Wednesday, June 25, 2014

विदाई का रोना


Symbolic Picture

अंजन दीदी उम्र में मुझसे बहुत बड़ी होते हुए भी मेरी पक्की दोस्त थी। सुपारी खाने की शौकीन थी सो इसके बायस उसके दांतों में कस्से लगे हुए थे। हंसती तो चव्वे में लगे कस्से दिखाई देते। हर दो-चार दिन पर सरौते से एक कटोरी सुपारी काटती। मैं कई बार उससे कहता- एकदम ठकुराइन लगती हो। रौबदार जैसी। मेरी मां और उसमें भाभी-ननद का रिश्ता होने से एक दूसरे से छेड़छाड़ और आंचलिक गालियों का लेन देन होता रहता था। खासकर दीदी जो शुरू से गांव में रहने के कारण खांटी पकी हुई थी। वो मेरी मां को दृश्यात्मकता भरे गालियों से नहला देती। गालियां देने के उस मकाम पर मेरी मां भी उसके आगे नतमस्तक हो जाती। उसकी बेसुरी आवाज़ में वे आंचलिक गालियां और भी भद्दी हो जाती। ये मुझे बड़ा नागवार गुज़रता। एक बार मैंने दीदी से कहा भी कि मेरे पिताजी यानि अपने भैया, दादी के सामने तो तुम गाय बनी रहती हो लेकिन अकेले में ऐसी गंदी गंदी गालियां! उसने अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दिया। कुछ पल अपनी लाड़भरी आंखों से मुझे मुस्कुराते हुए घूरा। फिर कहा - शहर में रहने वाले मेरे बहुत पढ़निहार और अच्छे बच्चे! गालियों से उम्र बढ़ती है। सारे संकट टलते हैं। दुर्भाग्य कटते हैं। विपदा का समूल नाश हो जाता है। लेकिन उसके लिए भलमनसाहत चाहिए होती है। उदार होना पड़ता है। यह एक अधिकार भरा प्रेम है जो अपने आप दिल से छलक छलक आता है। बियाह शादी में इसलिए भी गालियों भरे गीत गाए जाते है। यह रिश्तों के मिठास को दर्शाता है। बात मुझे जम गई सो याद रख लिया।

अंजन दीदी की आवाज़ बेसुरी होकर भी बड़ी अलग सी थी। परिवार में शादी के उत्सव पर जब उसे कोई गीत उठाने को कहा जाता तो उसकी फटी हुई आवाज़ पर सब हंसते। औरतों का एक झुंड दरवाज़े के चौखट पर माथे पर पल्लू लिए बारातियों के लिए गाती- 'बहनचोद निकलो हमारे घर से। चावल भी खाया, दाल भी खाया। मिठाई को रखा पॉकिट में।' छोटे छोटे अंतरों वाले इन गानों को यदि विजुवलाइज़ किया जाए तो आदमी गीत रचने वाले गीतकार की तरल बुद्धि पर बलिहारी जाएं। इसी तरह एक गीत ऐसा भी था जिसका अर्थ यह था कि दूल्हा अपने बाप का असली बेटा नहीं है। दरअसल दूल्हे की मां निम्फ्रोमैनियक है। उसे अनैतिक यौन संबंध बनाने का चस्का कुछ इस तरह लग चुका है कि वो गांव के हर आदमी जिसमें सगे-संबंधियों के साथ-साथ, जानवर तक शामिल हैं। इनमें सिर्फ स्त्री संबंधी गालियां नहीं मर्दों के लिए भी गालियां होती। 

दीदी ये गीत अपने खिंचे गले से मगन होकर गाती। सुनने वाले हंसते तो वो भी हंस देती। जबड़े में लगा कस्सा उभरता और मेरी चेतना के एल्बम में उनकी एक तस्वीर क्लिक हो जाती। तब लगता क्या है आदमी! संस्कृतियों के बीच अपनी मौलिक आदतों, स्वभावों, जूनूनों का एटेंडेंस लगाता हुआ एक ज़िंदा किरदार!

आगे चलकर दीदी की भी शादी हुई। कोहबर गाए गए। मगर अपनी विदाई के अवसर पर वह ऐसा दहाड़ मारकर रोई कि सुनने वालों को जैसे सदमा लग जाए। मैं आज तक भूला उस दिन को भूल नहीं पाया हूं। वह बड़ा हृदयविदारक दृश्य था। इस समय रोने की एक विशेष लय होती है जो एक ही तर्ज पर वह किसी चक्की के पाटों की तरह घर्र-घर्र चली जाती थी। तर्ज कुछ यूं था -

अं हं हं हह........ हो बाबू आबे तोरा खाना के एत्ते दुलार से खिलैथों हो 
(पिताजी अब आपको इतने प्यार से खाना कौन खिलाएगा)

अं हं हं हह......... खाय घड़ी पंखा के झुलैथों हो 
(आपके खाते वक्त अब पास में बैठकर पंखा कौन डुलाएगा)

कलप कर रोना और आदत में शुमार बहुत बारीक बातों का साथ में तालमेल था। अंजन दीदी को अक्सर जुकाम रहता था सो ज़रा सा रोने से नाक लाल होकर गीली हो जाती थी। आंखों पर आंसू ढुलके होते मगर इतने सारे क्रियाओं के बीच ताज़ा आंसू गाल पर नहीं लुढ़कते थे। 

विदाई के समय यह रोना सबके लिए था। सबके लिए मतलब सबके लिए। मसलन बारी बारी से गले लगते हुए जब वो किसी दुलारे बच्चे के पास जाती तो उसके लिए-
अं हं हं हह...... नुनू हो स्कूली के टास्क आबे के करैथों हो
(प्यारे बच्चे तुम्हें अब तुम्हारी पाठशाला से मिले होमवर्क कौन कराएगा)

पड़ोस की काकी के पैर भी और गले साथ साथ लगती। पैर शिष्टाचारवश और गले स्नेहवश। और फफक कर कहती -
अं हं हं हह.......काकी हे, केना जीबै आबे हम तोरा बिना......
अं हं हं हह.......के आबे तोरा सुतला में खटिया के नीचा एक लोटा पानी राखथौं.......
अं हं हं हह.......हे काकी हे के हमरो माथा पे तेल ठोकी के चोटी बान्तै हे.....

(काकी, मैं अब तुम्हारे बिना कैसे जीयूंगी? कौन अब तुम्हारे सोते में खटिया के नीचे एक लोटा पानी रखेगा? काकी, दुपहर बाद मेरे माथे पर कौन तेल ठोक कर मेरी चोटी बांधा करेगा.....)

फिर वो नेह में भीगी मेरे गालों पर अपनी नर्म नर्म हलेथी लगाकर कहती- 
अं हं हं हह......... लल्ला रे......हमरा भुली जैभे? भुलिहैं न रे अपनो दीदी के....
(प्यारे, मुझे भूल जाओगे? भगवान के लिए अपनी दीदी को कभी मत भूलनाा। मैं तुम्हारे याद के सहारे ही वहां रहूंगी.....तुम भी मुझे याद रखना)

फिर कान के पास आकर कहती - दोकानदरवा के यहां आबे एक्को पैसा उधार नै छै। चिठ्ठी लिखिहैं बेटा।
(पड़ोसवाली दुकानदार के पास अब कोई उधार बाकी नहीं है। अब वो तुमसे पैसे मांगे तो बता देना। कहीं वो तुम्हें ठगने की कोशिश न करे। समय समय पर मुझे खत लिखना )

इस रोने में रोज़मर्रा की उन आदतों का जिक्र होता जो दिनचर्या का हिस्सा होता और जिसे अब मिस किया जाना था। कई बार लगता ये रोना खुद के लिए नहीं बल्कि सुनने वालों को रूलाने के लिए ज्यादा किया जा रहा है। कितनी देर तक कोई इसे अनसुना कर सकेगा? जहां आपने एक भी पंक्ति पर ध्यान दिया दिल बुरी तरह से डूबने लगता। मजबूत से मजबूत कलेजे वाला भी इसे सुन बिफर पड़ता।
 
इस रोने में एक और खास बात थी। कि जैसे यह सुनियोजित लगता। जैसे इस रस्म में प्रजेंस ऑफ माइंड की बहुत अहमियत लगती। लड़की भावुक होकर सिर्फ बिसूर ही नहीं रही होती है, बल्कि गले लगने के बाद सबके कान के पास कुछ पर्सनल और काम की बातें भी करती जाती है। उसके पास सबके लिए एक खास संदेश होता है। जैसे वह काकी को बताती कि अब तो मैं जा रही हूं। अब मैं यहां की जिम्मेदारी से मुक्त हूं तो मेरे बाद जो भी मेरा काम संभाले उसके लिए वो अलां-अलां चीज़ फलां-फलां जगह रखी हुई है।

इस दौरान उसकी गीली आवाज़ भावुकता और व्यावहारिकता के बीच कहीं झूलता हुई होती। जैसे अलगनी पर से आखिरी कपड़ा जब उतारते हैं तो उसके रस्सी के तनाव में आया विचलन जो धीरे धीरे कंपन में बदलती है। 

देखा जाए तो लगता है, विदाई पर यूं बुक्का फाड़ कर अचानक से रोने का यह हुनर लड़की अचानक से सीख लेती है लेकिन गौर करें तो ये पौध तैयार होती है जब वह लड़की तीसरी कक्षा के आसपास होती है। जब उसकी सीनियर सहेली या दीदी उसे कहती है-चल आज फलाने टोला के चिलाने अंगना में ढिमकाने की विदाई है। और बालों में बिना तेल, कमर पर कोई बच्चा लादे वह लड़की अपनी खोई खोई आंखों से यह दृश्य देखती है। और इस तरह बड़ी होती जाती है। और हंडी में चढ़ी अधहन की तरह समय के साथ पकती रहती है। और अपनी विदाई के दिन फट पड़ती है। और उस ऐन मौके पर इतने दिनों से सकेरी हुई सारी भावनाएं और आदतों की दनादन उल्टी करने लगती है। अंजन भी ऐसे ही बड़ी हुई थी।

मैंने कई साल से अंजन दीदी को कोई खत नहीं लिखा है। आज वो सुबह से याद आ रही है। और उसका रोना मेरे दिल को सिसका रहा है। आज उसके लिए मेरे दिल में गाली आ रही है।

Thursday, June 19, 2014

B. last seen yesterday at 10:22 PM



मैं उसके बारे में जितना सोचती हूं उसकी होती जाती हूं। एक उम्र के बाद खूबसूरती मायने नहीं रखती। पहचान वालों की मुस्कुराहट, मोटे लोगों के किसी खास पर उसकी अपनी खास मौलिक प्रतिक्रिया, फलाने का संशय, चिलाने का चिंताग्रस्त होकर घूमना, मीता का अनजाने में सीटी बजा उठना, किसी काले के आंखों की चमक, किसी गोरे की माथे की सिलवट, गंजे का खिखिलाकर हंसना, बूढ़े की भलमनसाहत दिल को भली लगने लगती है। कुछ के सीने के बाल याद रह जाते हैं, कुछ की बेसुरी आवाज़ भी मन को हांट करती है। कुछ के मेकिंग लव के दौरान बने क्षण याद रह जाते हैं। कुछ के जुबान से निकला शब्द सहलाते हुए से लगते हैं, कुछ की आवाज़ ही आराम दे जाती है। 

मुझे उसके प्यार करने का तरीका बहुत पसंद है। यह सच है कि वह मुझे पसंद करता है लेकिन एक स्त्री होने के नाते जाने अनजाने मेरा सिक्थ सेंस मुझे यह भी इंगित करता है कि उसकी यह चाहना मेरे शरीर के कुछ खास अंगों के प्रति ज्यादा है। वह मेरे गोरे रंग को लेकर अक्सर हैरतजदा रहता है। हम जब मिलते हैं, मेरा मतलब हमारा जब कभी भी बाहर मिलना होता है, कनॉट प्लेस के के एफ सी में, हौज खास के बरिस्ता में, ग्रीन पार्क के कोस्टा कॉफी में मैंनें उसकी आंखों में झांकते हुए कुछ और अनजाने रास्तों की तरफ खुद को ट्रैक से फिसलता पाया है। 

यह अजीब है कि 28 साल बाद भी मैं प्यार के मसलों में उदार हूं। और लगता है अब जैसे यह आदत ही बन गई है। मैं चीजों को वैसा का वैसा नहीं ले पाती जैसा वह कहा या किया गया है। उल्टे यह जरूर लगता है कि मैं उसमें थोड़ी अपनी सोच मिलाकर ग्रहण करती हूं। या कभी कभी जब अपनी स्वभाव के उलट जब जानबूझ कर थोड़ी से अपना विचार रखती हूं, वैसे ही दूसरों की बातों में अंर्तमन में यह अनुमान लगा लेती हूं कि शायद इसका मंतव्य भी कुछ वैसा ही हो। दरअसल प्यार नाम की इस शै को आप बहुत हल्के में नहीं ले सकते। यह कई जगह निशान लगाता हुआ निशाना करता है। या शायद प्यार को हल्के में लेकर ही जिया जा सकता है। कुछ भी हो यह ताउम्र मुझ जैसी लड़की के लिए अपने बालों को संभालते रहने जैसा है। हां इन बालों पर जिसपर आड़े कुछ वक्तों में आपको झल्लाहट भी होती है और कई बार जब किसी उधेड़बुन में हों या आपके बॉयफें्रड के साथ यदि हो रहा फ्लर्ट अपने सीरियस होने के उस मकाम पर पहुंच रहा हो जब उसमें तेज़ सांसों की मिलावट होने की गंध आने लगे, वह आपके हाथों के रोओं को सहलाते हुए, आपकी बांहों की तरफ बढ़ने लगे, उसके होंठ सूखने लगे, इन हरारतों से आप अपना दम साधने लगें और किम्कत्वर्यविमूढ़ता की स्थिति आ जाए। अब इस एकआध को जीयें या उसे यही से धकिया दें कि लड़ाई मन में चलने लगे। वैसे इस तरह के अनुभव के साथ साथ आप पर्टिकुलर इस अनुभव शब्द के बारे में आप क्या सोचते हैं? मुझसे शेयर कीजिएगा। लेकिन मुझे लगता है कि अनुभवों का दोहराव दरअसल अनुभव नहीं होता।

मैं अनालाइज बहुत करने लगती हूं। हां तो मैं कहां थी?। हां तो हमारा जब भी बाहर मिलना होता है। यप। यहीं थी मैं। वह मेरे प्रति ज़रा चौकन्ना रहता है। थोड़ा आगे की तरफ झुका हुआ। मुझे ज्यादा से ज्यादा कंफर्ट फील कराने की आड़ में चिंतित। जूझता हुआ सा। ऐसे वक्तों में हमारी आंखों एक दूसरे से बहुत ज्यादा मिलती है। कई बार मिलती है लेकिन कई बार वह नज़र बचा भी ले जाता है। जैसे उसे इस बात का पता होता है कि मैं उसकी आंखें पढ़ना चाहती हूं। चूहे बिल्ली के इस खेल में मैं मुर्गी की तरह कुट-कुट करते हुए उसे चुग लेती हूं। 

सरेआम उसके कोहनियों के स्पर्श में एक आग्रह है। ऐसा लगा है जैसे वह बंद कमरे में ही खुल सकने को अभिशप्त है। कुछ प्रमी होते हैं ऐसे खासकर दक्षिण पूर्व एशिया में। वे प्रेम में कई स्तरों पर जूझते हैं, यही वजह है कि मैं उन्हें एक सम्मानित प्रेमी नहीं मानती। इसके उलट वे एक डरपोक पिता, कंजूस बेटे और बीवी से चार बच्चों को जनकर भी वे शिखंडी पुरूष होते हैं। वे पूरी जवानी प्रेम करने के बाद अपनी खोल में घुसे चले जाने वाले चूहे होते हैं और तब उन्हें वो दुनिया सुरक्षित लगती है। यह सच है कि इंसान रूप में हम प्रेम करने को बाध्य हैं लेकिन मैं इसे हम स्त्रियों की खूबी मानती हूं कि हम प्रेम कर उन पुरूषों के उलट ज्यादा उदार, ज्यादा साहसी और निडर हो जाती हैं। माफ कीजिए, अगर आप मुझे ऐसे में आवारा समझेंगे तो मैं आपकी इस दयनीय सोच पर 'हुंह' भी नहीं कर सकती। 

वह मुझे रूचता है। मुझे ठीक ठीक याद है। उस दिन वह परतों वाला टी-शर्ट पहने था जिसका गला दो बटन से खुलता था। बिना मीन्यू देखे वह ऑर्डर देकर अपना सर नीचे झुकाए बैठा था। गौर से देखने की शुरूआत दरअसल ऐसे लम्हों में ही होती है जब सामने वाला आपसे अंजान हो। मैंने उस दिन उसके शरीर के खूबसूरती के बारे में महसूस किया। एम सपाट चौड़ा सीना जो उस वक्त और समय के बनिस्पत ज्यादा ही चौड़ा लग रहा था। वो शेव की हुई छाती थी जिसपर हल्के हल्के बाल उग आए थे। मैंने ख्याल किया वे अपने में उमस सेमेटे छाती है। मेरी उंगलियां कसमसाई। मन हुआ उनपर उल्टे हाथ उंगलियां फिराऊं। प्रेम करने का उद्वेग ऐसे ही रूटीन से हटकर अचानक से जगता है। दरअसल नाजो अदा से छूने का मन ऐसे ही कुछ चोर लम्हों में होता है। मेरी सांसे छोटी पड़ने लगी। अपने युवा प्रेमी की इस तरह कामना करने से मेरे ज़हन में उसकी उभरी हुई पिंडलियां, उसके जांघों की मजबूत पकड़, उठी हुई हड्डियां और उसकी गर्म सांसों से मेरा उलझाव उभर आया। पुरूष इस तरह कहां हमारी सेक्सुएलिटी के बारे में सोच पाते हैं! ऐसे अंतरंग पलों में खुद मेरी पीठ में एक तनाव उभर आता है। पीठ के कैनवस पर सर्दियों के दिन लद आते हैं और लगता है दो किस्सापसंद औरतें वहां ऊन कांटा लेकर लगातार फंदों पर फंदे बुनती जा रही है। और तब मेरी पीठ को आंच की जरूरत होती है।

Tuesday, June 17, 2014

'शीर्ष'क आने तक गया थक

नए कमरे की बाथरूम की दीवार पर बहुत सारी बिंदियां सटी हैं। कंधे तक सीमेंट की पुताई की गई उन दीवारों पर बिंदियों की लड़ी अपने लाल होने के बायस ही उभरती प्रतीत होती हैं। बाथरूम की दीवारें नीम नींद में अधमुंदी आंखों से देखती है। जब नल खुलता है और पानी की धार गिरती है तब सीमेंट की पुताई वाली वे दीवारें सौंधी-सौंधी महकती है। दीवार की तन्द्रा टूटती है। वे सारी बिंदियां कमर की ऊंचाई पर चिपके हैं। जब नहाने बैठता हूं तो वे बिंदियां एकदम सामने पड़ती हैं। कई बार नहाना विलंबित कर उन बिंदियों से मूक संवाद करने लग जाता हूं। वे भी मेरी तरह वहां नहाने बैठती होगी। अपने बदन पर पानी डालने डालने तक उसे ये अपने माथे पर से ये बिंदी जल्दबाजी में हटाई होगी। कई बार तो एक दो मग अपने शरीर पर डालने के बाद चेहरे पर हाथ फेरने के क्रम में उसकी उंगलियों से टकराई होगी तब जाकर उसे इसे हटाने की सूझी होगी। ऐसा हर जगह होता है। गांव में चापाकल के पास बैठकर नहाती औरतें पेटीकोट अपने उभारों के ठीक ऊपर बांधने के बाद चुकुमुकु बैठकर चापाकल पर ही बिंदियां साट देती हैं। नदी में डुबकी लगाती औरतें पास के पत्थर पर इसे साट जैसे अपनी हाज़िरी लगा कर भूल जाती हैं।

वहां ये बिंदियां उन अनपढ़ औरतों के भूले कि किए गए हस्ताक्षर हैं। याद रखने की होड़ में उनमें वे छूट गई आदतें हैं जो उन्हें कुछ भला बनाती हैं। खुद की शिनाख्त को भूलवश कुछ यूं छोड़ते क्या उसने कभी यह सोचा होगा कि जिसे मैंने कभी देखा नहीं आज इतवार के इस दोपहर ढ़ले बाथरूम के एकांत में मैं उसके बारे में सोच रहा होऊंगा। यह तय नहीं है कि चार प्याला लगाने के बाद, गीले माथे बिंदियों की संख्या कितनी है, हो सकता है मैं जिस बिंदी को घूर रहा हूं वो एक ही हो लेकिन मुझे बहुत सारी नज़र आ रही हो। 

स्त्रियां अपने होने के निशान को कैसे कैसे छोड़ती हैं! तवे पर अंतिम रोटी सेंक लेने के बाद बंद आंच पर एक चुटकी आटा डाल देने में। रात के खाना होने के बाद भी रोटी वाले डिब्बे में आधी रोटी बचा कर रखने में। कपड़े में मेरी जिंदगी में भी कुठ ऐसी औरतें हैं जो छूटती नहीं। वे किन्हीं न किन्हीं आदतों, स्वभाव की वजह से मन में घर बनाए हुए है। उनकी याद नहाने के बाद भीजे कंधे पर रखी गीले ठंडे एहसास हैं। 

XXX

प्रिय बहार,

सोचकर अच्छा लगता है कि इस घटिया दौर में जब लेखकों और कवियों की साख दांव पर लगी हुई है, जब आमजन की नज़रों में वे एक संदेहास्पद पात्र बने हुए हैं, जब गिनती के कुछ चमकदार चेहरे अतिसाधारण लिख रहे हैं फिर भी तुम्हारा विश्वास उनमें लगातार बना हुआ है। दरअसल हमलोग पलायनवादी स्वभाव के हैं। रंगे हुए सियार। चीज़ों से हमारा लगाव बदलता रहता है। ज्यादातर चीज़ें हम बस मन लगाने के लिए करते हैं। हमारी मातृभाषा में इसे ‘डगरा पर का बैंगन’ बोलते हैं। हिन्दी में कहूं तो जिधर वज़न देखा उधर लुढ़क गए टाइप। तुम्हारी बनावट दूसरी है। जितनी सुंदर तुम हो उतना ही सुंदर सोच और पुख्ता यकीन भी। तुम एक हारे हुए ट्टटू पर दांव लगा रही हो, यह देखकर और भी आश्चर्य होता है। अक्षररूपी ब्रह्म में तुम्हारा विश्वास बना रहे।

Wednesday, June 4, 2014

कोई समझा कर घर ले आए हमको

मैं घर से भागा हुआ वो आदमी हूं जो गुस्से से भागा था। जाते समय के साथ मैं गांव की तरफ और सरकता जा रहा हूं। वहां के रहन सहन सोच पर और हावी होती जा रही है। अपने तरफ की बोली-भाष कान में शहद घोलती है। इस बेरूखी और बनावटी दुनिया में पुकार का सम्बोधन मात्र दिल को झकझोर देता है। जिस दिन वहां से चलने के लिए ट्रेन में बैठता हूं तो एक मायूसी छा जाती है। मन बैठने लगता है। उत्साह मुर्झा जाता है। एक मुर्दानगी छा जाती है। रेलगाड़ी अपने रास्ते पर बढ़ती है और मैं यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि घर छोड़कर ठीक कहां किया? ऐसा क्यों है कि यहीं खुद को पूरा पाता हूं। हम साला लोअर मीडिल क्लास लोगों के लिए समाज में सर्वाइव करना और भी मुश्किल है। बीच के रास्ते ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। ऑटो चला नहीं सकते, कचरा उठा नहीं सकते, पढ़ाई एक बोझ है जिसके लिए मां बाप से पेट काट-काट कर जैसा भी पढ़ाया। अंधविश्वास और प्रगतिशीलता का चंवर डुलाता यह समाज अपने आप ही मुग्ध है। लानत है ऐसे समाज पर जो अब तक पाप-पुण्य और अच्छे बुरे के दलदल में लिथड़े हुए कीड़े की तरह रेंगते हुए विकास के दंभ में जी रहा है। असल में लोअर मीडिल क्लास एक भौंडी सी खुद को परिभाषित करती हुई सी गाली है जो जैसा है उसे मेंटेन रखने के लिए, इज्जत बनाए रखने के लिए जी रही है। 

 कभी कभी लगता है मैं नहीं सक सकता यहां। जबरदस्ती यहां बना हुआ हूं। खुद को साबित करने का जैसे एक दबाव है। ये जगह मेरे लिए नहीं है। मुझमें इतनी ऊर्जा नहीं है। मैं जीत नहीं रहा हूं जिए रहा हूं। मैं ऑफिस में काम करके, मीटिंग अटैंड करके, क्लाइंट की ब्रीफिंग लेकर, बॉस के साथ प्रजेंटेशन करके, रेडियो, टीवी के लिए लिखकर, रिकॉर्डिंग लाइनअप अप करके, वाइस ओवर आर्टिस्ट के साथ उठते बैठते हार रहा हूं। ये पुर्नजन्म भी होता तो कोई बात थी। अपने अतीत की आईडेंटीटी मिटाकर जीना ज्यादा बोझमुक्त रखता। यही सालता है। रोशनी और उम्मीद की तरह हम अपने आज़ादी से जीने के स्वाद को भी चखते हैं और एक बार यदि उसका स्वाद लग गया तो ये उतारे नहीं उतरता। क्यों ख्याल आता है कि हम कौन थे? समय का कैसा फेर है और कैसी प्रगति है कि करियर का सही चलना ही हमारी सफलता का पैमाना बन गय है? एक सुखद बचपन और शानदार किशोरावस्था के बाद प्रेम की विफलता के बाद यह जीवन की असफलता है। मेरे जैसे कई युवा इस रोग को, इस दर्द को, मन की अंधेरी सुरंग में रेंग रहे इस एहसास को जी रहे होंगे। इस पैमाने पर हम खारिज हो चुके लोग हैं। नियति मुझे कल को भले बंबई ले जाए लेकिन मैं रिवर्स गीयर में चलने वाला आदमी हूं। 

जितना मैं घर से दूर रह रहा हूं, घरेलू होता जा रहा हूं। दाल-भात, लिट्टी-चोखा, चूड़ा-आम, सत्तू के अच्छा कुछ भी नहीं लगता। गोबर से लीपे हुए आंगन से ज्यादा साफ और गरिमामयी कुछ नहीं लगता। वहां मैं सुबह के साढे पांचे से शाम के सात बजे तक एक पैर पर खड़े रहते हुए भी नहीं थकता। रात को जल्दी गहरी नींद आती है। आधी जरूरतें घट जाती हैं। खर्चे कम हो जाते हैं। मुंहामुही सबका हालचाल लेते हैं। चेहरे को वहां पढ़ना आसान हो जाता है। वहां की किस्सागोई धड़कती है। 

गांव की आदत मुझपर कुछ इस तरह तारी रहती है कि रात के तीसरे पहर नींद में लगता है कि मैं भागलपुर के बाज़ार में हूं। जहां चिरौता बेचने वाले, मछली खरीदने की गुहार और जल्दी से जल्दी जंक्शन पहुंचाने की अपील जब आपस में गुंथ जाती है। मुझे एक एक आदमी को रोककर बात करने का मन होता है। उसकी बोली भाषा में रम जाने का दिल करता है। जिक्र हो गया तो अब उसी भाषा में लिखने को ऊंगलियां कसमसा रही है- 

-कि हो कहां घॉर भेल्हों?
-तोरे गामों के छिकियै।
-गांव भेल्हों लत्तीपुर, थाना बिहपुर आ जिला भागलपुर।
-देखलिहौं नय पहिनै कभी गामों में अहील्लि पूछलिहौ।
-अच्छा त तोंय गंगा के ई पारो के भेल्हो?
-आंय हो चाहै कि छहो तोंय सब? उन्हरको लोग सनी गंगा के ऊ पार बोलै छय। ई पार और ऊ पार के कि मतलब?
-मतलब त यहै कि एन्हेंय बोलल जाय छै बाप दादा के जुगो से
-यहै?
-तबे कि। 

मैं उसके जैसा बोलना चाहता हूं। मैं अपना सवाल खुद बोलने के बाद उसका उत्तर बन उसके गले से निकलना चाहता हूं। एक गंवई आर्त स्वर, उसका पंक्चुएशन, उस पैनी नज़र का तंज अपनाना चाहता हूं। अक्सर पुआल की खूशबू आती है। गीले भूसे में चोकर मिलने की। लाल साग की जड़ों के साथ मुलायम गीले मिट्टी की। मैं भी अपनी मिट्टी से उखड़ गया हूं बाबा। गांव के बुखार में अक्सर रहता हूं। वह मेरे अंग-अंग तोड़ता रहता है।

कोई समझा कर घर ले आए हमको।

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