Friday, March 29, 2013

खैर छोड़ो....मैं भी कितना वाहियात आदमी हूं

नीले घेरे वाले उजले सर्चबॉक्स मैंने लिखा ‘एस’ तो चार पांच परिचित दोस्तों के नाम छन आए। छठा जो है वो तुम्हारा चेहरा है जो कुछ क्षण में ही तुम्हारे फोटो अपडेट करने के बायस बदल जाता है। मैंने अक्सर उस छठे पर क्लिक करके तुम्हारे पेज पर जाता हूं। शुक्र है मेरी जानकारी में ऑरकुट की तरह फेसबुक अब तक यह नहीं बता रहा कि रिसेंट विज़िटर कौन कौन है? बदलते दौर में चीज़ें अब गोपनीय नहीं पाती। सबको हमारा अता पता मिल जाता है। डाटा सुरक्षित नहीं रही। मेरे ई-मेल पर अक्सर वियाग्रा वाले अपना प्रोमोशनल ऐड भेजते रहते हैं। कहने को यह बल्क मैसेज है लेकिन अगर गौर किया जाए तो समझ में आता है कि कोई खिड़की है जहां से कुछ रिसता रहता है। अगर कभी ऐसा हो असली जीवन में भी कि लोग देख सकें कि हमारे मन की खिड़की में रिसेंट विज़िटर कौन है तो रिश्तों पर बुरा असर पड़ सकता है। खैर छोड़ो....मैं भी कितना वाहियात आदमी हूं कहां से कहां बह जाता हूं।

मैं तो यह कह रहा था कि पिछले कुछ दिनों में तुम्हारे पेज पर इतना बार गया हूं कि छठा पायदान एक एक सीढ़ी ऊपर चढ़ता हुआ नंबर एक बन गया है। अब आलम यह है कि सर्चबॉक्स में अब अगर ‘के’ भी टाइप करता हूं तो तुम्हारा नाम फिल्टर करने लगा है। ‘एन’ लिखूं तो भी तू, ‘यू’ लिखूं तो भी तू.... मुझे लगता है यह असली सर्च है। फेसबुक भी अजीब चीज़ है, एक खामोश बैरा जो जानता है हमारा यहां आने का उद्देश्य क्या है। जिसे यह ट्रेनिंग दी जाती है इस रेस्तरां का फलां टेबल बुक है सो देर तक खाली मत बैठने देना।

तुम्हें कभी कभी लगता होगा न कि मैं कितना घुन्ना आदमी हूं और यह कल्पना भी करती होगी कि कभी जो मुझे मिलना हुआ गर सच में तो इस रास्कल को कॉलर से पकड़कर फलाना बात पूछूंगी, चिलाना सवाल करूंगी। लेकिन तुम्हारी ही तरह मेरे पास जबाव नहीं होते, सिर्फ सवाल हैं, बेहिसाब मौलिक सवाल। जबाव भी है लेकिन वो सब बस समझौते से उगा है, जबाव में घनघोर बदलाव है, यह मौलिक नहीं है, यह कभी कुछ है तो कभी कुछ। ग़ौर करोगी तो पाओगी जबाव मूड पर निर्भर करता है। एक प्रश्न है जो अटल और नंगा खड़ा रहता है। खैर छोड़ो....मैं भी कितना वाहियात आदमी हूं कहां से कहां बह जाता हूं।

अरसे बाद वहां पर तुम्हारे हाल के फोटोज़ देखे। देख कर बहुत कुछ सोचा जिसे पहले पहल लाल गुलाबी और फिर कंट्रास्ट कलर कहते हैं। थोड़ी देर तक तो मैं बच्चों की तरह तुम्हें देखा। फिर किसी समझदार हत्यारे की तरह जो खून कर चुकने के बाद खुद पर हैरान होता है इस लड़की से....इस लड़की से जिससे मैं इतना प्यार करता हूं, इसका खून कैसे कर गया। उसकी उंगलियां टटोलता है पर कुछ पूछने की जरूरत नहीं समझता। अब हम तो तुम्हारे पहलू में आ नहीं सके लेकिन तुम मेरे दामन में दम तोड़ो यह ख्याल भी क्या कहीं से कम हसीन है?

दुपट्टा सलीके से अब लेने लगी हो। और इस संभालते वक्त चेहरे पर की हया भी देखने लायक है। क्या आगे चलते अब भी हुए यूं अचानक पीछे पलट कर कर देखकर हंसती हो? क्या मेरी तरह अब भी कोई तमीज़ से छेड़ता है तो चेहरे पर ऐसा एक्सप्रेशन लाती हो जैसे खट्टी दही चखी हो? क्या साइड के टूटे दांतों वाली खिड़की अब भी हमेशा झांकती रहती है? क्या वहीं जहां से तुम्हारी नाक की बनावट माथे में मिलकर खत्म होती है वहीं से भवहें अपनी ऊंची उड़ान भरती हैं? माथे पर के बादल ऐसे कैसे संभालती हो? क्या अब भी तुम्हारी छुअन बीत जाने के बाद भी मोम के स्पर्श जैसा ही अनुभूति देता है? तुमने एक बार आइसक्रीम खाने की ज़िद में मुझे कोहनी से अनजाने में छुआ था मुझे आज भी लगता है जैसे मेरे बदन का वो हिस्सा बबल वाले पैकिंग में लपेटा हुआ। मेरे ज़हन में छुअन की तरह तुम्हारी याद भी कुंआरी है। क्या उन ऑलमोस्ट स्लीवलेस बांहों पर तुम्हारे सूट की किनारी अब भी हल्की चढ़ी रहती है? क्या अब भी कभी कभी अचानक से अब्सेंट माइंड होकर मंदबुद्धि बच्चे जैसा लगती हो ?

यहां दिल्ली में दो दिनों से बेमौसम बरसात हो रही है । वैसे तुम भी कभी कभी सोचती होगी न कि मैं लड़का होने का बड़ा फायदा उठाता हूं और इसी आड़ में खुल कर कुछ भी लिख लेता हूं। यह भी कि अगर मेरे लिखने से यह जो भी है जिसे उघाड़ना और एरोटिक कहते हैं निकाल लिया जाए तो फिर क्या बचता है? यहां आजकल नारीवाद की हवा है। गुड टच से बैड टच, देखने और घूरने तक पर बहस चल रही है। पूरा माहौल ही बड़ा गंदा सा बन पड़ रहा है जानां। कितना अच्छा होता न थोड़ी बहुत ऊंच नीच के साथ हम भी चल लेते। खैर छोड़ो....मैं भी कितना वाहियात आदमी हूं कहां से कहां बह जाता हूं।

यह सब सोचकर भी अब जब नीले घेरे वाले उजले सर्चबॉक्स मैंने लिखा है ‘ए’ तो फिर तुम्हारा नाम फिल्टर....................

Thursday, March 28, 2013

पंचिंग बैग


  • कभी कभी लगता है मैंने उसे पहचानने में भूल कर दी।
- हो जाता है, हम कहां सारी जि़ंदगी किसी को सही सही समझ पाते हैं। पेशे में पड़ा डाॅक्टर, टीचर, वकील भी निजी जीवन में ऐसी गलती कर ही बैठते हैं।
  • तुम मेरा काॅन्फिडेंस बढ़ाने के लिए ऐसा कह रहे हो? जबकि यह दुःख की बात है।
- मैं सिर्फ वो कह रहा हूं जो सच है, जैसा हो जाता है, हर किसी से
  • नहीं,  मुझे लगता है जैसे वो मेरे लिए थी
- मगर तुममें से किसी के पास ज्यादा समय नहीं था। बाई द वे, लेट हर फ्री नाऊ। तुमने काफी पी ली है ।
  • न.... नहीं..... ज्यादा पीने में और कुछ नहीं होता.... मगर ऐसे में उसके रिएक्शन शाॅट्स याद आने की दर बढ़ जाती है।.... और फिर....  वो सब गैप भी जहां- जहां उसे हमने समझने में गलती की।
- क्या उसको लेकर तुम्हें कोई गिल्ट होता है ?
  • बिल्कुल नहीं।
- फिर?
  • गिल्ट नहीं, बस संदेह... खुद पर।
- संदेह? क्यों ?
  • उन लोगों की बातचीत याद आती है जिसपर उसने मेरी नज़र में अपने परिचित स्वभाव से उलट प्रतिक्रिया दी थी। एक मिनट.... क्या प्रतिक्रिया से व्यक्ति का स्वभाव पता चलता है ?
- यही अभी मैं भी पूछने वाला था। मगर प्रतिक्रिया तो झूठी भी हो सकती है? यह परिस्थिति और व्यक्ति विशेष दोनों पर निर्भर करता है।
  • हम कहां चले आते हैं नहीं? हमारे गांव में इस अवस्था को डगरे पर का बैंगन कहा जाता है।
- तुम प्रेम करते हो या लड़कियों की सच्चाई जुटाते फिरते हो?
  • लड़कियां ही क्यों आदमी भी। वैसे प्यार के साथ यह अपने आप जुटता रहता है। क्या प्यार करना सच जानना नहीं है? गलत है कि प्यार अंधा होता है, मेरी उम्र, सिचुएशन और नज़र से देखो जहां तुम कोई भी स्टेप लेने में नाकाबिल रहते हो, यहां प्यार सब कुछ देखने लगता है। वह चमगादड़ की तरह रात में दीवार पर और पेड़ उल्टा लटकता है और उल्लू की तरह रात भर टकटकी लगाए ताकता रहता है।..... समझ नहीं आता कि इतना पीने के बाद मुझे चढ़ी है या कि अब होश आया है।
- ऐसे पलों में जब तुम इस तरह की बातें करते हो तो मुझे मुझे ऐसा लगता है कि उसको खोने का तुम्हें कोई पछतावा है......
  • यह तुम्हारी बेहद मामूली और बेसिक रिएक्शन है.... हकीकत ये है कि तुम भी इसे पूछ कर जितना इस मामले को समझ नहीं रहे उससे ज्यादा बस अंदर से मजे ले रहे हो..... नहीं उस तरह नहीं....तुम मेरा कुछ बिगाड़ोगे नहीं.... मगर जानने का अपना एक आनंद होता है, एक उम्र के बाद तुममे उतनी सिम्पैथी नहीं बचती। तुम भाषा और भावनाओं के जानकार हो जाते हो, तुम उस फेज को टालना सीख जाते हो.... उसी तरह से.... और पछतावा तो माय फुट। लेकिन पता है क्या.... खुद से ईमानदार होना एक बहुत ही बुरी बीमारी और आदत है।
- यानि ईमानदारी संदेह करना सिखाती है और घटना हो चुकने के बाद खुद से ईमानदार होना बस अपने भर के लिए अच्छा है, इससे कोई बाहरी परिदृश्य नहीं बदलता है बल्कि बाहरी चीज़ें और बदल जाती हैं। बाई द वे लेट मी क्लियर यू ये ईमानदारी नहीं बस एक कन्फेशन है।
  • तुम्हें पता है तुम्हें हर वो आदमी अच्छा लगा है जिसने तुम्हारी घाव पर नमक छींटा है। तुम्हें बुरी बातें कहीं हैं, तकलीफ दी है। तुम्हें प्यार की बातें कम याद रही हैं, उसके झगड़े ज्यादा याद रहे हैं। प्रेम कम याद रख पाते हो और उसकी हिंसा तुम्हारे यादों में अमर रह जाती है। इस ज़माने में जब तुम सारी दुनिया देख चुकने का दावा करते हो तब तक प्यार एक प्रतिस्पद्र्धा की तरह खड़ा हो चुका होता है और यह विभिन्न देशों के साथ हितों की तरह बदलता है। और यह भी गज़ब है कि उम्र के एक दहलीज पर आकर तुम यह कबूलने में भी शर्मसार होते हो कि तुम उसके साथ प्यार में रहे थे।  
- असल में तुम प्यार में कोई तमाशा नहीं चाहते, बवेला नहीं चाहते, अगर तुम अकेले रह गए तो बस चुपचाप उसे भूखा मारने लगते हो। तुम्हें हर बात का जबाव चुप्पी में नज़र आता है। तुम एकांत ओढ़ लेते हो और अंततः एक संकोची आदमी में तब्दील हो जाते हो।
  • आई लव यू टू।

Friday, March 22, 2013

शॉट डीविज़न


डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हारे शरीर में डब्ल्यू. बी. सी. (white blood cells) की कमी हो गई है और इसकी कमी से शरीर में रोग प्रतिरोधक घटती है। बिस्तर पर पड़े पड़े और रम के सोहबत में सारा दिन जो कुछ इस ख्याल से गुज़रा वो यूं है कि बेहिसाब तनहाई  है। इसे काटने के लिए क्या कुछ नहीं किया। कई अलग अलग वाली टेस्ट वाली सिनेमा देखने की कोशिश की, इसी तर्ज पर कई किताबों में सर दिया। मगर मैं इतना स्वार्थी हूं कि सब कुछ ताक पर रखकर इन चीज़ों में नहीं खो सकता। बिस्तर पर बैठे बैठे और मूड खुश रहे तो सब जंचता है मगर कई बार जो ख्याल दिल में है मन उससे नहीं उबर पाता।

मैं खुश रहने के लिए काम नहीं करता। न काम करके खुश होता हूं। काम करता हूं इसलिए कि अपने दिन के 12 घंटे काट सकूं। कई बार उमग कर, हुलस कर और कई बार मजबूर होकर फोन उठाया। बुखार में जब कमज़ोरी से कमर टूट रही हो तो क्या संभाला जाए ? जीभ पर जब कोई स्वाद न लगता हो, होंठ बार बार खुश्क हो जाते हों, और उसे लपलपाई जीभ से बार बार गीला करना पड़े और कई लोगों ने लगभग मिन्नत करना पड़ जाए कि 'प्लीज़ मुझसे एक मिनट बात कर लो'।

जी में कई तरह का ख्याल हो आया। जैसे कि मैं एक औरत हूं, अस्पताल के बेड पर पड़ी हूं और कई सारे बच्चों को छोड़कर जा रही हूं। बच्चे जोकि अभी इस उम्र के हैं जो समझते नहीं कि मरना क्या होता है, सो वो मेरे सामने मुझसे बेखब खेल रहे हैं, अपने भाई बहनों से झगड़ रहे हैं, मेरे पास उनको देने के लिए कोई संदेश नहीं है, क्योंकि इसका कोई मतलब नहीं है।

कुछ बार ऐसा लगा कि जैसे गला और जीभ जैसे किसी चीज़ की प्यासी है। लगा कि हवा में अभी इस पल कुछ है जो पी ली जाए। रजाई ओढ़ ली। थोड़ी ही देर में पसीने से नहा उठा। स्पंज वाले तकिए से पसीना यूं चूने लगा जैसे बाल्टी भर पानी में डूबाकर निकाला हो। लगा शरीर जैसे किसी देह की प्यासी है। फिर तो तांडव ही होने लगा। इस ख्याल से ही पसीने की मात्रा तिगुनी हो गई। सांसे गर्म होकर ब्लोअर बन गई। आग के भभके से निकलने लगे। मन जैसे यह सोच बैठा कि होंठ किसी केले के थम्ब जैसी चिकनी जांघों पर फिसल रहा हो। अंगारों के थक्के उड़ने लगे। हम पीसने में कागज़ की मानिंद गल रहे थे। लगता था जैसे वजूद पर कोई बिना स्टाम्प का टिकट लगा जो अब खुद-ब-खुद लिफाफे से टिकट को अगला देगा। उसकी पीठ जैसे नदी थी और मैं उसमें सुनहरी मछली खोज रहा था। उसने मेरे सीने पर की पसीने की बूंदें पी ली। मैंने उसके माथे पर के पसीने को चखा। लगा जैसे पसीने की ही प्यास थी।

जिंदगी का कास्ट डायरेक्टर बुरा होते हुए भी अच्छा है। मूल्यांकन का तराजू वाला न्याय की तरह अंधा है। अपनी जिंदगी का शॉट डीविज़न करता हूं तो पाता हूं बहुत मिसकास्टिंग है मगर एक तुम्हारे नाम का वज़न रख दिया जाता है तो पलड़ा इस ओर झुक आता है। मिट्टी के चूल्हे पर सिंके हुए राख की सौंधी महक आती गोल-गोल रोटी की तरह।

Wednesday, March 20, 2013

कथार्सिस



एक दिन की तीन मनोदशा

सुबह 9:40 

जन्म हुए कई घंटे हो चुके हैं। अभी खून से लथपथ हूं। मां की नाभि से लगी नाल अब जाकर कटी है। खुद को आज़ाद महसूस कर रहा हूं। मां के साथ शरीर का बंधन छूट गया। अब यहां से जो सफर होगा उसमें अगर सबकुछ ठीक रहा तो मां के साथ बस मन से जुड़ा रहूंगा। किकियाना चाहता हूं पर लगता है मां ने मुझे शायद तेज़ ट्रैफिक वाले शहर में पैदा किया है। गाडि़यों के इतने हॉर्न हैं, क्या अलार्म है!



दोपहर 12:30 बजे

जिंदगी में आपका पैदा होना ही फेड इन है। और मर जाना फेड आऊट। इसी बीच आपके जीवन का नाटक है। गौर से सुनो और अपनी आपकी दुखती रग पर हाथ रखो सारे सारंगिए एक साथ अपना साज बजाने लगते हैं। रूमानी पल का ख्याल करते ही जिस्म से सेक्सोफोन बजाने वाला निकलता है। बेवफा को गैर की पहलू में देखो तो पियानो बजता है। यार को याद करने बैठो तो एक उदास वायलिन।

पैदा होना प्री प्रोडक्शन है। किशोरावस्था लोकेशन रेकी है, जवानी शूटिंग और अधेड़ावस्था पोस्ट प्रोडक्शन। आदमी सिनेमा है।

शाम 7:00 बजे

पिता:    कित्ता कमाते हो जो इतना शेखी है?
मैं:        15 हज़ार
पिता:    और खर्चा ?
मैं:        सात हज़ार रूम रेंट, तीन हज़ार खाना, डेढ़ हज़ार फोन, हज़ार रूपिया सिनेमा सर्कस, हज़ार का दारू      बीड़ी,  पान, सिगरेट। पांच सौ टका का बाकी लफड़ा।
पिता:    कितना बचा ?
मैं:        एक हज़ार !
(पिता के माथे की शिकन ऊंची होती है, चेहरे को मेरे कान के पास लाते हैं, गला खंखारते हैं)
पिता:    आंय?
मैं:        जी.... एक... (उनके एकदम सामने पड़ रहे गाल को कोहनी से ढ़कते हुए) एक हज़....हज़ार.....
पिता:   कितना ? अरे हम बूढ़े हो गए हैं, अब ऊंचा सुनते हैं..... ज़ोर से बोलो न
मैं:    (डर मिले थोड़े बुलंद आवाज़ में) एक हज़ार।
दुख है कि पिताजी हाथ पैर से कम बातों से ज्यादा मारते रहे। इसकी ठीक वाइस वरसा मां है जो बातों से कम और..........
पिता:      एक्के हज़ार ना ?
मैं:       हां।
पिता:     तो यहीं आंख के सामने रहकर एक हज़ार रूपया कमाना क्या बुरा है!
(जब तक पिता के कहने का मतलब समझते हैं अमिताभ बच्चन के तरह कमर पर हाथ रखकर एंग्री यंग मैन बन फिल्मी अंदाज़ में कहती है)
मां:      अपना पेट तो कुत्ता भी पालता है, तू भी अपना ही पाल रहा है। फिर तेरे और उसमें फर्क क्या रहा?

(शॉट फ्रीज़ हो जाता है)
(क्रेडिट उभरता है)

Tuesday, March 19, 2013

संझा और लत्तर


निवेदिता नीले कुरते में तुम बुलशेल्फ के सामने खड़ी हो
नीचे भी कुछ पहन ही लेती
यूं गहरी गहरी नज़रों से झांकती हो
मिलन का लम्स अब तक काबिज है
मुस्काते हुए थकी थकी दिखती हो
थकी थकी दिखती हो या फिर से थकाने का इरादा है
बुकशेल्फ के सामने खड़ी हो
फिर भी मुझे आरा मशीन लगती हो
मैं जरासंध की तरह खुद को चीड़ा जाता महसूस कर रहा हूं।

इस दुनिया में जहां सच के भी प्रायोजक होते हैं
मैं देखता हूं कि बैकग्राउंड के सारी किताबें एक दूजे में मर्ज होकर डिजाल्व होते हैं और तुम निखरती हो
प्रेजेंट्स से लेकर एंड क्रेडिट तक
मुर्गी, अंडा और आमलेट से
फोरप्ले, फक और ओर्गज्म तक
नीले तारे गिनने से लेकर भुखमरी तक
तुम्हारी बालकनी के सामने अपनी गरीब पिता तक को न पहचानने की ग्लानि
से
इतवार को बिना निवाला पूरी बोतल उड़ेले जाने तक
बाल यौन हिंसा से चकमते तारों के साथ शहर बदलने का सफर तय करने तक
मेरे मन के सिनेमा पटल पर तुम ही काबिज हो।

सिग्नेचर की बोतल में लगा मनी प्लांट बुरा मान दूसरे की खिड़की पकड़ रहा है।

Friday, March 15, 2013

बिलबिलाया घूमा करता है नेवला


और चूहे बिल्ली की तरह हम दूसरे पर टूट पड़े। अपने अपने दायरे की सारी बातें भूलकर। वो क्षण सिर्फ मेरा था, वो क्षण सिर्फ उसका था। कभी मैं उसकी बाहों में था तो कभी वो मेरे आगोश में थी। हमले ज़ारी थे। वो बदहवाश सी थी और मैं केवल उसे जीत लेना चाहता था। उसके बदन के खड़े हो गए सारे सुनहले भूरे रोएं को सहलाकर शांत कर देना चाहता था। उसकी गोरी गुदाज बाहों पर च्यूटी काटना जैसे एक नीली तितली का कुछ क्षण के लिए उग कर मिट जाना। हम दोनों ने अपनी पूरी इसमें ताकत झोंक रखी थी। यहां हारना भी जीतना था। यह हिंसा भी बाप से मार खाने की तरह अधिकार सुख था। ऐसा लगता था जैसे मैं नगरपालिका द्वारा लगवाया गया टूटा नल होउं जो अब टूट गया है और वो झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली स्थानीय निवासी जिसे मानसिक असुरक्षा इतना सताता है मानो पानी अब तीन चार दिन नहीं आने वाला सो वह पति के खाली किए जा चुके शराब की बोतलों तक में पानी भर रही हो। वह भी मुझको वैसे ही बरत रही थी जैसे मैं फिर उसे नहीं मिलने वाला। हम दोनों एक दूसरे को रौंद रहे थे। वो जांघें जो मेरी हसरत थे आज उस पर मेरी उंगलियां वहां मचल रही थी। उसकी पीठ दोपहर में नदी किनारे की पत्थर हो आई थी जिस पर प्यासी मछलियां मारे प्यास के पटपटाकर अपना मुंह रगड़ते मरती हैं।

मैं अक्सर सोचता कि कैसे उसका पति उसे संभालता होगा। बहुत सारी लड़कियों को टूट कर प्यार उसका पति नहीं सिर्फ उसके आशिक ही कर सकते हैं। कहां चूम पाता होगा उसका पति पूरी तरह उसे। क्षणिक इंटेंसिटी और अमर इंटेंसिटी में बेपनाह फर्क होता है।

उसकी आंखें पत्थर की हो आई थीं। पलकें जों खुल और बंद हो रही थी तो लगता वे मानो नीले कंचे हों जो इस तरह घूम रहे हों जैसे किसी ने अमानिका उंगली से उसे साधा हो। चन्न से वो अपनी ही जगह पर घूमती रही हो।  वो भरी भरी जांघें जो चूड़ीदार पाजामें में समंदर के हिलोरें जैसे लगती और जिसके बारे में चंद पल सोचते ही लगता मैं कपड़े उतार कर पानी में गले तक खड़ा हूं। सांसे बाधित हो जाती। लगता हवा की जगह पानी ही श्वासोच्छवास बन गई है। पानी की सांस ले रहा हूं पानी ही छोड़ रहा हूं। और पानी हिलोरें मारती शार्क की तरह पूरी ताकत से मेरे ऊपर एक भरपूर ताकतवर प्रहार करने वाली है। एक वार और काम तमाम। एक डर मिला रोमांच।

वे होंठ जिसे मैं अपने तनहाई के पलों में सोचा करता कि काश कभी मौका लगे तो इन होठों को इसी मुद्रा में चूम सकूं। या फिर कितना अच्छा होता अगर इसके होंठों का कटाव हमेशा ही ऐसा होता।

वे मोटे ओठ जो बनैले फूलों के बीच रहकर खिले हुए गुलाबों की तरह हो आए हैं जो लाॅन में बेदखल हैं जहां बाथरूम के फटे हुए पाईपों से पानी टपकता रहता है, खिड़की के उन छज्जों को फाड़कर जहां पीपल के पौधे उग आते हैं, जहां औरतें इस्तेमाल की हुई सेनेटरी नैपकिन फेंकती हैं, जिन जगहों के देखभाल माली नहीं करता। घर में ही वर्जित स्थल।

और पूरी तरह जब वो मेरी गिरफ्त में आई, जब उसपर आसमान बनकर मैं छा गया। घना बादल बनकर उस धरा पर मैं घुमड़ घुमड़ कर बरसने ही वाला था कि उसने मेरा नाम पुकारा। सागर... सागर.... सागर.... मेरे अच्छे सागर.... सिर्फ मेरे सागर। ऐसा कहते हुए उसकी उंगलियां कभी मेरे कानों के पीछे होती कभी मेरे बालों में, आँखों में स्नेह के महीन-महीन रेशमी धागे लिए हुए। 

सहसा मुझे एहसास हुआ, अब एक ऐसी लड़की जिसे किसी बात की जल्दी नहीं है. जो मेरी है सदियों से, वहीँ है, वहीँ तो है हमेशा से, उसे कहीं भी तो नहीं जाना है। लगा बदन के समंदर में डूबने से कहीं गजब है प्रेम भरे संबोधन में डूबना। एक थकी, लरज़ी हुई, आप पर हारी हुई आवाज़। चीनी की भारी चाशनी में सूखे और खोखले मैदे की तरह डुबकी लगाते तुम।

यकीन हुआ कि हमें एक पतली, कोमल, मादा आवाज़ आवाज़ की तलब होती है जो हमार सारे जटिलताओं और तकलीफों को सोख ले। जिसे सुनकर सारी थकान किसी पके हुए घाव से मवाद की तरह बह निकले।
तब जब उसके उभार एकदम सामने हों, जिंदा और गुदगुदे, फड़फड़ाते, किसी हवादार दिन नाव के भरे भरे पाल सरीखे। जिसकी चाहत में कई रातें ज़ाया की गई हो। हस्तमैथुन करने की तमन्ना हो मगर दिमाग में ज़ारी लड़ाई के बायस वो सफल न हो पाएं। जिसकी आंखों की लहक के आगे वो निस्तेज हो जाए। जो जब वहां से उठ कर जाए तो उसके स्पर्श तक फरेब लगे मगर सबूत सिर्फ इतना हो कि बिस्तर पर चार पांच सौंधे सौंधे उसके सीधे टूटे हुए बाल हों। जिसके चले जाने के बाद लगे क्या कोई आया भी था मेरे जीवन में?

वो खुन्क-खुन्क हाथ..... जो हाथ में हो तो लगे कि झूठे हैं, वो पारदर्शी शीशे सा बदन जिससे गुज़रे तो लगे कि सपना हो। वो आंखों में जानी जानी सी छवि जिसे जितना जीते जाएं झूठ की शंका बढ़ती जाए।

कई बार लगता है प्रेम सिर्फ एक मंच भर है जहां बाकी सभी किरदार झूठे हैं और बस हमें ही एकल प्रस्तुति देनी है।

क्या होता है आखिर संभोग, समंदर, जीवन और प्रेम में ? लील ही तो लिया जाना।

Wednesday, March 13, 2013

रॉ फुटेज में डंप जिंदगी


दफ्तर छोड़ने के बाद उसकी अनुपस्थिति ज्यादा हाजि़र हो गई है। वो कोना जहां वो बैठा करता था इतना सुनसान लगता है जैसे जेठ महीने में गलियों में उठते गोल गोल बवंडर हू - हू करते हैं। उसका कम बोलना अब ज्यादा सुनाई दे रहा है। रफ स्क्रिप्टों पर यहां वहां की गई काट पीट, दो शब्दों के बीच में प्रूफरीडिंग की तरह कई निशान लगे हैं, ये खोंच हैं जो गांव की गलियों के गुज़रते टटिये में होते हैं और जिनमें अक्सरहां कपड़े फंसते हैं। अक्सर ही कोई सूत उधड़ कर रह जाता है और हम कभी फुर्सत में उस उधड़े सीवन को ठीक करने की कोशिश करते हैं तो उसकी अंतिम परिणिति उस पूरे धागे को कपड़े से अलग करने पर जाकर खत्म होती है।

ह्वाईट बोर्ड पर विकल्प के रूप में लिखे उसके पंचलाइन, आधे मिटे मिटाए, खुद जन्माए और मारे गए, जो कभी जार्नर, फॉर्मेट में फिट ना होने के बायब या क्लाइंट से अप्रूव नहीं होने के कारण रिजेक्ट हो गए, उन्हें कभी अपनी किताब में संजोने के दिली इरादे की चुप्पी लिए दफन कर दिया कि एक दिन ये मुहावरे के रूप में अपनी शक्ल अख्तियार करेंगे।

अचानक जब भी दराज़ खोलता हूं तो रिसाइकल लिफाफे पर उसके वन लाइनर मिल जाते हैं। बारहा ये बहुत लंबी होती हैं और इनमें ज़िन्दगी के मुख्तलिफ लम्हों, एहसासों और पैकरों का कोकटेल होता है।

एक प्राईवेट नौकरी करता आदमी यूं सामान्यतया एक बैग भर का मुसाफिर होता है। उसे कोई पर्सनल आलमारी दफ्तर मुहैया नहीं कराती लेकिन छूट गई चीज़ों में कई चीजें हैं। फोन पर किसी को कन्विंस करते चश्मा मेज़ पर रखकर रगड़े गए आंखों के टूटी हुई पलकें, फलाने टेंडर के लिए अप्लाई करते हुए अमुक शर्त को अंडरलाइन कर उसका जबाव तलाशने के दौरान माथापच्ची करने के क्रम में टूटे बाल, रखे रखे ठंडे हो जाते चाय की कप, और यदि आपकी आंखों का कैमरा पैन करे तो स्टूडियो के पास रखी ऑफिस की उसकी चप्पल पर ठहर सकती है। पैरों की नाप कितनी छोटी होती है, बाज़ारवादी नज़रिए से सोचें तो कुछ ही नंबर में समा जाता आदमी जैसे कई कुछ नंबर की ब्रा की साइज़ से औरतों को नापते हैं।

ये स्टूडियो जहां दुनियां भर के साउंडट्रैक तैयार होते हैं, वहां उसका 'जी' कहना गूंजता है। कोई माई का लाल नहीं जो आदमी के खामोशी को न्यूएंडो के उन्नत से उन्नत तकनीक पर भी एडिट कर सके। उसका होना अनमिक्स वर्जन था जहां से उत्तम ब्रॉडकास्ट क्वालिटी मिक्स वर्जन आता रहता था।

कभी कभी अब जब फोन का रिसीवर उठाने से पहले अब हाथ एक क्षण को रूक जाता है, किसी गुप्तचर एजेंट की तरह सोचता हूं कि इस पर उसके फिंगरप्रिंट हैं, एक जीवित, कंपन करती थरथराती देह का अंश....... रिसीवर से लगते तारों के गोल छल्ले....हां बस यही था वो.... पेंचदार, लचीला और देह की ही दो ध्रुवों को जोड़ता, उनका मेल कराता... रिसीवर उठाकर सुनता हूं तो एक लंबी डैश सुनाई देती है, आधी रात पटरी पर दौड़ लगा लेने के बाद की रेलगाड़ी जिसके सूने ट्रैक को आप लाल सिग्नल की नज़र से देखें।

सर के ऊपर स्लो मोशन में घूम रहा पंखा है या वक्त अपना ही ग्रह काट रहा है।

रॉ फुटेज में डंप जिंदगी जैसे भोज में दही के पीछे चीनी जैसे खेत में हल के फाल से चीरे लगते और बीज डालते ज़मीन.

अपने ही डायल में चक्कर रहा वक्त में ज़िंदगी की सारी टाइमलाइन खुली है मगर वक्त के साथ भी कोई हमारी तरह गैर जिम्मेदार एडिटर होता होगा तभी यहां के एफसीपी (फायनल कट प्रो) से हर बार बेहतर आऊटपुट नहीं निकलता।

...और कई रफकट फायनल डिलीव्रबलर्स नहीं बन पाते।

Friday, March 8, 2013

नींद भरी आँखें और क्लीन शेव करने की कोशिश

मैं झटपट छत पर गया। मचिए पर एक पैर रखकर, कमर पर हाथ रखे आसमान की ओर देखकर अपने तलवे की जड़, फेफड़े की पसलियों, गले की नसों को एकमेक कर जितनी भी हवा खींच कर छोड़ी जा सकती है, सबको समेट कर आसमान में छोड़ दिया। मगर समेटी गई अन्य तमाम चीज़ों की तरह भी वे भी मेरे अंदर से निकल न पाईं। ख्याल आया कि मैं फ्री हो गया मगर यह सिमटा हुआ दिमाग के तहखाने के कोने में किसी जर्मन किचेन के शिल्प जैसा हो गया। अब बस छूने भर की बात थी यह तहदार परत बड़ी ही चिकनाई से खुलने लगती। याद टच स्क्रीन सा सेंसिटिव है। आप बस एक कोंटेक्ट याद करो आपको उससे जुड़ी कई विकल्प बताने लगता है। आप उसे मैसेज भी कर सकते हैं, आप उसके कोंफ्रेंस चैट भी कर सकते हैं, आप अलां घटना को याद कर सकते हैं, आप फलां घटना को कल्पना में फिर से शुरू कर सकते हैं जिसमें पछतावे के बायस अंत अब आपकी मर्जी हो।

मन निर्देशक है या एडीटर? वक्त अगर सबसे बड़ा स्क्रिटराइटर है तो जिंदगी की फिल्म इतनी उबाऊ क्यों है?
कहते हैं समय और प्यार से बड़ा रेज़र कोई नहीं, चलिए एक वीडियो स्पॉट बनाते हैं जिसमें दिखाया जाए कि वक्त कितना भी गुज़र जाए प्यार के याद की क्लीन शेव नहीं हो पाती। यह यह कोई अपानवायु त्यागने जैसा नहीं है जो किए जाने के बाद मुक्त अनुभव किया जाने लगे।

मचिए पर इस तरह एक पैर रखकर और कमर पर हाथ रखे फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता कि मैं अपनी परेशानियों के दलदल में डूबा आत्मविश्वास से लैस हूं। यहां समाधान नहीं दिखता मगर एक लांग शॉट लिया जाए तो अदृश्य समस्याओं में एक हीरो सा खड़ा हूं। इन तीन सौ चौतीस शब्दों की एक तस्वीर लांग शॉट में शाम के सात बजे में, हल्की पीली रोशनी में रेलवे ट्रैक से रिप्लेस की जा सकती है जो अपने पिटे हुए पथ पर चलते हुए भी अरबों नज़ारे और भकटनों को ढ़ोती है।

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