Friday, December 27, 2013

अपने पसंद की विधा चुन लेना


मेरा कान है और फोन पर उसकी आवाज़ है। उसकी प्रवाहमयी क्रिस्टल क्लियर आवाज़। पर मेरे कान की श्रवण शक्ति जैसे मेरे शरीर में घूम रही है। वह मुझसे मुखातिब है लेकिन सुनती मेरी कलाई है। इस बात को उसने मेरे घुटने की हड्डी से कहा है। उसकी उस बात पर मेरे पैर के बाएं अंगूठे ने प्रतिक्रिया दी है। ये वाक्य कोहनी ने लपकी है और उसकी इस बात ने मेरे नाभि को चूमा है। अबकी उसने मेरी आंख से कुछ कहा और अब तो अब मुझसे भी बाहर जा चुकी है, देहरी पर सुस्ताता धूप भी यकायक उठ कर बात तो रसोई में तिरछी होकर घुस आई है।

तकनीकी रूप से कोई बैकग्राउंड शोर नहीं है मगर पृष्ठभूमि में कुछ अन्य शोर हैं। हम अपने अपने कुछ काम निपटाते जा रहे हैं। बैकग्राउंड में सिंक में धुल रहे बर्तन की आवाज़ है, वह पानी का शोर सुनती है और कुछ देर के लिए चुप हो जाती है। उस ओर भी कोई फेरी वाला आवाज़ लगा रहा है, वह खुद बीच बीच में अपनी मेड को कुछ बता रही है, मैं चुप हो जाता हूं। हमारे हलचल साझा हो जाते हैं।

किसी के प्यार में होना अच्छा है लेकिन मज़ा तब है जब वह संपर्क में न हो। मैं वहीं रहता है जहां मुझे पिछली दफे छोड़ा गया था। जीवन में एक दिन की भी तरक्की नहीं लगता। बस जहां थे, वहीं हैं। उसी मंझधार में उसी पत्ते पर हिचकोले खाते। जैसे ही किनारा लगने को होता हूं भूस्खलन हो जाता है।

तुमने देखे हैं कोसी के किनारे? मैं बारिश के मौसम में थाह पाता हूं, जब ये नदी कोछार काट कर बहती है, जब उठापटक में पता नहीं चलता कि ये कोसी का पानी है या सैलाब लिए सोन का, गंडक का या तालाब का।
सबसे बहुत सारे व्यवहार में कुछ अपने सिग्नेचर होते हैं। मैं उसके सिग्नेचर से मिलता हूं। वह लिखकर कलम घसीट डालती है मैं वहीं छूट जाता हूं। लापरवाही से विदा के साइन ऑफ में.....फिराओ एक बार उन बुहारे हुए लकीरों पे कलम।

सांस भारी हो जाती है और लगता है बाहर निःसांस काटे हुए उसी मनःस्थिति का कोहरा है। जो आस्तीन पर नहीं है मगर हर कुछ देर बाद बांह छूने पर लगता है जैसे उसने छुआ है। उसके छूने का ठंडापन उसके प्रेजेंट की पहचान है जो अभी अभी एब्सेंट हो गई है। कोई बर्फ का फाहा है, रूई की सी हल्की कतरन है। तस्तरी में उड़ेली गई चाय की लोच खाती भाप है, जो चार-छह सेंटीमीटर तक दृश्य है।

कुछ शब्दों की प्रवृत्ति अजीब होती है। जलना शब्द हर बार गर्माहट की प्रतिति देती है। तुम इसे अगर जमना समझो तो मैं इन दिनों बर्फ का तंदूर बना हुआ हूं, पर कोल्ड स्टोरेज नहीं। इसे विलासिता न जानो मगर दहलीज़ पर खड़े होकर सैकड़ों सिगरेट फूंकते और चाय का घूंट लेते हर आगत-अनागत देखता हूं।

हमारा माध्यम दृश्य-श्रव्य है, बिम्ब से अलंकार तक वीडियो है। मगर वीडियो सूख चुके फूलों की गंध नहीं दिखा सकता और ऑडियो का जादू इतना हैरान करता है कि झूठा लगता है इसलिए मैंने जो कम में कहा है उसे साहित्य में समझना।

तुम अपने पसंद की विधा चुन लेना।

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