Skip to main content

Posts

बुखार के दिन

बुखार के यही दिन थे। उस पल दोनों कमज़ोर हो गए थे। भूल गए थे अपने होने के पीछे का वजूद। अपनी निम्नवर्गीय परिवार पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर रवि का भाईयों में सबसे बड़ा होना और उधर हुस्ना पर मर्यादा की मार। तुर्रा ये दोनों एक परिपक्व प्रेम के बारे में साहित्य में पढ़ रहे थे। होनहार थे तो जाहिर है पढ़कर सिहरते भी और रोते भी। लेकिन उस वक्त शायद एक रंग में रंग गए थे। एक के ख्याल दूसरे को अपने लगने लगे थे । यहां सोचने समझने की ऐसी परत तैयार हो गयी थी कि दोनों अलग-अलग हैं ही नहीं। बुखार से तपते रवि ने पागलों जैसे ढ़ेर सारी बातें करने के बाद हुस्ना के गले पर अपनी तपती छाप क्या छोड़ी। हुस्ना पिघलती गई। दोनों को खुद से ही प्यार होने लगा था और वो अपनी ही परछाई में छुप जाना चाहते थे। छिप जाना चाहते थे मानों ठण्ड में बारिश हुई हो और गली का कुत्ता थोड़ा सा भींग कर किसी छज्जे के बित्ते भर खोदी गई जगह में दुबक रहा हो। हुस्ना और रवि में तब फर्क करना मुश्किल हो चला था। रवि ने अपना थोड़ा सा बुखार हुस्ना को दे दिया था। उधर हुस्ना के मन में बाज़ार का गीत गूंज रहा था - आओ अच्छी तरह से कर लो प्यार, कि निकल ...

दूसरा सिरा कहाँ है !!!

राजू और पिंकी एक नदी के मुहाने पर खड़े हैं जहां से नदी करवट लेती है मतलब कि एक बड़ी घुमावदार मोड़ लेती है। नदी अब तक अपने साथ लाई हुई सारी मिट्टी यहीं छोड़कर आगे दरिया में मिल जाती है। इस कारण यहां डेल्टा बना हुआ है। नदी के इस फितरत को दार्शनिक अन्दाज से पिंकी निहार रही है। विशाल जलराशि गाद में गिर रही है। पानी ऐसे शोर मचा रही है मानो कोई महागाथा गा रही हो और उसके मुहाने पर खड़ी पिंकी के चेहरे पर कई भाव हैं एक ही पल में जैसे वह उफनते दरिया की हैसियत भी नाप रही है और दूसरे पल प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश भी कर रही है। सम्भव है वो इसे जीवन से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हो। राजू आदतन पानी में बड़े-बड़े पत्थर मार रहा है । हवा तेज बह रही है। इसके कारण दोनों के बाल हवा में उड़ रहे हैं। एक दूसरे को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ रहा है। वो मौन है मगर राजू उसकी चुप्पी अपने बड़बोलेपन से बार-बार तोड़ रहा है । राजू और पिंकी एक दूसरे से दस कदम के फासले पर समानान्तर खड़े हैं. राजू : (जोर से) तुम भी दरिया में पत्थर फेंको। (पिंकी नहीं सुनती) राजू : (और जोर से) पिंकी, उठाओ पत्थर पिंकी : (जै...

चांदी के चमचे से चटनी चटायी

स्टेज सज-धज कर तैयार है। उस पर नीली-पीली लाल गुलाबी हर रंग की लाइटें पड़ रहीं हैं। प्रोग्राम शुरू होता है, एंकर अजीब सी शक्लो सूरत लिए और विचित्र सा पहनावा लिए अवतरित होता है। अपने आवाज़ में जोश भरने की कोिशश करते हुए वो गायकों से परिचय करवाता है। सामने न्यायाधीश बैठे हुए हैं हर गुरू के अपने चेले-चपाटी हैं। चेला आता है जी भर चिल्लाता है अर्थात् गाता है सभी गुरू सिरियस मूड में बैठे हैं जैसे अलग अलग खिड़की से उसे जांच रहे हों। चेले ने बड़े ध्यान से गाना चुना है वो जिसमें वो सबसे बेहतरीन नकल उतारता है। वो गाना जिसे सुनकर उसे घर वाले और यार दोस्त डिट्टो ओरिजनल गायक जैसा बताते हैं। चेला अंतिम सांस तक अपना बेस्ट देता है बीच-बीच में लड़कियों को प्रोपोज भी कर देता है और शुभचिंतकों को सांत्वना देता रहता है। पब्लिक मदहोश है वो हाथ हिलाते रहते हैं, चिल्लाते हैं, उन्होंने आज से पहले वैसा गाना नहीं सुना था ये भरम हर गाने पर होता है... चेला यह जान गया है कि वो जमाना गया जब शो जीतने के लिए क्लासिकल गाना पड़ता था जो जितना धा-धा- धिन्ना और मन्ना डे की तरह लागा चुनरी में दाग गा सकेगा वो विजेता होगा। गुर...

???...

सांसों के फनगट में, दुनिया के जमघट में, ये कौन सा राग-विहाग है। दो है चार है, साला चमाड़ है। उमड़ता जज्बात है, उगलता आग है। कैसा पक्षपात है! उमड़ता है, घुमड़ता है, बरसता है, और तौबा फिर भी यही ग़म के बैठा है कि साला ठीक से नहीं बरसा। वरना ये कील कहां चुभता रहता! कुछो बाकी रह गया है। दिन है तो रातो होगा, दु सौ सवालो होगा। ये जो रस्ता है, पता नहीं कैसा बस्ता है, सब कुछ कूल है फिर भी शुल है, जीवन है कि भूल है। सांसा आधा अंदर है उफनता समंदर है। भुल है, भुलैया है, जिंदगी की गलियां है। वक्त का पहिया है, बेलौस बहैया है। भेड़ बनाकर हांकता है। कमीने मुंह किसका ताकता है। भगाने पर भी नहीं भागता है। क्या कोई कपड़े रखवा लिया है ! देखो तो कैसा आग है। अबे आग है कि झाग है। जिलेबी रस्ता है, मीठा है, छोटा है। इन सब को ढ़ोता है। अयाल है-ख्याल है फैला जंजाल है, बोलना बवाल है तो जीना मुहाल है, चंद सवाल है पर कितना बदहाल है ! होता भी हूं, रोता भी हूं, करता भी हूं, मरता भी हूं। आदत नहीं बनती, सांस नहीं थमती। बिचार है कि सदी के गर्म कपड़े जैसा दोपहर में यहां-वहां उतारा हुआ है ! सबके साथ दिन काटा जा सकता है। प...

Say-ओए-होए, होह-होए

1 बाहर/दिन/यूनिवर्सिटी का मैदान कलाई पूरी तरह से घुमती है। घुटने को नीचे झुकाकर बल्लेबाज बाहर जाती हुई गेंद को स्वाक्यर कट लगाता है। विकेटकीपर सूने ग्ल्बस् को अपनी पेट की ओर खींचता है। दोनों पैर हवा में हैं और निगाहें घास पर फिसलती गेंद पर जो सीमा रेखा के बाहर जा रही है - चार रन। इस तरह, बल्ले का संपर्क छूटते ही गेंद मैदान पकड़ती और एक पर एक क्लासिकल किताबी चौका लगता जाता। `अमित का ऑफ साइड बहुत मजबूत है` अहाते से सनग्लासेज लगाए आती-जाती लड़कियां मुस्कान फेंकती है और मुलायम ताली बजाती हैं जिससे ताली की आवाज नहीं आती लेकिन वो उत्साहवर्धन और `बेटा तू लिस्ट में है` का भ्रम देती है। प्रत्युत्तर में बल्लेबाज भी पसीना पोंछने के बहाने हेलमेट उतारता है और मुस्कान बिखेरता है। मैदान के सारे क्षेत्ररक्षक पलटकर गैलरी की तरफ देखते हैं और ओवरकांफिडेट होकर अपना कॉलर चढ़ाते हुए अगली गेंद पर जान की जानी लगा देने वाली फििल्डंग का जज्बा लिए बल्लेबाज की तरफ बढ़ते हैं। उधर गेंदबाज़ अजीत अगरकर की तरह अगली गेंद फेंकने के लिए अपनी सांसें बटोर रहा है। बल्लेबाज फिर हेलमेट लगाता है, बल्ला हवा में घुमाता ...

सायलेंस..... एक्शन

"ऐसा क्यों होता है कि कभी मन कुछ नहीं करने का करता है, जिस चीज़ का इंतज़ार बरसों के करते रहते है वो मिल जाने पर उतनी ख़ुशी नहीं रहती?.. ऐसा क्यों होता है की कभी- कभी हर चीज़ से उब जाते है हम... बेवज़ह की थकन क्यों रहती है... मन बहलाने घर से निकलो तो क्यों सर दर्द वापस लिए लौटते हैं... क्यों ऐसा होता है की कोई कितना भी उकसाए उठकर चलने का हौसला नहीं होता... क्यों लगता है कभी-कभी की जो है वो बीता जा रहा है और उसका मुझे कोई मलाल नहीं है," ... अंजू यह दार्शनिकता भरी बात शून्य में निर्विकार, अपलक देखते कहती है... "तुमने कभी किसी को बर्बाद होते देखा है ? मैं खामोश हूँ... "जानते हो! मैं जिंदगी में अच्छा कर सकती थी पर एक मोड़ पर मैंने ऐसा महसूस किया जितना बेहतर मैं बर्बाद हो सकती हूँ शायद बन नहीं सकती... तुम जिंदगी के ऐसे ही मोड़ पर मिले; जहाँ मैंने तुम्हारा साथ सिर्फ इसलिए पड़का क्योंकि तुम बिछड़ने वालों के कतार में सबसे अव्वल नज़र आते हो..." " बह जाने दो ना यह दुनिया, भाड़ में जाए, एक पल में यह झंझट ख़तम... जिसे यह इत्मीन...

डायरेक्टरर्स कट

/सीन-१/ सुनेहरा मौसम/दिन ब्लैक एंड व्हाइट शेड में आपकी गर्लफ्रेंड फरों वाला ओवरकोट पहने हुए है... गले में स्कार्फ, और घुटनों तक का बूट, उसके हाथ में आपके उधार के पैसों के लिया ऑर्किड का गुलदस्ता है.. क्योंकि उसे पसंद है... वो चार महीने बाद आपसे मिलने स्टेशन पर आ रही है... सिर्फ २० मिनट का वक़्त है, उस ट्रेन के उस स्टेशन विशेष पर रुकने का... आपने कई रातें जग कर, हर भावना में डूब कर, कभी पहाड़ पर, तो कभी साहिल पर बैठकर, कभी जगती आँखों से कोई सपना देखते हुए उसे हर मूड में कई लव लेटर्स लिक्खे हैं... इसमें से कई मीर के शेर है तो कुछ चुराए हुए दोस्तों के मोबाइल से फॉरवर्ड किया हुआ एस. एम. एस., अगर गर्लफ्रेंड कुछ ज्यादा हाई-टेक है तो आर्चीज़ के दूकान के शाम के रंगीन साये में एक दुसरे पर झुकते कपल्स के धुंधले चेहरे के बैकग्रऔंद में कुछ अंग्रेजी कोटेशन्स, आप चेप देते हैं... क्योंकि आपने तो सिर्फ प्यार किया! ऐसे उच्च ख्याल कहाँ आये आपने दिमाग में? ... हाँ कॉपीराइट आप ज़रूर लेते है , वाजिब भी है अपना पढाई छोड़ कर, अपना काम छोड़ कर, बायोलोजी के प्रैक्टिकल एक्साम के...