Friday, August 14, 2015

प्रेम : साँझ की बेकार चिंता



प्रेम बहुत काॅम्पलीकेटेड विषय बना दिया है हमने। या कि प्रेम जटिल ही है? शायद दिल के लगने से कहीं कोई बड़ा वस्तु है प्रेम। हमारी तो भाषा भी बहुत गरीब है कि हम झट किसी अच्छे लगने वाले एहसास को प्रेम का नाम दे देते हैं। क्या कभी हमारे समझ में आएगा प्रेम? बहुत विरोधाभास है। अगर रोज़ प्रेम को लेकर कुछ नया नया या अलग से एहसास या समझ उपजते रहते हैं तो इस तरह को कभी नहीं समझ सकेंगे कि क्या है प्रेम या रोज़ ही समझते रहेंगे। तो क्या अनपढ़ और जाहिल व्यक्ति नहीं करता प्रेम ? क्या उसके प्रेम करने की योग्यता नहीं है? उसके अंदर उस बुद्धि विशेष का अभाव है? वह कैच नहीं कर पाएगा प्रेम की नित नई परिभाषा को ? अब तो कई बार यह भी लगता है कि हमने प्रेम का सतहीकरण और सरलीकरण कर दिया है। कई बार लगता है प्रेम को हमने दूषित कर दिया है। आम आदमी का रंग देने में, ऊपर ही ऊपर इसे सबकी जिंदगी से जोड़ने में। तो क्या प्रेम संबंधों के इतर भी होता है। हम पहाड़ पर बिना किसी के संपर्क में (यहां तक कि प्रकृति भी) रहकर प्रेम में होने का दावा कर सकते हैं या प्रेम पर भाषण दे सकते हैं। समय के साथ प्रेम बस चर्चा करने, पढ़ने, एक टेबल पर एक टाॅपिक भर का डिशक्शन हो गया है।

और हम प्रेम को जानने का कितना दावा भी तो करते हैं। फिर ऐसा भी होता है कि अचानक से कोई पूछ ले कि प्रेम क्या है तो ज़मीन आसमान देखने लगते हैं, एकदम से कोई जवाब नहीं सूझता। 

असल में हम प्रेम कर भी रहे हैं या बौद्धिक चेतना के स्तर पर सिर्फ इसे एक्सप्लोर कर रहे हैं? कहीं यह हमारे सोचने का कंम्फर्ट ज़ोन तो नहीं बन गया है? एक आसान टाॅपिक जो जितना ही डिस्कस किया जा रहा है जीने के स्तर पर वह उतना ही जीवन में गायब है?

हम कहां ढ़ूंढ रहे हैं प्रेम ? सिनेमा स्क्रीन पर रचनात्मक रूप से एडिटेड सीन में? या पत्रिका में छपी किसी प्रेम कहानी में ? क्या मैं यह सही लिख रहा हूं? क्या मैं इस पर प्रश्न उठा कर ठीक कर रहा हूं? मतलब क्या मेरा सवाल जायज है?

हम सब अपने अपने - अपने तरीके से प्रेम को समझने की कोशिश करते हैं? लेकिन मुझे लगता है आज यह हमारे बैठारी का रोग हो गया है। प्रेम की विवेचना मात्र एक बौद्धिक खुराक बनकर रह गई है। अकेले में चिंतन करने योग्य सब्जेक्ट। जीने से कोसों दूर, रिश्तों में नदारद। अपने अकेलेपन में हम इस किताब का पन्ना पलट रहे हैं। जैसे नैतिकशास्त्र होता है, किसी को धोखा न देना, रिश्वत न लेना, झूठ न बोलना वगैरह.....

Thursday, August 13, 2015

शापित फसल



उसके बारे में कोई एक सूरत नहीं उभरती। जुदा जुदा से कुछ ख्याल ज़हन में आते हैं। मेरी छोटी सी उम्र में उसी का मौसम रहा करता है।

किसी रात का ख्वाब थी वो। क्षितिज से उतरती सांझ में दरिया पर सुरमई सी बहती हुई। पानी पर किरोसिन की तरह बहने वाली, रंगीन नक्शे बनाती हुए, फिसल जाने वाली..... जिस्म के रोओं पर रेशम सी सरक जाने वाली। झींगुरों के आवाज़ के बीच प्रतीक्षा की रात गहराती है। कई  प्रश्न अनुत्तरित छोड़ जाती है।
कई बार लगता है यह क्या है जो मुंह चिढ़ा रहा है। यह क्या है जो मिटता नहीं। यह क्या है जिसकी खरोंचे लगती रहती है। जो कभी खत्म नहीं होता और अपने होने का आततायी एहसास दिलाता रहता है। यह अधूरा होने का एहसास। एक बेकली, एक अंतहीन सूनापन जो अपने खालीपन से भरा हुआ है।

एक व्यग्र सुबह की तरह...किसी स्कूली बच्चे के छुट्टी के इंतज़ार की तरह... जैसे किसी भी पल उससे टकराना होगा।

किसी दोपहर की फुर्सत सी जैसे - टक-टक, टक-टक की आवाज़ के साथ कठफोड़वा गम्हार की डाली पर अपनी चोंच मारता है। छत पर भिगोकर पसारा गया गेहूं सूख जाता है। पूरे बस्ती में मुर्दा वीरानी छाई रहती है। समय की नाड़ी मंद पड़ जाती है। लगता है जैसे एक बड़े से बंद हौद में छोड़ दिया गया है।

आधी रात की घबड़ाहट है वो जब धड़कन अपने ही सीने से निकलकर जिन्न की तरह धम-धम करके ज़मीन पर चलती हुई लगती है। कहां जानता हूं कि अभी रात के तीसरे पहर मैं तमाम चाहतों से मुक्त हो जाऊंगा। मेरे अंदर एक ईश्वर जगेगा। टेबल लैम्प की एकाग्र रोशनी में कलाई घड़ी की थिरकती और चमकती सूई की तरह.... जैसे सारी आपाधापी थम जाएगी वहीं आकर।

समय नहीं गुज़रता और आखिरकार गुज़र ही जाता है। एक एक दिन उसके इंतज़ार में जीते जाना। क्या हम इंतज़ार में बूढ़े नहीं होते? मेरा इंतज़ार बूढ़ा हो रहा है अब। 

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