Thursday, October 29, 2015

विलंबित ताल



हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है।
आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है।
जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है।
बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है।
पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है।
कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है।
बारिश अपने बरसने में रूकी है। ऐसा लगता है कि पूरे शहर में इंतज़ार की बारिश है। सभी अपनी चाहत की दहलीज पर छाता ताने खड़े हैं। वह कभी आसमान देखता है तो कभी बाहर का मौसम। फिर अंदाजे लगाता है और साथ वाले इंतज़ारी को अपने अनुमान बताता है। मन में यह दृश्य भी रूक गया है कि कहीं उसका कोई मुलाकाती भी रूका होगा।
और इसी दृश्य का रूकना भी रूका हुआ है। प्ले बटन आंखों से ओझल है और पॉज रूका पड़ा है।
उम्र रूकी है। गणना करना रूक गया है। अच्छा-बुरा सोचना भी रूका है। नफे नुकसान का हिसाब लगाना भी बंद है।
रूक जाने की इच्छा गलत समय तो जरूर है मगर रूकने की यह चाहत बरसों से अंदर रूकी थी। मन वहीं रूका है जो पल अतीत में तेज़ी से चल रहा था। उनमें पंख लगे थे और जिसके रूक जाने के बारे में भी हम सोच नहीं पा रहे थे। 
कुछ लम्हें रूक गए हैं और उनमें जीने की चाहत अंदर रूकी पड़ी है। बस यही चल पड़ने की घड़ी है जो रूकना चाहता है।

Saturday, October 10, 2015

देख तो दिल कि जां से उठता है



देख तो दिल कि जां से उठता है
ये धुंआ कहां से उठता है

कई बारी यह लगता है कि जैसे दिल पिछली रात ही जला दी गई बस्ती है जहां अगली सुबह हम राख चुनने जाते हैं। यादें हैं कि मरती नहीं, अनवरत सताती है। और जो भूलने की कोशिश करो तो कोसी नदी के सैलाब की तरह दोबारा ज्यादा खतरनाक तरीके से लौटती है। और अगर याद करने बैठो तो उनके संग बॉटल में लगे मनी प्लांट की तरह कोने निकलने लगते हैं। सिरा से सिरा जुड़ने लगता है और लत्तर बनने लगता है। कौन सी कानी कहां जाएगी और जाकर किससे मिल जाएगी कहना मुश्किल है। 

हम अपने दिमाग की तरह कहानियों का उपयोग भी बदमुश्किल एक दो प्रतिशत ही कर पाते हैं। वजह - कहानियों के भीतर कहानी। कई सतहों पर कहानी। परत दर परत कहानी। चीज़ों को श्वेत और श्याम में अगर हम देखने का हुनर विकसित कर लेते हैं तो ज़रा सा ज्यादा महसूस करने की भावना हममें उन विषय वस्तु के प्रति सहानुभूति भी जगा जाती है। 

यह हमारे महसूस करने की ही ताकत है कि हम बिना मजनूं हुए मजनू का दर्द समझ सकते हैं, बिना जेबकतरा हुए जेब काटने वालों की मानसिकता समझ सकते हैं। इसलिए हमें जजमेंटल नहीं हुआ जाता है। हम अपने दायरे में रहते हुए भी रोमियो से कम प्रेम नहीं करते और रांझे जैसा ही विरह का दर्द समझते हैं। यही वजह है कि हम एक ठरकी आदमी द्वारा भी उसके खुद को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने भर से वो हमारे दिल पर असर कर जाता है।

तो मन जो है चक्कर लगाने का नाम है और दिल कन्फ्यूज होते रहने का। जिंदगी कहीं जाकर नहीं लगती कि अलां जगह जाकर यह अपने सर्वोत्तम रूप में होगी। यह ऊंचाई पर जाकर मरने वाली बात होती है।

आजकल आध्यात्मिकता भी बड़ी ज़ोर मारने लगी है मेरे अंदर। अब जैसे शंकराचार्य से सुनी कहानी बहुत हांट करती है कि दिन भी भर ज़मीन पर अपना आधिपत्य करने वाला आदमी जब शाम को मरा तो उसकी जरूरत सिर्फ उतने भर ज़मीन की हुई जितने पर उसने दम तोड़ा। इस तरह की कई और लड़ाईयां मेरे भीतर इन दिनों लगातार चल रही है। ऐसा नहीं है कि यह मुझे कन्फ्यूज कर रही है लेकिन ऐसा है यह मुझे तंग कर रही है। लगातार अपना ध्यान मेरी ओर खींच रही है। मैं समय से पहले बूढ़ा होने की ओर अग्रसर हूं। दोस्त कहते हैं मैं जवान हुआ ही नही। बचपन के बाद सीधे बुढ़ापा आ गया।

प्रेम भी बूढ़ों की तरह ही करने लगा हूं। हालांकि वासना के क्षणों में वह उबाल त्याग नहीं पाया हूं लेकिन बाकी सारे लक्षण, एक दूसरे के प्रति परिचय भरा समर्पण और शायद प्रेम से ऊपर की जो अवस्था और साथ होने भर की जो जरूरत होती है उसे महसूस करता हूं। आगत की प्रतीक्षा ने मुझे पत्थर बना दिया है। उम्मीदें जड़ हो चली हैं। ऐसा लगता है अगर निर्जीव चीज़ों को भी सहलाता रहा तो शायद वो जीवित हो उठेगी या ऐसा करते करते खुद मैं ही निर्जीव हो जाऊंगा। 

इधर पिछले महीनों से सुनने की आवृत्ति भी बढ़ गई लगती है। मधुर संगीत पसंद है लेकिन इस दुनिया में जो भी बेसुरा है वह कानों को अप्रिय लगता है। हर आवाज़ अपसे स्तर से ज्यादा बढ़कर मेरे कानों में आती है और मुझे वह टाइमलाइन पर किसी फटे हुए धब्बे की तरह, गाढ़े घर्षण के रूप में खुली दिखाई देती है। 

कुल मिलाकर अपनी हालत बरसात के दिनों में हवा से बचाए जाते सीमेंट की बोरी की तरह है जिसमें लाख कोशिशें के बाद भी हवा लग ही जा रही है और इसके बायस अब वो बोरी यहां वहां से जम रही है। कहीं से फट कर कभी बुरादे की तरह उड़ता हूं तो कहीं वे आपस में मिलकर मोटे मोटे गांठ में बदल रहे हैं। कहीं से वे चखने पर मिट्टी का सौंधा स्वाद लिए हुए है तो कहीं कहीं वह कंकड़ की तरह सख्त और बेस्वाद हो गया है।

Tuesday, October 6, 2015

हिसाब



आखिर क्या जोड़ता है हमें। हमारे अंदर का खालीपन। या एक दूसरे के अंदर जब्त दर्द को हम कुरेद देते हैं। ऐसे तो कोई हर्ट नहीं करता जैसे तुम मुझे कर देती हो। ऐसे तो कोई नहीं छूता जिससे मैं तुम्हारी राह में बिछ बिछ जाता हूं। ऐसे तो कोई इस्तेमाल नहीं करता कि इस्तेमाल होते वक्त तो तकलीफ होती है और तुम बेहद थकाती भी हो लेकिन उसके बाद यह सोच कर अच्छा लगता है कि मुझे तुम्हारे द्वारा ही इस्तेमाल होना है और तुम ही मुझे इस्तेमाल के दौरान सबसे अच्छा एक्सप्लोर कर पाती हो। 

कभी कभी ऐसा लगता है जैसे किसी लंबी यात्रा पर जाने वाला हूं। या बिछड़ने वाला हूं तुमसे। या हमारे बीच कल को एक बेहद लंबी चुप्पी पसर जाएगी। कि हम एक दूसरे से बोलना बंद कर देंगे लेकिन एक दूसरे से हमारी उम्मीदें खत्म नहीं होंगी। लेकिन ये उम्मीदें हैं भी तो कैसी... एक दूसरे को याद करने की, मेरे लिखने की, तुम्हारी आवाज़ सुनने की, साथ समय बिताने की, जाने क्या क्या आपस में बातें करने की.... तुम्हें देख लेने की.... तुम्हारे लिए रोने की, तुम्हीं से हर्ट होने की.... 

कई बारी लगता है तुम किसी अजाने देस के अंचल में गाई जाने वाली लोकगीत हो जिसकी धुन मुझे खिंच गई लेकिन मैं उसे समझ नहीं पाया। उसका अर्थ मुझे नहीं पता। मैं कहां कुम्हार का बेटा जो नौसिखिया है और तुमएक पका हुआ मटका जो टिमक टिमक कर बजता है लेकिन कोई तो रिश्ता है ही हमारे बीच। तुम्हें बरतने का हुनर मुझमें नहीं। एक एक अनकही चाहत तो है। चाहत की एक अदृश्य डोर तो है। जो बातें मेरे द्वारा कही गई है। और वो तेरे दिल में वैसे का वैसा उतर गया है वह और कहां से आएगा। इसके ठीक उलट मैं भी कहां से वैसी कोई दूसरा खोज सकूंगा जो लगभग तोड़ ही दे और फिर हौले हौले उस पर अपने होठों से बोसे दे। वो नर्म नर्म इलाज कहां मिलेगा मुझे। 

समझदार उम्र के चाहत की अपनी बेबसी होती है। एक दूसरे के उम्र में हम बाधक नहीं बनना चाहते। एक दूसरे के साथ रह नहीं सकते। एक दूसरे के बिना भी नहीं रह सकते। अय्याशी और धोखा हमसे हो नहीं पाता। दिल की बात किसी से कह नहीं पाते। दुनिया को जजमेंटल होने से फुर्सत नहीं। कुलमिला कर दिल ही में एक बाज़ार खुल जाता है और हम मूक होकर तमाशा देखते रहते हैं। हम खुद अपने आप पर हंसते हैं, रोते हैं, किलसते हैं और अपनी ख्वाहिशों पर अंगारे डालते हैं। 

आखिर क्यों नहीं कुछ और जगह ले पाता तुम्हारी? एक बार तुम्हें देख लेने के बाद हमें जाने किस सकून की राह दिख गई थी। एक बार तुम्हारा स्पर्श होने के बाद कौन सी छुअन ऐसी जागी कि कहीं भी करार नहीं आता। एक बार तुम्हारी देह गंध मिल जाने पर कौन सी आदिम प्यास जग गई कि हम पढे लिखे और विवेकवान होकर भी प्रेम में एक जंगली बैल की तरह हो जाते हैं।

तुम एक सांस हो। जीवनदायिनी। लेकिन तुम्हीं बेसांस भी करती हो। हर निकलते सांस के साथ लगता है जैसे अंदर फंसकर टूटा हुआ कांटा निकल गया हो। हम उम्र के साथ और भारी होते जाते हैं। अपने इन तकलीफों को कहां रख आएं हम कि जब जब लगता है अब जीना आ गया या अब हमने खुद पर काबू पाना सीख लिया कि तभी वो सैलाब दूगनी तेज़ी से हमारे ऊपर कहर बनकर टूटता है। बताओ रानीजान, ऐसा क्यों होता है कि कठघरे में हर बार हम अकेले ही नज़र आते हैं? कि हम हिसाब देते देते बेहिसाब हो जाते हैं तब भी हिसाब देने को हमें उतारा जाता है।

Friday, October 2, 2015

प्रति-शोध



ऐसा लगा कि तुमने सरे बाज़ार मेरे जवान और कोमल सीने से दुपट्टा उड़ा दिया। उसी सीने का ख्याल कर तुम किसी अंतरंग पल मुझसे कहते थे कि तुम्हारा यह छुपा हुआ सीना मुझे शरीर बनाता है। आज सबके सामने जो तुमने यूं उघाड़ा तो मैं एक ही पल में जीते जी मर गई। लगा किसी ने तीन सेल वाली टार्च की बत्ती आंखों में ही जला दी। अंधी हो गई अपमान और शर्म के मारे। 

मेरा कंधा झूठा होकर सिकुड़ गया था। एक स्त्रीसुलभ परदा। निर्लज्जता से लोहा लेती लाज। ऐसी लाज जो हारती नहीं बस बेबस महसूस करती है कि तुमने बराबरी से युद्ध नहीं किया। तुमने युद्ध के नियम तोड़े। दरअसल तुम्हें अपनी तय हार की जानकारी थी। तुम्हें पता था कि तुम देर तक टिक नहीं सकोगे। ऐसे में अपने मरदानेपन के खोखले अहंकार में चूर होकर तुम ऐसे चाल चलकर स्वयं को विजेता समझते हो। हर बार स्तंभन को तैयार तुम्हारा लिंग तुम्हें मदांध करता है।

लेकिन,
मैं पुर्ननवा हूं हर पल नई हो जाने वाली। चार ही दिन बाद जब मुझे किसी महफिल या जलसे में देखोगे तो तुम्हारे अंदर पलने वाली व्यस्नी मछली तड़प उठेगी। फिर वैसी ही हूक उठेगी। यह देखकर और तिल मिल मरोगी कि आज दुनिया जिसके लिए आहें भर रही है उसी को तुमने नीलाम किया था। फिर पहले से भी ज्यादा जंगली और वहशी होकर मेरा ख्याल करोगे। और पछताआगे कि साली के साथ अलां अलां काम नहीं किया था अबकी हाथ लगे ये सारे काम ऐसे ऐसे करूंगा। मैं नहीं जाऊंगी बदला लेने न ही किसी को भड़काऊंगी। तेरा अपना अवसाद ही मारेगा तुझे। बूंद बूंद भभकते तेज़ाब गिरती रहेगी तुझ पर।

Thursday, October 1, 2015

प्रतीक्षा



जीवन जीते जीते हम कितनी चीज़ों से मोह लगा बैठते हैं। ख्वाहिशें हैं कि कभी खत्म नही होती। हर मुहाने पर जाकर सोचते हैं कि काश थोड़ा और होता... कभी किसी रिश्ते में... कभी कोई मीठा सा लम्हा.... वक्त है कि ऐसे पलों पर भागा जाता है और रेशम पर रेशम की तरह फिसलता जाता है। हम यह सोचते हैं कि ज़रा और चलता। 
हमारा दिल भी अजीब होता है। हम किसी न किसी मोड़ पर किसी न किसी को चांस देते हैं। कभी घटनाओं के दोहराव में तो कभी अनुभव के लिए तो कभी एक उम्मीद में जो हमारी आत्मा में रोशन राह भर दे। आत्महत्या करने के कई मौके आते हैं और अगर अभागे न हुए तो कोई दिलबर हमें फिर से मिलता है। हम खुद को प्यार के मौके भी देते हैं। कुछ कम देते हैं और मेरे जैसा आदमी ज्यादा देता है। दिल कभी नहीं भरता। यह शाश्वत भूखा और प्यासा है। हर वक्त थोड़ा और मोहलत मांगते हम न जाने कितनी ही घटनाओं, संबंधों, दृश्यों से अपना दिल जुड़ा लेते हैं और यह मोह हमारे लिए परेशानी का सबब बन जाता है।

मैं यह क्यों लिख रहा हूं पता नहीं। मन में किसी स्तर पर शायद चल रही है यह बात इसलिए लिख रहा हूं। इसकी शुरूआत क्या है, क्यों है, और इसकी अगली कड़ी क्या है नहीं जानता। मैं कामना में डूबा एक भोगी आदमी हूं जो अपनी वासनाओं में ही लिप्त रहता है। भला मेरा इस तरह से सोचने का क्या मतलब। मैं क्यों अपने ट्रैक से हटकर सोच बैठा। मेरी चाहतें, कामनाएं, वासनाएं तो चिरयुवा हैं। वह इतनी पिपासु हैं कि कभी शांत नहीं होती और वह अपने दोहराव और घेरे में ही घूमती रहने के बावजूद नहीं थकती। 

क्या मैं बूढ़ा हो रहा हूं। या मैं थकने लगा हूं। क्या मेरी ऊर्जा जाती रही है। उम्रदराज़ लोग मुझे शुरू से आकर्षित करते रहे हैं कहीं यह चाहत ही तो मुझे ऐसा नहीं बना रही। या कुछ चीज़ों की प्रतीक्षा ने कहीं मेरी आंखों को पथरा तो नहीं दिया। मेरी सूनी आंखें आखिर किसकी प्रतीक्षा करती है। क्यों सारी जानकारी होने के बाद भी हम जीने के स्तर पर सामान्यों जैसा जीते हैं। 

किसी से खुलकर बात न कर पाना तो कहीं इस तरह के उलझनों का कारण तो नहीं है।

जूते का सोल है जीवन। घिसा जा रहा है। हम जूते की तरह सर्वाइव कर रहे हैं। 

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