Friday, May 31, 2013

रेडियो बरक्स हिंदी फ़िल्मी गीत


सिगरेट की आदत तब तक नहीं लगती जब तक दोस्तों के बीच मुंह में धुंआ भर कर, जबरदस्ती खांसी रोककर, गले की नसें सूजाकर और आखों में उसकी जलन को रोककर लाल करते हैं। सिगरेट की आदत उस दिन लग जाती है जब आप सुबह के सात बजे खास तौर से खूंटी पर टंगी कमी़ज को उठा कर उसके दोनों हत्थे में सीढ़ी से उतरते हुए उन हत्थों में डालते हुए, गली में चलते हुए उनके बटन लगाते हुए नुक्कड़ पर की गुमटी पर पहुंच जाते हैं और सिर्फ एक अदद सिगरेट दुकानदार को देने बोलते हैं। उस दिन सिगरेट की आदत लग गई पक्की समझिए।

आज भी जो लिख रहा हूं वो भी कुछ ऐसा ही समझिए। बिस्तर पर था और एक बेचैनी थी, करवट काट रहा था। रहा नहीं गया तो उठ कर लिखने बैठ गया हूं। कोई तोप या धांसू चीज़ नहीं लिख रहा, न साहित्य रच रहा हूं। बस पिछली बार की तरह ही हिंदी फिल्मी गीतों के मुताल्लिक कुछ बातें हैं। जैसे जैसे मन में बातें आ रही हैं लिख रहा हूं।

पृष्ठभूमि में रेडियो चल रहा है और जो बात दिमाग में फिलहाल छन कर आ रही है वो ये कि हिन्दी फिल्मी गीतों में ख्य्याम का संगीत अजब कोमलता लिए हुए है। उनके संगीतबद्ध किए गीत जब सुनता हूं तो लगता है जैसे किसी कमसिन के सीने पर उसका दुपट्टा सरसरा रहा हो। या फिर ऊंचे गोल बिस्तर पर झीने परदे में कोई नाजनीन बैठी हो, जो इतनी छुपी हो कि दिमाग में बहुत ज्यादा रोशन हो रही हो।

ख्ययाम का संगीत यही है, इतना सिंपल कि कई बार लगता है उन्हें ये इल्म हो कि मुझे अपनी विद्वता दिखा कर गीत के बोलों को मारना नहीं बल्कि और उभारना है। आंचल कहां मैं कहा हूं, ये मुझे ही खबर नहीं, न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया, लता मंगेशकर का गाया यह गाना और ऐसे ही कई गीत शब्द प्रधान हो जाते हैं। उनकी पत्नी जगजीत कौर जो कि खुद बहुत अच्छा गाती हैं, उन्होंने बहुत कम मौके दिए। उनका गाया देख लो आज हमको जी भर के हृदय विदारक गीतों में से एक है और इसका संगीत कलेजा चीड़ देता है। कहते हैं टेक्स्ट अपनी आवाज़ खुद चुनता है। इस गीत के शब्द ने जैसे अपनी सही आवाज़ चुन एक मुकम्मल पनाह पा ली हो जैसे।

सवाल उठता है कि रेडियो कैसे सुना जाए। यकीन मानिए रेडियो सुनना आपमें संगीत की अच्छी समझ पैदा कर सकता है। रेडियो तेज़ आवाज़ में सुनने की कतई कोई चीज़ नहीं। इस पर गीत सुनने के दरम्यान सामान्य दर से हमेशा दो दर्जा नीचे रखिए। ऐसे में यह कल्पनाशक्ति तेज़ कर देता है। वो जो शब्द सुनने से छूट गया उस पर आपका दिमाग हाथ आजमाने लगता है और वहां शब्द फिर आप चुनने लगते हैं।

रेडियो नाटक खासकर जिसमें बेबसी के दृश्य ज्यादा हों उन्हें सुनने पर वो बेबसी हमारी हो जाती है। रेडियो से छन कर आती आवाज़ एक साबुत जिस्म हो जाता है दुर्योधन के पत्थर के बदन की तरह जिसकी जांघें अब भी सजीव हैं। एक रेडियो हममें कई एहसासात भर सकता है। मैं आजकल के एम एम चैनल्स की बात नहीं कर रहा, इससे मैं रत्ती भर प्रभावित नहीं हो पाता। इनमें सुर तो नहीं ही है अलबत्ता शोर बहुत है। खैर....

मैं बात कर रहा था गीतों से अपने याद की। शुरूआती दौर की बात है। हफ्ते में मुझे एक गीत गाना होता था पिताजी के सामने। तब रेडियो पर किशोर कुमार बहुत आसानी से समझ में आ जाते थे। खासकर राजेश खन्ना पर फिल्मांकित गीत। उन गीतों की फक्कड़ता, उनमें छुपी लापरवाही और दर्द जैसे कि अधिकांश हिंदुस्तानी ऐसे ही होते हैं, मुझे भी ये गीत खींचते थे, इन्हें कॉपी करना आसान था। रफी तब एकदम समझ नहीं आते थे। लेकिन जैसे जैसे समय गुज़रा रफी के आगे कोई नहीं टिक सका। रफी की आवाज़ एक साहित्यिक क्लास किस्म की आवाज़ है, जो बहुत पाक भी है। वो अपने गायन में डूबकर भी एक दूरी बनाए रखते हुए से प्रतीत होते हैं।

दर्द भरे गीतों के लिए मुकेश की आवाज़ एक अजीब किस्म की उदासी देती है। इसे सुनकर मैं अक्सर अवसाद में चला जाता हूं। मैं तो इक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर। जो राह में मिल जाओगे, सोचेंगे तुम्हें देखा ही नहीं। अभी तुमको मेरी जरूरत नहीं बहुत चाहने वाले मिल जाएंगे, अभी रूप का एक सागर हो तुम, कंवल जितने चाहोगी खिल जाएंगे या फिर मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो, दोस्त दोस्त न रहा या चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया। सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देती। वक्त करता जो वफा आप हमारे होते, ऐसे कई गीत हैं जो जब किसी इतवार की दोपहर को सुनता हूं तो ये सिलसिला खत्म नहीं होता।

इसी दर्द और उदासी के क्रम में दस्तक फिल्म का वो गीत भूलाए नहीं भूल सकता जब मदनमोहन खुद अपनी जिगर चाक कर देने वाली आवाज़ में गाते हैं - माई री मैं का से कहूं पीर अपने जिया की। सोचता हूं क्या सोचकर गीतकार ऐसे गीत लिख जाता होगा। क्या खाते होंगे और इस गीत के शब्द रचने के दौरान कैसी मनःस्थिति होगी लिखने वाले की? ये उन गीतों में है जो सुनकर ये जलन होती है कि काश ऐसे हम भी लिख सकते!

जलन के इसी क्रम में मेरे महबूब फिल्म का वो गीत रफी ने गाया है - मेरे महबूब तुझे मेरे मुहब्बत की कसम। ये गीत अलहदा और बेमिसाल है। रफी ने इसे आवाज़ देकर मुझे लगता है अमर बना दिया है। संगीत को भूल जाईए। इस गीत का अगर प्रिंट आऊट लेकर अगर इस पर गौर किया जाए तो यह बेसिकली एक निहायत खूबसूरत कविता है जिसमें आदि, मध्य और अंत तीनों है। अपने उरूज पर जैसे जैसे यह पहुंचती जाती है बला हुई जाती। सामने आ कि बस यही मेरा इलाजे गमे तन्हाई है। उफ़, उफ़ और उफ़। इश्क में जीना और तभी ऐसा लिखना संभव है। ये ऐसा गीत है जो सुलाता भी है, रूलाता भी है और नींद से जगाता भी है। रफी की आवाज़ जैसे वीणा के तार उंगली काटते हैं।

वहीं कुछ गीत गायक और गायिका दोनों से गवाएं गए हैं। इनमें कुछ अच्छे हैं जैसे - तुम मुझे यूं भूला न पाओगे। लेकिन कुछ में ये प्रयोग फीका हो गया है जैसे मासूम फिल्म का गीत - तुमझे नाराज़ नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं। लता की आवाज़ में ये गीत लोरी होते हुए लचर हो जाती है, ऐसे ही अंदाज फिल्म का ये गीत - जिंदगी एक सफर है सुहाना, फीमेल आवाज़ में यह बेअसर है।

कहते हैं शहनाई शादी का प्रतीक है। हुस्नलाल भगतराम द्वारा संगीतबद्ध और रफी का गाया ‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाऊं, मेरे दिल में जल रही है, अरमान की चिताएं' में शहनाई वादन सुनिए। या फिर राग गुनकली में उस्ताद बिस्मिल्लिा खां साहब द्वारा बजाई जादूई शहनाई - 'दिल का खिलौना हाय टूट गया,' सुनिए। खबरदार जिन्हें शहनाई से शादी याद आती हो ये पूर्वाग्रह तोड़ देगा।

Wednesday, May 29, 2013

याद बरक्स हिंदी फ़िल्मी गीत

सुब्ह से एआईआर की उर्दू सर्विस सुन रहा हूं। इतने अच्छे अच्छे फिल्मी गीत आ रहे हैं कि काम करते करते उंगलियां कई बार ठिठक जाती हैं और उन गीतों के बोलों में खो जाता हूं। गज़लें कई बार दिमाग स्लो कर देती हैं और एक उदास सा नज़रिया डेवलप कर देती हैं। कभी कभी इतनी भारी भरकम समझदारी का लबादा उतार कर एकदम सिंपल हो जाने का मन होता है। रेट्रो गाने सुनना, राम लक्ष्मण का संगीत ‘उनसे कहना जब से गए हैं, मैं तो अधूरी लगती हूं’ टिंग निंग निंग निंग। इन होंठों पे प्यास लगी है न रोती न हंसती हूं। लता ताई जब गाती हैं तो लगता है, मीडियम यही है। इन गानों में मास अपील है। सीधा, सरल, अच्छी तुकबंदी, फिल्मी सुर, लय और ताल जो आशिक भी गाएगा और उनको डांटने वाले उनके अम्मी-अब्बू भी। समीर के गीत गुमटी पर के पान के दुकान पर खूब बजे। ट्रक ड्राईवरों ने अल्ताफ राज़ा को स्टार बना दिया। और कई महीनों बाद जब इन गानों पर हमारे कान जाते हैं तो लगता है जैसे दादरा, ठुमरी, धु्रपद और ख्याल का बोझ हमारा दिल उठा नहीं सकेगा। हम आम ही हैं खास बनना एक किस्म की नामालूम कैसी मजबूरी है। हांलांकि यह भी सच है कि देर सवेर अब मुझे इन्हीं चीज़ों तक लौटना होता है, नींद इसी से आती है और सुकून भी आखिरकार यही देते हैं।

शकील बदायूंनी साहब ने वैसे एक से एक कातिल गीत लिखें हैं। याद में तेरी जाग जाग के हम रात भर करवटें बदलते हैं। रफी के गाए गीत तो लगता है सारे क्लासिक लगते हैं। उन्होंने 98 प्रतिशत अपने लिए सटीक गीत चुने और 99 प्रतिशत अच्छे गीत गाए हैं। ‘लचकाई शाखे बदन, छलकाए ज़ाम। वो जब याद आए बहुत याद आए का एक पैरा ‘कई बार यूं भी धोखा हुआ है वो आ रहे हैं नज़रे उठाए’ प्यार की सुकोमल एहसास में से एक है। वहीं लता का गाया ‘खाई है रे हमने कसम संग रहने की’ का एक मिसरा प्रेम को बड़े ही अच्छे शब्दों में अभिव्यक्त करता है। -ऐसे तो नहीं उसके रंग में रंगी मैं, पिया अंग लग लग के भई सांवली मैं। ये सोच कमाल है जो अंदर तक गुदगाते हुए सिहरा से देते हैं।

उदास गीतों में थोड़ी सी बेवफाई टायटल गीत का वह लाइन ‘जो रात हमने बिताई मर के वो रात तुमने गुज़ारी होती या फिर आगे की पंक्तियों में ‘उन्हें ये जि़द के हम पुकारें, हमें ये उम्मीद वो बुलाएं, है नाम होठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें’ मुहब्ब्त के कशमकश को शानदार तरीके से व्यक्त करता है।
कुमार सानू की मंथर तालाब में फेंके गए सीधी लाइन में गाया ‘मेरे दिल भी कितना पागल है’ इतना एक रेखीय लय में लगता है। इसके अलावा सत्रह साला ईश्क तब फिर से जिगर चाक करता है जब उन्हीं की आवाज़ में ‘दिल तो ये चाहे पहलू में तेरे बस यूं ही बैठे रहें हम’ सुनते हैं।

ये यादें मेरी जान ले लेगी। पटना के सदाकत आश्रम में लगे सरसों के फूल याद आने लगते हैं। और त्रिकोणमिति बनाते हुए अक्सर किसी सुंदर, मीठे गीत को सुनते हुए सोचता कि इसे कैसे फिल्माया गया होगा। दरअसल रेडियो यही है, दृश्य को होते हुए कान से देखना। शराबी अमिताभ के जन्मदिन पर किशोर के गा चुकने के बाद नायिका का कहना कि ‘ओ मेरे सजना लो मैं आ गई’ गाते ही म्यूजिक का तेज़ गति से भागना बंद आंखों से सोचा था तो लगा कि लंबे लंबे पेड़ों के जंगलों में यहां दोनों एक दूसरे को खोजते हुए भाग रहे होंगे। मन के सिनेमा में समानांतर ट्रैक पर हमेशा एक और सिनेमा चल रहा होता है।

पुराने गानों को देखते हुए खास कर 80 के दशक के गीत को देखते हुए ये साफ साफ लगता है कि "बहुत सारे अच्छे गानों को पिक्चाईजेशन बुरा है।"

तुम्हें भी ऐसे ही सोचता रहता हूं जानम। नवंबर की धूप में दिन भर पीठ सेंकते हुए। जाती मई में पसीने पोंछते हुए। देर तक रोटी चबाते हुए कि जब उसका स्वाद मीठा हो आता है, कई बार निवाला मुंह में है यह भूल जाता हूं।
इसी क्रम में तीसरी कसम में शैलेंद्र का लिखा और मुकेश की गाई गीत के बीच रूक कर जब राजकपूर अपनी मासूम आवाज़ में कहते हैं- ‘‘मन तो जानती हैं न आप!’’ तो यह भी याद रह जाता है।

एक पैरलल आवाज़ यहां भी सुनिए कि कैसे आंख और मन के सिनेमा में एक ही वक्त दो दो सिनेमा चलते हैं।

Tuesday, May 28, 2013

रिजेक्शन by कपिल

ईर ने कहा ब्याह करब
बीर कहिस कि हमहूं ब्याह करब
फत्ते भी बोलिस कि ब्याह करब
तो ऐसेई मज़ाक मज़ाक में हम भी बोल दिए बियाह करेंगे।

तो कपिल ने सागर को केंद्र में रखकर मज़ाक मज़ाक में एक कहानी लिख दी। आप भी नोश फरमाईए। वैसे कपिल मुकरियां भी बहुत अच्छा लिखते हैं और फेसबुक पर उनकी मुकरियां खासी चर्चित हैं। ये मुकरियां किश्तों में उनके ब्लाॅग पर भी मौजूद है।

दफ्तर में हम कपिल के मुंहलगे जूनियर लगते हैं  और घर पर उनके मुंहलगे किराएदार।

दफ्तर के दो लोगों को यानि एक कपिल शर्मा और दूसरे बिश्वजीत बैनजी को ठेल ठाल कर और डांट धोप कर हमने उनका ब्लाॅग बनवाया। कपिल जोकि भाकपा माले के कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ता हैं, ने हिंदी की राह ली। (कोरबे ना, चोलबे ना) वाले बिस्वजीत बैनर्जी, एक सरकारी मकहमे में उंचे अधिकारी हैं साथ ही अरविंदो काॅलेज में फैकल्टी स्क्रिप्ट राइटिंग टीचर भी, उन्होंने अंग्रेजी की राह ली। हम जो कि विगत 11 साल से इंग्लिश सीख रहे हैं सो बिस्वजीत के ब्लाॅग से दूर दूर ही रहते हैं। हमसे तो अच्छा सिरीदेबी न जी? ऐतना बरिस बादो आके इंगलिश विंगलिश बोल गई! और अवार्ड सवार्ड भी बटोर गई। खैर। जिंदगी है, होता है, चलता है।


http://hamareydaurmaink.blogspot.in/2013/05/blog-post_28.html

Monday, May 27, 2013

इतवार की शाम और महबूबा के बेवफाई के किस्से


ज़रा ज़रा बीयर की आठ घूंट, ज़रा ज़रा प्याज़ की मोटे मोटे कतरनों के साथ किरचे लंबे लाल मिर्च वाले अचार का मसाला। ज़हर को बुझाने के लिए एक ज़हर। इतवार की शाम, थोड़ी से महबूबा के बेवफाई के किस्से और ज़रा ज़रा घर की याद। एक झटके से सिहरना, बौखलाना, आवेग में थोड़ा उंचा बोलना और नुसरत की गाई हर लाइन पर दिल से दाद देना।

और तब वह कहती है - वो मुझे बहुत प्यार करता है। मुझे पीछे से अपनी बांहों में भर कर मेरी कान के लौ चूमता हुआ हौले से आई लव यू फुसफुसाता है। अपने जीभ को नुकीला बना मेरे गालों पर के गड्डे खोजता है। वह जब मुझे अपनी बांहों में कर तोड़ता है और हौले हौले मेरी बदन को सिलाई मशीन बना अपनी दांतो से टांकता है, जिस्म में उधड़ आई सीवन के धागे यहां वहां से खोजकर अपनी दांतों से तोड़ता है तो मैं हर लहरों पर राफ्टिंग  वाली खाली बोट बन पलटती जाती हूं।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि जब मेरे पपीते जैसे स्तनों को अपने गर्म हथेलियों में थामता है तो उसके हथेलियों के रेशे रेशे को मेरा ज़ोर ज़ोर से धड़कता सीना महसूस करता है। मैं सिकुड़ कर कोई और फल बन जाती हूं। ऐसे वक्त में अक्सर मेरे पैरों के अंगूठे और उंगलियां भींच जाती हैं। वह पल भर को रूक उन उंगलियों को तोड़ता है। वह मेरे रग रग से वाकिफ है। वह मेरी नस नस का जायका जानता है। मुझे यही चाहिए था। वह फिजा में मेरी देह गंध पहचान लेता है।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि मैं अपना बदन चुराती हूं, वह मुझे खोज खोज कर खोलता है। अक्सर वो रात भर टूट कर प्यार करने के बाद अलसुब्ह घास की नोक पर ठहरी ओस की बूंद को मेरे उरोजों के तख्त पर लाकर रख देता है। कहता है इस तख्ते ताउस पर यह मोती थरथराता है।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि बिस्तर जिंदगी लगने लगती है। मुझे यहां वहां से तोड़ता मरोड़ता है और कुछ भी करने से पहले जब वो मुझे यह बताता है कि वह क्या कुछ करने का इरादा रखता है तो मैं दिल ही दिल में आमीन कहती हूं। कई बार तो जब वह यह सब बता रहा होता है तो पड़ोस वाली मस्जिद से अजान की आवाज़ आती है और मैं यकायक बुत बन जाती हूं, वो अपनी रौ में बोलता जाता है मैं उसके मुहब्बत के सजदे में झुकी आमीन कही जाती हूं। उस वक्त मेरी आंखें नीम नींद में अलसाई हुई, आधे नशे में गोल गोल हो उपर घूमती हैं। गुमां होता है किसी पीर ने मेरे माथे को ठोंका है। मैं अलमस्त हुई जाती हूं।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि मैं अपनी देह से आज़ाद हुई जाती हूं। 37-28-36 की आंकड़े वाला मेरा यह बदन किसी भीगी तितली के मानिंद हल्की होकर बगिया में उड़ी जाती है। उसे मुझे बरतना आता है सखी। रात के जाते पहर वो बला कर जादूगर हो जाता है और मुझे कंधे, गर्दन और पीठ से चूमकर वह यह बतलाता जाता है कि मैं उसी की हूं। उसके प्यार करने में मैंने खुद को खोजा है।

वह मुझे चूम चूम कर छोड़ता है, मैं चुगी जाने के लिए तड़फती रहती हूं।

और जब वह अपने बदन का तार तार ढ़ीला कर मुझ पर झुका बेतरह हांफ रहा होता है, जब देर सुबह उसका बदन कई सालों के गैप के बाद अचानक जिम ज्वाइन किए हुए जैसा ऐंठता हैं, मैं खोखली रात भर की जागी हुई खोखली जांघें, फास्फोरस और कैल्शियम विहीन घुटने लिए दोनों पैर भींच कर सोती हूं दरअसल तब मैं जीती जाती हूं, वो हारा जाता है।

ज़रा ज़रा बीयर की आठ छटांक, ज़रा ज़रा प्याज़ की मोटे मोटे कतरनों के साथ किरचे लंबे लाल मिर्च वाले अचार के मसाले। इतवार की शाम और थोड़ी सी महबूबा के बेवफाई के किस्से। कई साल से आगे के सारे साल तक।

उसकी याद घर की याद है।

Saturday, May 11, 2013

अक्ल के मदरसे से उठ इश्क के मयकदे में आ


अक्सा: उमरा, तू इज़हार क्यों नहीं कर देती ?

उमरा: उसकी जरूरत है क्या ?

अक्सा: दुनिया बड़ी तेज़ है री, अपना सामान ना छांको तो किसी और हो जाता है। मेरी देख, मैं इंतज़ार ही करती रह गई।

उमरा: तो मैं भी कर लूंगी, ऐसी मोहब्बत किस काम की कि कहना पड़े..... तकरीबन रोज़ ही तो मिलना होता है उससे....जिसे आंखें पढ़ना न आए उसके लिए जिंदगी भर आंखों में इंतज़ार ही सही।

अक्सा: उफ्फ! यही तो हमारी गलती है उमरा, हम इश्क में बहुत जियादा ही कुछ दाना होने लगते हैं। हमारी हरकतें तो नादान हो हुई जाती हैं मगर एहसास के पैमाने पर जज्बात यकायक चार दरजा ज़हीन हो जाता है।
उमरा (जैसे अक्सा के बयान से गुम हो): ये सब मैं कुछ नहीं जानती.... (चहककर) तुम्हें पता है, हम दोनों का नाम बहुत छोटा है, बस कुछ हर्फों का ही हेर फेर है बस। कल को अगर फिलम वाले कोई गैरज़बान में सनीमा बनाएंगे तो जहां जहां हमारा नाम आएगा उनको डबिंग और लिपसिंक करने में कोई दिक्कत पेश  न आएगी।

अक्सा (चिढकर): और तुम दोनों इस तरह लोगों की जबान में एक दूसरे को पा लोगे। हाय मैं मरी जाऊं, ज़हनी तौर पर पैदल हो गई हो क्या तुम, बौराई ही जा रही हो। (चंद लम्हा रूककर) अब कहोगी, हम दोनों को एक ही तरह के रूमाल पसंद आते हैं, वो भी मेरी तरह मोटे सफहे पर लिखना पसंद करता है। दरगाह वाले पीर की ज़बान उसे भी जंचती है। गली में नफीस तलफ्फुज से उर्दू बोलने वाला फराज़ उसका भी पसंदीदा है। अल्लाह! गोया मुहब्बत न हुआ, सगुफ्ता और फिरोज का ऊंचे जबान में अफिल बे ते से का झगड़ा हो गया।

उमरा: जितनी तू जबान की तेज़ है न अक्सा काश दीगर मौंजू में भी होती ! लेकिन यहां तो पलटकर मुझे ही फलसफे सिखला रही है।

अक्सा (बात काट कर): एक मिनिट उमरा बेगम, फलसफे मैं नहीं तू दे रही है, मैं तो वही बता रही हूं कि अगर तेरा उस पर दिल आया है तो वक्त रहते उस पर अमल कर, मैं तो सलाहितें दिए जा रही हूं और तू है कि मुझ पर ही चढ़े आ रही है। क्या मेरा दिमाग खराब है? मुझे गली की वो.....उस.... दाद लगे, रोएं झड़े...... वो तेरा मनपसंद रूस्तम कुत्ते ने दांत लगाया है ?

उमरा (आंखों में प्यार भरकर): ऐसा नहीं है री। आजकल मेरी बातों का बुरा न मान। मेरे कहे और किए पर आजकल मेरा खुद अख्तियार नहीं रहता। कान पर पेंसिल रखकर सारा घर बौराई फिरती हूं, जब सब जगह खोज लेती हूं और थक कर बैठ जाती हूं और सर खुजलाते हुए याद करती हूं तो टक से पेंसिल गिर पड़ता है। (पास आते हुए) तू तो मुझसे कहीं जियादा अक्लमंद है
(शब्द के उलट दिमाग पर उंगली फिराते हुए फिर अक्ल और मंद को वाजिब वक्फे से अलग करती है)

/अक्सा अपमान में चिढ़कर घुटने के पास उसे हौले से एक लात जमाती है, बदले में उमरा झपटकर उसे पीछे से पकड़ लेती है। दोनों बाहें उसे गले में डाल उसकी पीठ पर लरज आती है, दोनों के गेशु खुले हैं और थोड़ी दूर से देखने पर बरगद के नीचे पीपल नज़र आता है।/

उमरा (ज़ारी....): हाय कसम से मेरी जान! तू तो बिल्कुल सौंधा सौंधा महक समेटे भुट्टा है, कोई भी दाना दाना चख ले तुझे। बख्शी साब ने शोले में डोर से पतंग जब टूट जाती है तो रूत रंगीन हो जाती है, यह तुझे ख्याल करके ही लिखा होगा। (अक्सा हौले हंस देती है, भुट्टे के दानों की तरह होठों से बीच से उसके दांत हल्के बाहर झांकते हैं) हाय! शरमा गई।

(उमरा, अक्सा के सीने पर हाथ रख देती है, अक्सा की सांसें नामालूम कितना आशारिया कितना तेज़ धड़कने लगती है)

उमरा: हाय ये तो बहुत जोर से उठ और गिर रहा है, लगता है जैसे कोई अंदर से बाहर आने वाला है।

(अक्सा देर तक उसका हाथ वहां सहन नहीं कर पाती और झटके से हटा देती है)

(वह उठती है और अपने बालों को बांधने लगती है)

अक्सा (एकदम से गुस्से में) : उमरा, खबरदार मुझे ऐसा मज़ाक एकदम अच्छा नहीं लगता। वो तो तुम हो, इसलिए एक बार मुआफ किया, कोई और होता तो मेरे हाथों आज कत्ल होना ही था।

उमरा  (गंभीर होकर): सच अक्सा ! सच को झूठ के जामे में मत पहनाओ अक्सा। अपने बेजायकेदार जिंदगी का गुस्सा मेरे ऊपर न उतारो। साफ क्यों नहीं कहती तुझे ऐसा पड़कने वाला कोई तेरे पसंद को कोई नहीं है। गुस्सा तो तूने कर दिखाया मगर तुझे मेरे इस हरकत का गुस्सा नहीं है, यह कहीं और का बादल है तो तू बहाने से मेरे ऊपर जबरदस्ती बरसा रही है।

अक्सा: तू जो भी समझ ले, मेरा उस पर ज़ोर नहीं

उमरा: इसमें जोर जबरदस्ती की बात ही क्या है। देख अपनी हालत देख, यार दोस्त से भी तू अब बचने लगी है, बहाने करने लगी है, झूठ बोलने लगी है, परदा करने लगी है। देख अक्सा मैं तुझसे मुंह नहीं फेर सकती। मैं भी तुझ जैसी ही हूं। मगर दो घड़ी को अगर किसी बहाने से तेरा दिल बहला दिया तो तू गुस्सा हो जाती है। हर जगह अपने गुस्से को बीच में क्यों ले आती है। मैं भी जानती हूं मेरा हश्र भी तुझ जैसा ही होगा। तू  मुहब्बत में रहना सीख न मेरी तरह। इससे उबरेगी तो सिर्फ कड़वाहट होगी। यह सोचकर मैं भी कांप जाती हूं। क्यों न इसी में रहा जाए। क्यों न हरेक चीज़ से दिलजोई की जाए। किसी एक के क्या बनना, सबका बन के रहा जाए। ग़म में भी रहा जाए और उससे खुद ही उबरा जाए। सोसाइटी की सबसे दिलफरेब औरत भी दुनिया से जाने के बाद कई दिलों को एक पाक सनीमा की तरह पाक पैगाम दिए जाती है। और एक बार याद रख.... जो भी इस दायरे में रहता है न जिंदगी के सनीमा में वहीं सच्चा कलाकार होता है।

/उमरा उठती है, सूट के घेरे को फैलाते हुए चारों ओर घूमती है/

उमरा: हवा की तरफ बहता।

/उमरा एक पैर उठाकर बदन को मोर सा बनाती है/

उमरा:  नदी की बहती हुई।

/उमरा अपनी कमर को तानकर दरख़्त बनाती है और गर्दन और हाथ को ढ़ीली छोड़ देती है।/

उमरा: पेड़ की मजबूत बुनियाद और उसकी शाखों की तरह लचीली।

अक्सा फटी आंखों से सबकुछ देखती है। 

***
लेकिन कहां हो पाता है आदतें ओढ़ना सबसे ? 


Tuesday, May 7, 2013

लैंड माईन्स


मेज़ पर लुढ़का हुआ निब वाली कलम है जो स्कैनर के पैरों के पास कुछ तरह तरह औंधा पड़ा है जैसे रात भर जागने के बाद उसे चौथे पहर नींद आई हो। रूठ कर सोया था जिसकी रूठन नींद में भी दिख रही है। निब का नुकीला हिस्सा मेज़ और स्कैनर के बीच के खोह में घुस आया है। खुद को इस बिंब से बहुत रीलेट करता हूं। लगता है कुछ पैसों के लिए जैसे कोई लड़का अपनी मां से लड़कर रात भर घर के बाहर बिताया हो और पीकर कहीं गिरा पड़ा हो।

कलम अपने में स्याही भरे है। इतना कि कपड़े खराब करता है। थर्मामीटर की तरह झाड़ो तो बुखार की तरह उतरता है। फर्ष को बूंद बूंद रंग जाता है। इसकी निब को देखता हूं तो किसी खूनी वारदात की तरह लगता है। आप इन काले स्याहियों से अपने दिल के लहू के अरमानों में रंग भर सकते हैं। ज़हन बिल्कुल खाली है लेकिन लगता है हुमक कर उठा लूंगा तो यकीनन दिल की बेचैनी को करार हो आएगा।

कभी कभी हम पढ़ते कम हैं या बिल्कुल नहीं पढ़ते हैं। यह जान रहे होते हैं लेकिन इसमें इंगेज रहने का कोई बहाना चाहते हैं। स्कूली दिनों की तरह जहां बाप अगर मटरगष्ती करता देख लेगा तो कोई काम पकड़ा देगा सो बेहतर है किताब में सिर डाले बैठे भर रहो। नज़र नीची रखके दुनिया के तमाम मसाइल पर मन ही मन ड्रिल करते रहो। इन न पढ़ने के दिनों में भी, जब  बुकशेल्फ में कई किताबें रखी हों तो भी राह चलते, बस में बैठे, किले की कोई गुंबद निहारते, शाम ढ़ले पार्क में फैले पेड़ों की अंधेरी काया देखते यह एहसास शिद्दत से उठता है कि बहुत दिन हो गए कोई किताब नहीं रखीदी। वह अलां किताब हमारे पास होनी चाहिए, वो फलां किताब लेने से रह गई। और अगर अबकी वह किताब लेंगे तो सीरियसली पढ़ेंगे। आखिर पढ़ने में लगता ही क्या है? पढ़ना तो अपना शौक है न फिर पढ़ने से काहे इतना भागना ? अरे राह चलते पढ़ लेंगे। हिन्दी तो अपनी इतनी अच्छी है कि बस में तीन स्टॉप खत्म होते न होते दो पेज़ तो औसतन रोज़ाना पढ़ ही सकते हैं। 

लेकिन नहीं हो पाता। महीनों महीने बैग में कम अज कम किताब और एक नोटबुक घूमती रहती है। तो पढ़ने लिखने के नाम पर आज दिखावा आज तक ज़ारी है। 

यही हाल इन कलमों के साथ भी है। बुकशेल्फ में ही ये कलम ऐसे रखे रहते हैं जैसे मिस्टर इंडिया फिल्म में परमाणु रॉकेट बड़े सलीके से रखा रहता है। कई बात तो आधी रात के एकांत में इन कलमों की सिरीज़ को छूता हूं तो कर्ण की याद आती है जब महाभारत के युद्ध में वह अपने तरकष में एक एक विष बुझे तीर सलीके से रखता था।

कोई तकलीफ तो है साहब। आप मानें या न मानें। कभी दिल किलकता है तो कभी किलसता है। अफसोस हावी होता जाता है। अपने भर की पूरी ताकत से ही सर दीवार पर दे मारने का मन हो आता है। होंठ सूखते हैं। हर चीज़ अधूरी लगती है। कभी कभी तो हालत इतनी बुरी हो जाती है कि मैं अपना लिंग परिवर्तन नहीं कर पाता और तब किन्नर बनकर एक बड़ी घुटन महसूस करता हूं।

इन कलमों को देखता हूं तो यही सब कुछ तारी हो जाता है। मैं आखिर किसकी प्रतीक्षा कर रहा हूं? और हैरत तो ये है कि इन प्रतीक्षा में कोई बेचैनी नहीं है। बस टिक टिक टिक टिक सूइयां बज रहीं हैं और मैं किभी भी क्षण एक धमाके से उड़ जाऊंगा। 

फिर एक निर्जीव कलम भी जो मेरे अंदर इतने एहसास छोड़ जाता है कि जिससे ज़हन खाली भी लगता है और बेचैनी अब डब करता लबालब उसका क्या होगा?

वैसे आज रात मैं मेंढ़क बनकर इस निब वाली कलम से अपने दिल का न्यूड फोटोग्राफी करने की कोषिष करूंगा। और यही सही रास्ता भी है कि ऑपरेशन टेबल पर खुद को रेशा रेशा खोल देना और फिर उसे माइंस की तरह अपने अंदर बिछा कर उस पर मिट्टी डाल साबुत बन जाना।

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...