Friday, June 28, 2013

जिंदगी क्लोज-अप में ट्रेजेडी है, लेकिन लाँग-शॉट में कॉमेडी।


बहुत सारा प्यार करने के बाद यूं अचानक लगता है कि जैसे अब प्यार नहीं कर रहे हैं। अब अपने अंदर का अकेलापन किसी से सांझा कर रहे हैं। कि जैसे एक समय के बाद ये बड़ी वाहियात शै लगती है। लगता तो ये भी है कि प्यार नहीं होता ये बस आत्मीयता, घनिष्ठता उसके साथ में सहज लगना, अपने मन की बात को बेझिझक उसके सामने रख देने की बेलाग आज़ादी, फलाने की आंखों में अपने इंसान भर बस होने का सम्मान वगैरह वगैरह में बंट जाती है।

कल रात यूटीवी वल्र्ड मूवीज़ पर एक सिनेमा देखा। ए गर्ल कट इन टू। विश्व सिनेमा बस उस बड़े फलक को महसूसने और सिनेमैटोग्राफी के लिए देखता हूं। कम लोग हैं जिनके लेखन के शब्दांकन और उसका फिल्मांकन पर्यायवाची हो सकता है या कागज़ पर है।

कथित फिल्म की नायिका एक टी.वी. कलाकार है और एक 50 साल के लेखक से प्यार कर बैठती है। मुहब्बत भी अजीब शै है साथ ही बौद्धिकता भी। अपनी जवानी निसार कर रहा एक  जूनूनी लड़का उसे प्रोपोज कर रहा है लेकिन उस लेखक का भेजा महज एक बुके उसे अंदर से रोमांचित कर देता है। वह सब कुछ छोड़कर भागी भागी उसके पास जाती है। यहां बिस्तर साझां करना कोई शर्त नहीं। 

कहानी के बीच में थोड़ा विराम देकर मैं खुद को वही खूबसूरत नायिका मान यह सोचने लगा कि अगर मैं एक उन्मादी और समर्पित संभोग के बाद इस अतिबौद्धिक लेखक के सीने के बालों में उंगलियां फंसाए किस ख्याल से गुज़र सकती (याद रहे मैं नायिका) हूं।

कहानी पर आते हैं। ये प्यार के शुरूआती और जीवन के गुलाबी दिन हैं। मगर अच्छी स्क्रिप्ट भी लाइफ की तरह ही होती है। सच तो ये है कि इसकी स्क्रिप्ट नहीं होती मगर इतना तय होता है कि आदमी थोड़े दिन बाद कभी असुरक्षा का शिकार होकर या कभी समझदारी से क्या खोया- क्या पाया का हिसाब किताब लगाने बैठ जाता है।

बहरहाल, अतिमृदुभाषी लेखक जोकि शादीशुदा है वह नायिका से शादी करने से मना कर देता है। हालांकि वह उस लड़की से प्यार करता है। कुछ इस तरह कि तुम्हें सार्वजनिक रूप से अपना नहीं सकता मगर तुम्हें किसी और का होने भी नहीं देना चाहता है।

नायिका से झूठ बोलकर जाने वाला लेखक बाथटब में रेडियो पर उस टी.वी. कलाकार नायिका की जल्दबाज रईस युवक से शादी की खबर सुनता है। शादी वाले दिन वह लड़की के घर पहुंचता है। और फिर से वही सब कुछ शुरू करने का प्रस्ताव रखता है। लड़की उसे एक आम समझ वाली आदमी के रूप में बुरी तरह ज़लील करती है, और गेट आऊट कहती है, जो दर्शकों के अपने मन की बात है।

इन सब के बीच दृश्यांकन बहुत खूबसूरत है। शहर में ट्रामों का गुज़रना, पाॅलिस्ड वुडेन कलर के बीच किताबों की नीलामी के दृश्य। लड़की और सुलझे हुए लेखक के बीच के दृश्य। अगर हम पागल हैं और देर सवेर हमें इसका एहसास हो ही जाता है। अगर हम अव्यवस्थित हैं तो हम एक सुलझी डोर खोजते हैं। अगर हम मानसिक असुरक्षा या किसी भी तरह के असुरक्षा के शिकार हैं तो साथी में अपना सब कुछ उड़ेलकर उससे भी वैसा ही आऊटपुट चाहते हैं। जिंदगी यहीं कटु, सच्ची और अनस्क्रिप्टेड हो जाती है। फिल्म की तरह असल लाइफ के किरदारों में भी आम और परिपक्व समझ में झगड़ा है। ऐसे में ही कुछ दिन पहले अपनी ही एक महिला दोस्त की बात याद आ रही है जो अपने पति से कई दिनों से मन न मिलने के बायस बिस्तर पर एक रात कह उठी कि - जब शरीर से चिपकते हो तब सोचते हो कि मन और दिल से भी हमें वैसे ही मिलना चाहिए। ये कैसा रिश्ता बनाते हो कि अपना मन और स्वभाव को झगड़ने के लिए बचा कर रख लेते हो और शरीर परोस देते हो?

ज्यादा टी.वी. और सिनेमा नहीं देखता सो मैं पूरी फिल्म नहीं देख पाया।

और तमाम उठापटक के बाद सुबह से इस ख्याल से गुज़र रहा हूं कि प्यार से बड़ा कोई पाॅलिटिक्स नहीं है।

(शीर्षक चार्ली चैपलिन की उक्ति है.)

Tuesday, June 18, 2013

ट्रेडमिल पर स्लो मोशन में भागती लड़की


तुमसे ही तो कायनात सारी
तुमसे ही तो ऊँचा फलक

आंखे ऐसी कि जुबान बेमतलब 
नमक-तेल और पकाई हुई लाल मिर्च में लिपटी रोटी

गुलाबी होंठ पतले-पतले
जैसे छप्पर से लिपटा लौकी का नन्हा टूसा
किसी बच्ची के नर्म गर्म उंगलियों का स्पर्श

नमी भरे चमकीले बदन पर उभार
जैसे जैसलमेर के रेगिस्तान में तेज़ हवा से रातों रात जमा हुए रेत के धोरे

कमर जैसे बर्थडे पर फुलाया जा रहा आकार लेता गुब्बारा
पहली बारिश के बाद पके अमरूद पर एक कट्टा दांत काटने का निशान

नितंब
उजले बालू में गुना दर गुना पैठ गया और खूब पानी खाया घड़ा

मेरी,
शिकार हो चुकी सिकुड़ती सांसे
लो ब्लड प्रेशर का शिकार मैं
इनसे लग कर सोऊं तो लगे
बुखार में कोई माथे और तलवों पर पट्टियां करता हो कोई।

Monday, June 10, 2013

एन जी शॉट्स के बीच का क्लासिक क्लिक

भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

वे हंसती हैं तो मटर की छिमियां खुलने लगती हैं। उजले रेत पर लेटे परवलों के नीचे नमी आ जाती है। गंगा में उतरी नावें ज़रा ज़रा हिचकोले लेने लगती है। खुद गंगा का पानी भी तो रहस्यमयी होने लगता है।

उनकी हंसी आधी पिघल चुकी मोमबत्ती है। एक गुज़र चुका अधूरा फसाना है। उनकी हंसी किसी उत्कृष्ट साहित्य के छह छूट गए पन्ने हैं। किसी दिलचस्प सिनेमा के बयासी प्रतिशत अंश देखने बाद कट गई लाइट के बायस क्षोभपूर्ण एहसास के बाद की अपनी कल्पना है। 

उनकी हंसी एक उजले बोर्ड पर एक बिंदु है।

सुराही के बेहद महीन रंध्रों के बीच पानी का बारीक चमकीलापन है।






भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

Sunday, June 9, 2013

एपिक के सेलेक्टेड सीन्स !



भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

उन्हें देखता हूं तो लगता है वो पटना की ही हैं हमेशा से.... उनके ताज़ा कंधे से उसी शहर ठहरे हुए शहर की महक आती है जहां की मूर्तियां फिर से उनके हंसी का इंतज़ार करते जागना भूल गए हैं। मुझे यकीं नहीं होता जब कोई कहता है अमां यार वे तो वीनस की हैं।

कम उम्र में ही उनके होंठ पूरी तरह खिल चुके अड़हुल या गुलमोहर की तरह लगते हैं।

उनका ख्याल आते ही पेट में मेरे गुलाबी तितलियां उड़ने लगती हैं।
याद आने लगती है सोनू निगम के जान और दीवाना सुनने वाले दिन.... कि आधे आधे पैसे से आर्चीज़ से आॅडियो कैसेट खरीदना और एक एक रात के लिए उसे अपने पास रख रात भर बजाना फिर उन गानों को निचोड़ कर जो रस निकले वो कागज़ पर लिखना, अगले दिन उन्हें देना।
हो ओ ओ आ हा हा.... हो ओ ओ आ हा हा
बैक टू बैक सिंगगिंग....

क्या वे जानती हैं कि वो मुझे अच्छी लगती हैं ?

क्या वे वाकिफ हैं कि मेरा उनसे जी लग गया है?

मुहल्ले का कोई नादान बच्चा अपनी तोतली आवाज़ में उनके पीछे दौड़कर जाए और उनका हाथ पकड़ हांफते हुए उनसे कह दे -दीदी...... वो पलोछ वाले भैया को आप बहोत अच्छी लगती हैं। वो आपको प्याल करते हैं।

ये सुन वो शरमाते हुए हंसे और बच्चे को गोद में उठाकर पूछें - कैसे ?
बच्चा उनके गालों पर एक गीला सा मासूम बोसा ले कहे - ऐछे।
वे अपने गीले गालों को दुपट्टे को फिर से पोंछते हुए हंसे।

किसी के भी मार्फत हो, समय, लम्स, दृश्य, एहसास और चुंबन सब कुछ तो साझा है।


भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

डंप फुटेज के फ्रीज़ शॉट्स


भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

जो उनकी जुल्फों में चने को जो बांध कर रखो तो भोर तलक अंकुरित भी हो जाए और काला भी न पड़े।

मैं आदिवासी बन गया हूं। जब दूर तक बारिश के आसार नहीं हैं तो फुहारों सी उनकी हंसी को अपनी हंसुली बनाकर पहन रखा है। उमस का ये मौसम चंदन महका रहा है।

उनकी हंसी विषुवतीय रेखा पर बसर करते लोगों की दूधिया मुस्कान।

समझ नहीं आता उनकी जान ले लूं या अपनी जान दे दूं।

नहीं समझ पाता उन्हें प्यार करना चाहता हूं उनके व्यक्तित्व से प्यार है।

क्या जिंदगी उनके पुष्ट उभारों में छिपा कोई अमरूद का नन्हा सा सौंधा बीज है?






थिरमना कौम बदलना चाहता है।

भाई सा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या?

Saturday, June 8, 2013

सुरमई याद के क्रोमा कलर


 भाईसा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या ?

वे इस तरह हंसती हैं जैसे उमस भर मौसम के बाद एक रात बारिश होती है। सुबह जब आप टहलने निकलते हैं तो अधिकांश सतह सूख चुकी होती है लेकिन छोटे छोटे गड्ढ़ों में पानी के चहबच्चे जमा हो जाते हैं।

सकेरा हुआ ठहरा पानी सपना है और उदास और सपाट सतह मेरा जीवन। मैं ढ़लान खोजते हुए गोल्फ की गेंद की उन चहबच्चों में डुबक जाना चाहता हूं।

माफ करें मैं गेंद का आयतन भी नहीं पाना चाहता क्योंकि वो एक शुरूआती डुबकी के बाद उन चहबच्चों में उतराने लगती है। कुछ कुछ ऐसे ही हेलती है जैसे बीच नदी नाव के चारों ओर डूबते बच्चे बचाने की गुहार लगाते हैं।

मैं भूरे कंचे वाली उन आंखों की रोशनी की गहराई में किसी आवारा लड़के की सिद्धस्त उंगलियों द्वारा कंचे की तरह पिल जाना चाहता हूं।

मैं उसकी हंसी के निर्वात में गौरैया का पंख बन जाना चाहता हूं।

भाईसा’ब आपने उनकी हंसी सुनी क्या ?

वन टेक ओ. के.


भाई सा’ब आपने उनका हंसना सुना?

हंसती है तो लगता है मानो हलक में छोटी छोटी मछलियां फिसल रही हैं। लगता है गले में कोई गीला गीला रंदा लगा पैड लगा है। नारियल का खोईया। अलगाते चलिए। जाने कहां जाकर, कितनी तहों में फल मिले।

वह इज़ाडोरा डंकन की तरह जीवन में आ कर दस्तक दे जाती है। उसका गला अब तक कुंवारा है।

वो इस तरह हंसती हैं जैसे सरकारी स्कूल में आप पड़ोस वाली सहपाठी के रानों पर मोटी मोटी च्यूटियां काटते हैं। जैसे हंसी समेटते समेटते दांतों के बांध को तोड़ बिखर गई हो। जैसे पारखी मजदूरिन खुदे खेत से भी घाघरा भर आलू निकाल लाए।

स्पंजी गालों में थरथराता भंवर बनता है, धूप में रखा शीशी में बंद आयोडीन पिघल जाता है, पानी में हिलता लेंस का क्लोज अप, डर्बी घोड़े दौड़ते हुए किसी मोड़ पर मुड़ना, पंद्रह हज़ार हाॅर्स पाॅवर की ऊर्जा, धीमी गति से न्यूट्राॅन  कणों का हमला और नाभिकीय विखंडन।

और आपको बरबस ही उसे प्यार करने को मन हो आता है। मैं उसके प्यार में जी रहा हूं, क्या कहें मर रहा हूं, या कहें कि मरते हुए जी रहा हूं या ये ही मान लें कि जीते हुए मर रहा हूं। माफ करें मैं एक्जेक्टली नहीं जानता कि मैं जी रहा हूं या मर रहा हूं।

भाई सा’ब आपने उनका हंसना सुना?

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