Saturday, February 27, 2010

गंगा-जमुनी सभ्यता


सोहर क्या था - अलहा मियां हमरे भैया का दियो नन्दलाल। ऐ मेरे अल्लाह! मेरे भाई को भगवान कृश्ण जैसा बेटा दे। अब ये मुसलमान घराने का गाना है।

-आनन्द भवजे मील बैंठी... आरे लगाये मनावै -


हजरत बीबी कह रही हैं कि अली साहब नहीं आये हैं। सुगरा तोते से कह रही हैं और अगर वो कहीं न मिले, ढूंढने जाओ कहीं न मिलें तो वृन्दावन चले जाना।

``है सबमें मची होली अब तुम भी ये चर्चा लो।

रखवाओ अबीर ए जां और मय को भी मंगवा लो।

हम हाथ में लोटा लें तुम हाथ में लोटिया लो।

हम तुमको भिगों डालें तुम हमको भिंगो डालो।

होली में यही धूमें लगती हैं बहुत फलियां।

है तर्ज जो होली की उस तर्ज हंसो बोलो।

जो छेड़ है इस रूत की अब तुम भी वही छेड़ो।

हम डालें गुलाल ऐ जां तुम रंग इधर छिड़को

हम बोलें अहा हो हो तुम बोलो ओहो ओ हो``

मौलाना हसरत मोहानी वो हैं शायर उर्दू के गजल गो शोहवा में जिनके अहमियत बहुत ज्यादा है यानी इकबाल के बाद जिन लोगों ने गजलें वगैरह लिखी हैं, गजलें लिखीं हैं शायरी की है उनमें बहुत अहम नाम है मौलाना हसरत मोहानी का। एक नया रंग, गलल में दिया है मौलाना ने। तो एक शायर की हैसियत से उनका रूतबा बहुत बदन है। मजहबी आदमी थे नवाज रोजे के पाबन्द, का दरीया सिलसिले के मुरीद लेकिन ये ईमान था उनका कि किसी के मजहब को न बुरा कहना न ये समझना कि वो बुरा है। अपना मजहब अपने साथ दूसरा मजहब उनके साथ। सिर्फ यही नहीं बल्कि जितने और रिचुअलस् थे मसलन ये कि हज करने को हर साल जाया करते थे। ये खुसुसियत ये थी कि मौलाना में ये कि वो कृश्ण जी को नबी समझते थे और बड़े मौतकीत थे और अपना हज कहते थे मेरे हज मुकम्मल नहीं होता जब तक कि मैं वापस आ के मथुरा और वृन्दावन में सलाम न करूं। तो वहां से आ के पहले पहुंचते थे मथुरा फिर वृन्दावन वहां सलाम करते थे और फिर बेइन्तहा कतरात और रूबाइयां कृश्ण जी के बारे में उनके मौजूद हैं।

-गोकुल ढ़ूंढ़यो, वृन्दावन ढ़ूंढ़यो... कन्हाई मन तोशे प्रीत लगाई।

किसी को ये नहीं मालूम है कि इब्राहिम आदिल शाह जो कि राजा है बीजापुर का उसने एक किताब लिखी किताब-ए-नवरस उसका बिवाचा वो शुरू होती है सरस्वती वन्दना से। अब लोग ये भूल जाते हैं कि कल्चर और मजहब दो अलग चीजें हैं लेकिन कल्चर मजहब से पैदा होता है। मजहब का कल्चर पर असर होता है। कलचर का मजहब पे असर होता है।

पण्डित रतन नाथ शरशार। 20वीं सदी के बेहतरीन शायर। रघुपति सहाय, फिराक गोरखपुरी। तो लोग समझते हैं उर्दू मुसलमानों की ज़बान है। ऐसा है नहीं। बेपनाह हिन्दू शायरों का कॉन्ट्रीबीयूशन है।
``कहती थी बानो इलाही हो मेरे वारिस की खैर,
क्यों गिरी जाती है मेरे सर से चादर बार-बार।``


ये पूरी एक बिलीफ ये थी कि हर मजहब एक कल्चर एक्जूट करता है। चाहे वो आपका मजहब हो और चाहे वो मेरा। और उस कल्चर से हम सब फैज़ियाब होते हैं। चाहे वो आप हिन्दू का कल्चर हो चाहे मेरे मुसलमान का कल्चर हो। आखिर में दोनों में जाके एक मिलन होता है जिसको कि हम एक कम्पोजिट कल्चर कहते हैं।

फय्याज खां वो शायर है जो कि जो इस तरह सूरत के उपर इससे अच्छा किसी ने लिखा नहीं, अहमदाबाद के बारे में उससे खूबसूरत नज्में किसी ने लिखी ही नहीं और शायर कहता है-

``कूचा-ए-यार ऐन काशी है``, मेरे यार का कूचा जो है वो काशी जैसी पवित्र नगरी जैसा है।

``कूचा-ए-यार ऐन काशी है,
जोगिया दिल, वहां का बासी है``।

Tuesday, February 23, 2010

जुगनू



वो मुझसे मिली ना थी पर उसे खो देने का डर मुसलसल बना हुआ था.... वो रास्ता चलते किसी किताब में जिल्द की जगह आइना लगी मिली थी... गाहे बगाहे मैं जिसे पढ़ने के बाद आपका अक्स देख लिया करता था, सर पर धूप थी और इन दिनों पेड़ों के झुरमुट से थोड़ी थोड़ी छांह भी लग जाती थी...


"जरा सी फिकर भी तुम्हारे चेहरे को बिगाड़ देते हैं, देखो जरा मैथ के रफ का पन्ना लग रहे हो...

हाँ तो ठीक ही तो है, तुम्हारी हथेली भी तो ऐसी ही है...ढेर सारी आरी तिरछी लाइनें

पर यह चेहरा नहीं है बेवकूफ

क्या सच में ?

मेरे वजूद में बिना दस्तक कई चीजें आती हैं... और आती क्या हैं फिर डेरा जमा लेती हैं... मैं जबरदस्ती जब भी तुम्हारी कल्पना करता हूँ कोशिश करता हूँ कि तुम्हारे जुल्फों के पार देख सकूँ... पर उस पार कितना अँधेरा है...

... तुमसे परे जो है.

सीढियों पर जब भी उसे अपने आगोश में लेने के लिए बाहों से घेरा डालता, पता नहीं क्यों, हर बार उसे यही लगा जैसे अब चूमने ही वाला हूँ... मैं चाहता था वो मेरी आँखों में देखे और वो चाहती थी उसके होंठों के दरारों से बातें करूँ... मैं जब भी उसके बिना जीने की सोचता तब भी वो पहले शामिल हो जाती.

आसमानी रंग आँखों का धोखा ही तो होता है .

पिछली बार इसी रंग में मुझे उजली धारियां दिखी थी. लंबे लंबे, दूर तक ....बहोत दूर तक... जैसे सुखोई या मिग -२१ धुंआ छोड़ता निकल गया हो.

इन दिनों जब मुझे मुहब्बत एक वाहियात सा फुर्सत में निपटाया गया काम लगता है... चलते हुए मैं अपनी परछाई खो चुका हूँ ... मेरी आँखों में दोनों हाथों के हथेली जितनी नींद भरी हुई है और ढेर सारा नशा ऐसे मैं कहाँ संभव था की मैं तुम्हें अपने आँखों में बसा कर रखूँगा...

मैं पलकें बंद करता हूँ तुम गिर जाती हो.

अच्छा बताओ चूमने के लिए सबसे खूबसूरत जगह कौन सी है ? रेडिफ पर जब किसी ने ये यह सवाल पूछा था तो सबसे ज्यादा वोट्स मुझे ही मिले थे, याद है तुम्हें....

हाँ याद है और ऐसे ही हम करीब आये थे... असम के कामाख्या मंदिर में एक घंटी बजी थी...

आखिरी बार जब फोन पर मैं तुम्हारा माथा चूमना चाहा था

उस्सरत आहा !, एटा सुम्मा दिया(मेरे पास आओ और एक चुंबन दो)

आं हां ! सिर्फ.....पलकों पर.

आह !

क्या हुआ ?

सीने में एक बिस्किट का पैकेट रख्खा था... चूर चूर हो गया, लगता है..."

Friends

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