Thursday, September 18, 2014

दो कौड़ी के दो ड्राफ्ट ख्याल



हालांकि मुझे रेखागणित में कभी दिलचस्पी नहीं रही लेकिन फिर भी बस्ते में एक कम्पास बॉक्स का रहना लाज़मी था। यह अनुशासन के लिए नहीं था क्योंकि मुझे कभी उसकी फिकर ही नहीं रही अलबत्ता कम्पास बॉक्स के अंदर एक तह मोटे गत्ते का बिछाकर तब के गुप्त कोड, तब के मासूम लव लेटर जिसमें बहुत रोने-रूलाने और कसमों वादों के बाद एक चुम्मी पर आकर बात रूकती थी। और तुर्रा ये कि तब चुंबन के आगे कुछ नहीं जानते थे। सोच नहीं चलती थी। और अब..... चुंबन से आगे ही सोचते हैं। उससे कम सोच नहीं पाते। 
तब कम्पास बस्ते का सबसे कीमती हिस्सा होता था क्योंकि कई बार इसमें नेपाली, भूटानी, बांग्लादेशी टका और सिक्के होते थे जिनका कोई इस्तेमाल नहीं था लेकिन जाने क्या था उस उम्र में कि इसे देखने भर से दिल को तसल्ली मिलती थी। उन करेंसी पर वो अनचीन्हे अक्षर, अपने देश की मुद्रा से अलग तरह के रंग, वे डाक-टिकटें.... उफ्फ वो उम्र जब कोई मुहावरे में कहता था-दिल्ली बहुत दूर है। तो पलटकर पूछ बैठते थे- कितने प्रकाशवर्ष दूर! 

***

मेटरलिस्टिक मैं कभी नहीं रहा। शायद यही वजह है कि शहर में ये चीज़ें मुझे जरूरत के बाद बोझा लगने लगती है। यही कारण है कि अब गांव जाता हूं तो पैर में हवाई चप्पल डालने के बाद बस और कुछ नहीं चाहिए होता है। और राह चलते यह सोचकर मुस्कुराता हूं कि कितनी शांति है न? न कदम कदम पर पर्स की जरूरत और न फोन की घनघनाहट। 

मेटरलिस्टिक आज भी नहीं हूं। आखिर महंगे फोन, कैमरा, गजेट्स लेकर भी क्या खोजते हैं उस पर - आखिरकार आदमी ही न। बिना संपर्कों के तो फोन चाहे एप्पल का हो या ऑरेंज का या टोमैटो का। होगा तो एक डब्बा ही न।

संपर्क साधने के आज इतने तरीके हैं - एसएमएस, ई-मेल, ऑरकुट, वाइबर, लाइन, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, गूगल प्लस, वी चैट, ह्वाट्सऐप। आदमी को आदमी के करीब लाने की कोशिश में बाज़ार बनाते ये तकनीक....। मरते और पत्थर हो रहे दिलों के बीच रोज़ तकनीक का एक नया साफ्टवेयर खड़ा हो जाता है लेकिन प्यार..... प्यार तो शिफ्ट हो रहा है।

मैं गलत हूं तो मुझे सही कीजिए। जिस तरह की दुनिया अब बनती जा रही है आपको नहीं लगता कि आने वाले दिनों में विजुअल्स भी अपनी अहमियत खो देंगे? दृश्य के साथ हो रहे इतने प्रयोग ही तो कहीं हमें कहीं संवेदनहीन नहीं बना रही ? कैमरे के साथ हो रही ऐसी अभ्यस्तता! गोया जिंदगी की हर धड़कन को ही कैमरे पर लाने की कोशिश की जा रही है। हम न जाने क्या देख लेना चाहते हैं। हम न जाने क्या पा लेना चाहते हैं।

कान में हेडफोन लगाकर तेज़ संगीत सुनते हुए अपने सर झटकने में हमें पता नहीं चलता कि मेट्रो में बगल की सीट पर बैठा आदमी अचानक से बेहोश हो गया। कारण तो दूर की बात है। दरअसल उस गीत को सुनते हुए हम ऐसी प्रतिति देना चाहते हैं जैसे हम सबसे ज्यादा अलमस्त, फक्कड़ और बिंदास हैं लेकिन उसकी कई शर्तें हैं। क्या इसे अपने में मगन होना कह सकते हैं? क्या अपने में मगन होने का अर्थ बदल गया है? हम किसी चीज़ में मगन होते हैं, अपने में कहां? हमें इस तरह किसी चीज़ में मगन देखकर हमसे कोई पानी की बोतल चाहकर भी मांगने की जहमत नहीं उठाता। हमने आंखें पढ़ना इतना कम क्यों कर दिया? हम सबको यही संदेश देना चाहते हैं न कि कोई हमसे कोई मदद न मांगे, सभी हमसे दूर रहें? लेकिन हमें जरूरत हो तो सभी उपलब्ध रहे। वरना हमें शिकायत हो जाती है। हम न जाने कहां जा रहे हैं। इस ‘न जाने कहां’ को इन्जॉय कीजिए । 

Thursday, September 4, 2014

Hold to record. Send to release.

बाहर बारिश है। मैं एक रेस्तरां में अपने बॉस के साथ बैठा हूं। मेरे सामने चार लड़कियां बैठी हैं। एक का मेरी नज़रों से संवाद कायम हो चुका है। बॉस ने यह भांप लिया है। इसलिए मुझे अब चार जोड़ी नज़रों को संभालना है। मैं जुकाम में हॉट कॉर्न एंड सॉर सूप पी रहा हूं। उनसे मिलती नज़र अब परिचित होने को है। वो मेरी ओर देख कर गर्दन घुमाती है और अपनी बाकी तीन सहेलियों में घुलने की कोशिश करती है। कई बार रेस्तरां का आकर्षण चाय की प्याली में आया सुगर का वो टुकड़ा होता है तो चाय में थोड़ा घुल कर भी थोड़ा सा बच जाता है। इसके आगे वो घुलने से इंकार कर देता है।

वो अब अपने कपड़े बार बार ठीक कर रही है। कभी कॉलर को खींचती है कभी शर्ट के नीचे का दोनों प्लेट मिलाकर नीचे खींचती है। इससे उसके दोनों ओर के बटनों के बीच की फांक सिल जाती है। हम हल्के परिचय के बाद भी थोड़े असहज हैं। 

बिल आता है। बॉस पे करते हैं। मैं अपनी मोबाइल समेटता हूं। नज़र एक बोसा। आंखों से बाय कहता हूं लेकिन पलकें इसे संभाल लेती हैं। एक आकर्षण का पटाक्षेप होता है। बाहर बारिश अब भी है लेकिन जाने क्या बरस रहा है....

Tuesday, September 2, 2014

वो शहर में है। मैं उसकी गुरुता में....



ये एक अजीब सा दिन है। हैरानी नहीं कि साल के कुछ दिन अजीब से होते हैं। कभी कोप भवन में घुसकर बिला वजह ज़ार-ज़ार रोने का दिन होता है। कभी बिना मतलब यहां वहां घूमने का। कभी सारी नैतिकता अनैतिकताओं का चोला उतारकर किसी के साथ कुछ भी कर लेने का, कभी कूट कर इस तरह मालिश करवाने का कि बदन का रोआं रोआं रूई के फाहे सी हवा में तैरते हुए रूक-रूक कर ज़मीं की तरफ आए। कभी बारिश में गलथ कर भीगने के बाद एकदम जमी हुई शिकंजी पीने का, फिर भी गीले कपड़े पहने रहने का और चिकन सूप छोड़कर आइसक्रीम खाने का। 

आज का दिन अजीब, कुछ अजीब वजहों से है। वो सुबह से ही मेरे शहर में है। एक मीटिंग के सिलसिले में आई हुई। मैं उसके ख्याल में गुम हूं। अब तक टेलीफोन पर एक दिलकश आवाज़ जो कई बार दृश्य में बदली है। जिसकी रूक-रूक कर बोलने में कई बार उसका परेशान होना उभरा है। जिससे मुझे उसके माथे पर पड़ रहे बल का पता चला। कभी मेरी एक चुंबन की इल्तज़ा को जिसने इग्नोर करते हुए अपनी लट झटकी है। कभी किसी बात में जिसकी बहुत लाड़ था। आधी रात किसी लम्हें में कमज़ोर होकर जिसने मेरी बाहों पर अपना सर रखा है। कभी बहुत ठहर ठहर कर, समझा समझा कर जो बोलती है। और कभी कभी तो बोल भी नहीं पाती लेकिन जिसके द्वारा उच्चारित अक्षरों के बीच के अंतराल उसके बोले जाने वाले शब्दों से ज्यादा बोलते हैं। वो जो एक मोम का बदन है, तमाम जज्बातों का शीशा है, वो सुबह से इस शहर में है। 

मैं सोचता हूं कि क्या क्या कुछ कर रही होगी वो। भागकर मेट्रो पकड़ रही होगी। फाइलें संभाल रही होगी। टैक्सी का दरवाज़ा बंद कर रही होगी। किसी कैंटीन में बैठ कर उत्तपम ऑर्डर किया होगा उसने। गाड़ी के शीशे से अगर उसे कोई दिख जाता होगा तो लगता होगा कहीं वो मैं तो नहीं। मेरे चेहरे को याद कर सामने वाले अपरिचित चेहरे में समानता ढूंढ़ने लगती होगी। दिल की धड़कन थोड़ी सी जाग जाती होगी। सोचने लगती होगी अगर इस आदमी की हाईट थोड़ी छोटी कर दी जाए, आंखें गहरी और नशीली हो जाए तो यह सागर हो सकता है। कई बार तो लगता होगा, हो न हो ये वही है, क्या पता इतने दिनों में बदल गया होगा। 

कुछ रिश्ते अपने में इतने उलझाव लेकर आते हैं कि हमें अरसे तक पता नहीं चलता कि आखिर हमें उसका करना क्या है। टेलीफोन पर की कुछ आवाज़ों से रिश्ते भी उसकी तरह हवा में टंगे रहते हैं। ये बेतार रिश्ता है। इसमें कई बार मिलने की इच्छा नहीं होती। और कई बार तो ये दिल होता है हम उसे ऐसी जगह से देखें जहां से वो मुझे न देख पाए। प्रेम के ये दांव पेंच सुखद है।

सारा दिन हम एक ही शहर में यहां वहां भटक रहे हैं। वो सचिवालय में है तो मैं दफ्तर में। अब वो लोधी रोड पर है तो मैं बंगाली मार्केट में। अब वो कनॉट प्लेस आने को है तो मैं निज़ामुद्दीन के रास्ते में हूं। हम दोनों एक ही दिन में चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे हैं। 

आज सुबह धूप भी अच्छी खिली थी। बर्फ जैसे सफेद बादलों के पीछे से सूरज चमक रहा था। फिर धूप-छांव का खेल चलने लगा। फिर छांव ही छांव थी। तब बादल ही बादल आए। फिर बारिश ही बारिश हुई। दिल्ली की चमकती हुई सड़कों पर नीम के पत्तों के मार्फत होती बारिश.....

आबे हयात बरस रहा है मियां! आबे-हयात। 

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...