हाट से थैला भर सब्जी खरीदने से कभी नहीं ऊबा मैं, शाम ढ़ले काठ की नाव से गंगा में डूबा मैं, दूर रहकर भी वो पड़ोसन की तरह ही लगती, क्या था जो इतना याद आता, सताता। जीवन गर्क करता, वर्तमान नर्क करता।

मेरा खुदऐतमाद मर गया है। अपने ही दिल के अंदर एक खोखल सा महसूस होता है। शदीद तनहाई से सींचा जाता, बरगद की तरह फैलता एक विशालकाय वृक्ष। उसे हर जगह तलाशता हूं। उसकी सरौते जैसी उँगलियों का लम्स फिर से जिंदा कैसे हो.


अब कहां की दानाई अब के कैसे बिसात
तुम भी छेड़ लो तुम्हें भी करार आ जाए

आदमी में ही यकीन था या कि उजाले में
क्या लगते थे तुम्हारे जो दुबारा तवील बोसे दिए

रंगीं पैरहन एक हसीं गुलिस्तां सा लगता रहा
तुमको चुनना साइड इफेक्ट लेकर भी आता रहा

इक उम्र ही तो गुज़ारी है, जानता हूं मैं अपने बदन को
तू मुझको वहां से छू जहां से मैं अनजान हूं अबके


उसको चाहिए कि आकर मुझसे लड़े।  

Wednesday, September 11, 2013

टूटता नहीं ये जादू


होंठ उसके जब भी लपकता हूं, गर्दन से गुज़रता हूं
इरादे दरकने लगते हैं, लहू बहकने लगते हैं।
मन जैसा कैसा ऊपर नीचे को होने लगता है।

दिल होता है किसी चील की माफिक चोंच में दबा कर उसे
उड़ जाऊं, इफरात समय निकाल, नितांत अकेलेपन में शिकार करूं
नस नस चटका दूं उसकी, अपनी रीढ़ की हड्डियां तोडूं

नहीं ही पूरा हो पता पक्षियों का सा ये ख्वाब तो
गली के मुहाने पर झपट्टा मार कर पकड़ लेता हूं उसे
निचले होंठ को अपने दांतों से महीन महीन कुतर देता हूं
दोनों गालों पर अनार उगा देता हूं
किसी दुख का बदला लेता हूं
जाने कैसी संगति है मेरी, कैसा मनोविज्ञान है
बिछड़ने से पहले कर डालो सब तकलीफ कम रहा करेगी
वह कहती -
एक मिनट रूको, जाना तो है घर ही वापस
बस ज़रा लिपस्टिक लगा लूं

/एक मिनट का अंतराल, जिसमें-
बारी बारी से ऊपरी और निचले होंठ पर लिपस्टिक फिसलता है (मन होता मेरा मैं ही अपने होंठों से वो लाली मिला दूं)/

क्षण भर में बदल जाती वो
मैं नहीं बदल पाया सदियों में

हर पल में लगती वो खींचती हुई
टूटता नहीं कभी ये भोर का-सा जादू! 

Tuesday, September 10, 2013

तुम्हें भी तो था न प्यार, तुम भी तो कह सकती थी



तकिए पे आहों की अनगिन सिसकियां हैं
कभी तुम्हारा बाल टूट कर छूट जाया करता था जिसपर
हाट ले जाने वाले झोले में अब बेहिसाब जिम्मेदारियां
बैंगन, तोरी, टिंडा, मेथी, अजवाईन, जीरा, परवल
एक ज़रा ध्यान तुम्हारा गया तो सुनीता चमकीं
अरे ! दातुन नहीं लाए।
परिपक्व हो चला अब बनाता हूं फौरी बहाने
नीम का था, आज मिला नहीं
उसे जवाबों ने न कोई लेना
नहीं ही जरूरी भी कोई मेरा जवाब देना
वो न सुनती, मैं न कहता

सांझ ढ़ले लालटेन शौक से जलाती सुनीता
आंखें क्षण भर दिप दिप करती, पलकों पे उसका कन्हैया नाचता
मैं जान रहा होता, मोरनाच करते रोशनी को, उसके प्रेमी को
वो समझ रही होती मैं छूट गया हूं
जल्दबाजी में पोछे गए लिप ग्लाॅस की तरह अपनी प्रेयसी के पास

हम दोनों बिला मतलब झगड़ते
हम दोनों एक दूजे की बेबसी समझते,
हम दोनों परस्पर हमदर्दी रखते
हम दोनों आधी रात अनजाने में करीब आते
हम दोनों किसी बहाने ज़ार ज़ार रोते और मजबूत होते
हम दोनों नहीं होते मौजूद जब संभोग होता

हम दोनों के बच्चे स्कूल जाते हैं, गेहूं पिसवाने को पैसे मांगते हैं।


हम दोनों एक दूजे को अब तक नहीं पहचानते हैं। 

Friday, September 6, 2013

नेकलाइन - तीन

हाय ! कैसे हो?

याद को वो पुराना सिलसिला इस प्रश्न से टूटा। मुझे लगा वो मेरे चेहरे पर विछोह के पड़ते फ्लैशेज़ कहीं देख न रही हो, सो जड़ता से लगभग टूटता हुआ मैं बोल पड़ा - हैलो, तुम कैसी हो।

एज़ यूजअल बढि़या। उसने ज़रा और आत्मविश्वास से खड़े होने की कोशिश की। बढि़या शब्द उसके मुंह से काफी माड्यूलेट होकर निकला जो मुस्कुराने और हंसने के बीच की अवस्था में कहीं फंसा था।

हम्मम..... - मैंने उसकी वर्तमान स्थिति से अवगत होते हुए कहा

मुझे कम बोलता देख उसने दूसरा रूख अपनाया जहां से मुझसे कुछ बुलवाया जा सकता था।
और तुम्हारे घर में सब ठीक? मम्मी, बुआ और मामाजी?

हां, वो सब भी बढि़या। दरअसल मैं इस अचानक के मिलने के संयोग को अब तक स्वीकार नहीं पाया था, सो बेहद सर्तकता से अपने शब्दों को चुन रहा था।

और मीता ? उसका क्या हाल है, इंटर में एडमिशन हो गया उसका?
आं... हां। हो गया।

सब्जेक्ट्स क्या लिए हैं उसने? - मैं हकबका गया। उसके अंदर अब भी उगलवाने की कला मौजूद थी। उसने भांप लिया था कि मैं बोलना नहीं चाहता। बरसों बाद कुछ खास किस्म के रिश्तों से जब हम टकरा ही जाते हैं तो उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं।

ऐसा नहीं था कि मैं उसके बारे में नहीं जानना चाहता था मगर उसके बात को शुरू करने का सिलसिला खीझ बढ़ाने के साथ साथ दिलचस्पी का भी बायस था।

मैंने जानबूझ कर जवाब नहीं दिया। मैं देर से जवाब देना चाहता था। लेकिन उसमें धैर्य नहीं था।

पेट निकल आया है तुम्हारा, आं....? उसने फिर पिन मारी। मैंने खिड़की के बाहर से नज़र हटा कर उसकी ओर एक नज़र देखा। हमारी आंखें मिली। मुझे सही जगह चुभी। मैं तिलमिला कर रह गया।

बीच के वक्फे खाली गए। मेट्रो के ट्रैक पर सरसाने की आवाज़ उस खाली वक्फे पर सुपर इम्पोज हो गई।
लगता है, तुम बात करने के मूड में नहीं हो। चलो..... मैं चलती हूं। ओ. के.।

नहीं ऐसा नहीं है। मीता ने बाॅयो लिया है। बुआ जी अब बीमार ज्यादा रहती है। मामाजी घर छोड़ गए। और बांकी सब ठीक है।

मैंने गौर किया कि अक्सर कुछ लोग जो कम बोलते हैं, वो फट पड़ते हैं।

मैं सही मायने में अब लौटा था जो बातचीत में काॅपरेट न कर पाने के गिल्ट को अब ढांपना चाहता था।

बाहर रात गहरा रही थी। नीले रंग के शाम का जादू अब टूट रहा था। अंधेरा सघन हो रहा था।

Monday, September 2, 2013

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।

कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।

वो आज भी उतनी ही साहसी है। जिन जिंदा सवालों के साथ वो मुझे घूरे जा रही थी उससे तो भीड़ में से कई लोग हमारे रिश्ते के बारे में जान चुके होंगे। 

जो रिश्ता खत्म हो गया अमूमन उससे मिलने की इच्छा मर जाती है। शायद वे रिश्ते खत्म नहीं होते। प्रेम में हम जेनेरश भी होते हैं और तह में कहीं जाकर प्रतिशोधी भी। हमारा प्रेम मुरझा गया था। उसकी सांसे तेज़ चल रही थी जिससे शर्ट के नीचे स्फटिक की घूमती मोतियाँ दिखाई दे जाती।  कान के झुमके अब भी उसके बालों के बीच फंस गए से लगते थे। 

क्या कहा था मैंने -
‘‘सिर्फ पूर्ण प्रेम। इससे कम मुझे कुछ नहीं चाहिए। सात गद्दों के बीच एक बाल भी नहीं। एकदम गुदगुदे गाल और भरे भरे उभार। और इससे कुछ भी कम तो गेट लॉस्ट। दरवाज़ा उधर है।’’

दरवाज़ा उधर ही रहा, बस वो नहीं रही। अक्सर ही जिस शाम मुझे पीने का इच्छा दोपहर से ही बलवती होने लगती है उससे झगड़े की दर भी बढ़ती जाती है। मैं अपने संवाद भी बोलता हूं और उसकी शैली और भाव भंगिमा से परिचित उसके भी, कि अभी अगर वो सचमुच यहां होती तो यही कहती। कल्पनाशीलता के किसी मोड़ पर जाकर शून्यता उभर आती है कि मैंने यह जबाव बहुत बेहतर दिया और शायद यह अकाट्य होता।

मगर क्या कहा था उसने -

कुछ भी तो नहीं.

(...जारी)

Saturday, August 31, 2013

नेकलाइन- एक

भीड़ में सहसा मुझे देख उसकी आंखें महकीं। चश्मा जोकि थोड़ा ढ़लक आया था सो उसने चार आंखों से मुझे देखा। मेरी निगाहें लगातार उस पर थी। नेकलाइन पर बल पड़े और वो आधी इंच नीचे धंस आई। चश्मे वालों के साथा थोड़ी दिक्कत ये होती है कि उसके शीशे पर अगर लाईट पड़ती है तो शीशे पर रोशनी की एक शतरंजी खाना नज़र आता है फिर एक पल को यह संदेह उपजता है कि उसने मुझे देखा या नहीं। और इसी दरम्यान अगर हम नहीं चाहते कि वो हमें देखे तो हम किसी दीवार के आड़े आ सकते हैं, नीचे झुक सकते हैं, पीछे मुड़ सकते हैं। 

आंखें किसी को कैसे चीन्हती है। पहले स्वाभाविता में नज़र पड़ती है फिर सहज ही गर्दन इधर उधर घूम जाती है लेकिन उस पहचाने की आंख हमारे स्मृतियों में सहसा धंस आती है और तंग करने लगती है। संबंधों में एक लाख शिकायत के बाद भी पहली प्रतिक्रिया मुस्कुराहट की ही होती है। वो स्केलेटर से चढ़ रही थी और मैंने सीढि़यां ली थी। ऊपर प्लेटफार्म पर हाॅर्न बजाती मेट्रो आने या जाने का संकेत दे रहा था। अमूमन सभी मानकर चलते हैं कि गाड़ी अब लगने वाली होगी, सो सबके कदमों की रफ्तार बढ़ जाती है। एक दूसरे को पहचानने की क्रिया को हमने भैंस को दिए गए रोटी की तरह निगल लिया गो कि मेट्रो में किसी स्टील राॅड को पकड़कर धीमे धीमे झूलते हुए अतीत में आए उस किरादार संबंधी याद की जुगाली करेंगे। 

मगर हुआ कुछ ऐसा कि हमने साथ ही गाड़ी ली। मैंने दूसरा डिब्बा लिया, उसने तीसरा। पहली कोच महिलाओं के लिए रिज्वर्ड है सो जो जल्दी में किसी और कोच में चढ़ते हैं वे गाड़ी चल पड़ने के बाद अंदर ही अंदर पहली कोच तक आती हैं। वो आ ही रही थी कि मैं दो कोच के भीतरी जंक्शन (क्योंकि वहां सबसे अच्छी हवा लगती है, रबड़ की सतह होती है) पर वही जुगाली कर रहा था कि उसकी आंखें फिर से मुझे खोजते हुए वहां से आगे बढ़ रही थी। मैंने छुपना चाहा। मगर एक सफल कोशिश के बाद दूसरे प्रयास में पकड़ा गया। पहचान की आंखें मकड़ी की तरह फंदा डालती हैं। रिश्तों की तरह उससे भी आज़ाद होने में समय लगता है। 

वो अब भी उतनी ही भरी पूरी थी। नहीं पहले से शायद कम हो गई थी। हाथ में वही पूरे हथेली को भरता सैमसंग गैलेक्सी चार है। हल्के आसमानी रंग की फिसलती शर्ट और काली जींस। उन दोनों को अलग करता लाल बेल्ट जो अब धूसर हो चली थी और जो उठते बैठते कई लोगों को यकायक निकर का सा भ्रम देती होगी। चेहरे पर हल्की सी जम आई नमी, आंखों में सुब्ह का लगाया फैल आया काज़ल। हां हाथों की चूडि़यां अब शादी के डेढ़ बरस बाद कम हो आई थी। 

 ......(ज़ारी)

Friday, August 30, 2013

......

उसके होने का गंध उसके नाभि से फूटती है लेकिन शब्द कहां से फूटते हैं? यूं ही विशाल पुस्तक मेले में अनजाने से बुक स्टाल पर बाएं से आठवीं शेल्फ में अमुक किताब का होना कि जहां दुकानदार भी नहीं उम्मीद करता हो कि पाठक यहां देखेगा सो वहां किताबों का सा भ्रम देता कुछ भी रख दो। 

स्टाल पर कोने में ग्रे कालीन पर उन शब्दों से गुज़रते हुए जाने क्यों लगता रहा कि उसके लिखे जाने से पहले वे शब्द हमारे ज़हन में महफूज थे और किसी ने सेंध मार कर यह निकाली है। पढ़ना कई बार वही सुहाता जो हम पहले से जान रहे होते हैं।

यह सोचना भी बहुत सुखद लगता कि हमारे शब्द साझे हैं। दिमाग से सरसरा कर फिसलते हुए उनकी उंगलियों के बीच फंसे कलम से कैसे किसी काग़ज़ पर वे आकार लेते होंगे? क्या 'द' वैसा ही होता होगा जैसा उनके दिमाग में उपजा था, या कि उनकी उंगलियों ने उसे सफहे पर रोपते हुए कोई कलाकारी कर डाली थी। उनका लिखा 'ज' भी आह कितना आत्मीय! पहचाने से शब्द जिन्हें बीच के बरस में कहीं भूल आए थे और उस भूलने की याद भर आती रही। यों ही अनायास वो पढ़ना छोड़ उन उंगलियों का ख्याल करने लगता हूं जो सर्फ से धोए जाने के बाद हल्की हल्की रूखी लगती है। 

क्या उनका लिखना भी संगीत संयोजन के नियमों में बंधा है। क्या वे भी हर शब्द तीन ताल पर गिन कर, कभी कोई मीटर पकड़ कर लिखते हैं? 

अच्छा है कि कई सवालों के जवाब नहीं सो उनके व्यक्तित्व के प्रेम में पागल मुझ जैसी प्रेमिका रंगमंच पर गोल गोल बेसुध घूमती नज़र आती है।

अपार किताबों में भी वर्णमाला के खांचे में ही बंधी हर रचना मगर कैसे चीन्ह लेता है हमारा हृदय उन्हीं में से कुछ खास शब्दों को। क्यों लगता ऐसा कि वे जो अक्षर लिखते तो हमारे दिल पर नर्म नर्म रूई के फाहे गिरते। क्यों लगता ऐसा कि किसी कोई आदमी न सही तो राह चलते किसी जानवर के ही गले लगते फफक पड़ने की संतुष्टि मिलती? क्यों लगता ऐसा कि हमारे बीच की दूरी को भी हज़ार मील की दूरी और अनियमित कालखंड के फासले भी पट जाते? क्यों लगता ऐसा कि वे गर सामने ही होते तो अपनी धड़कन संयत कर उनकी हथेली बड़े इत्मीनान से अपने उभारों पर रख लेती ?

शब्दों की हल्की हल्की ऊष्मा, अक्षरों के आंच, वाक्यों में छुपी अदरकी स्वाद। मां ने जो कभी रूला रूला कर, गर्दन गिलास में गोत कर जबरन पिलाया, क्यों आज उसी का स्वाद जिह्वा पर छाया?

Thursday, August 8, 2013

फेसबुक स्टेट्स !


लड़की ने अपना फेक फेसबुक अकाउंट खोला। सर्चबार में आर लिखा और दूसरे विकल्प को सेलेक्ट किया। ‘इसके सिर्फ टैग की हुई तस्वीरें और अपडेट्स दिखते हैं और लंबे अरसे से इसने किसी को टैग नहीं किया है’
फिलहाल वह स्क्राॅल डाऊन करके ‘शो ओल्डर स्टोरीज़’ में जाकर उसके पुराने स्टेटस देख रही है।

अंर्तजाल पर यूं तो अरबों शब्द छींटे हुए हैं। जिनमें से हज़ार शब्द उसके भी हैं।

पुराने स्टेट्स पर भी सरसरी निगाह डालते हुए उसमें जहां कहीं उसका अपना नाम दिखता  - आह! कितना सुखद अतीत!! मुझे ज़हन में रखकर लिखी गई महबूब की ये पंक्तियां। नियान लाईट की रोशनी लिए उन आंखों में क्षण भर के लिए एक सौ अस्सी वाॅट की चमक आ जाती है।

और ये स्टेट्स उस शाम की है जब थोड़ी देर को सोकर उठी ही थी। सर में तेज़ दर्द था और दिल कर रहा था कि इस सूने घर में किसी को आवाज़ देकर कहूं - दीदी अदरक वाली चाय बना दो। कि तभी फोन की घंटी बजी। दिल ने जैसे धड़कना शुरू कर दिया। तकिए को हटाया तो लगा जैसे वो तकिए के नीचे ही आवाज़ लगा रहा था। फोन का रिंग भी जैसे मेरा ही नाम पुकार रही हो। स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था। एन काॅलिंग..... के बाद तीन डाॅट्स जैसे बिना फोन उठाए ही जैसे इस बेचैनी को बयां कर रहे थे। काश इंतज़ार के उन बेचैन लम्हों की फोटोकाॅपी रख रखा जा सकता!

उन दिनों कितना घुमा फिरा कर ये स्टेट्स लिखा करता था! उसी शाम उसने पूछा था - क्या पहनी हो? मैंने हंस कर कहा था - गाऊन।
- उतार कर मुझे पहना दो।
- अच्छा ?
- हां, और उसके नीचे?
- चप्पल। वो भी पहना दूं।

दो जोड़े कान और होठों के दरम्यान दीर्घ हंसी देर तक गूंजती रही थी।

खुले में जैसे पुराना किला हो। इन बारिशों में पत्थरों ने हरे गाऊन डाल लिए हैं। इन्हें छूता हूं तो ये मेरा स्पर्श महसूस करती हैं। प्रेम में अमूर्त चीज़ें भी मूर्त हो जाती हैं। यादें जाफना के जंगल जैसी हैं और यहां से तुम्हें उल्टे उंगलियों से छू रहा था। तुम सांस लेने लगी हो।

इस शाम लड़की के सर का दर्द फिर तारी है। अदरकी चाय देने वाली दीदी तो आज भी नहीं है और न जिलाने वाले स्टेट्स ही।

Monday, August 5, 2013

A thousand things to forget....


जनाब एक मिनट अपना कीमती समय दीजिए। रूकिए एक मिनट! आपने अपने व्यवहार से तो अपनी बात कह दी। मैं ज़रा अपने मुंह से अपनी बात कहना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि मुझे इसके लिए आपके अनुमति की जरूरत नहीं है। क्योंकि अगर आप नहीं सुनेंगे तो भी मैं अपनी बात कहूंगा। किसी से भी कह लूंगा। रसोई की दीवार से, अरूणेश के छज्जे से, कमरे के बाहर लटकती टाट के परदे से और गर महसूस हुआ कि गुसलखाने का सड़ रहा पयताना ही यदि मेरी बात सुनने में इच्छुक है तो मैं उससे ही कह लूंगा।

मैं जानता हूं कि मेरी बातों से धुंआ नहीं उठता। यह एक ठंडी बुझी चुकी राख की मानिंद है जिसमें अब कोई चिंगारी नहीं। आप धीरज रखें मैं आपको यह आश्वस्त करना चाहता हूं कि यह कोई बवेला नहीं मचाएगी। मैं जानता हूं कि आपकी जिंदगी फेसबुक की तरह है जहां फलाने कहे को भी लाइक करना और चिलाने के उद्गार पर भी कमेंट करना है। क्षणभर में कहीं प्रशंसा भी करनी और तत्क्षण ही किसी दूसरे स्टेटस पर अफसोसजनक भी लिखना है और बढ़ जाना है।

अपनी रीत और बीच चुके जीवन के आधार पर मैं यह चाहूंगा कि मेरा कहा आपका मनोरंजन नहीं करे। क्योंकि मैंने पाया है कि मैं मनोरंजन दे सकने के लायक ही नहीं हूं। मैंने बड़ी कठिनाई अपनी दुम का दबाया है साहब। रोज़ मुझे सिर्फ अपनी जगह खड़े हो जाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी है। आलम यह है कि अब मैं आगे बढ़ जाने के सपने नहीं देखता। आप देख सकते हैं (जिसके लिए आपकी पारखी नज़र को चंद सेकेंड की जरूरत होगी) कि मैं एक बेहद आम आदमी हूं। भिखमंगे खानदान में लावारिस की तरह पला बढ़ा। आपको आपके मां बाप पालते होंगे मुझे तो पेड़ों, आसमानों, हवाओं और पानी से मिलकर पाला है।

मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि एक वक्त था जब मैंने भूख पर विजय प्राप्त कर ली थी। मेरे और भूख में कोई मसले नहीं बचे थे। मैं दिन रात सीधा सीधा उससे मुठभेड़ करता था। मैं किसी बाउंड्री पर उसकी छड़ पकड़ कर रातों को सोता और जागता था। जब नींद आ ही जाती तो छड़ से हाथ न छूट जाए इसलिए अपनी कोहनी और अपना घुटना उसमें फंसा देता। हर जगह मैंने जुगाड़ तलाशे हैं। आप न जाने क्यों पहाड़ों पर के बाबाओं की इज्जत सिर्फ इसलिए करते हैं जिन्होंने तपस्या से भूख पर जीत पाई है।

लेकिन आज समय दूसरा है। सो मैं भी दूसरा हूं। बड़ी साधारण सी पंक्ति है लेकिन फिर भी इसे लिखते हुए अथाह पीड़ा महसूस कर रहा हूं कि अब मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती। आपको किसी भी प्रकार से इस पंक्ति में कोई चमत्कार नहीं लग रहा होगा लेकिन आप ज़रा अपना बहुत सारा ज्ञान, संगीत की कतरनें, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से अर्जित अनुभूतियां, किताबों के शब्द थोड़ी देर के लिए अपने सिलबट्टे जैसी पीठ पर से उतार दें। माफ करें मैंने थोड़ी अनैतिकतावश आपकी नंगी पीठ देख ली है और पाया कि उस पर अब किसी ऐसे आदमी की जरूरत है जो छेनी से आपकी पीठ तो हरा, ताज़ा कर दे।

नहीं मैंने कतई नहीं पी है। अच्छा चलिए, पी है। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? आप पीते किस तरह से हैं? मुआफ कीजिए, मैं एक जगह बैठकर सुरूर लेने वाला आदमी नहीं हूं। कल इतवार था और मैंने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। मैं टेबल पर आर एस की बोतल रखकर उसे ग्लास में ढ़ालता गया और काम करता रहा। मैंने किचेन के बर्तन धोए, बीच बीच में खुमारी चढ़ती तो अनजाने में ही वहीं बैठ जाता

क्या आप खुद को कभी भूलते हैं?

भूलते होंगे। जरूर भूलते होंगे। मेरे अपने आपको भूलने की दर बहुत ज्यादा है। कल से चैबीस घंटे में से साढ़े इक्कीस घंटे मैं अपने आप को भूला रहा हूं। दिन भर टूट टूट कर कमरे का सारा काम करने के बाद मैं शाम को दो पैग लगाने के बाद नहाने चला गया। क्या आपने कभी बहुत सारा पी कर नहाया है? भूलवश मैं बाथरूम का दरवाज़ा लगाना भूल गया। फर्श पर साबुन का झाग लगाकर बैठा तो भूल गया कि मैं क्या करने यहां क्या करने आया था। कई बार ऐसा भी हुआ कि नहाते नहाते पानी भरा मग उठाया और पानी डालना भूल गया। एक चेतना थी जो दरवाज़े के बाहर की दुनिया का आभास कराती थी। कमरे के अंदर एकांत में और दुनिया की पैन करती आंखों के कैमरे के आगे में हम सिर्फ ह और म नहीं रहते। बीच की भूली हुई वर्णमाला भी इनमें आ जाती है।

कुछ बासी सा लार था जो मुंह में जिह्वा और चिकने विशाल छत के बीच था। अटपटाई सी ज़बान थी। अव्वल तो कुछ कहता नहीं। कुछ कहता तो उसे बार बार दोहराता जाता। हंसता तो लगातार हंसता जाता। ऐसे ही हालत मैंने संभोग भी की, जहां कुछ शुरूआत करता और फिर राह में ही भूल भी जाता। साथ वाली पे्रमिका का भी धैर्य चुकता गया जब उसने पाया कि मैं यहां बिस्तर पर अपने तलवे रगड़ रही हूं और वो मेरे बदन की थाह लेने के बजाए कपड़े ही टटोले जा रहा है।

आप सुनने वालों में से कई लोग जा चुके हैं। उन्हें अपना कोई काम याद आ गया होगा। हां तो मैं आपसे क्या कह रहा था..... हां आम आदमी। दोस्तों यह व्यवस्था का ही दोष है जब हर शब्द राजनीति से जुड़ जाता है। यह मज़े की बात है जो आपको सुनने में लगेगी कि जब मैं होश में होता हूं तो हमेशा आपको अपना परिचय देने में डरा हुआ रहता हूं। मुझे हमेशा अंदर से यह खदशा लगा रहता है कि कोई मुझे खुश और हंसता देख ले तो कहीं कोई मुझसे किसी तरह की मदद न मांग बैठे। अपने सहकर्मियों के संग पार्टियों में भी मुझे डर सताता है कि कोई मेरे घर पर पार्टी आयोजित करने का प्रस्ताव न रख दे। मैं अपनी प्रेमिका के घर से भी किसी नौजवान को अपने यहां इसलिए नहीं आने देता चाहता कि कहीं वो मुझसे कोई नौकरी दिलवा देने का आग्रह न कर बैठे। (और जब भी किसी ने ऐसा किया है मैंने हमेशा के लिए उससे कन्नी काट ली है) मुझे अपनी पसंद तक छुपा कर रखनी पड़ती है, वे समझते नहीं कि इस रूप को बचाए रखने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

मैं आपको जितना स्वस्थ, हंसमुख, चुलबुला और परिपक्व दिखता हूं उससे कहीं ज्यादा बीमारियां पाले बैठा हूं। हा हा हा हा हा हा।

दरअस्ल सुनने की चीज़ यही है। आप मेरी हंसी में मेरी ग्लानि, प्रशंसा में ईष्र्या, नारी सम्मान में उससे एक विशेष काम वासना सुन सकते हैं। और तो और मैंने कई चीज़ें बुरी बता कर सिर्फ इसलिए छोड़ी हैं क्योंकि वो मुझसे निभ ही नहीं सकती थी।

हां तो प्रिय मित्रों, ज़रा मुझे याद दिलाएंगे कि मैं क्या कह रहा था........

Friday, August 2, 2013

Guzarte Lamhen, passing moments via cinematic angle and '!!!'

27th May, 12 / Rasoi/ 12:55 AM (approx.)

कल रात भारतीय समयानुसार  (how Hindi changes our thoughts!) IST 11:08 पर उसका कॉल आया। हैलो के बाद बीच के समय में हमारे संबंधों की गर्माहट घुल आई। पिछले मार्च में जब हम मिले थे तो हम कोस्टा कॉफ़ी  में हम बैठे थे। पेपर नेपकिन उठाते समय उसने मेरा हाथ पकड़ा था। बहुत धीमे धीमे मुझमें कुछ हुआ था। मैं सिकुड़ने लगी थी। समझ नहीं आया कि कई बार जिंदगी भर धोखा खाने और छलावे को रिश्ते में रहते हुए भी हम नए किसी रिश्ते के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? जबकि हम जान रहे होते हैं कि हमारे बाकी प्यार और रिश्ते की तरह यह भी अनकंडिशनल है। क्या हममें मना कर पाने की इच्छाशक्ति नहीं होती या फिर पहचान की यह दस्तक हमारी जीवन में उम्मीद बनकर आता है। रोशनी भी अजीब शै है, पूरी उम्र अंधेरे की आइसपाइस करते बिता देने के बाद भी हममें कहीं यह धप्पा बनकर पैठ जाती है।

मैं अक्सर सोचती हूं कि आर को आखिर किस चीज़ की तलाश है!
वेल...... अलग होते समय आर ने मेरे बाएं गाल उसके चुंबन लिया जिसने मुझमें एक नया जोश भर दिया था।
 
------पॉज ......../कॉफ़ी ब्रेक /

30th May '12 - I at 8:58 PM

कितने कम लड़कों ने यह महसूस किया होगा कि प्यार करने देना प्यार करने से ज्यादा अहम है!
xxxxx

II- at 11:39 PM

यह कहावत गलत है कि फर्स्ट इम्प्रेशन इज़ द लास्ट इम्प्रॆशन । बाहरी प्रेशर के कारण या फिर पहली मुलाकात में स्वयं को हम अच्छा प्रजेंट करने के कारण अपने मूल गुण से उलट खुद को दिखाते हैं। आत्मविश्वास की कमी वाले ऐसे कई लोगों को मैं जानती हूं जो समय के साथ मिलते घुलते पहचान में मुझे हैरान कर डालते हैं।

31st May '12 - I at 14:56 PM

सोकर देर से उठी। तीस की उम्र होने को आई अब मेरी। अक्सर सुबह जब उठती हूं तो प्यार की कमी महसूस होती है। थर्टीज़ थोड़ी अजीब होती है। यह महसूस करवाती है कि अब हमारे लिए प्यार दुनिया में थोड़ा ही बचा है।  आई मीन कि..... अब मुझे प्यार पाने का नहीं प्यार देने का टाइम आ गया है।

xxxxx
पहली मंजिल से सामने देखती हूं तो पाती हूं ये जाती जुलाई की सीढि़यां हैं। खुले आकाश के नीचे, बारिश की नेह में भींग कर बीच की मुख्य जगह को छोड़कर अपने आस पास के इलाके पर जमी काई को बचाने का प्रयास कर रही है। दीवारों पर यहां वहां मखमली हरी कालीन लगी है।

लॉन के किनारे जंगली खरपरवार उग आए हैं। पी इनके बीच जब उतरता है तो लगता है अपने आप से उलझ रहा हो। दीवार को पकड बढ़ती हर लत्तर उसे किसी उधेड़बुन की तरह लगता है। कहता है - मन हिंसक हो जाता है और पूरी ताकत से उन्हें तब तक काटने का मन होता है जब तक कि सिर्फ और सिर्फ पारदर्शी मैं न बचूं।

3rd of June, 12 at 2:28 AM
सागर बियेविओरल डिसआर्डर से ग्रस्त लगा। आई गेस कि वो चाइल्ड अब्यूज़ का शिकार रहा हो। %$&#&$@

7th June, 12 at 9:46 PM
समटाइम्स वी डोंट चूज़ वर्ड केयरफुल्ली। टूडे आजर्व टोल्ड मी डैट ही वांट्स टॅ हैव सेक्स विद जी। आई इन्नटरप्पटेड एंड करेक्टरेड सिंस यू बोथ आर इन लव इच अदर यू कैन से दैड यू वन्ना मेक लव दिव हर।
सेक्स! हाऊ रिडिकलस!! F****

बाइ द वे लाइफ इज़ गोइंग ऑन  स्वीटहार्ट...... वैसे अभी अचानक से एम की याद आई जो अपने पूरे लेटर में लव की बात करती और लास्ट में अपने सिग्नेचर के बाद पी.एस. डालती कि - दिस इज़ नोट ए लव लेटर

ओह  गाॅश द मेन थिंग आफ्टर दिस लाइन वाज़ थ्री एक्स्क्लामेशन सिम्बल ‘‘!!!’’’

Now, remembering Baby's dialogue from Kasap (Joshi Ji)

"Usne shayad amrood ang lagaaya tha main N ki di hui Vodka laga rahi hoon"

Thursday, August 1, 2013

मरती हुई मछली याद में ज़िंदा रह जाती है


17.03.12 at 11:52 PM

आज अनजाने में ही ए का हाथ मेरे हाथ से छू गया। छुअन को लेकर मुझे लगता है कि हार्ड टच उनता अहम नहीं होता जितना किसी की त्वचा के साथ हमारे त्वचा के रोएं भर स्पर्श करें। इस सिलसिले में मुझे याद है तब मैं बारह की थी और सातवीं में पढ़ रही थी, लंच से ठीक पहले चौथे पीरियड में मृगांक ने एक लंबी गर्म सांस मेरी गर्दन पर छोड़ते हुए मेरे कान की लौ पर अपने नाक से एक धीमा सा स्पर्श कराया। मैं सिहर उठी थी। वो मेरी पहली सिहरन थी। छुअन का वो रोमांच मुझे आज तक याद है।  

खैर......आज के इस स्पर्श से हमदोनों ही चौंक गए। हमने खुद को एक दूसरे से एक झटके से अलग किया। जब भी हमारी नज़र मिलती, हम एक दूसरे को तौलते, बैलेंस्ड बनने की कोशिश करते। फिर रिपोर्ट को समझते समझते मैंने बनावटी गुस्सा अख्तियार किया तो ए पूरी तरह सहम चुका था। मुझे उसका यूं डरना अच्छा लगा।

22.04.12 at 8: 47PM

कल शाम ऑफिस से जल्दी पैक अप हो गया। मैं हूमायूं के क़िले को चली गई। जाने क्या मन हुआ कि मैं किले के अंदर न जाकर बाहर पार्क में ही टहलने लगी। आसमान बहुत गहरा नीला था। नीती जैसे अपने कैनवस पर नीले रंग के ताज़े गीले कलर का इस्तेमाल करती है। मैंने देखा कि आसमान में किले का गुंबद अकेला है। शम्मी के पेड़ के पत्ते मेंहदी के रत्ती रत्ती की तरह बिखरे हुए हैं। पेड़ों के झुटपुटे में कालिमा बढ़ने लगी। एक पेड़ है जिसका नाम मैं नहीं जानती (वैसे तो बहुत से ऐसे पेड़ है जिसका नाम मैं नही जानती) इस पर शाम को कई बड़े पक्षी चील और गिद्ध कयाम करते हैं। ये पक्षी दिन भर जैसे अपने डैने आकाश में फैला कर उड़ते हैं रात को वैसे ही चुप्पा बनकर सिर झुकाए रहते हैं जैसे कोई शुर्तुमुर्ग रेत में अपना सर धंसाए रहता है। तब मुझे इनकी लघुता का एहसास होता है। कोई भी हर जगह बादशाह नहीं होता। मैं प्रकृति की खूबसूरती निहार ही रहती थी कि शाम का धुंधलका कब बढ़ आया पता नहीं चला। शाम रात में बदल गई। 

मैं भी मैं कहां रही!

06.04.12 at 1:28 AM

सीसीडी में आज गर्ग ने अपना हाथ मेरे हाथ पर हिम्मत कर रख ही दिया। मैंने चाहा कि हटा दूं। सो इस दौरान हुए रिएक्शन में मैं हल्का सा कुनमुनाई मगर फिर रहने दिया। मुझे लगा कि मुझे गर्ग के इस टच को समझने की कोशिश करनी चाहिए। उन नज़रिए से नहीं जो मैं उसके बारे में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रखती आई हूं। उस एंगल से भी नहीं जिसके दायरे में वो मेरे लिए पहचाना है। मैंने उसके टच को गर्ग के अस्तित्व से आज़ाद कर महसूसने की कोशिश की। मुझे उसके टच में एहसास और आत्मीयता की वो ऊष्मा महसूस नहीं हुई। एंड देन आई रिअलाइज्ड कि गर्ग इज़ नॉट फार मी। ये भी लगा कि कई बार हम बस पहचान के लोगों के साथ, उसकी आंखों में अपने लिए इज्जत की खातिर, उसकी दोस्ती को तरजीह देते हुए हम उसके साथ सहानूभूति से पेश आते हैं, या फिर दयनीय नज़र से उस भावुक रिश्ते को देखते हैं। डोंट नो डैट मैं खुद को समझा पा रही हूं या नहीं मगर मेरा दिल कह रहा है कि इस चीज़ को जो मैं इस वक्त लिख नहीं पा रही हूं वो बस समझ रही हूं। मुख्तसर बात ये कि प्यार में हमें किसी पर एहसान नहीं करना चाहिए और साथी के साथ और स्पर्श को आज़ाद ख्याल से सुनना चाहिए। अपना मनोभाव उसमें मिक्स कर उस रिश्ते को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

22.05.12 at 4:12 PM

डियर डायरी!
या... या.... यप्प.....। आई नो। आई नो। लांग टाईम नॉट रिटेन। बट मिस्ड यू सो मच। तुम्हारी याद तब तक आती रहती है जब तक तुमसे भागती रहती हूं। और अब.... अब तो बस तुम्हें जी रही हूं। इससे पहले कि भूल जाऊं कुछ बिंदु लिख लूं।

  • काग़ज़ कलम का क्या रिश्ता है? तौलकर बोलना क्या प्यार ?
  • आखिरकार सबको अपने घर ही लौटना है। और
  • मरती हुई मछली याद में ज़िंदा रह जाती है।
लव एन हग्स :)
S

Wednesday, July 3, 2013

इ एम आई


मानो जिंदगी एक पज्ज़ल हो, बहुत तनहा हो, और जिम्मेवारी से भार से लदी फदी भी। ऐसे में वह अपने अपने अंतरतम से कनेक्ट हो गया हो। दुनिया के अंदरूनी सतह पर एक दुनिया और चलती है जिससे वह जुड़ गया हो। जहां खामोशी ही प्रश्न हो, चुप्पी ही उत्तर, मौन की बेचैनी हो। खामोशी ही वाक्य विन्यास हो, यही व्याकरण हो। मास्टर ने नंगी पीठ पर कच्चे बांस की लिजलिजाती करची से सटाक दे मारा हो और शर्त यह हो कि उस जगह जहां तिलमिलाते हुए हाथ न पहुंचे वहां नहीं सहलाना हो। 

वह लगातार फोन कर रहा है। मजाज़ का शेर चरितार्थ हो बहुत मुश्किल है उस दुनिया को संवरना, तेरी जुल्फों का पेंचो खम नहीं है। रिवाॅलविंग चेयर पर एक कान से फोन का रिसीवर चिपका हो और दूसरा हाथ हवा में जाने क्या सुलझा रही हो। जीने के कितने पेचीदा गुत्थी हो, मसले रक्तबीज हैं। अपने मसाइल सुझल नहीं रहे, ग्राहकों की वित्तीय समस्या सुलझाई जा रही है।

कि अचानक एक अधिकारी आवाज़ देकर बाॅस के चेंबर में बुलाता है। बाॅस का केबिन? प्राइवेट नौकरी यानि चैबीस घंटे गर्दन पर लटकती सलीब। दिखावे से शरीर से आॅफिस में उपस्थिति के बारह घंटे। प्राईवेट नौकरी की जैसी अपनी एक सरहद है, और आप मानो फौजी। बाकी के बारह घंटे भी मन से ड्यूटी पर। बाॅस अपने केबिन में क्यों बुला सकते हैं। आलम यह है कि नौकरी के लिए सर भी कटा दो तो बाॅस संवेदनहीन होकर बोले - यार इतने सालों के बात बात पर सर कटाई है लेकिन देखो इसे ठीक से सिर कटाना भी नहीं आया। मर गया लेकिन काश हमारे कंपनी के लिए खून भी देता जाता। फिर वो अगले वित्तीय वर्ष में इस बिंदु पर विचार करने के लिए भी कोई कोड आॅफ कंडक्ट लागू करेगा। खैर.... 

वह केबिन में जाता है। मन में एल लाख सवाल है। सिर्फ सवाल ही तो है। उफ सवालों का शोर कितना है? इतना है कि चमड़ी मोटी हो गई है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा के दौर में इमोशन पर काबू रखना एक खास व्यक्तिगत गुण है जो कम्पटीशन सक्सेस रिव्यू सहित अमरीकी प्रबंधन संस्थाओं में तरक्की के लिए पढ़ाया जाता है। यह व्यक्तित्व विकास की सीढ़ी है। बाॅस नायक के शर्ट की तारीफ करता है। नायक बाॅस की बात को ज़ारी रखता है। बाॅस नायक को बैठने को कहता है। यहां से नायक के जुबान का संपर्क उसके दिमाग से कट जाता है। वह सिर्फ शिष्टाचार के नाते धन्यवाद ज्ञापित करता है। लेकिन उसके मन में सवाल वही है 7 क्या अब इस टुच्ची सी नौकरी से भी (अल्लाह माफ करना यही इस वक्त भी भगवान है) हाथ धोना पड़ेगा? 

कि अचानक आने वाला एक एक लम्हा स्लो मोशन में बदल जाता है। अरे ये क्या हुआ ? कैसे हुआ? यह भला हो कैसे सकता है ? क्या कान जो सुन रहा है, दिल उसे समझ भी रहा है? कहीं संघर्ष के नीले सपने उसे दिन दहाड़े सच में नहीं आने लगे? मैं सच्चा हूं या जग झूठा है? यह दृश्य हो भी रहा है या नहीं? 

बाॅस उसे कल से पक्की नौकरी पर रखने का प्रस्ताव रखता है। नायक के अंदर एक उत्तेजना सी उठी है। प्रशांत महासागर के गर्त में समाए किसी ज्वालामुखी में कोई वलवला सा उठा है। काश दिल से भी मैग्मा निकलकर पूरी धरती को पिघलाता हुआ वह देख सकता। यह प्रतिक्रिया व्यक्त कैसे हो? शब्दों में तो संभव नहीं। इस वक्त तो मुठ्ठी इतनी कसी कि दीवार को बारीक बुरादों में बदल दे। लोहे की छड़ चकनाचूर कर दे। गैर इरादती तौर पर मा....द....र.....चो.......द ही बोल दे। और ऐसा बोलते हुए उसकी वाइस उत्तेजना को व्यक्त करते हुए क्रैक हो। लेकिन फिर वही बात..... इमोशन पर कंट्रोल, व्यक्तित्व का विकास। लेकिन दिल तो है न संगो खिश्त....... सो प्रस्ताव सुनकर आंखों में आंसू भर आते हैं। पलकों का दरया छलकने को ही होता है। कपोल सहित गाल फड़कने लगते हैं। मन करता है एक मुक्का टेबल पर दे मारे और कहें - यस! या किसी बाॅलर द्वारा मिडिल स्टंप उखाड़ने पर जैसी प्रतिक्रिया दें और कैमरा उसे रिवांइड मोड में दिखाए। 

हम मध्यमवर्गों के लिए नौकरी यही चीज़ है। देवता। फरिश्ता। खुदा। इसके आगे सब हारे हैं। नतमस्तक हैं। इसी से सभी संभलते और संभाले जाते हैं। यही हमारे लिए अध्यात्म है। इसी से हमारा दुख भी जश्न मनाता है। इसी से हम राजा हैं। इसी से दुनिया चूतिया है। इसी के कोई मां का लाल हमारा कुछ नहीं उखाड़ सकता। यही हमारा हैप्पीनेस है। 

अपने व्यक्तित्व में कितने भी बगावती हों। यहां का बगावत माघ की रात में अंगीठी सेंके जाने बाद उस पर उलटा दिया एक लोटा पानी है।

द परस्यूट आॅफ हैप्पीनेस का यह अंतिम टुकड़ा देख कर उठा हूं। रात के एक बजकर तीन मिनट हो रहे हैं। बेचैनी सी महसूस हो रही है। बाहर बारिश है। ऊंचे लैम्पपोस्ट की गंदलाई रोशनी में बारिश रूई के फाहों सी झर रही है। हथेली पर कुछ बूदें लेता हूं। ये फाहे ठंडी हैं।

फिल्म के क्रेडिट्स उभर रहे हैं। प्रकृति नहीं बदली है, हमारी प्रकृति बदल गई है।

Friday, June 28, 2013

जिंदगी क्लोज-अप में ट्रेजेडी है, लेकिन लाँग-शॉट में कॉमेडी।


बहुत सारा प्यार करने के बाद यूं अचानक लगता है कि जैसे अब प्यार नहीं कर रहे हैं। अब अपने अंदर का अकेलापन किसी से सांझा कर रहे हैं। कि जैसे एक समय के बाद ये बड़ी वाहियात शै लगती है। लगता तो ये भी है कि प्यार नहीं होता ये बस आत्मीयता, घनिष्ठता उसके साथ में सहज लगना, अपने मन की बात को बेझिझक उसके सामने रख देने की बेलाग आज़ादी, फलाने की आंखों में अपने इंसान भर बस होने का सम्मान वगैरह वगैरह में बंट जाती है।

कल रात यूटीवी वल्र्ड मूवीज़ पर एक सिनेमा देखा। ए गर्ल कट इन टू। विश्व सिनेमा बस उस बड़े फलक को महसूसने और सिनेमैटोग्राफी के लिए देखता हूं। कम लोग हैं जिनके लेखन के शब्दांकन और उसका फिल्मांकन पर्यायवाची हो सकता है या कागज़ पर है।

कथित फिल्म की नायिका एक टी.वी. कलाकार है और एक 50 साल के लेखक से प्यार कर बैठती है। मुहब्बत भी अजीब शै है साथ ही बौद्धिकता भी। अपनी जवानी निसार कर रहा एक  जूनूनी लड़का उसे प्रोपोज कर रहा है लेकिन उस लेखक का भेजा महज एक बुके उसे अंदर से रोमांचित कर देता है। वह सब कुछ छोड़कर भागी भागी उसके पास जाती है। यहां बिस्तर साझां करना कोई शर्त नहीं। 

कहानी के बीच में थोड़ा विराम देकर मैं खुद को वही खूबसूरत नायिका मान यह सोचने लगा कि अगर मैं एक उन्मादी और समर्पित संभोग के बाद इस अतिबौद्धिक लेखक के सीने के बालों में उंगलियां फंसाए किस ख्याल से गुज़र सकती (याद रहे मैं नायिका) हूं।

कहानी पर आते हैं। ये प्यार के शुरूआती और जीवन के गुलाबी दिन हैं। मगर अच्छी स्क्रिप्ट भी लाइफ की तरह ही होती है। सच तो ये है कि इसकी स्क्रिप्ट नहीं होती मगर इतना तय होता है कि आदमी थोड़े दिन बाद कभी असुरक्षा का शिकार होकर या कभी समझदारी से क्या खोया- क्या पाया का हिसाब किताब लगाने बैठ जाता है।

बहरहाल, अतिमृदुभाषी लेखक जोकि शादीशुदा है वह नायिका से शादी करने से मना कर देता है। हालांकि वह उस लड़की से प्यार करता है। कुछ इस तरह कि तुम्हें सार्वजनिक रूप से अपना नहीं सकता मगर तुम्हें किसी और का होने भी नहीं देना चाहता है।

नायिका से झूठ बोलकर जाने वाला लेखक बाथटब में रेडियो पर उस टी.वी. कलाकार नायिका की जल्दबाज रईस युवक से शादी की खबर सुनता है। शादी वाले दिन वह लड़की के घर पहुंचता है। और फिर से वही सब कुछ शुरू करने का प्रस्ताव रखता है। लड़की उसे एक आम समझ वाली आदमी के रूप में बुरी तरह ज़लील करती है, और गेट आऊट कहती है, जो दर्शकों के अपने मन की बात है।

इन सब के बीच दृश्यांकन बहुत खूबसूरत है। शहर में ट्रामों का गुज़रना, पाॅलिस्ड वुडेन कलर के बीच किताबों की नीलामी के दृश्य। लड़की और सुलझे हुए लेखक के बीच के दृश्य। अगर हम पागल हैं और देर सवेर हमें इसका एहसास हो ही जाता है। अगर हम अव्यवस्थित हैं तो हम एक सुलझी डोर खोजते हैं। अगर हम मानसिक असुरक्षा या किसी भी तरह के असुरक्षा के शिकार हैं तो साथी में अपना सब कुछ उड़ेलकर उससे भी वैसा ही आऊटपुट चाहते हैं। जिंदगी यहीं कटु, सच्ची और अनस्क्रिप्टेड हो जाती है। फिल्म की तरह असल लाइफ के किरदारों में भी आम और परिपक्व समझ में झगड़ा है। ऐसे में ही कुछ दिन पहले अपनी ही एक महिला दोस्त की बात याद आ रही है जो अपने पति से कई दिनों से मन न मिलने के बायस बिस्तर पर एक रात कह उठी कि - जब शरीर से चिपकते हो तब सोचते हो कि मन और दिल से भी हमें वैसे ही मिलना चाहिए। ये कैसा रिश्ता बनाते हो कि अपना मन और स्वभाव को झगड़ने के लिए बचा कर रख लेते हो और शरीर परोस देते हो?

ज्यादा टी.वी. और सिनेमा नहीं देखता सो मैं पूरी फिल्म नहीं देख पाया।

और तमाम उठापटक के बाद सुबह से इस ख्याल से गुज़र रहा हूं कि प्यार से बड़ा कोई पाॅलिटिक्स नहीं है।

(शीर्षक चार्ली चैपलिन की उक्ति है.)

Tuesday, June 18, 2013

ट्रेडमिल पर स्लो मोशन में भागती लड़की


तुमसे ही तो कायनात सारी
तुमसे ही तो ऊँचा फलक

आंखे ऐसी कि जुबान बेमतलब 
नमक-तेल और पकाई हुई लाल मिर्च में लिपटी रोटी

गुलाबी होंठ पतले-पतले
जैसे छप्पर से लिपटा लौकी का नन्हा टूसा
किसी बच्ची के नर्म गर्म उंगलियों का स्पर्श

नमी भरे चमकीले बदन पर उभार
जैसे जैसलमेर के रेगिस्तान में तेज़ हवा से रातों रात जमा हुए रेत के धोरे

कमर जैसे बर्थडे पर फुलाया जा रहा आकार लेता गुब्बारा
पहली बारिश के बाद पके अमरूद पर एक कट्टा दांत काटने का निशान

नितंब
उजले बालू में गुना दर गुना पैठ गया और खूब पानी खाया घड़ा

मेरी,
शिकार हो चुकी सिकुड़ती सांसे
लो ब्लड प्रेशर का शिकार मैं
इनसे लग कर सोऊं तो लगे
बुखार में कोई माथे और तलवों पर पट्टियां करता हो कोई।

Monday, June 10, 2013

एन जी शॉट्स के बीच का क्लासिक क्लिक

भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

वे हंसती हैं तो मटर की छिमियां खुलने लगती हैं। उजले रेत पर लेटे परवलों के नीचे नमी आ जाती है। गंगा में उतरी नावें ज़रा ज़रा हिचकोले लेने लगती है। खुद गंगा का पानी भी तो रहस्यमयी होने लगता है।

उनकी हंसी आधी पिघल चुकी मोमबत्ती है। एक गुज़र चुका अधूरा फसाना है। उनकी हंसी किसी उत्कृष्ट साहित्य के छह छूट गए पन्ने हैं। किसी दिलचस्प सिनेमा के बयासी प्रतिशत अंश देखने बाद कट गई लाइट के बायस क्षोभपूर्ण एहसास के बाद की अपनी कल्पना है। 

उनकी हंसी एक उजले बोर्ड पर एक बिंदु है।

सुराही के बेहद महीन रंध्रों के बीच पानी का बारीक चमकीलापन है।






भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

Sunday, June 9, 2013

एपिक के सेलेक्टेड सीन्स !



भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

उन्हें देखता हूं तो लगता है वो पटना की ही हैं हमेशा से.... उनके ताज़ा कंधे से उसी शहर ठहरे हुए शहर की महक आती है जहां की मूर्तियां फिर से उनके हंसी का इंतज़ार करते जागना भूल गए हैं। मुझे यकीं नहीं होता जब कोई कहता है अमां यार वे तो वीनस की हैं।

कम उम्र में ही उनके होंठ पूरी तरह खिल चुके अड़हुल या गुलमोहर की तरह लगते हैं।

उनका ख्याल आते ही पेट में मेरे गुलाबी तितलियां उड़ने लगती हैं।
याद आने लगती है सोनू निगम के जान और दीवाना सुनने वाले दिन.... कि आधे आधे पैसे से आर्चीज़ से आॅडियो कैसेट खरीदना और एक एक रात के लिए उसे अपने पास रख रात भर बजाना फिर उन गानों को निचोड़ कर जो रस निकले वो कागज़ पर लिखना, अगले दिन उन्हें देना।
हो ओ ओ आ हा हा.... हो ओ ओ आ हा हा
बैक टू बैक सिंगगिंग....

क्या वे जानती हैं कि वो मुझे अच्छी लगती हैं ?

क्या वे वाकिफ हैं कि मेरा उनसे जी लग गया है?

मुहल्ले का कोई नादान बच्चा अपनी तोतली आवाज़ में उनके पीछे दौड़कर जाए और उनका हाथ पकड़ हांफते हुए उनसे कह दे -दीदी...... वो पलोछ वाले भैया को आप बहोत अच्छी लगती हैं। वो आपको प्याल करते हैं।

ये सुन वो शरमाते हुए हंसे और बच्चे को गोद में उठाकर पूछें - कैसे ?
बच्चा उनके गालों पर एक गीला सा मासूम बोसा ले कहे - ऐछे।
वे अपने गीले गालों को दुपट्टे को फिर से पोंछते हुए हंसे।

किसी के भी मार्फत हो, समय, लम्स, दृश्य, एहसास और चुंबन सब कुछ तो साझा है।


भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

डंप फुटेज के फ्रीज़ शॉट्स


भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

जो उनकी जुल्फों में चने को जो बांध कर रखो तो भोर तलक अंकुरित भी हो जाए और काला भी न पड़े।

मैं आदिवासी बन गया हूं। जब दूर तक बारिश के आसार नहीं हैं तो फुहारों सी उनकी हंसी को अपनी हंसुली बनाकर पहन रखा है। उमस का ये मौसम चंदन महका रहा है।

उनकी हंसी विषुवतीय रेखा पर बसर करते लोगों की दूधिया मुस्कान।

समझ नहीं आता उनकी जान ले लूं या अपनी जान दे दूं।

नहीं समझ पाता उन्हें प्यार करना चाहता हूं उनके व्यक्तित्व से प्यार है।

क्या जिंदगी उनके पुष्ट उभारों में छिपा कोई अमरूद का नन्हा सा सौंधा बीज है?






थिरमना कौम बदलना चाहता है।

भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

Saturday, June 8, 2013

सुरमई याद के क्रोमा कलर


 भाईसा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या ?

वे इस तरह हंसती हैं जैसे उमस भर मौसम के बाद एक रात बारिश होती है। सुबह जब आप टहलने निकलते हैं तो अधिकांश सतह सूख चुकी होती है लेकिन छोटे छोटे गड्ढ़ों में पानी के चहबच्चे जमा हो जाते हैं।

सकेरा हुआ ठहरा पानी सपना है और उदास और सपाट सतह मेरा जीवन। मैं ढ़लान खोजते हुए गोल्फ की गेंद की उन चहबच्चों में डुबक जाना चाहता हूं।

माफ करें मैं गेंद का आयतन भी नहीं पाना चाहता क्योंकि वो एक शुरूआती डुबकी के बाद उन चहबच्चों में उतराने लगती है। कुछ कुछ ऐसे ही हेलती है जैसे बीच नदी नाव के चारों ओर डूबते बच्चे बचाने की गुहार लगाते हैं।

मैं भूरे कंचे वाली उन आंखों की रोशनी की गहराई में किसी आवारा लड़के की सिद्धस्त उंगलियों द्वारा कंचे की तरह पिल जाना चाहता हूं।

मैं उसकी हंसी के निर्वात में गौरैया का पंख बन जाना चाहता हूं।

भाईसा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या ?

वन टेक ओ. के.


भाई सा’ब आपने उनका हंसना सुना?

हंसती है तो लगता है मानो हलक में छोटी छोटी मछलियां फिसल रही हैं। लगता है गले में कोई गीला गीला रंदा लगा पैड लगा है। नारियल का खोईया। अलगाते चलिए। जाने कहां जाकर, कितनी तहों में फल मिले।

वह इज़ाडोरा डंकन की तरह जीवन में आ कर दस्तक दे जाती है। उसका गला अब तक कुंवारा है।

वो इस तरह हंसती हैं जैसे सरकारी स्कूल में आप पड़ोस वाली सहपाठी के रानों पर मोटी मोटी च्यूटियां काटते हैं। जैसे हंसी समेटते समेटते दांतों के बांध को तोड़ बिखर गई हो। जैसे पारखी मजदूरिन खुदे खेत से भी घाघरा भर आलू निकाल लाए।

स्पंजी गालों में थरथराता भंवर बनता है, धूप में रखा शीशी में बंद आयोडीन पिघल जाता है, पानी में हिलता लेंस का क्लोज अप, डर्बी घोड़े दौड़ते हुए किसी मोड़ पर मुड़ना, पंद्रह हज़ार हाॅर्स पाॅवर की ऊर्जा, धीमी गति से न्यूट्राॅन  कणों का हमला और नाभिकीय विखंडन।

और आपको बरबस ही उसे प्यार करने को मन हो आता है। मैं उसके प्यार में जी रहा हूं, क्या कहें मर रहा हूं, या कहें कि मरते हुए जी रहा हूं या ये ही मान लें कि जीते हुए मर रहा हूं। माफ करें मैं एक्जेक्टली नहीं जानता कि मैं जी रहा हूं या मर रहा हूं।

भाई सा’ब आपने उनका हंसना सुना?

Friday, May 31, 2013

रेडियो बरक्स हिंदी फ़िल्मी गीत


सिगरेट की आदत तब तक नहीं लगती जब तक दोस्तों के बीच मुंह में धुंआ भर कर, जबरदस्ती खांसी रोककर, गले की नसें सूजाकर और आखों में उसकी जलन को रोककर लाल करते हैं। सिगरेट की आदत उस दिन लग जाती है जब आप सुबह के सात बजे खास तौर से खूंटी पर टंगी कमी़ज को उठा कर उसके दोनों हत्थे में सीढ़ी से उतरते हुए उन हत्थों में डालते हुए, गली में चलते हुए उनके बटन लगाते हुए नुक्कड़ पर की गुमटी पर पहुंच जाते हैं और सिर्फ एक अदद सिगरेट दुकानदार को देने बोलते हैं। उस दिन सिगरेट की आदत लग गई पक्की समझिए।

आज भी जो लिख रहा हूं वो भी कुछ ऐसा ही समझिए। बिस्तर पर था और एक बेचैनी थी, करवट काट रहा था। रहा नहीं गया तो उठ कर लिखने बैठ गया हूं। कोई तोप या धांसू चीज़ नहीं लिख रहा, न साहित्य रच रहा हूं। बस पिछली बार की तरह ही हिंदी फिल्मी गीतों के मुताल्लिक कुछ बातें हैं। जैसे जैसे मन में बातें आ रही हैं लिख रहा हूं।

पृष्ठभूमि में रेडियो चल रहा है और जो बात दिमाग में फिलहाल छन कर आ रही है वो ये कि हिन्दी फिल्मी गीतों में ख्य्याम का संगीत अजब कोमलता लिए हुए है। उनके संगीतबद्ध किए गीत जब सुनता हूं तो लगता है जैसे किसी कमसिन के सीने पर उसका दुपट्टा सरसरा रहा हो। या फिर ऊंचे गोल बिस्तर पर झीने परदे में कोई नाजनीन बैठी हो, जो इतनी छुपी हो कि दिमाग में बहुत ज्यादा रोशन हो रही हो।

ख्ययाम का संगीत यही है, इतना सिंपल कि कई बार लगता है उन्हें ये इल्म हो कि मुझे अपनी विद्वता दिखा कर गीत के बोलों को मारना नहीं बल्कि और उभारना है। आंचल कहां मैं कहा हूं, ये मुझे ही खबर नहीं, न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया, लता मंगेशकर का गाया यह गाना और ऐसे ही कई गीत शब्द प्रधान हो जाते हैं। उनकी पत्नी जगजीत कौर जो कि खुद बहुत अच्छा गाती हैं, उन्होंने बहुत कम मौके दिए। उनका गाया देख लो आज हमको जी भर के हृदय विदारक गीतों में से एक है और इसका संगीत कलेजा चीड़ देता है। कहते हैं टेक्स्ट अपनी आवाज़ खुद चुनता है। इस गीत के शब्द ने जैसे अपनी सही आवाज़ चुन एक मुकम्मल पनाह पा ली हो जैसे।

सवाल उठता है कि रेडियो कैसे सुना जाए। यकीन मानिए रेडियो सुनना आपमें संगीत की अच्छी समझ पैदा कर सकता है। रेडियो तेज़ आवाज़ में सुनने की कतई कोई चीज़ नहीं। इस पर गीत सुनने के दरम्यान सामान्य दर से हमेशा दो दर्जा नीचे रखिए। ऐसे में यह कल्पनाशक्ति तेज़ कर देता है। वो जो शब्द सुनने से छूट गया उस पर आपका दिमाग हाथ आजमाने लगता है और वहां शब्द फिर आप चुनने लगते हैं।

रेडियो नाटक खासकर जिसमें बेबसी के दृश्य ज्यादा हों उन्हें सुनने पर वो बेबसी हमारी हो जाती है। रेडियो से छन कर आती आवाज़ एक साबुत जिस्म हो जाता है दुर्योधन के पत्थर के बदन की तरह जिसकी जांघें अब भी सजीव हैं। एक रेडियो हममें कई एहसासात भर सकता है। मैं आजकल के एम एम चैनल्स की बात नहीं कर रहा, इससे मैं रत्ती भर प्रभावित नहीं हो पाता। इनमें सुर तो नहीं ही है अलबत्ता शोर बहुत है। खैर....

मैं बात कर रहा था गीतों से अपने याद की। शुरूआती दौर की बात है। हफ्ते में मुझे एक गीत गाना होता था पिताजी के सामने। तब रेडियो पर किशोर कुमार बहुत आसानी से समझ में आ जाते थे। खासकर राजेश खन्ना पर फिल्मांकित गीत। उन गीतों की फक्कड़ता, उनमें छुपी लापरवाही और दर्द जैसे कि अधिकांश हिंदुस्तानी ऐसे ही होते हैं, मुझे भी ये गीत खींचते थे, इन्हें कॉपी करना आसान था। रफी तब एकदम समझ नहीं आते थे। लेकिन जैसे जैसे समय गुज़रा रफी के आगे कोई नहीं टिक सका। रफी की आवाज़ एक साहित्यिक क्लास किस्म की आवाज़ है, जो बहुत पाक भी है। वो अपने गायन में डूबकर भी एक दूरी बनाए रखते हुए से प्रतीत होते हैं।

दर्द भरे गीतों के लिए मुकेश की आवाज़ एक अजीब किस्म की उदासी देती है। इसे सुनकर मैं अक्सर अवसाद में चला जाता हूं। मैं तो इक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर। जो राह में मिल जाओगे, सोचेंगे तुम्हें देखा ही नहीं। अभी तुमको मेरी जरूरत नहीं बहुत चाहने वाले मिल जाएंगे, अभी रूप का एक सागर हो तुम, कंवल जितने चाहोगी खिल जाएंगे या फिर मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो, दोस्त दोस्त न रहा या चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया। सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देती। वक्त करता जो वफा आप हमारे होते, ऐसे कई गीत हैं जो जब किसी इतवार की दोपहर को सुनता हूं तो ये सिलसिला खत्म नहीं होता।

इसी दर्द और उदासी के क्रम में दस्तक फिल्म का वो गीत भूलाए नहीं भूल सकता जब मदनमोहन खुद अपनी जिगर चाक कर देने वाली आवाज़ में गाते हैं - माई री मैं का से कहूं पीर अपने जिया की। सोचता हूं क्या सोचकर गीतकार ऐसे गीत लिख जाता होगा। क्या खाते होंगे और इस गीत के शब्द रचने के दौरान कैसी मनःस्थिति होगी लिखने वाले की? ये उन गीतों में है जो सुनकर ये जलन होती है कि काश ऐसे हम भी लिख सकते!

जलन के इसी क्रम में मेरे महबूब फिल्म का वो गीत रफी ने गाया है - मेरे महबूब तुझे मेरे मुहब्बत की कसम। ये गीत अलहदा और बेमिसाल है। रफी ने इसे आवाज़ देकर मुझे लगता है अमर बना दिया है। संगीत को भूल जाईए। इस गीत का अगर प्रिंट आऊट लेकर अगर इस पर गौर किया जाए तो यह बेसिकली एक निहायत खूबसूरत कविता है जिसमें आदि, मध्य और अंत तीनों है। अपने उरूज पर जैसे जैसे यह पहुंचती जाती है बला हुई जाती। सामने आ कि बस यही मेरा इलाजे गमे तन्हाई है। उफ़, उफ़ और उफ़। इश्क में जीना और तभी ऐसा लिखना संभव है। ये ऐसा गीत है जो सुलाता भी है, रूलाता भी है और नींद से जगाता भी है। रफी की आवाज़ जैसे वीणा के तार उंगली काटते हैं।

वहीं कुछ गीत गायक और गायिका दोनों से गवाएं गए हैं। इनमें कुछ अच्छे हैं जैसे - तुम मुझे यूं भूला न पाओगे। लेकिन कुछ में ये प्रयोग फीका हो गया है जैसे मासूम फिल्म का गीत - तुमझे नाराज़ नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं। लता की आवाज़ में ये गीत लोरी होते हुए लचर हो जाती है, ऐसे ही अंदाज फिल्म का ये गीत - जिंदगी एक सफर है सुहाना, फीमेल आवाज़ में यह बेअसर है।

कहते हैं शहनाई शादी का प्रतीक है। हुस्नलाल भगतराम द्वारा संगीतबद्ध और रफी का गाया ‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाऊं, मेरे दिल में जल रही है, अरमान की चिताएं' में शहनाई वादन सुनिए। या फिर राग गुनकली में उस्ताद बिस्मिल्लिा खां साहब द्वारा बजाई जादूई शहनाई - 'दिल का खिलौना हाय टूट गया,' सुनिए। खबरदार जिन्हें शहनाई से शादी याद आती हो ये पूर्वाग्रह तोड़ देगा।

Wednesday, May 29, 2013

याद बरक्स हिंदी फ़िल्मी गीत

सुब्ह से एआईआर की उर्दू सर्विस सुन रहा हूं। इतने अच्छे अच्छे फिल्मी गीत आ रहे हैं कि काम करते करते उंगलियां कई बार ठिठक जाती हैं और उन गीतों के बोलों में खो जाता हूं। गज़लें कई बार दिमाग स्लो कर देती हैं और एक उदास सा नज़रिया डेवलप कर देती हैं। कभी कभी इतनी भारी भरकम समझदारी का लबादा उतार कर एकदम सिंपल हो जाने का मन होता है। रेट्रो गाने सुनना, राम लक्ष्मण का संगीत ‘उनसे कहना जब से गए हैं, मैं तो अधूरी लगती हूं’ टिंग निंग निंग निंग। इन होंठों पे प्यास लगी है न रोती न हंसती हूं। लता ताई जब गाती हैं तो लगता है, मीडियम यही है। इन गानों में मास अपील है। सीधा, सरल, अच्छी तुकबंदी, फिल्मी सुर, लय और ताल जो आशिक भी गाएगा और उनको डांटने वाले उनके अम्मी-अब्बू भी। समीर के गीत गुमटी पर के पान के दुकान पर खूब बजे। ट्रक ड्राईवरों ने अल्ताफ राज़ा को स्टार बना दिया। और कई महीनों बाद जब इन गानों पर हमारे कान जाते हैं तो लगता है जैसे दादरा, ठुमरी, धु्रपद और ख्याल का बोझ हमारा दिल उठा नहीं सकेगा। हम आम ही हैं खास बनना एक किस्म की नामालूम कैसी मजबूरी है। हांलांकि यह भी सच है कि देर सवेर अब मुझे इन्हीं चीज़ों तक लौटना होता है, नींद इसी से आती है और सुकून भी आखिरकार यही देते हैं।

शकील बदायूंनी साहब ने वैसे एक से एक कातिल गीत लिखें हैं। याद में तेरी जाग जाग के हम रात भर करवटें बदलते हैं। रफी के गाए गीत तो लगता है सारे क्लासिक लगते हैं। उन्होंने 98 प्रतिशत अपने लिए सटीक गीत चुने और 99 प्रतिशत अच्छे गीत गाए हैं। ‘लचकाई शाखे बदन, छलकाए ज़ाम। वो जब याद आए बहुत याद आए का एक पैरा ‘कई बार यूं भी धोखा हुआ है वो आ रहे हैं नज़रे उठाए’ प्यार की सुकोमल एहसास में से एक है। वहीं लता का गाया ‘खाई है रे हमने कसम संग रहने की’ का एक मिसरा प्रेम को बड़े ही अच्छे शब्दों में अभिव्यक्त करता है। -ऐसे तो नहीं उसके रंग में रंगी मैं, पिया अंग लग लग के भई सांवली मैं। ये सोच कमाल है जो अंदर तक गुदगाते हुए सिहरा से देते हैं।

उदास गीतों में थोड़ी सी बेवफाई टायटल गीत का वह लाइन ‘जो रात हमने बिताई मर के वो रात तुमने गुज़ारी होती या फिर आगे की पंक्तियों में ‘उन्हें ये जि़द के हम पुकारें, हमें ये उम्मीद वो बुलाएं, है नाम होठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें’ मुहब्ब्त के कशमकश को शानदार तरीके से व्यक्त करता है।
कुमार सानू की मंथर तालाब में फेंके गए सीधी लाइन में गाया ‘मेरे दिल भी कितना पागल है’ इतना एक रेखीय लय में लगता है। इसके अलावा सत्रह साला ईश्क तब फिर से जिगर चाक करता है जब उन्हीं की आवाज़ में ‘दिल तो ये चाहे पहलू में तेरे बस यूं ही बैठे रहें हम’ सुनते हैं।

ये यादें मेरी जान ले लेगी। पटना के सदाकत आश्रम में लगे सरसों के फूल याद आने लगते हैं। और त्रिकोणमिति बनाते हुए अक्सर किसी सुंदर, मीठे गीत को सुनते हुए सोचता कि इसे कैसे फिल्माया गया होगा। दरअसल रेडियो यही है, दृश्य को होते हुए कान से देखना। शराबी अमिताभ के जन्मदिन पर किशोर के गा चुकने के बाद नायिका का कहना कि ‘ओ मेरे सजना लो मैं आ गई’ गाते ही म्यूजिक का तेज़ गति से भागना बंद आंखों से सोचा था तो लगा कि लंबे लंबे पेड़ों के जंगलों में यहां दोनों एक दूसरे को खोजते हुए भाग रहे होंगे। मन के सिनेमा में समानांतर ट्रैक पर हमेशा एक और सिनेमा चल रहा होता है।

पुराने गानों को देखते हुए खास कर 80 के दशक के गीत को देखते हुए ये साफ साफ लगता है कि "बहुत सारे अच्छे गानों को पिक्चाईजेशन बुरा है।"

तुम्हें भी ऐसे ही सोचता रहता हूं जानम। नवंबर की धूप में दिन भर पीठ सेंकते हुए। जाती मई में पसीने पोंछते हुए। देर तक रोटी चबाते हुए कि जब उसका स्वाद मीठा हो आता है, कई बार निवाला मुंह में है यह भूल जाता हूं।
इसी क्रम में तीसरी कसम में शैलेंद्र का लिखा और मुकेश की गाई गीत के बीच रूक कर जब राजकपूर अपनी मासूम आवाज़ में कहते हैं- ‘‘मन तो जानती हैं न आप!’’ तो यह भी याद रह जाता है।

एक पैरलल आवाज़ यहां भी सुनिए कि कैसे आंख और मन के सिनेमा में एक ही वक्त दो दो सिनेमा चलते हैं।

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...