Thursday, December 31, 2015

झूलते हुए रस्सी में मरोड़ बनी रहती थी, पकड़ थी कि ढीली पड़ जाती थी।



एहसास में बने रहने का नाम जिंदगी है वरना तुम पत्थर हो। गलतियां करो, और पछताने से ज्यादा रोया करो। उस शाम जब तुमने जब ये कहा था झील में किसी ने पत्थर फेंका था, कुछ पानी दो गुच्छे ‘टुभुक’ की आवाज़ के साथ उछले थे। बात सच्ची थी। मुझे अब भी याद है। दिन भर की हंसी मजाक के बाद यह पहली गंभीर बात तुमने कही थी जो तुम्हारे हिसाब से दिन का पहला मजाक था। तुम्हारे मंुह से जब भी इस तरह की बात निकलती थी, तुम हथेली से मुंह दाब कर बेतहाशा हंसती थी। अचानक से तुम्हारे ऐसा बोलने के बाद भी तुम आदतन हंस हंस कर दोहरी होने लगी थी।

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं एक जो लम्हे को जी कर आगे बढ़ जाते हैं, उन लोगों के लिए जो इसे अपने मन में टांक लेंगे। दूसरे टाइप के लोग पहले में ही आ गए। 

तुमने यह बात जब मुझसे कही थी तो मेरे दामन से उम्मीद का आखिरी सिरा भी छूट रहा था। मैंने भी आदतन तुम्हारी इस बात को नहीं माना। इस मामले में भी दो तरह के लोग होते हैं। एक समझाने मात्र से समझ जाने वाले। और दूसरा टाइप वाले में मैं हूं - मुझे ठोकर खाने, खाते जाने, चीज़ों को उसके हाल पर छोड़ देने और अगर हो पाया तो समय हाथ से निकलने के बाद खुद ही सुधरने की आदत है। लोगों का सब्र चूक सकता है मुझे समझाते समझाते। 

मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहता लेकिन मेरे अंदर का अंधेरा खत्म नहीं हो रहा है। सवालों के जवाब तरतीब से नहीं मिल रहे। किसी से वाजिब तरीके से प्रश्न भी नहीं पूछ पा रहा हूं। कभी कभी कुछ उठता है और अपने ही अंदर लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। मैं न चाहते हुए भी अपने रास्ते में खुद भी दीवार बन गया हूं। चश्मा धंुधला पड़ गया है मेरा। अजीब बात है ऐसे इलाके में हूं जहां रोज़ 4 वक्त अजान सुनता हूं। लेकिन इनर कॉलिंग नहीं आ रही है। 

मैंने देख लिया और कहीं मेरी तृप्ति नहीं है। और टूटे फूटे ढंग से ही सही यही काम मैं थोड़े मन से कर पाता हूं। मेरे जिंदा रहने के लिए लिखना बहुत जरूरी है। लिखना मेरे लिए अच्छा है। यही मेरा मुक्ति मार्ग है।
मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाला साल मुझसे मेहनत करवाएगा, विज़न साफ होगा और मैं लिख सकूंगा। 

Sunday, December 27, 2015

लोग क्यों मरते हैं

बाबा लोग मरते कैसे हैं? क्या किसी प्रतीक्षा में? चमत्कार के? आत्मीय मिलन के? किसी से कुछ कहने के? कैसे मरते हैं?
क्यों देखने में ऐसा लगता है कि वो एक एक दिन के साथ पक रहे हैं। उनकी आंखों पर जैसे एक मसनुई सी चमक की परत चढ़ी जाती है। क्यों वे अपने हृदय की गहराई से हमें कॉल तो करते हैं लेकिन हम उन्हें सुन कर भी अनसुना कर जाते हैं। ऐसा नहीं है कई बार लोगों की पुकार जिसे हम सच्ची पुकार कह सकते हैं, सुनाई दी है। ऐसा क्यों होता है कि आड़े वक्त हम प्रमादवश किसी दो कौड़ी के क्षणिक रिश्ते, किसी भौतिक वस्तु की लालच में उस व्यक्ति को सरासर नज़रअंदाज कर जाते हैं जिन्हें हमें कभी किसी खाई से सरपट बाहों में भरकर उठा लिया था। यह खाई कैसी जानलेवा खाई थी न। जानलेवा शब्द गलत है यहां लेकिन एक पूरे समूचे संभावनाशील चीजों का चले जाना कितना त्रासद है न! जो हमारी आत्मा को बचा लेते हैं और वापस से हमें सुरक्षित हमारे ही हाथों में सौंप देते हैं हम कैसे उससे विमुख हो जाते हैं। क्या हमें पता होता है कि जीवन दर्शन में वो हमारा पिता है और हमे अउस पिता के सामने अपने छुटपने का अहसास होता है। कई बार नज़र चुराने की क्रिया की शुरूआत आत्मज्ञान से ही उपजती है।
हम भूल जाते हैं कि हम खुले चबूतरे पर घायल, कराहते कबूतर थे जिसे सामान्य पक्षी भी डेग डेग भरकर अपने चोंच से और लहूलुहान कर रहा था, उसने सिद्धार्थ की तरह हमें उठाया, मरहम पट्टी की और सुरम्य वातावरण की कोमल हथेलियों में, नीले नभ में उन्मुक्त उड़ने को छोड़ दिया।
ये ठीक होते ही हमें हमारे पंजों और पंखों पर इतना आत्मविश्वास कहां से आ जाता है बाबा कि हमारा एक ही क्षण में रूपांतरण हो जाता है।
समाज में हर सहारा देने वालों का यही गत क्यों है? क्या यह एहसासबोध और ग्लानि ही हमें मारती है। या हमारी हर जीत हमें थोड़ा और पुख्ता बनाने के साथ साथ हमें अंदर से और खोखला भी करती है। क्या हम यहां सचमुच अपनी श्रेष्ठता साबित करने, अपनी महत्वकांक्षा को पोषित करने ही आए थे। क्या हर जीत हमारे अहं को चारा देने का काम करती है।
आज मैं गीता के कई उद्धरणों से खुद को जोड़ पा रहा हूं जैसे एक क्षण में मैं करोड़ों का स्वामी हो जाता हूं और अगले ही पल दरिद्र।
हम कैसे होते जा रहे हैं कि न किसी से खुल कर लड़ पाते हैं, न किसी से खुल कर कह पाते हैं? हमें ठीक से पोषित और शोषित होना भी नहीं आता।
क्या किसी से बात न कर पाने की वजह से भी हम मरते जाते हैं बाबा? मरना एक दिन की तो बात नहीं होती। और मरने के प्रकार भी अलग अलग होते हैं। हम एकजुट होकर तो सांस के रूकने पर ही मरते हैं लेकिन टुकड़ों टुकड़ों में दिन में कई बार, लम्हों में बहुत बार मरते हैं। लेकिन हमें इतना नाजुक नहीं होना चाहिए और मरने के सही कारणों की पड़ताल करनी चाहिए।

Thursday, December 17, 2015

हमारे साथ रहो, न रहो।




कोई बेचैनी का परदा है जो रह रह कर हिल जाता है। खिड़की के उस पार से हवा की हिलोर उठ ही जाती है। धूल धक्कड़ से कमरा भर जाता है। इसे अपने हाल पर छोड़ दो तो हर सामान पर परत चढ़ जाती है। फिर इनके बीच से कोई सामान उठाना ऐसा लगता है हीरे की दुकान से पेंडेंट उठा रहे हों। इसी में से एक है तुम्हारी हेयर क्लिप। शार्क मछली की तरह खूंखार तरीके से दांत फाड़े हुए। अभी जिस एंगल से यह देख रहा हूं एक रूद्रवीणा रखी लगती है। ठहर गया हूं इसे देखकर। समय जैसे फ्रीज हो गया है। वक्त की सारंगी जैसे किसी नौसिखिए से एक पूरी पर अकेली तार पर अनजाने में ही बज गई हो और वह धुन दिल की टीस का तर्जुमा हो। वो धुन फिर नहीं लौटता। जानता हूं कि तुम भी दोबारा नहीं लौटोगी। दोबारा कुछ नहीं लौटता। हम फोटोकॉपी करने की कोशिश करते हैं, अपना प्रयास करते हैं और हू ब हू वैसा हो फिर से होने की कामना करते हैं। लेकिन दोबारा से वह करते हुए थोड़ा समझदार हो जाते हैं, नादानी जाती होती है। तुमने कैसा उजास भरा है मेरे अंतस में! एक समानांतर दुनिया ही खोज दी जहां हर अमूर्त वस्तु प्राणवान है। हर स्थूल चीज़ें चलती फिरती शय है। ऐसा लगता है जैसे खजाना पास ही है। एक अदृश्य सोता अब दिख ही जाने वाला है। उसकी आवाज़ दृश्य है। यहां हमारे पैरों की चर्र-पर्र की आवाज़ भी शोर लगता है। यहां हर कल्पना सच है। यहां हर सच जो अब तक मानते हुए आए हैं, एक सरासर झूठ है। मैं नहीं जानता कि इस रिश्ते का नाम क्या है। जो एक शब्द तुम्हारे मन में उपज रहा होगा वह इंसानी और साहित्यिक जगत का सबसे ज्यादा मिसकोट और मिस्यूज करने वाला संदर्भ बन गया। हमने उसकी गरिमा नष्ट कर दी है और उसे बेहद हल्का बना दिया है। हमने धरती, हवा, पानी सब दूषित किया, इसे भी। हम इसका नाम नहीं लेंगे।

 

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