Tuesday, April 30, 2013

विरह का भी कैसा शीर्षक !


वे भी क्या दिन थे जानां। जी मेल बालकनी की तरह लगा करता था। हम उसमें सुब्हो शाम बैठा करते थे और उसकी एक एक पट्टी टंगी हुई अलगनी की तरह लगा करती थी। आज भी सर्च मेल में तुम्हारा नाम डाल कर देखता हूं तो सिलसिलेवार रूप से मेल छंट कर आते हैं। एक पट्टी पर उंगली रखता हूं तो तह ब तह एक एक मेल में अठासी अठासी मेल पिन किए हुए खुल आते हैं। खुद को शादीशुदा महसूस करता हूं और लगता है किसी ने कपड़े उतार लाने का आदेश दिया है। और जैसे ही एक याद का एक सूख चुका कपड़ा अलगनी से खींचता हूं उन बड़े कपड़ों के नीचे छोटे छोटे अंतरवस्त्र तक गिरने लगते हैं।

वो भी क्या दिन थे जानां। हम वर्चुअल एक दूजे का सर दबाते थे, एक दूसरे के कंधे पर सर रखते थे। कभी कभार रो कर दिल भी हल्का कर लेते थे। किस हद तक अकेला है आदमी। अब तक हॉलीवुड के फिल्मों में देखते थे कि हद से ज्यादा अमीर आदमी खोखला और अकेला होता है। लेकिन देखो तो हम जो आम आदमी हैं, घर छोड़ कर बाहर काम करने आते हैं। मां बाप, भाई बहन वाले हैं। जान तक दे डालने वाले दोस्त रखने वाले हैं लेकिन बेतरह अकेले हैं। अंदर आक्रोश नहीं है अब बेशुमार एक खालीपन है। एक पागलपना है। कई बार महसूस होता है जैसे चीजों को आखिरी बार देख रहे हैं। या फिर फलाना नॉवेल पढ़ तो लिया मगर कहां याद रहा उसकी हर लाइन से गुज़रने का एहसास ! इसलिए फिर से पढ़ेंगे का संकल्प। वो कौन था जिसने तब पढ़ा है ? यह कौन है जो अब फिर से उसका स्वाद चखना चाहता है ? वो कौन होगा जो सब भूल जाएगा?

ये भी क्या दिन हैं जानां कि लगता है तुम्हारे कंधे पर कि ख्यालों में साड़ी पिन  ब्रा स्ट्रेप्स, ब्लाउज और साड़ी तीनों को लिए पिन कर रहा हूं और बार बार रिवाइंड होकर कुमार गंधर्व उड़ जाएगा हंस अकेला सुना रहे हैं।
सोचता हूं संभोग भी आखिरकार कहीं जाकर योग ही हो जाता है। चीजें करना और उससे निरपेक्ष होते जाना।

ये भी क्या दिन हैं जानां!

Tuesday, April 23, 2013

Gmail, Draft No. 134, 8/26/11


"ये रामधुन करने बैठे लोग तो ऐसे चिल्ला रहे हैं जैसे आज ही क़यामत आ रही हो, मन में भी प्रेम भरे नाटक नहीं चलने देते. इत्ता चिल्ला रहे हैं कि अन्दर भी कहानी बनने देना इनको मंजूर नहीं... मन तो इतना हिंसक हो उठता है कि आड़ी लेकर खाई में उतर कर सारे जंगल काट दूँ. वो सब शक्लें क्यों नहीं कटती जिनका काँटा नागफनी की तरह बढ़ता जाता है. मान-मर्यादा कोई अशर्फी होता तो कब का उतार कर दे देती"

अबकी माँ बीच में टोकती है - रे सुग्गा ! क्या-क्या बोलती रहती है ? क्या हुआ है रे तुमको ?

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लड़की हाथ काटती है, लड़की प्रेम में रहते हुए भी प्रेस करते वक़्त कपडे नहीं जलती, किचेन में भुजिया नहीं जलता. दुपट्टा संभालना जिसका एक मुख्य सामजिक आदेश है जो अब अनिवार्य शारीरिक क्रिया में बदल गयी है (जैसे ब्रश करते हैं) लड़के को शिकायत - हमारे जैसा प्यार नहीं है.. घर से निकल गया, नशे में डूबा रहता हूँ, हाथ वो भी काटता हूँ, लव लेटर लिखता हूँ. दौड़ते दौड़ते बस पकड़ता हूँ, मुंह के बल गिरता हूँ. किडनी फेल हो गया लगता है. एक सफेदपोश प्रेम, एक काले कारनामों से भरा प्रेम " दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक"

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"जिस तरह मैं काम करने के दौरान चैट बॉक्स में तुम्हें पिन मारता रहता हूँ और तुम्हें लगता है उम्र के बड़े बूढ़े से मोड़ पर आरामकुर्सी पर बैठे हुए मै पीछे आ कर तुम्हारे गले में बाहें डाल देता हूँ. कम से कम इतनी तो दुआ करना ही की ये तंग करना बना रहे." 

डी टी सी. में पांच रुपये का टिकट कटाकर अपने बाएं हाथ की मध्यमा ऊँगली की अंगूठी में टिकट को तीन बार पतले पतले मोड़ कर डाली हुए लड़की के ज़हन में ये बात गूँज रही है. यों खड़े होकर सफ़र करना भी बुरा नहीं बस ज़रा बस आज सड़क पर पानी बहुत उड़ा रही है और शीशों पर बूँदें इस तरह से रुकी है जैसे चश्में के पीछे भीगी आँखें.
बाबू कित्ते दुःख !!!!

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चार बरस हुए सुलेमान को रामसरन को बीवी को सरेराह छेड़े हुए. जो मतला था वो ये थी :

"यूँ कानों कान गुल ने न जाना चमन में आह
सर लो पटक के हम सरे बाज़ार मर गए".

और सुलेमान को लगा उसने एकतरफा मुहब्बत के किला फ़तेह कर लिया. मीर की शायरी को अपना महबूब मानने वाले को ये पता था की रामसरन की बीवी अपने नाम से नहीं रामसरन की बीवी से जानी जाती है. गोया सुलेमान ने भी मुहब्बत इसी नाम के साथ की. एक सारी उम्र जब एकतरफा सिलसिला चलता रहा तो....

... तो आम के मौसम में जब सुलेमान मियाँ गुस्से में मचान पर बैठे थे तो बेल का शरबत देते हुए रामसरन कि बीवी ने कहा : 
"तुमने जो अपने दिल से भुलाया हमें तो क्या,
अपने तईं तो दिल से हमारे भुलाइये"

सुलेमान ने सोचा नहीं था कि जिंदगी और मुहब्बत की इस ग़ज़ल की आखिरी शेर रामसरन की बीवी को ही कहनी है.

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... और गिफ्ट वाले दूकान के गलियारे में लड़के ने लड़की का हाथ पकड़ लिया. लड़की के कान के झुमके हिलने लगे. इसके लिए लड़की हरगिज़ तैयार ना थी. लड़की गिफ्ट के बीच सपनीले संसार के बीच उस अकेलेपन को जीना चाहती थी. लड़का अकेला पा कर उसे चूमना चाहता था. लड़की सबके बीच जीना चाहती थी. लड़का भीड़ में उस पर मरना चाहता था....

...और एक दिन सचमुच उसने उसके गोरे बदन पर ऊँगली से अपना नाम लिख दिया. उसने गौर किया कि अब लड़की जब तब उसके गले लग जाती है, मैं सिर्फ उसके सामने खड़ा होता हूँ तो खुमारी से नहा कर मेरे होंठ के तरफ बढ़ने लगती है. ऐसा पहले नहीं था लड़का भरसक जतन करता और ऐन वक्त लड़की किसी बहाने, किसी अदा या फिर शरमाते हुए निकल लेती. एक निष्कर्ष निकला लड़की देर से आती है लेकिन जब आती है सबकुछ छोड़ कर आती है. दोनों अब भीड़ में मरने लगे हैं. आप कहीं उन पर पैर तो नहीं रख रहे ?

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(1948 में एक बार मंटो मिला तो उससे कुछ यूँ बातचीत हुई)

इस एस्बेस्टस वाले छत पर बारिश बड़ी जोर से होती है. बाज़ औकात गरज कर बरसती है तो लगता है छप्पर तोड़ डालेगी. और फिर सूप भर भर पानी आँगन में गिरता है. उधर गेहूं उठाना है, इधर से कपडे उठाने हैं. हाय अल्ला अब तो दरी भी भीगने लगी है. बंगले अच्छे हैं एक मंजिल पर पानी आये तो दूसरे पर चले जाओ क्यों मंटो ? अब हमलोग कहाँ जाएँ ?

मंटो : चुनांचे लोग मांस जरूर खायेंगे पर ठंढे गोश्त 'पहले' धोये जाने का रिवाज है.

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बहुत बारिश होने से हुआ क्या है कि त्रिमूर्ति भवन के अन्दर जवाहर लाइब्रेरी में एक पुराने से छोटे किले की गुमसाई सी दीवार में सीलन लगने से पर कुछ लड़के और लड़कियों  के नाम उभर आये हैं. दिल्ली सरकार इन दिनों लोगों को जागरूक कर रही है कि किलों, मीनारों पेड़ों पर अपने नाम ना लिखें. लड़की को एतराज़ है कहती है सरकार खुद जनता के पैसे से चार करोड़ का बजट पास कर अस्सी हज़ार में एक थर्ड क्लास ईंट से सड़क बनवाती है और उस पर काले वाले टाईल्स पे सुनहरे अक्षरों में अपना नाम लिख कर एहसान बताती है राजू क्या हम इतने गए गुज़रे प्रेमी हैं जो एक गुमशुदा सी दीवार पर अपना नाम नही लिख सकते ? मैं तो कहती हूँ सरकार हम पे बुलडोज़र चलवा कर इंडिया गेट पर हमारा नाम लिख दे.

लड़का अवाक है जानता है कि वो, लड़की और प्रेम तीनो एक दुसरे से ही जुदा होने वाले हैं इसलिए लड़की रोष में है.

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लड़की मोबाईल का कीपैड कम दबाना चाह थी. 

लेकिन इस समय तक तो लड़के का फोन आ जाता था. मन मार कर उसने कीपैड फिर से दबाया..ह्म्म्म 7:45 हो गए. 8 सेकेण्ड बाद मोबाईल फिर अँधेरे में डूब गया. ओह शीट ! मैंने अपनी बैट्री नहीं चेक की. मोबाईल का कीपैड एक बार और दबाया गया. ऊपर के कोने वाली खिड़की में दो डंडे खड़े थे. शायद आज की बात तो इतने में हो जायेगी. मोबाईल फिर अँधेरे में.... 8 :10 हो गए होंगे.. मेरा नेटवर्क तो आ रहा है ना ? ऐसा तो नहीं की वो मिला रहा हो और मैं ही गायब मिल रही होऊं... की- पैड एक बार दबा... बायीं तरफ सारे डंडे खड़े मिले... 8 :20 हो गए तो आखिर उसने दोनों हाथ बस के बाहर निकाल दिए. इंतज़ार के मेहदी अब लड़की के गले से निकल फिजा में घुलने लगी.

कितना कुछ संभालना पड़ता है.. लड़के की मजबूरी, हकीकत का एहसास और अपने अन्दर का मासूम प्रेम. बात ना हो सकने की खीझ.. कोमल शिकायत और सिसकी भरे रूह!

लड़की ने सोचा अगर अभी ताज़ा मेहदी लगे होती तो अभी के अभी इसी बारिश में धो भी देती.

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मेट्रो में लड़का-लड़की बैठे हुए हैं. लड़का अपना स्लैम बुक लड़की को दिखा रहा है- Friends are forever हर पेज पर ऊपर बड़े इस्टाइल में लिखा है -
पहला पन्ना लड़के ने खुद ही भरा था. लड़की स्लैम बुक के मार्फ़त लड़के को और जानने का प्रयास कर रही थी. कोचिंग जाने के क्रम में संगीत और फिल्मों के अलावा व्यक्तिगत पसंद का पता नहीं चलता... पसंदीदा दृश्य वाले खाके में लड़की ने पढ़ा - मेहँदी भरे हाथों को देखना. लड़की ने झट अपने दोनों हाथ आगे किये. राखी पर लगायी गर्यी मेहँदी चमक उठी. लड़की को अपना हाथ ज्यादा सुर्ख दिखने लगा है. लागी चेहरे पर पढ़ी तो और भी लाग हो गयी. हिंदी का एक दोहा याद आने लगा - 'लागी मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल, लागी देखन मैं चली, मैं भी हो गयी लाल'
सपने परखनली में विविध रासायनिक पदार्थों से मिल कर नए नए रिजल्ट देने लगे. खोज प्रेम की हुई लेकिन अवशेष दुःख, दर्द, अवसाद, विरह, तड़प का भी आया.

कि जैसे एक्सपायरी डेट निकल जाने के बाद ब्रेड के साथ खट्टे छोले खाते हैं प्रेम का स्वाद ही ताउम्र बचा रह गया.

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घुटने से बड़े हाफ पैंट में ठुमकता हुआ बबलू जब स्कूल जाता है तो आंवले के पेड़ के पास अक्सर रुक जाता है. दो दिन पहले ही भैया ने इस पेड़ से कैसा टनाका, खट्टा-मीठा कच्चा आंवला खिलाया था. वो उछलता है पर पेड़ तक नहीं पहुँच पाता उलटे जाले में फंस कर गिर जाता है. फंसा हुआ है वो, गले में स्कूल के आई कार्ड से, गर्दन में लटका थर्मस, हाफ पैंट ज्यादा लम्बा डग भरने से रोकता है. अपने भार से ज्यादा लम्बा और भरी बस्ता. अतिरिक्त प्यार से दबा और ओढ़ी हुई उम्मीदें... पैर ज़मीन पर ऐसे पड़ते हैं जैसे रेल की पटरियों पर चल रहा हो. करने को सब कर रहे हैं पर बस कर रहे हैं.

जिंदगी भी तो बबलू ही है ना बाबू ! नय रे ! कुछ गलत कहे ?

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...अ एक बात और देख दोस कि जो होता है वो छठ पूजा के लिए जो गंगा किनारे दौरा (टोकरी, डाला) रख के छेकते हैं ना आजकल लड़कियों का वही हाल है. सब पहलेहिये से बुक हैं. अब जैसे तुम जान दिए जा रहे हो ना, अब सातवीं किलास ने लड़कियां सब भी अपना बॉय फ्रेंड देखे लगती है. हमारी मानो तो अब प्राथमिक विद्यालय के गेट पर खड़ा होके चौथा पांचवां किलास कि लड़की देखो. काहे से कि सब पहलेहिये से बुक है.

मिंकू जो कि इन दिनों प्यार के तौर तरीके और गरदा तरीके से बोलें तो मुहब्बत के पेचो-ख़म सीख रहा है, कोई मन मुताबिक लड़की खोज रहा है. पिंकू जो कि इस कला में मास्टर है और पूरे लाइफ यही किया है उसको अकिल (अक्ल) दे रहा है.

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देख दोस (दोस्त) पियार (प्यार) करे के है ना त ए गो बेसिक फंदा बताते हैं. जिससे पियार हो ना उसको दिल पे चोट दो, जेतना दुःख दोगे ना दिल में बसे रहोगे. देखा नहीं था रे दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे में काजोल जब पूछती है की हमरे सादी में आओगे ? तो कैसे सरुखवा मगरूर काला चस्मा लगा के इतराते हुए से कहता है : नहीं, सेनोरिता, मैं तुम्हारे सादी में नहीं आऊंगा.

बस्स ! बेट्टा यही है पियार का मूलमंत्र ! घोट ले इसको. ऐसा रहा, समझो मामला जमा. तब्बे से ना काजोल को सरुखवा दिखने लगता है. दिमाग दौडाने लगती है कि साला हमको कैसे ऐसा बोल दिया. किसी को घंटा बराबर भी भाव मत दो.


पिंकू, मिंकू को सिखा रहा है और हम आपकी तरह अवाक सुन रहे हैं... भौचक !

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गेंदे के फूल के माला गूंथते हुए चुटकी ने अपनी दीदी को चिढाते हुए कहा - दोस्तों से झूटी-मूठी दूसरों का नाम ले के फिर मेरी बातें करना... मांग में सिंदूर भरती दीदी ने आधे में अपने हाथ रोका और भरी आँखों से हंस दी.
हुं, दीदी कितनी बदल गयी है. इत्ता भी नहीं समझ रही की छुटकी उनसे मार खाना चाहती है. कम से कम दीदी को अभी हँसाने वाला तो कोई है. बाबूजी मेरी भी पसंद के खिलाफ कहीं शादी कर देंगे तो मैं कैसे हसूंगी? कैसा होता है ये सुख! भरी आँख से हसने का ?

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लड़की बुक्का फाड़ कर  रो रही थी जैसे कोई पेड़ कट कर लरजा हो. यकायक राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से उठी... कंधे पर बैंग बांधा... लोग हैरान रह गए... गाड़ियों के कई विकल्प थे... मेट्रो अब पिछड़ी क्षेत्र से नोयडा और गुडगाँव जैसे पॉश इलाकों तक भी जा रही थी. कुछ आंसू गाल पर सूखे तो कुछ वापस आँख में लौट गए.. आंसू पोछे नहीं गए. शहर में मेट्रो की लाइन का जाल था और गाल पर आंसू का.. शहर के कम सुने जाने वाले रेडियो स्टेशन अक्सर अपनी गरीबी लता ताई की ह्रदयविदारक आवाज़ में गाते हैं- 'अंखियों को रहने दे, दिल के तू आसपास, दूर से दिल की बुझती रहे प्यास'
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कल आधी रात ही चुड़ैल का फोन आया.. कहने लगी द्वारका में हूँ... फोन कटते ही लड़के ने कसम खाई - अब मुंह तक नहीं देखूंगा साली का. अगली सुबह दफ्तर जाते वक़्त मेट्रो में चढ़ते ही वह पीछे की तरफ द्वारका कितना स्टेशन है, गिनने लगा... मेट्रो आगे जा रही तो और उसका मन पीछे जाने लगा. के अचानक मोटी की गाली निकली, बदन चिमनी बन गया, भीतरी सतहों से स्याह काला धुंआ उठा तो अचानक बोल उठा - आग से नाता, नारी से रिश्ता काहे मन समझ ना पाया !

 
 
पांच इधर झटक लिए पी. डी. ने

Saturday, April 20, 2013

याद पटना : एक सौ आठ डिग्री


काम से आज छुट्टी ली है। लिखना भी एक काम है। आज लेखनी जब फुर्सत पाती है के पन्नों से गुज़र रहा था तो सोचने लगा मेरा अतीत कितना लुभावना था! जबकि सुबह जैसे ही बिस्तर छोड़ा सबसे पहला यही ख्याल आया कि मैं वर्तमान अतीत को लिए चल रहा हूं बहुत पहले के अतीत को भूल चुका हूं। एकदम पहले के अतीत को नहीं। मेरा मतलब बचपन याद है। जवानी भूल गया और अब ये जिसे अब भी लोग जवानी कहते हैं और मैं अधेड़ावस्था ये जी रहा हूं। भूला क्या हूं ? तो दोस्त यार, कॉलेज, पटना यूनिवर्सिटी। गंगा भूल रहा हूं। रूपक सिनेमाहॉल की देसी एडल्ट फिल्में भूल चुका हूं। अप्सरा सिनेमा हॉल तो अब कहीं है ही नहीं स्मृति में।

वीणा वास्तव के कारण और पहली बार हार्डकोर एडल्ट फिल्मों के कारण जिसमें अंतिम के दस मिनट में सिलेबस के बाहर का शॉट के कारण छूट गए सामान की तरह याद करने पर याद आ जाता है। महिलाओं, लड़कियों के हिमायती अशोक अलबत्ता याद है। उसकी इमेज शाहरूख और शाहिद के चोकलेटी छवि जैसी थी। सिनेमाहॉल में जिन लड़कियों पर लाइन मार रहे होते, फिकरे कस रहे होते कि देख अभी शाहरूख काजोल को चूमेगा वही टिकट खिड़की पर डी सी लेने के वक्त बहन और दीदी बन जाती। रीजेन्ट का समोसा भी भूल गया। एलिफिंस्टन जबकि हॉट स्पॉट था, फिर भी उसे कभी सिनेमाहॉल नहीं माना। पर्ल तो पैदा होने के पहले से ही बंद था। उसे बंद देखने की आदत लग चुकी थी। हमें कुछ दरवाज़ों को बंद देखने की आदत लग जाती है, बावजूद हम वहां से गुज़रते वक्त उसे एक नज़र देख लेते हैं। देखना क्या एक उम्मीद है जो हमारे अंदर एक अप्रत्याशित चीज़ से गुजरने की लालसा छोड़ता है? कुछ दरवाज़े बरसों बंद रहते हैं और कई बार हम उस बंद के आगे खुलते हैं। ईश्वर की मूर्ति आंख खोलकर नहीं देखती इसलिए हम उसके आगे बहुत तरह के उपक्रम करते हैं।

मोना बिल्कुल याद है। मैट्रिक्स के हीरो की तरह। सुफेद पत्थर पर लगे दस हाथ के पोस्टर की तरह कि जब भी साइकल या रिक्शा कोलिज के लिए गुज़रता आंखें अपने आप पोस्टर की तरफ उठ जाती जिसके सेंटर में खून में नहाया हीरो रिवाल्वर ताने खड़ा है। एक साइड में विलेन की अराजकता है। एक कोने में विधवा मां को वचन देता नायक है, एक कोने में बार डांसर का आइटम सांग का दृश्य जिसमें उसके कसे डीप कट चोली में से गहरी कटान लिए उभार दिख रहे हैं। एक बलात्कार का दृश्य है और पोस्टर का चालीस फीसदी हिस्सा वो है जो नायक की मंजिल की तलाश के बीच की हमराही है। कई बार लगता इस एक्सट्रा को जांघों तक ही साड़ी रखने का काम मिला है।

रूपक सिनमाहॉल में लगे फिल्मों के दृश्य हास्यास्पद होते थे। कई बार एडिटिंग की गलतियां इस तरह होती कि सीन में शूटिंग के सामान और टेक्नेशियन के कमांड तक आ जाते थे। बेन सीड इस कदर बोरिंग हुआ करता कि उक्त दृश्य के हीरो और हीरोइन एक दूसरे ही इस कदर शर्मिंदा रहते कि दोनों की आंखें बंद रहती। चूंकि ये फिल्में पोर्न नहीं थी इसलिए हालत और भी बुरी होती। सीन का हीरो इस कदर मजबूर होता कि साऊथ इंडियन हिरोइन के मांसल होठों, गले, गर्दन, पेट, पैर और जांघों पर ही घूम फिर कर आना होता। बैकग्राउंड म्यूजिक ऐसा होता मानो म्यूजिक डायरेक्टर हारमोनियम या पियानो पर बैठ कर उतरना भूल गया हो। कई बार दोस्तों की खातिर सर में अमृतांजन लगा कर बैठे रहना पड़ता।

उमा मुहब्बतें की तरह एममात्र फिल्म के लिए बस दिमाग पर जोर डालने पर याद है। बहुत याद है आम्रपाली अधूरी फिल्मों के कारण, सड़क पर घुटना भर पानी हो तो इस लालच में जाना कि आज ही रिलीज हुई सिर्फ तुम के टिकट मिल जाएंगे। और जो अमीर दोस्त मोना या रीजेन्ट के मुस्टंडे भीड़ कंट्रोलर से लाठी खाते हुए, पच्चीस रूपए की टिकट डेढ़ सौ में लेते हुए तीन बजे अपनी हीरोगिरी छांटेंगे तो हम दस रूपए में साढ़े बजे ही अपनी रिपोर्ट दे रहे होंगे। कोलेज भी हो लेंगे और घर जो कि उन दिनों गेहूं भी पिसवाने निकलता तो मां बाबूजी जोड़े में धमकियाते कि सिनेमा देखने गया है, उनको शक भी न होता। वो तो मेरे बाबूजी की हैसियत नहीं थी वरना वो मेरे लिए कोलेज और कोचिंग तक घर में ही खुलवा देते। लेकिन जब आपको बिगड़ना ही है न शिव खेड़ा की यू कैन विन आपको रोक सकती है  न स्वेट मार्डन। रिच डैड पूअर डैड हम जैसों को कभी जिम्मेदार नहीं बना सकती।

दिल्ली में काम करने के दौरान जो सिनमा देखी तो उसमें कोई रोमांच नहीं है। पटेल नगर के कमरे से हाफ पैंट और टी शर्ट में निकला और सत्यम मल्टीपलैक्स में जाकर बैठ गया। समझदारी अब इतनी आ गई है कि हिंदी सिनेमा के साथ बहुत कम बह पाता हूं। अंग्रेजी आती नहीं सो ज्यादा ऊंचा नहीं कूद सकते। बीच में यार दोस्त की मेहरबानी और माऊथ पब्लिसिटी से ईरानी, कोरियन, चीनी, जापानी सिनेमा देख कर उस पर रीझ जाते हैं।
तो ये सिनेमा इंद्रियों को संदेवनशील तो बना रही है लेकिन इसे देख कर दिमाग भी स्लो हुआ जाता है। इन कुछ फिल्मों में कई जगह लगता है सिनेमैटोग्राफर कैमरा रख कर उठाना भूल गया है और कैमरा ही दिमाग है सो वैसा ही मेरा दिमाग भी हुआ जा रहा है।

जवानी ठीक था। शहर के साथ साथ सिनेमा देखने की जद्दोजहद में जीवन की रॉ फुटेज से भी दो चार होना पड़ता था। लोहार को काम करते देखते, वेल्डिंग मशीन, साइकिल की नाचती रिम, पंक्चर चेक करने के लिए पानी कठौत की काली पानी में टेस्टिंग, बातों में ढ़ेर सारी गालियां, गालियों के हतप्रभ कर देने वाले विचित्र बिम्ब, दोस्तों के फैंटेसी, पुलिस जिप्सी से छिपते हुए वीमेंस कॉलेजों के चक्कर, इप्टा के नुक्कड़ नाटक।
बीबीसी उर्दू सुनते हुए उसे कॉपी करने की कोशिश करना - /ढ़ोलक की थाप/

'ये बीबीसी लंदन है। उदू नस्रियात की पहली मजलिस में जहांनुमा पेशे खिदमत है। इस वक्त पाकिस्तां में सुब्हो से साढ़े छै, भारत में सात, बांग्लादेश में साढ़े सात और यहां लंदन में ग्रिनह्व्चि में रात का डेढ़ बजा चाहता है। और अब पेश है इस वक्त की आलमी खबरें....'

आज शनिवार रात को ऑनलाइन बुकिंग टिकट करवाते हैं इतवार को जाकर हाफ पैंट में ढ़ेर सारे एक्सक्यूज मी, थैंक यू, ओह शिट, ह्वाट ए फकिंग मूवी के साथ देख आते हैं। लगता ही नहीं कि सिनेमा देखा। हिंदी सिनेमा तो बीच के कुछ महीनों में एक टुच्ची सी चीज़ में कन्वर्ट हो जाती है।

स्मृति में दानापुर का डायना सिनेमाहॉल है। शाम ढ़ले क्रिकेट का मैच हार कर जब हम जबरदस्ती सस्ती सब्जी लेने दीघा पठाए जाते तो मुसहरी और बिना प्लस्टर की दीवारों पर ठोके गए गोयठा (उपले) के बीच आने वाले वहां हफ्ते में लगने वाले फिलिम को साइकिल का स्टैंड लगाकर ध्यान से पढ़ रहे होने का जिक्र आता है। वहीं ठीक बगल में इस हफ्ते हमें मूर्ख बना दिए गए फिल्म का पोस्टर लगा रहता जिसकी हेडिंग चल रहा है, शान से का होता।

उन दिनों दानापुर साइकल से पच्चीस मिनट का रास्ता था और सिनेमा के पैसे घर से मिले एक किलो आलू के लिए पैसों में से साढ़े सात सौ ग्राम लिए जाने की मार्जिन से निकलते। पांच किलो आटे में से आधा किलो बेच देते तो एक समोसे का हिसाब निकल आता। दीघा में ही एक अन्य अतिनिम्न दर्जे का सिनेमाहॉल जिसका नाम अब याद की सिलेबस से पूरी तरह बाहर हो चुका है वहां जोहराबाई और हीराबाई सरीखा फिल्म लगा करता।

और याद में इतना ही दर्ज है कि पहली बार बड़ा हाथ तब मारा जब यह प्लान किया कि गर्लफ्रेंड को ऐसे रीझायेंगे कि  हां कह ही देगी। पहली महंगी गिफ्ट में एक माऊथ ओर्गेन, आर्चीज़ से एक लॉक होने वाली जिंस के कपड़ों में घिरी डायरी के लिए मैट्रिक में कैमेस्ट्री के प्रैक्टिकल के नाम पर पैसे मारे थे इस दलील पर कि यह भी कैमेस्ट्री बनाने के लिए ही जद्दोजहद की जा रही है।

सवाल उठता है कि आखिर किससे हम इश्क कर रहे थे ? क्या सिर्फ एक लड़की से?
 




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जेनुइन नज़र रखने वाले मेरे सभी आवारे दोस्त.

Thursday, April 18, 2013

B. Call log 07/04/2012 8:28PM last call duration: 03:38:21


अप्रैल के यही दिन थे। वातावरण की हवा में अपनी इक उम्र पूरी करके पेड़ों से पत्ते अलग हो रहे थे। कुछ के अलग हो चुके थे। पॉश इलाके के उन ब्रांच रोडों में सन्नाटा इतना हुआ करता कि चलते हुए पैरों के नीचे आते पत्तों की कड़कड़ाहट सुनाई देती। मैं नाथू स्वीट्स से अपने जेब की रेज़गारी गिनता हुआ दो समोसे खरीदा करता और उसे मिस कॉल दिया करता। यह एक नियम था जब चौबीस घंटे के इन वक्त में दक्षिण एशिया के एक उपप्रायद्वीप के दो जुदा लोग एक दूसरे से जुड़ जाते थे। कभी कभी कितना सुखद लगता है न कि साल के इन्हीं दिनों में जब अप्रैल चल रहा हो, दिन भर उमस रहता हो और शाम की खुशनुमा हवा के झोंकों में हमारी अपनी अपनी जिंदगी के दो वक्त एक साथ कॉमन हो जाते हों। अपनी अपनी उम्र जीते हुए एक दूसरे के साझीदार। लगभग गर्व और सुख की तरह यह ख्याल आता है कि उन क्षणों में वो हमारे साथ था।

मैं पार्क में एक ज़मीन में धंस आए सिमेंटेड बेंच पर बैठ जाता, कंधे से अपना बैग उतार कर साइड में रखता। ब्राउन ठोंगे से एक समोसा निकाल उजली पॉलीथीन की सारी चटनी एक कोने में कर उसे भी समोसे की शक्ल में नुकीला कर पहले एक कट्टा समोसे काटता फिर चटनी की पॉलीथीन में नुकीले हिस्से पर हल्के से अपने दांत गड़ाता, चटनी की हल्की मीठी धार दो चार बाद चबाए हुए समोसे में घुल मिल आती और वे दोनों भी मेरे मुंह में साझीदार बन आते।

तभी मोबाइल स्क्रीन चमका करती और हम आपस में डूब जाते। पार्क लगभग सुनसान हुआ करता। कभी कभार कॉलोनी के एक्के दूक्के मेरी तरह आवारा कुत्ते वहां भटका करते। पार्क के ठीक बीचों बीच एक बहुत ऊंची लैम्पपोस्ट से पीली रोशनी झरती रहती जो ज़मीन तक आते आते और मद्धम पड़ जाती। पार्क में फूल पत्ती बहुत कम हुआ करते, खाली जगह ज्यादा होती। मैं अपने पैरों की सैंडिल खोल देता और उससे बातें करते हुए पैर की उंगलियों से दूब को टटोलता रहता। मेरा मन हमेशा ऐसे कामों में बहुत लगा है जिनका कोई औचित्य नहीं होता। जैसे बदन और बालों में मिट्टी लगाकर नहाना, घास को घंटों स्पर्श करते हुए महसूस करना, रबड़ के पेड़ के पत्तों को सहलाते हुए यह सोचना कि क्या पता कल को यह हमें छूने को भी न मिले। जब छोटा था तब अक्सर रबड़ के एक पत्ते को तोड़कर कोई मिट्टी का केन उसके नीचे लगा देता। रात भर उसका दूध टप टप करते उसमें उतरा करता। वक्त बदला लेता है आज मेरे ज़हन से रोज़ कोई न कोई पत्ता टूटा करता है और मैं टप टप रिसता रहता हूं।

हम बातें करते। उपन्यास की तरह। कभी मूर्त कभी अमूर्त। कभी सिर्फ व्यक्तिक। कभी प्रेम तो कभी दुनिया। हमारी बातें एक घर थी। घर में रहना ज्यादा था मगर खिड़की से भी बाहर झांक लिया करते। फोन हमारी खिड़की थी जिससे वो आवाज़ के मार्फत अंदर आ जाती। जब उसकी आवाज़ उन दिनों एक व्यसन था। अक्सर पान लगवाते वक्त मैं पान वाले को जर्दा ज्यादा डालने कहता। ज़र्दा मेरा जीभ काटता जो उसके तलब को काटने के काम आता। कुछ आवाज़ हमेशा जिंदा होते हैं। कुछ आवाज़ सिर्फ सपना। कुछ आवाज़ें भ्रमित करती हैं। मेरे साथ कुछ ऐसा था कि हर लंबी बातचीत के बाद मैं उसकी आवाज़ के गुण, पिच, आरोह-अवरोह तक भूल जाता। कई बार संदेह होता क्या हम जिससे बातें करते हैं वो दूसरी तरफ सचमुच होता है? याद जिर्फ इतनी ही क्यों रह जाती है कि उससे बात हुई थी और इन इन चीज़ों पर बात हुई थी ? आवाज़ पूर्णतः अपने जिंदा रूप में क्यों नहीं याद रह जाती? अगर ऐसा होता तो शायद हमें किसी से बिछड़ने का गम इतना नहीं सताया करता। क्यों उससे बात करना आंखें पर पहने गए चश्मे की याद दिलाता है जिसे हम वक्त बेवक्त साफ करने के दौरान उलट कर उसके शीशे पर अपने मुंह का भाप देकर नमी देते हैं और अगले ही पल वो गाइब हो जाती है।

कभी कभी जब वह व्यस्त होती और उसका फोन नहीं आता मेरे अंदर की खला जवान होने लगती। मैं बैग उसी बेंच पर छोड़ कर दौड़कर पार्क के चक्कर लगाने लगता। इतना थकता कि शरीर पेड़ पर टंगा किसी मेरे हुए सूखे सांप सा अकड़ जाए। कुरते के कोर कोर से पसीना पटकने लगता। मैं जिस्म को रोज़ थकाता हूं। चैन से सोने के लिए कौन कौन से रास्ते नहीं अख्तियार करता हूं। बेवक्त जिम जाता हूं। पुश-अप मारता हूं, हांफने लगता हूं। गर्लफ्रेंड रूम पर हो तो लगातार दो दो बार संभोग कर लेता हूं और नहीं रहे तो हस्तमैथुन करके थकने की कोशिश करता हूं। रात रात भर धीमे आवाज़ में रेडियो पर गुलाबी गाने बजाने वाले चैनल सुनता हूं। नींद इतने पर भी मुझे अक्सर दगा दे जाती है फिर मजबूर होकर नींद की गोलियां गटकता हूं। जानता हूं कि एक दिन इन गोलियों की भी आदत लग जाएगी और ये भी बेअसर होने लगेंगी। आप न जाने क्यों कहते हैं कि आत्महत्या एक अनैतिक कदम है।

उन रास्तों से अब नहीं गुज़रता। उसके बहाने सिलसिलेवार ढंग से वहां की मैगज़ीन वाली दुकान और छोटी वाली गोल्ड फ्लेक की याद आती है। और हर मीठी याद सूखे गले में शराब की पहली कड़वी घूंट है।

लालटेन पर का शीशा भी अपने अंदर जलते आंच के बायस चटखने से डरता है। इसलिए क्रोसड्रेसिंग करता है। साथ ही यह तर्क भी देता है इन लौ को बाहर की आंधी से बचाना होगा इसलिए यह प्रतिरोधक है। 

अपने वजूद पर उन यादों की हमने वैसे ही कोटिंग कर रखी है जिससे एक्सट्रीम अंदर और बाहर तो आज़ाद हैं मगर बीच में हम बस गुलाम हैं।

अप्रैल के यही दिन हैं। वातावरण की सीमित हवा में अपनी इक उम्र पूरी करके पेड़ों से पत्ते अलग हो रहे हैं। कुछ के अलग हो चुके हैं। पॉश इलाके के उन ब्रांच रोडों में सन्नाटा इतना हुआ करता होगा कि चलते हुए पैरों के नीचे आते पत्तों की कड़कड़ाहट सुनाई देती होगी.... 

....मगर उन रास्तों से अब गुज़रना नहीं होता।

Tuesday, April 16, 2013

सीधा प्रसारण


परदा उठता है।

नफासत भरी चाल में मलमल का कुरता डाले एक आदमकद आकृति मंच पर उभरती है। देह में लोच, मुख पर विनम्रता और नमस्कार की मुद्रा धारण किए माननीय संगीतकार नंगे पैर मंच पर बढ़े चले आ रहे हैं। एकबारगी लगता है जैसे मंच रूपी धरा ही कृतार्थ हो रही है। पके हुए बालों में शाइनिंग लिए हुए, पीतांबरी कुरते से एक दिव्य आभा का प्रस्फुटित हो रही है। कस्तूरी की महक आ रही है लगता है मृग यहीं आसपास है और कुचालें भर रहा है। कलाकार के कुरते के तीन बटन खुले हुए हैं जिसमें सोने की पतली सिकरी औंधे लेटे हुए है। यूं इस तरह सुनहली चेन का बाहर झांकना उनके पावन और विराट रूप को और दिव्य बना रहा है। हल्का पीलापन लिए उनके देह पर कुरता फिसल फिसल जा रहा है। कई बार लगता है कुरता नहीं कोट है और यह पतली देह उसके असहनीय भार को धारण नहीं कर पा रही और अभी अभी शरीर पर पिघलकर तार तार होकर बह उठेगी। कह सकते हैं कि संगीतकार का क्लीवेज दिख रहा है लेकिन न...न... (जीभ काटते हुए) संगीतकार हैं तो ऐसा बोलना पाप होगा।

संगीतकार के चेहरे पर हिन्दी में कहें तो तेज़ है, मुख देदीप्यमान है। आंखों से ज्ञान का प्रकाशपुंज निकल रहा है। इस ज्योति से सरासर जगत में जीवन रस फूट पड़ा है। सृष्टि सत्, चित्त, आनंद हो उठती है। श्याम बरन के कन्हैया नाच उठे हैं। आज पृथ्वी पर कला अपना शंखनाद करेगी। रंभा, उर्वशी, मेनका और तिलोत्तमा सामूहिक नृत्य में सहयोग करेंगी। यह अपनी तरह का जुगबंदी का विलक्षण और सर्वोत्त्म प्रदर्शन होगा। सत्य की विजय का उद्घोष होगा। सृष्टि राग, रंग, रस से सराबोर हो जाएगी।

उर्दू में कहे तो फनकार के हूनर का नूर है गोया उनके चेहरे के मसाम मसाम से रौनक बरस रहा है, ज़र्रे ज़र्रे पर आफताब चमक रहा है। लगता है मंच के बीचोंबीच जो दीपशिला है अगर वह उस पर अपना चेहरे से स्पर्श भर कर देंगे तो मंच पर रखा वह तुच्छ और निर्जीव दीया जल उठ्ठेगा। शमा के रोशन होने से नित्य नीरस संध्या अनुगृहीत हो जल उठेगी। सामने दर्शक दीर्घा में बैठी सारे हुस्नो जमाल जो अब ज़ाहिर हैं, फीकी हो जाएगी।

मंच के किनारे ज्यादा वोल्टेज पाली पीली रोशनी की चुभन से उनके माथे पर पसीने की नन्हीं नन्हीं बूदें चमक रही हैं। अगर आप अपने आंखों का कैमरा जूम करके देखें तो वे बूंदें आपको भारी होकर गोल-गोल घूमती नज़र आएंगी और उसमें वातावरण का रंगीन प्रतिबिंब दिखाई देगा। और उनके मुखमुद्रा की यह भंगिमा देखकर आप कह उठेंगे कि कलाकार के माथे पर संपूर्ण ब्रह्मांड नृत्य कर रहा है। कह सकते हैं कि आदरणीय संगीतकार पौव्वा तो नहीं बीयर चढ़ा कर जरूर आए हैं लेकिन... न.... न.... (जीभ काटते हुए) संगीतकार पर ऐसा सोचना भारी जुलुम लगता है।

उनके नन्हें- नन्हें,  गोरे -सलोने पांव रूई के नर्म नर्म फाहों जैसे हैं। उनके उवाचने का पिच इतना धीमा है जो फुसफुसाने की हद को शर्मिंदा कर देता है। तीव्रता से कदाचित उनका परिचय नहीं। उतावलापन उन्हें भाया नहीं। उनकी नज़र में जो ऐसा करता है वह उचक्का है, मानवोचित गुणों से च्चुत है अतः मनुष्य रूप में बिना पूंछ का पशु है, वह कला से हीन है। ग्रह नक्षत्रों, पल-विपल के नृत्य और सूक्ष्म कला से पूर्णतः अनभिज्ञ है।

पुरूष अधीर होते हैं सो उनके कला का दर्शन मात्र कर अपने को धन्य समझते हैं मगर उनके धीमे बात करने की सुविख्यात अदा का एक अतिरिक्त लाभ उन्हें यह भी मिलता है कि प्रशंसिकाएं लगभग सांसों को सुन सकने वाली नज़दीकी की हद तक उनके पास आ जाती हैं। कह सकते हैं कि इन स्वास्थ्य लाभरूपी व्यायाम से मैं उनके सिताररूपी हृदय तरंगों को सुन लेता हूं लेकिन.... न... न.... (जीभ काटते हुए) एक संगीतकार के बारे में ऐसा कहना गुनाह है क्योंकि वह हमारी धड़कनें सुनकर अपने वाद्य्ययंत्रों पर हू ब हू ध्वनित कर देता है।
औपचारिक दीप प्रज्ज्वलन के बाद उनके स्वागत हेतु दो शब्द के बहाने वक्तारूपी मंत्री महोदय उनके कशीदे इस तरह पढ़ने लगते हैं गोया किसी लेफ्टिस्ट को वामपंथ पर लेख लिखने दे दिया गया हो। भारत की शस्यशामला धरा पर कला की हो रही दुगर्ति की तुलना वह समकालीन सिनेमा में ‘स्त्री - एक देह प्रदर्शन’ मुद्दे से जोड़ देते हैं। सचिव के कई बार उनके पाजामे खींच कर याद दिलाने पर वह अपनी तकरीर अंत वे ललित निबंध के इस गुर से करते हैं कि अंत आशावान शब्दों में होना चाहिए, अतः श्री मंत्री उवाच् -

इन सबके बावजूद ऐसा नहीं है कि हमारा देश कला के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। बाहर से कलाकारों को आयात करने की आवश्कता नहीं है। हम इस मामले मे आत्मनिर्भर हैं कि हमारे यहां हर गली में कलाकार हैं (भाषण के दौरान उनकी नज़र अग्रिम पंक्ति में लाल और काली छींट वाली साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज पहने एक महिला से मिल चुकी है जो जिस पर वह अपनी हर पंक्ति के दो छह शब्द के दृश्य उस पर न्योछावर कर दे रहे हैं। पटकथा के लहजे में कहूं तो यहां आॅडियो, वीडियो को सपोर्ट नहीं कर रहा है) मैं अपने दोस्तों और उनकी सहेलियों से अनुरोध करूंगा कि वे अच्छे फनकार पैदा करें ताकि हमें अपने पड़ोसी देशों से कलाकार बुलाने की आवश्यकता न पड़े और हमारे देश के फनकार अपनी कला के बूते अच्छी जीवनशैली बसर कर सकें। माता शारदा उनको.....

सचित घबराकर फिर उनका पाजामा खींचता है। मंत्री महोदय घड़ी और उस महिला को एक बार फिर देखते हैं। श्रोताओं से जबरदस्ती ताली बजवाते हैं। मंच छोड़ने से पहले उक्त महिला पर सर से पांव तक अंतिम गहरी हृदयवेधी दृष्टिपात करते हैं। और मंच से उतर जाते  हैं।

मंच पर पहले से बैठे हुए कलाकार के रूप की आंच अब हल्की मद्धम पर चुकी है। वे इरिटेट हो गए हैं। जुगलबंदी के लिए उनके साथी कलाकार अब तक नहीं आए हैं। बहरहाल वे तबले पर थाप देते हैं। और भीड़ को साधने की कोशिश करते हैं। इस मामले में वे युवा हास्य कवियों जैसे हैं जो वरिष्ठ हास्य कवि के आने तक श्रोताओं की हूटिंग से बचने के लिए दो टके की कविता सुनाते हैं। हां तो लाइव टू मंच से पहला कलाकार -
तबले पर थाप से पहले वे अपनी हथेली पर रा...धा... रा.... धा... उच्चारते हैं। यह उनकी देवी को स्मरण करने की अदा है। वे अपनी पूज्य को इस रिदम से मंच पर साकार करते हैं।

पब्लिक साथ जुड़ती है। जोरदार बेसुरे तरीके से जबाव आता है - राधा.... राधा....

कलाकार कनखी से प्रोग्राम के संचालनकर्ता को साथी कलाकार द्वारा आने में किए जा रहे देरी को नोटिस करवाता है। पर भीड़ को इंगेज रखने के लिए राधा आलाप खैंचने लगता है।

रा....धा.... रा....धा.... रा....धा....
धा...धा.....धा...... धा......धा......
धिगिर धा..... धिगिर धा.....
रा....धा.... रा....धा.... रा....धा....

जुगलबंदी पब्लिक पर छोड़ी जाती है। भीड़ बेचारी ऐसी लय कहां से लाए! वो सिर्फ राधा राधा..... रा...... रा..... रा...... रा..... रा...... रा..... रा...... रा..... धा...धा....धा...धा....धा...धा....धा...धा....धा...धा.... राधा... राधा... राधा जबाव देती है।

कलाकार का मन भीड़ के प्रति घृणा से भर जाता है, वह थूकना चाहते हैं मगर थूकने का पात्र जोकि पीतल का है, संलाचनकर्ता रखना भूल गए हैं।

अगले ही पल उन्हें लगता है वे कितने श्रेष्ठ हैं जो इस बावली भीड़ को हांक रहे हैं। क्या अजब और गजब होती है संगीत की शब्दावली जो भीड़ मस्त नागिन की तरह फन काढ़े बस सर झूमाए डोलती रहती है!

सहसा... पब्लिक ताली बजाती है। पहले कलाकार चैंकते हैं फिर देखते हैं मंच पर दूसरी आभा प्रस्फुटित हो चुकी है। उलझे और बिगड़े बालों में गंधाए हुए, पसीने में तर-ब-तर दूसरा संगीतकार मंच पर विद्यमान है। चेहरे पर कई रातों की रूठी हुई नींद पर परछाईं है। उंगलियों में कई लपेटी हुई नाजुक पट्टी है जैसे मैदान पर फील्डर के होते हैं और कैच छोड़ने के बाद कैमरा खिलाड़ी के अफसोस के बाद उसकी उंगली पर जूम इन करता है। कह सकते हैं कि संगीतकार मारे टेंशन के कई सिगरेट फूंक कर आया है लेकिन न...न... (जीभ काटते हुए) संगीतकार हैं तो ऐसा सोचना भी... हें...हें...हें.. हें....

पहला कलाकार नाराज़ है। दूसरे के बारे में सोचता है - लगता है साला कहीं और से परफाॅर्म करके आ रहा है। मेरे से जूनियर है, मेरे सामने पैदा हुआ, सा, रे, ग, म सीखा और आजकल हर जगह मेरा ही पत्ता काटता फिरता है। पहला कलाकार यह सब सोचता हुआ उसका नमस्कार कर अभिवादन करता है।

दूसरा कलाकार सोचता है कि इसका प्रदर्शन आजकल इतना गिरा हुआ क्यों है, अब समझा। यह साला रिहर्सल में भी गायब रहता था। माल कमाने के जुगाड़ में ज्यादा रहता है। ऐसा सोचता हुआ वह नमस्कार का जबाव विनम्रता से सिर को चाइनीज मार्शल आर्ट वाले ‘हो’ लहजे में बहुत ज्यादा झुका कर देता है।

पब्लिक अपने पर शर्म महसूस करती है। सोचती है - इनकी दुनिया कितनी विराट है! हम जैसे तुच्छ लोग हमपेशा लोग भाई- भाई होकर लड़ते-मरते हैं। इन लोगों में कितनी विनम्रता है! भीड़ अपने पर लानत भेजती है।

पहले कलाकार ने तबले पर जोरदार थाप दी। उंगलियों की कोर से कसे, मढ़े हुए चमड़े पर जब चोट पड़ी तो वह पगडंडी से भटके भेंड की तरह वापस ट्रैक पर आ गई। संगत करते हुए दूसरे कलाकार ने पखावज को जड़ से हिला डाला। पब्लिक में एक रोंगटे खड़े कर देने वाला रोमांच जागा। भीड़ आह्लादित हो उठी। संगीत की सुरलहरियों से आसमान भी झंकृत हो उठा। कई बुजुर्ग महिलाओं ने तो से मंच पर यह दिव्य समागम देख अश्रुपूरित नेत्रों से खुद को गदगद फील किया।


कि अचानक दूसरे कलाकार की भृकुटी में पहले तनाव आया तत्पश्चात् वह टेढ़ी होकर ऊपर की ओर उठी। उठी और थोड़ी देर तक लगा हवा में ही टंग गई। लेकिन फिर गिरी। पहले कलाकार ने जोकि तबला बजा रहा था रिहर्सल के बाहर जाकर राग छेड़ दिया। दूसरे कलाकार को यह बीट खटका कि यह तो रिहर्सल में था ही नहीं! इतना समझते ही वह निश्चिंत हो गया और यह सोचते हुए कि साला अपनी औकात पर आ गया, वह खुद भी कुछ का कुछ बजाना लगा।

हमारी आम जनता सीधी है। रोजी रोटी से थक कर आती है तो उसे यह भी सुरीला लगा।

सो तब से बेसुरों में सुर तलाशकर उसमें सुख और सुकून खोजना आज भी ज़ारी है।

पब्लिक सुर नहीं शोर सुन रही है। भैंस की तरह संगीतकार पगुरा रहें हैं, नागिन की तरह आम जनता उस बीन की तान पर झूम रही है।

जुगलबंदी ज़ारी है।

परदा अभी गिरा नहीं है।

Monday, April 15, 2013

गुलाबी सुबह डिवाईडेड बाई चिलचिलाती धूप



साढ़े चार साल मेरे साथ रहते रहते वो ऊब चुकी थी। अब न प्यार में वो नयापन रहा था, न रोमांच। स्लेट पर ईश्क लिखते लिखते उसकी लकीरें मोटी होकर भद्दी लगने लगी थी। और तो और ई, श् और क आपस में मिलकर गुंथ गए थे। दूर से देखने पर यह शब्द सात बच्चे जन चुकने, तीन के सफाई और फिर से पेट फूली औरत की तरह अब बस एक बेडौल आकृति लगने लगी थी। कूल्हे भारी होकर कमर का साथ कब का छोड़ चुके थे। मगर था तो बदन का हिस्सा ही सो घिसटता जा रहा था। जैसे जीवन नीरस था स्लेट पर लिखा यह शब्द भी।

यह मेरी दूसरी बीवी है जो शुरू से बहुत डोमिनेटिंग रही है। शादी से पहले मुझे इसकी ये आदत अदा लगती थी। मैं इसके इसी खूबी का मुरीद था। आज सोचता हूं तो लगता है पता नहीं मुझे प्यार हुआ था या नहीं मगर तब इसके बोल में मुझे एक प्रेमवश अधिकार लगता था। एक अथाॅरिटी जैसे आपकी गर्लफ्रेंड कहे - खबरदार जो अपने जगह से हिले और आपको उसमें अपनी मां का प्यार भरा गुस्सा नज़र आए या तुतलाती आवाज़ में अपनी बेटी का आदेश महसूस हो आप वहीं के वहीं जड़ होकर खड़े रह जाएं।

मेरी पहली बीवी इसके ठीक उलट थी। इतनी गिरी हुई कि उससे प्यार नहीं पाता था। साली में बगावत नाम की कोई चीज़ ही नहीं थी। कठपुतली थी, कठपुतली। हमें प्यार में कठपुतली होना अच्छा लगता है कठपुतली बनाना नहीं। बिस्तर पर भी जिधर लिटा दो बस आंख बंद करके लेटी रहती। कभी सेक्स से न पहल करती न करने देती। उसकी बाॅडी लैंग्वेज देखकर ही संभोग की ईच्छा मर जाती। देवी जैसी लगती। मन मार कर सेक्स करता भी तो बदले में आह ऊह तक न करती और मेरा सारा जोश जाता रहता। गुस्से में कभी कह देता कि मार दूंगा तो गाल आगे करके आंख बंद कर लेती। कहने लगती - मारिए। मैं आपसे मार खाना चाहती हूं। मैं जब भी ऐसा सोचती हूं मुझे सुख मिलता है।

और मुझे कोई जवाब नहीं सूझता। मारे नफरत के मैं उसे लात से धक्के देकर अलग कर देता।

वहीं ये दूसरी बिस्तर पर कमाल थी। अक्सर मुझे पलट कर मेरी छाती पर चढ़ आती, बाल खोलकर मुझ पर झूल जाती। तब मुझे हाॅलीवुड फिल्म बेसिक इंस्टिक्ट की शेरेन स्टोन याद आती। उसके वक्ष मेरे आगे डोलते रहते। वह मेरे हाथों को कैद कर मुझ पर छा जाती और अपनी मादक काली-नीली आंखों से शोले निकालते हुए किसी बात का बदला लेने लगती। वह मेरे कमर पर भरपूर ताकत से कूदती और मेरा सर तकिए पर चार चार इंच तक उछल जाता। पूरा कमरा उसके शोर से भर जाता और मैं समय से पहले स्खलित हो जाता। 

लेकिन यह पहले की बात थी। पिछले चार सालों से मामला पूरा उलट गया। 

वैसे उसे मुझसे प्रत्यक्षतः कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन शिकायत प्रत्यक्ष से ज्यादा अप्रत्यक्ष होता है। पड़ोसी कह देते थे कि वल्लाह क्या जोड़ी है! और यह सुनकर जहां उसके चेहरे पर थोड़ी हया आ जाती वहीं अंतर्मन में हम दोनों सोचने लगते कि क्या लोग अंधे होते हैं? लेकिन मन दोमंुहे बाल होते हैं साहब। और ऐसे में जब आसपास और कुछ न हो तो नर्म नर्म से चुभा करते हैं। हया का सच से कोई लेना देना नहीं होता। शर्म पहली स्वभाविक प्रतिक्रिया है और सच कुंडली मारकर बैठा अजगर। हया चेहरे पर की हवाईयां हैं जो क्षणिक होती हैं और उड़ जाती हैं लेकिन सच खाना खा लेने के बाद पोंछा मारने पर भी फर्श पर छूट गया पका हुआ चावल है जो आपके तलवों से लगकर आपके चिढ़न का बायस बनता है।

तब मैं आदतन थोड़ा और तल्ख होकर सोचने लगता कि कैसा चूतिया आदमी है जो अब तक रिश्तों में जुड़े आदमी को पढ़ना नहीं सीखा। क्या इसने अपने बाल नहीं उड़ाए? एक सरसरी निगाह देखने भर से आदमी भविष्यवाणियां कैसे कर देते हैं?

पहल किसी न किसी को तो करनी ही थी। एक दिन मैंने ही की और कहा देखो बुरा मत मानना लेकिन अगर हम अपने बची कुछ अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं तो तुम क्यों नहीं..... कुछ...... सो....च....सोच.... । और मैं इसके आगे कह नहीं पाया। 

लेकिन मैं दावे से कहता हूं कि वह मेरे कहने का मतलब समझ गई थी। लेकिन फितरत साहब, फितरत। आप जिंदगी में समस्या सुलझाने की कोशिश कीजिए और यह आपको ज़लील करने का मौके नहीं छोड़ती। उसके चेहरे पर के भाव को मैंने पढ़ा, वो चैंकी नहीं, वो ऐसा था जैसे उसे इसका इंतज़ार हो। एक लोमड़ी किस्म की कुटिल मुस्कान कि जैसे देख लो अब तुमसे ये भी नहीं निभ रहा और तुम इस हद तक उतर आए। फिर वह भोली बनती हुई चैंकते हुए बोली - क्या मतलब ? मैं समझी नहीं। ज़रा फिर से कहो। 

अबकी बार मैं कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसके डोमिनेटिंग आदत के चक्कर में मैं आ ही जाता हूं सो अबकी भी आया। मैं एक बहुत ही कमज़ोर दिल वाला आदमी हूं। अच्छे समाधान की तलाश में मैंने जब भी कुछ डेयरिंग फैसले लेने की ईमानदार कोशिश की सामने वाले ने मैं बुरी तरह धरा गया, मेरा गर्दन नाप लिया गया। 

मैं एक बुजदिल आदमी की तरह झटपट अपनी कही हुई बातों से सिरे से पलट गया। बातों को घुमाने के लिए यह मेरी खास पाॅलिसी है कि चूंकि मुझमें देर तक तर्कपूर्ण बहस करने और आत्मविश्वास की कमी और घुन्नेपन की आदत के कारण मैं मामले को हद से ज्यादा बिगड़ने से पहले ही यह चाल चलता हूं कि अपने कहे से मैं साफ पलट जाता हूं। तब मैं बस यह चाहता हूं कि इसी बहस में यह मामला निकल जाए। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा क्या होगा वो झूठा, मक्कार, दोगला भर ही तो कहेगी। लेकिन उन बुरे नतीज़ों से तो बच जाऊंगा। फिर इसमें मेरी मदद औरतों के ज्यादा बोलने वाले गुण भी करते हैं। जब वो भी बहुत मुझ पर बरस जाती है तो नाॅर्मल होने लगती है और तभी फिर मैं अपने बयानों को लचीला करना शुरू करता हूं। अंततः मैं मान भी लेता हूं कि मैंने ऐसा कहा था लेकिन मेरा मतलब वो नहीं था। तुम ही गलत समझी। 

अगर यहां मामला रफा दफा हो जाता तो जीतने के लिए मैं इस बात को पकड़ कर बैठ जाता कि तुम्हें तो हर बात को उल्टा समझने की आदत है। कहता आम हूं, सुनती ईमली और बोलती अमरूद हो। 

लेकिन यह सब पहले की बातें हैं। आज तो अपनी कही हुई बातों के पहलमात्र से ही मैं बुरी तरह चक्रव्यूह में फंस गया। उसने उसी को मुद्दा बनाया और छीछालेदार करना शुरू किया।  मैं अकबका गया। उसने हथेली फैला फैला कर मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया जिससे सीधे सीधे मेरे ज़मीर पर चोट लगनी शुरू हुई। वह वितृष्णा से भर उठी। उसके चेहरे पर मेरे लिए घृणा देखने लायक थी। उसने मुझे कम से कम दो बाप की औलाद कहा।

फिर भी वह गुस्से में उफनती हुई मेरे ओर देखती हुई चीखती जा रही थी। मैं हिम्मत करके उसे एक दो बार देख लेता। आंखें मिलने पर वह और उग्र हो जाती। उसके द्वारा दी जाने वाली गालियां और मोटी होती गई। मुझे लगा यहीं मेरे कान के पास बम फूट रहे हैं। मैंने उसकी बातों को इग्नोर करते हुए अपनी खाल मोटे होने का संकेत देते हुए जब अपनी कनपटी छुई तो उंगली सुलग उठी। बस मेरी नज़र ठीक इसी समय उससे एक बार फिर मिल गई-

‘तेरी मां मुहल्ले भर के मर्दों से फंसी होगी।'

बस इसके आगे मेरे कान सुन्न हो गए। एकबारगी लगा कि सामने कोई सिनेमा का परदा है और उस पर मैं कोई म्यूट फिल्म देख रहा हूं जिसका एक कैरेक्टर हद दर्जे के गुस्से में पागलों की तरह चिल्ला रहा है।
तब मेरे सब्र का पारावार नहीं रहा और उस दिन हम पहली बार हमारे रिश्ते में हिंसा उतर आई थी। मैंने क्रोधवश उसे एक थप्पड़ मारा, वह क्षण को अवाक् हुई लेकिन स्वभाव से ही इतनी डोमिनेटिंग औरत कहां चुप रहने वाली थी। उसने मुझपर अपने लात घूंसे बरसाना शुरू कर दिए।

वैसे मैं भी पल में शोला और पल में शबनम बन जाता हूं। शुरूआत तो हर चीज़ की कर देता हूं पर कारगर अंत करना नहीं आता। मैंने हवा दी उसने मुझे राख कर दिया। मैंने एक थप्पड़ मारा और मैं इसी भर से संतुष्ट हो गया था मगर उसने इसे बेस बनाकर मेरा कचूमर निकाल दिया।

एक पुरूषप्रधान समाज में निम्नमध्यमवर्गीय लिजलिजा पति होकर अपनी दूसरी बीवी से बुरी तरह ज़लील होकर भरपूर पिटा हुआ मैं फिलहाल अपने आपको काफी तृप्त महसूस कर रहा हूं। 

आज हमारे साढ़े चार साल के बासी रिश्ते में कुछ नया और रोमांचक हुआ है और अगर ऐसा ही रहा तो आगे और भी रोमांचक होने की उम्मीद है।

तब किसी अल्हड़ सी लड़की ने सुबह की गुलाबी धूप में स्लेट पर ईश्क लिखा था आज चिलचिलाती धूप में जिं़दगी की मास्टरनी हाथ में बांस की कच्ची और लपलपाती छड़ी लेकर कोम्प्रोमाईज के मायने सिखला रही है।

Saturday, April 6, 2013

कन्फेशंस एंड एक्स्टसी


वो बीमार है और इसका ख्याल कर जहां तक मेरी समझ में आता है कि इस वक्त लोग अपने बिस्तर पर पड़े पड़े रिश्तों की सख्त पड़ताल करते हैं। नफा नुकसान सोचते हैं। अंदर ही अंदर अपने अति पर आगे से तौबा करने की ठानते हैं। वो गुस्सा, वो तुनुकमिज़ाजीपना जो आदमी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है और जब वो स्वस्थ होता है तो उसे यदि तब आप उसके व्यवहार की यही गलतियां बताएं तो वो अपने को ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा बेहतर और काबिल समझता है, लेकिन बीमारी में अक्सर लोगों का प्रतिरोध घट जाता है और उसे एहसास होता है कि हां फलां दिन हमने थोड़ी गलती की थी। मैंने यह भी नोटिस किया है कि आदमी इसी को कहते हैं कि अस्पताल के बिस्तर पर भी वो उसी ‘थोड़ी’ में अपने को संतुष्ट पाता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि जब आदमी ठीक हो तब उसे यदि आप साइको कह दें तो वह भड़क उठता है। गुस्से में तमतमाए क्षणों में वह पागल है यह आदमी स्वीकार नहीं कर पाता। लोग लाड़ दुलार के क्षणों में ही, प्यार में ही खुद को अपने पर ही रीझ कर पागल भी लेते हैं या सामने वाले का यह संबोधन बिना किसी ऐतराज़ के स्वीकार कर लेते हैं। और कई बार तो वे अपने अति को अंदर ही अंदर जान उस समय सामने वाले से ही यह सुनने की प्रतीक्षा भी करते हैं। मैंने उसके ईगो को जब भी सहलाया उसके चेहरे पर वैसी खुशी रिफ्लेक्ट हुई जैसे कोई ठंडे दिनों में आइसक्रीम खाकर खुश होता।

आम दिनों के झगड़े में जब मैं उससे बहस में हारता तो खीझ कर कहता कि मैं पागल हूं, आलसी, कमीना, नमकहराम और काहिल हूं और तुम बहुत महान, विद्वान और चमत्कारिक हो तो उसके चेहरे पर यह सुनकर एक कुटिल मुस्कान आ जाती। यह इस बात का द्योतक होता कि हां तुम सही कहते हो, और मैं तुमसे सहमत हूं।

तो आदमी और रिश्ते के बारे में इतना सा नोटिस कर मैं उसके पास गया। मुझे उसके नज़दीक जाने का यही मौका सबसे मुफीद लगा। हम मर्द ऐसे कमज़ोर लम्हों का फायदा उठाने में उस्ताद होते हैं। डीटीसी के बस में टिकट लेने में मदद करने के बहाने, सीट देकर उसके ठीक पास खड़े होकर उसके क्लीवेज़ के मार्फत स्तनों का दूर तक देखने का रस्ते भर का प्रयास, अपना स्टॉप आने पर आगे निकलने के बहाने इस एहसास को जा़हिर करता कि हमारा हाथ तो हैंडल पर है लेकिन भीड़ और धक्कामुक्की की वजह से अपने कोहनी से उसके उभारों की साइज़ नापकर दबाने में हम उस्ताद होते हैं। वैसे उस्तादी की बात आई है तो मुझे जैसा आदमी पुरूष मित्रों का फोन भले जानबूझ कर न उठाएं लेकिन महिला मित्रों का फोन जरूर उठाता है और यदि बदकिस्मती से नहीं उठा पाया तो वापस कॉल बैक भी करता है। उसकी यथासंभव मदद को हाज़िर रहता है। तब उसकी तकलीफ हमारी होती है और दुख के उस परम क्षणों में भी उसकी आवाज़ मुझे बड़ा सूकून दे रही होती है। और साहब मैं तो यहां तक कहता हूं कि उनके दुख दर्द से मुझे सहानुभूति तो जरूर रहती है लेकिन मैं अंदर ही अंदर यह सोचकर खुश होता हूं और तसल्ली दे रहा होता हूं कि चलो कम से कम वो मुझसे किसी बहाने बात को कर रही है और उसकी पतली, मादा आवाज़ से बड़ी राहत पाता हूं। कई बार तो उसकी समस्या सुलझ जाने पर भी मैं अनजान और मासूम बनकर घुमा फिरा कर, अपनी भलमनसाहत और निष्कपट हृदय दिखाकर उससे बात करता रहता हूं। जानबूझ कर अपने अंदेशे, डर और रास्ते रखता हूं। मेरा मकसद बस उससे लंबी लंबी बात करना होता है।

तो साहब यही सब रहा और मैं उसके पास गया। बालों में तेल लगने और हफ्ते भर न धुल पाने के बायस उससे एक गुमसी गुमसी खूशबू आ रही थी। मुझे उसके बदन की ये मादा और बासी गंध बहुत पसंद है सो मैं उसका हाल चाल पूछने के बहाने लंबी लंबी सांसे लेकर अपने ज़हन में यह गंध उतारने लगा। कई बार बीच रातों में मैंने अपने बिस्तर पर उसकी इस गंध की कमी बेतरह महसूस की है। यह मेरी फैंटसी कहिए या कि सनकीपन कि मैं उसके बदन से निकला पसीना एक गिलास में जमा करके पीने की ख्वाहिश रखता हूं।

मैंने उसके माथे पर हाथ रखते हुए उसकी तबीयत पूछते हुए उसके कपोल छुए। बुखार की  तपन के बायस वे दहक रहे थे। मैंने ख्याल किया कि अगर ये हाल है तो उसका बिस्तर कितना गर्म होगा! और अंदर ही अंदर थोड़ा अफसोस किया कि काश यह अस्पताल का बिस्तर नहीं होता और वो मेरे कमरे पर की बिस्तर होती। अक्सर गलत जगह प्यार करने का अरमान जागता है। ट्रेन की बोगी में, वहां के बाथरूम में, दफ्तर के स्टूडियो में, घर के किचन में और कई बार तो पार्टियों में अचानक से.... दिल होता है कि बस दबोच लें। तब उसके प्रिय दोस्त भी हमारे कोफ्त की वजह बनते हैं।

लेकिन वो साली उखड़ गई। औरत है न, गुज़री हुई बातें पालने पोसने में ये माहिर होती हैं। इनका वश चले तो ये आपके मरने वक्त भी आपसे आपके ही बारे में दसियों हज़ार शिकायत करने बैठ जाए कि फलाना दिल तुमने मुझे नहीं देखा था, चिलाने पल में तुमने मेरा दिल दुखाया था। वो उन आखिरी क्षणों में आपके सात जन्मों का हिसाब वहीं कर दे। खैर मैंने खुद के गुस्से पर काबू किया और जिन परिवेश में बड़ा हुआ हूं यह सीख सीख कर कि दुधारू गाय लताड़ मारती ही है और यदि उसका दूध लेना ही हो तो उसके माथे को प्यार से पुचकारो, गमछे से उसके पैर और पीठ पर की मख्खी उड़ाओ।

लेकिन साहब चालाकी की कोशिशें और इस औरत को अबकी बार जीतने की सारी रणनीति बेकार। कमीनी हाथ ही न आए। फिर मैंने अपना ब्रह्मास्त्र यानि कि यानि कि भावुकता और कुंठा निकालने वाला हथियार भी इस्तेमाल किया। खुद को ज़लील किया, कोसा और अतिरेक गुस्से में बिस्तर की चादर को कई बार तमतमाए चेररे से मुठ्ठी में पकड़ पकड़ कर छोड़ा। मेरा अक्सर यह दांव चल जाता था। ऐसे में पहले वह थोड़ी देर तक चुप बैठती फिर धीरे से वह मेरे पास सरक आती। उसकी सिसकियां थमने लगती और अपना माथा मेरे कंधे पर दे धरती। दो चार क्षणों बाद मैं उसका हाथ अपने हाथ में लेता, वह कोई इंकार न करती। फिर अपने हाथों की सारी उंगलियों से उसके उंगलियों को लॉक करता। फिर छोड़ देता। दो-चार बार ऐसा करने से उसके लॉक करने में भी कसावट आती जाती। वो वापस ज़िंदगी और प्या र नाम के मेरे फरेब में लौटने लगती। मैं प्यार से सर झुकाकर उसके आंखों का आंसू चखता। कुछ पलों के लिए वह अभी-अभी पैदा हुई किसी नवजात शिशु सी कलपती हुई नज़र आती। मैं उसका माथा सहलाता। और थपकियां देता हुआ उसे बहाने की कोशिश करने लगता। उसके बाल सुझलाता और सुलझाते सुलझाते उसके माथे पर सबसे पहले एक चुंबन टांकता। यह उसका प्रतिरोध जांचने का एक सिग्नल होता कि आगे के लिए वह कितनी तैयार है। मैंने ऐसे नाजुक पलों का फायदा खूब उठाया है क्योंकि मुझमें अपनी दिलेरी और अच्छाईयों से किसी को जीतने की कूवत नहीं। साथ ही मुझे हमेशा से यह अभिमान रहा है कि मैं साथ वाले को अच्छे आदमी के मुकाबले दो सौ प्रतिशत संतुष्टि दे सकता हूं।

..... हां तो आज मैं उसके बाल सुझलाते हुए उसे बहाने की कोशिश रहा था। हमारी सांसें पास पास होने के कारण छोटी छोटी होकर सिकुड़ती जा रही थी। बुखार और भावनाओं के ज्वर में उसकी सांसें गर्म तो थी ही और यह मुर्गा छाप उलझे लाल बीड़ी पटाखों की तरह बस एक छुअन को तैयार हो रही थी। बुखार वाली देह मुझे हमेशा से पसंद है मैंने आज ख्याल किया कि मैं उसके बदन को रूई की तरह धुनकर हल्का कर दूंगा। मैं भूल चुका था कि मैं अस्पताल में हूं। आखिकार मैंने हिम्मत कर सबसे पहले उसके गाल चूमे। क्या होती है औरत जिसको  एक मक्कार प्यार मिलने भर के बहलावे से उसका रंग सुर्ख हो जाता है?

हमारे अधखुले होंठ एक दूसरे से जुड़ चुके थे। मैक्सी में कैद उसके सीने पर मेरे हाथ फिसलने लगे। मेरे धमनी और शिराओं में उसके बासी बदन की गंध घुलने लगी। मैंने अपने आपको बड़ा अमीर महसूस किया। मैं उसके होठों पर हल्के हल्के दांत काटने लगा। उसके बासी मुंह की र्दुगंध में मैं सांसे तलाशने लगा। किनारे से लार बह निकली जैसे कोई बच्चा जलेबी को दांत काटता है और ढ़लके चाशनी से अपना बुशर्ट भिगोता है।

लेकिन जनाब औरत की सात इंद्रियां होती हैं। और ये सोचते हुए मुझे अपने यूएनआई में बिताए दिन याद आते हैं जब एक लड़की के प्यार में पागल में उससे आखिरी बार मिल रहा था और वो वहां के खुले कैंटीन में भावुकता और व्यवहारिकता में अद्भुत सामंजस्य बनाए हुए थी। मैं उसे रो रोकर अपनी आंखों में हज़ार शिकायत लिए, हरामी समाज और पत्थरदिल ईश्वर को कोस कोस कर उसे देखे जा रहा था और वो अपने फोन में मैसेज चेक करने के बहाने मुस्कुरा-मुस्कुरा कर कह रही थी - ‘स्टॉप ईट सागर, ये क्या लगा है..... अच्छा मैं चलती हूं.... अभी मेरी मम्मी यहां से गुज़रने वाली हैं, मेरा भाई भी यही पास के मिनिस्ट्री में काम करता है।’ कसम से मीलॉर्ड हर फ्रंट को इत्ते खूबसूरती से संभालने की उसकी इस अदा का मैं दीवाना हो गया। हंसते हंसते रोना और रोते रोते हंसना और हंसने में रोने की इस मादक मिलावट को मैंने सलाम किया।

फिर क्या बचता है यार, उसने अपने उसी ट्रैक पर लौट आई। उसकी छठी और सातवीं इंद्रिय ने बगावत का रूख अपनाने हुए उसके दिमाग में चट से ज्ञान डाल दिया। हमारे हिन्दुस्तान में लड़कियों की परवरिश एक रेल के ट्रैक की तरह होती है, प्यार की रेल कितनी भी धाकड़ चले वे जन्मजात संस्कारों और नैतिक अनैतिक लड़ाईयों वाली लाइन भी लिए चलती हैं। अपनी क्रॉसचेकिंग भी करती चलती हैं। खुद को बड़ा दिखाने के लिए वे शराब पी सकती है, बाकी सब कुछ कर सकती है लेकिन अपनी नैतिकता और भावुकता की कमज़ोर छड़ी का ही आखिरकार सहारा लेती है। यह एहसास उसे गंगा नहाने जैसी पवित्रता का बोध कराता है।

लेकिन नहीं साहब, बीमारी में भी उसकी अकड़ नहीं गई। यह सच्चा एटीटयूड था।

अब क्या कहें आपको, आखिर वही हुआ। वो मुझसे अलग हो गई। दहाड़ मारकर रोने लगी, गुस्से में दो चार तमाचे मेरी गालों पर जड़ दिए। अब चूंकि मैं सिनेमा देखकर बड़ा हुआ हूं सो मेरा हरामी मन अगले ही सोचा कि अब शायद कमज़ोर होकर मेरी बांहों में आ जाएगी। प्रेम में ऐसे कई मजबूत लड़कियों को कमज़ोर होते मैंने देखा है जब हफ्ते के छह दिन वह बाहर जाकर अपने को साबित करती हैं और अपना ईगो सटिसफाईड करती हैं लेकिन इतवार को पियानों पर सर धर कर बेशुमार रोती हैं। कभी फर्श पर बाप की लुंगी पकड़कर बच्चे की तरह तड़पना चाहती हैं तो मां का आंचल पकड़ गाजर का हलवा बना देने के लिए मिनमिनाने की चाहत रखती हैं। कविताओं की किताब में और पासपोर्ट साइज अपने प्रेमी की फोटो को देख ज़ार- ज़ार रोती हैं। .....लेकिन.....लेकिन उसने मुझे वहां से निकाल दिया। मैं नहीं निकला तो चपरासी की मदद से निकलवा दिया। अब ज़रा आप महसूस कीजिए तो यह ज़लालत। लेकिन खैर... जो लोग मुझे जानते हैं वो यह जानते हैं कि मुझे अपनी ऐसी बे-इज़्ज़ती की आदत है। और कहीं न कहीं मैं इसमें आनंद पाता हूं।

                                                                                                 *****

आखिर क्या है आदमी? कैसी होती है उसकी प्यास? क्या वो बहुत अकेला है? या पैदाइशी कमीना है? या कि वासना है ? कैसी भूख है यह ? कहां से इतनी प्यास आती है? क्यों किसी के गले लगाने पर भी कई बार आत्मा तृप्त नहीं होती। क्यों मुंह चूरे हुए गहूंमन सांप की तरह और उस पर किरासन तेल डाला हुआ बिलबिलाया हुआ खुद को महसूस करते हैं? क्यों पांव को आराम देने की तलाश में जूते में पैर डालते ही वहां अपने घर बनाई हुई ततैया अंगूठा काट कर उड़ जाती है?

Thursday, April 4, 2013

कफ सीरप की बोतलें अगली बार इस्तेमाल में लाये जाने तक के लिए उदास है


मैं हमेशा से उसके उभारों के बारे में सोचता आया हूं। उससे संबंधित बहुत सारी कल्पनाएं की हैं। मैं सोचता रहा कि आईने के सामने जब वह अनावृत होकर आती होगी तो कैसी लगती होगी। उसके ये वक्ष कभी बासी और अलसाए हुए नीम नींद में होते होंगे कभी ताज़े और जागे हुए सर्तक। स्वस्थ, लगभग गोल, गुदगुदे, सख्ताई लिए मांसलता। कभी कभी जब जागे हुए मैं उन्हें अपने हथेलियों में थामता तो बड़ा मुतमइन हो जाता। ज़िंदगी की चक्की  में बीमा सुरक्षा, किराए का कमरा, परचुन की दुकान से उधारी खाते पर रोज़ का आटा, दाल, चावल की कमी से मुक्त महसूस करता। कुल मिलाकर कहूं तो मानसिक असुरक्षा से निकल आता। मुझे लगता कि मैं किसी ऊंचे टीले पर बैठा हूं, तब ज़िंदगी एक किसी गोल्फ कोर्स के हरे भरे मैदान सा लगता जिसमें पानी की चक्की से यहां वहां सिंचाई चल रही हो। यह वैसा ही लगता जैसे आप पैंतीस से चालीस के उमर में हों, करियर और जवानी अपनी पीक पर हो, बच्चे स्कूल जा रहे हों, घर की दीवारें हर दीवाली पर पेंट हो जाती हों, साल-छह महीने में एक ड्राइंग रूम में कोई न कोई फर्नीचर लग जाता हो, आनंद के लिए मार्केट में नई लांच हुई कंडोम फ्लेवरों पर हाथ आजमाते हों, गर्लफ्रेंड को सेक्सी और रंग बिरंगी लिंगरी में देखना चाहते हों, पांच सात सेविंग प्लान हो, रिटायरमेंट और पेंशन की तैयारी कर ली गई हो, बच्चों के स्कूल की छुट्टियों में आप घूमने चले जाते हों और वापस आकर अपने पड़ोसियों को मारीशस या अजरबैजान हो आने की सलाह देते हों।

हालांकि इन दिनों उसका उभार थोड़ा ढ़लक गया है। लेकिन उतना नहीं। अब भी अगर उन्हें थोड़ी देर तक प्यार किया जाए तो वे अनुभवी हाथों के हुनर से अपने पर इतराकर और पक्के जलावन की आंच पर सिंकते धिपे हुए तवे पर की रोटी सा फूलकर, मस्त उरोज़ों में तब्दील हो जाते हैं। तब जिंदगी बड़ी स्वस्थ हुआ करती है और लगता है सिर किसी स्पंज वाले तकिए में दे रखा है।

*****

अस्पताल में बेड पर लेटा हुआ हूं। दवाईयां दोस्त बन गई हैं। अच्छा है दारू न सही कफ सीरप सही।
यहां से दरभंगा हाऊस याद आ रहा है जहां कॉलेज के दिनों में तुम मेरे सीने पर लरजी रहती थी। उन दिनों गुलमोहर और अमलतास पर फूल पेड़ों पर शहद पर के मधुमख्खियों की तरह लधके हुए रहते। तुम मेरे सीने को विनोद मेहरा की खुले सीने से तौलती। सीने के उन बालों में तुम्हारे उंगलियों के लम्स अब तक उलझे हैं। उन दिनों तुम कहा करती ये मांझे हैं जिनसे मेरी उंगली कटती है। मैं भी पतंग बन आसमान में उड़ती थी लेकिन तुम्हारे धागे पर लगे मरकरी के शीशे की धार से तुम्हारे दामन में आ गिरी। आज मैं यहां से परवाज़ करती हूं। उस समझ मुझे लगता कि बस इसी बरस अब इन फूलों के आमद की यह आखिरी खेप है। और भाईसा होता है ऐसा कि जिस दिन हम हद से ज्यादा हंसते हैं अगले पर बुरी तरह रोते हैं। यह भारत सरकार का कृषि मंत्रालय नहीं है जो हर बार हर फसल के रिकॉर्ड उत्पादन का तमगा अपने ऊपर ले ले।

कितना मजबूर है आदमी, कैसी तरक्की की है? वर्तमान अतीत हो जाए तो हम आहें भरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते।

आज दरभंगा हाऊस के उन्हीं दिनों को याद करते हुए पुरानी डायरी से कुछ अन्तरंग लाइन निकालकर लगा रहा हूं जो तब शेर थे. उम्मीद है तुम पटना से इन्हें पढ़ोगी. कान बंद करने से अन्दर का शोर ख़त्म नहीं हो जाता. तुम पढ़ो इन्हें शायद तुम्हें भी कुछ याद आए। ये मेरे लिखे वाक्यों के ग्रामर की तरह कमज़ोर और बेतरतीब हैं लेकिन देखो ज़रा कि क्या टांग टूटे भेड़ दूध नहीं देते ? या कि उनके ऊन में गर्माहट नहीं होती ? आखिर कैकुलेटर लेकर प्यार तो नहीं हो पाता जानम।

हज़ार मंज़र हैं सागर प' ज़िक्र एक तसव्वुर का
सीना आसमान चूमता हो और तूने पैर मोड़ी हो
***
छूअन से ऑडियो ग्राफ की तरह उठता है तेरी पीठ पर तरंग
मेरी हथेलियों में तुम्हारी जांघ स्वस्थ बच्चा सा खिलखिलाता है
***
जिस्मानी मुलाक़ात में और क्या होता होगा दोस्त
मैं तुममें उतरता जाता हूँ और तुम निकलती जाती हो
***
उँगलियाँ तीलियाँ है मेरी तुम्हारा बदन माचिस है
वक्त को तंदूर की तरह जलने दो, रोटियां पकने दो
***
ये एक आखिरी लिबास भी खींच लूँ तुम्हारे कमर के नीचे से
मैं बेहद प्यासा हूँ लेकिन आसमान भी गरजता है
***
बिस्तर एक रास्ता रहा, चादर की सलवट जागती रही
पाले बदल-बदल कर हम घुड़सवार बनते रहे, घोड़े भी !
***
चुप रहना भी तभी कारगर होता है महबूब
जब तसल्ली या बेचैनी से चार लबों को चुप करा दो
***
यूँ मसले को समझ जब भी तुमने लट कान के पीछे लगाई है
बस समझना हमने कोई बेहद पेचीदा तस्वीर बनायी है
***

पढो और आज अपने पति को जी भर कर प्यार करो.

Monday, April 1, 2013

चार शब्द



"मैं मर रहा हूं। और मरने से पहले मुझे किसी का इंतज़ार है।" चेहरे पर शेविंग क्रीम लगाए हुए स्टील वाली रेज़र को भिगोते हुए उसने कहा।
उसकी पलकें झपकी हुई थी। लगता था जैसे उसके और उसकी नींद के बीच कोई है जो दीवार बन कर खड़ी हो गई है। इधर कुछ दिनों से वह बात करते करते या यूं ही चुपचाप रहते हुए वह अनाचक से कह उठता - 'तुम्हें कुछ सुनाई दे रहा है?'
'क्या' - मैं बीड़ी के होंठ को माचिस छुआते हुए उससे पूछता।
"यही.... खट खट की आवाज़..... लगता है जैसे ज़मीन के नीचे खुदाई चल रही हो.... या फिर यहीं मेरे पैर के नीचे ही किसी झरने का पत्थर पर लगातार गिरने का शोर..... "
मैं कहता ‘नहीं’ तब वह चुप हो जाता।
मुझे लगता है वो अब तुमसे कोई कान्टेक्ट नहीं रखना चाहती। आईने में ही उसके चेहरे को एक टुक नज़र डालते हुए मैंने लापरवाही से कहा।
यह सुनकर वह पलटा। उसके रूम पर आने के करीब चालीस मिनट बाद हमारी नज़रें आपस में टकराई। मैंने उसका चेहरा गौर से देखा, खिचड़ी दाढ़ी पर यहां वहां झाग लगे चेहरे में वह ईश्वर सरीखा महसूस हुआ। तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि वह सचमुच मर रहा है।
कोई जब भी मुझे इस तरह घूर कर देखता है तो मैं असहज हो उठता हूं। बॉडी लैंग्वेज की क्लास में आंख मिलाकर बात करना आत्मविश्वास की निशानी जरूर होगी लेकिन मैंने सहज बातचीत हमेशा ही आंख चुराकर की है। आंख मिलाने से आप उस व्यक्ति की छाया के प्रति काॅन्शयस हो जाते हो। इसके उलट रिश्ते में मर्यादा न टूटने और बुरा लगने की फिक्र से आज़ाद हो जाते हो।
उसने मुझे घूर कर देखा। मेरी नज़र उससे मिली नहीं लेकिन मैग्ज़ीन के पन्ने पटलते हुए मुझे उसका घूरना चुभा। अक्सर हमारी चार आंखें होती हैं कि मेज़ पर के ग्लास को देखते हुए दरवाज़ों के नीचे से दुबककर निकलते चूहे भी हमें दिख जाते हैं। आंखों की परिधि अगर ऐसा करती है तो हमारा मन भी करता है। एक ही वक्त पर कई दृश्य और संवाद भी दृश्य और अदृश्य समानांतर ट्रैक पर चलते हैं।
बहरहाल मैंने अपनी लापरवाही बनाए रखी और पूछा -घूर क्यों रहे हो ?
'न....घूर नहीं, सोच रहा हूं।'
'क्या?' - मैंने अपना सिर उठाया और अपनी परछाई पर उसकी झुकी हुई काया को महसूस करते हुए कहा।
अक्सर लापरवाही में ही लोग बहुत बड़ी बड़ी सच्चाई लोग कह जाते हैं।
यह पहली बार था जब मैंने उसे गौर से देखा। वो सचमुच मर रहा है और मैं यह बात किसी को बता नहीं सकता क्योंकि वह अभी जीवित है। यह बड़ा बारीक सा फर्क है। अखबार में आई किसी दुर्घटना के समाचार की तरह जिसमें कई बार मौत की खबर के लगभग आसपास ही होती है गंभीर रूप से घायल होने वाले लोगों का हाल। मगर उनकी हालत हमें मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की संख्या उतनी नहीं चैंकाती।
वो एक गंभीर अकेलेपन से गुज़र रहा है। मैंने अपनी जिं़दगी में कई लोगों को बहुत करीब से मरते देखा है। मुझे लगा कल को अगर यह ज़मीन पर गिर भी जाता तो इसकी उजली देह एक धुंआ उठाती घाटी में तब्दील हो जाएगी।  और जो चुप मेरे अंदर इतना बलवती होकर बोलता है वो तब क्या कुछ कहा करेगा।

मैं
मर
रहा
हूं.

जैसे मुझे तुमसे प्यार है।

हो चार शब्द रहे हैं। और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं।

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