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Showing posts from April, 2013

विरह का भी कैसा शीर्षक !

वे भी क्या दिन थे जानां। जी मेल बालकनी की तरह लगा करता था। हम उसमें सुब्हो शाम बैठा करते थे और उसकी एक एक पट्टी टंगी हुई अलगनी की तरह लगा करती थी। आज भी सर्च मेल में तुम्हारा नाम डाल कर देखता हूं तो सिलसिलेवार रूप से मेल छंट कर आते हैं। एक पट्टी पर उंगली रखता हूं तो तह ब तह एक एक मेल में अठासी अठासी मेल पिन किए हुए खुल आते हैं। खुद को शादीशुदा महसूस करता हूं और लगता है किसी ने कपड़े उतार लाने का आदेश दिया है। और जैसे ही एक याद का एक सूख चुका कपड़ा अलगनी से खींचता हूं उन बड़े कपड़ों के नीचे छोटे छोटे अंतरवस्त्र तक गिरने लगते हैं।
वो भी क्या दिन थे जानां। हम वर्चुअल एक दूजे का सर दबाते थे, एक दूसरे के कंधे पर सर रखते थे। कभी कभार रो कर दिल भी हल्का कर लेते थे। किस हद तक अकेला है आदमी। अब तक हॉलीवुड के फिल्मों में देखते थे कि हद से ज्यादा अमीर आदमी खोखला और अकेला होता है। लेकिन देखो तो हम जो आम आदमी हैं, घर छोड़ कर बाहर काम करने आते हैं। मां बाप, भाई बहन वाले हैं। जान तक दे डालने वाले दोस्त रखने वाले हैं लेकिन बेतरह अकेले हैं। अंदर आक्रोश नहीं है अब बेशुमार एक खालीपन है। एक पागलपना है। कई बार …

Gmail, Draft No. 134, 8/26/11

"ये रामधुन करने बैठे लोग तो ऐसे चिल्ला रहे हैं जैसे आज ही क़यामत आ रही हो, मन में भी प्रेम भरे नाटक नहीं चलने देते. इत्ता चिल्ला रहे हैं कि अन्दर भी कहानी बनने देना इनको मंजूर नहीं... मन तो इतना हिंसक हो उठता है कि आड़ी लेकर खाई में उतर कर सारे जंगल काट दूँ. वो सब शक्लें क्यों नहीं कटती जिनका काँटा नागफनी की तरह बढ़ता जाता है. मान-मर्यादा कोई अशर्फी होता तो कब का उतार कर दे देती"

अबकी माँ बीच में टोकती है - रे सुग्गा ! क्या-क्या बोलती रहती है ? क्या हुआ है रे तुमको ?
****** लड़की हाथ काटती है, लड़की प्रेम में रहते हुए भी प्रेस करते वक़्त कपडे नहीं जलती, किचेन में भुजिया नहीं जलता. दुपट्टा संभालना जिसका एक मुख्य सामजिक आदेश है जो अब अनिवार्य शारीरिक क्रिया में बदल गयी है (जैसे ब्रश करते हैं) लड़के को शिकायत - हमारे जैसा प्यार नहीं है.. घर से निकल गया, नशे में डूबा रहता हूँ, हाथ वो भी काटता हूँ, लव लेटर लिखता हूँ. दौड़ते दौड़ते बस पकड़ता हूँ, मुंह के बल गिरता हूँ. किडनी फेल हो गया लगता है. एक सफेदपोश प्रेम, एक काले कारनामों से भरा प्रेम " दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-ज…

याद पटना : एक सौ आठ डिग्री

काम से आज छुट्टी ली है। लिखना भी एक काम है। आज लेखनी जब फुर्सत पाती है के पन्नों से गुज़र रहा था तो सोचने लगा मेरा अतीत कितना लुभावना था! जबकि सुबह जैसे ही बिस्तर छोड़ा सबसे पहला यही ख्याल आया कि मैं वर्तमान अतीत को लिए चल रहा हूं बहुत पहले के अतीत को भूल चुका हूं। एकदम पहले के अतीत को नहीं। मेरा मतलब बचपन याद है। जवानी भूल गया और अब ये जिसे अब भी लोग जवानी कहते हैं और मैं अधेड़ावस्था ये जी रहा हूं। भूला क्या हूं ? तो दोस्त यार, कॉलेज, पटना यूनिवर्सिटी। गंगा भूल रहा हूं। रूपक सिनेमाहॉल की देसी एडल्ट फिल्में भूल चुका हूं। अप्सरा सिनेमा हॉल तो अब कहीं है ही नहीं स्मृति में।

वीणा वास्तव के कारण और पहली बार हार्डकोर एडल्ट फिल्मों के कारण जिसमें अंतिम के दस मिनट में सिलेबस के बाहर का शॉट के कारण छूट गए सामान की तरह याद करने पर याद आ जाता है। महिलाओं, लड़कियों के हिमायती अशोक अलबत्ता याद है। उसकी इमेज शाहरूख और शाहिद के चोकलेटी छवि जैसी थी। सिनेमाहॉल में जिन लड़कियों पर लाइन मार रहे होते, फिकरे कस रहे होते कि देख अभी शाहरूख काजोल को चूमेगा वही टिकट खिड़की पर डी सी लेने के वक्त बहन और दीदी बन जात…

B. Call log 07/04/2012 8:28PM last call duration: 03:38:21

अप्रैल के यही दिन थे। वातावरण की हवा में अपनी इक उम्र पूरी करके पेड़ों से पत्ते अलग हो रहे थे। कुछ के अलग हो चुके थे। पॉश इलाके के उन ब्रांच रोडों में सन्नाटा इतना हुआ करता कि चलते हुए पैरों के नीचे आते पत्तों की कड़कड़ाहट सुनाई देती। मैं नाथू स्वीट्स से अपने जेब की रेज़गारी गिनता हुआ दो समोसे खरीदा करता और उसे मिस कॉल दिया करता। यह एक नियम था जब चौबीस घंटे के इन वक्त में दक्षिण एशिया के एक उपप्रायद्वीप के दो जुदा लोग एक दूसरे से जुड़ जाते थे। कभी कभी कितना सुखद लगता है न कि साल के इन्हीं दिनों में जब अप्रैल चल रहा हो, दिन भर उमस रहता हो और शाम की खुशनुमा हवा के झोंकों में हमारी अपनी अपनी जिंदगी के दो वक्त एक साथ कॉमन हो जाते हों। अपनी अपनी उम्र जीते हुए एक दूसरे के साझीदार। लगभग गर्व और सुख की तरह यह ख्याल आता है कि उन क्षणों में वो हमारे साथ था।
मैं पार्क में एक ज़मीन में धंस आए सिमेंटेड बेंच पर बैठ जाता, कंधे से अपना बैग उतार कर साइड में रखता। ब्राउन ठोंगे से एक समोसा निकाल उजली पॉलीथीन की सारी चटनी एक कोने में कर उसे भी समोसे की शक्ल में नुकीला कर पहले एक कट्टा समोसे काटता फिर च…

सीधा प्रसारण

परदा उठता है।
नफासत भरी चाल में मलमल का कुरता डाले एक आदमकद आकृति मंच पर उभरती है। देह में लोच, मुख पर विनम्रता और नमस्कार की मुद्रा धारण किए माननीय संगीतकार नंगे पैर मंच पर बढ़े चले आ रहे हैं। एकबारगी लगता है जैसे मंच रूपी धरा ही कृतार्थ हो रही है। पके हुए बालों में शाइनिंग लिए हुए, पीतांबरी कुरते से एक दिव्य आभा का प्रस्फुटित हो रही है। कस्तूरी की महक आ रही है लगता है मृग यहीं आसपास है और कुचालें भर रहा है। कलाकार के कुरते के तीन बटन खुले हुए हैं जिसमें सोने की पतली सिकरी औंधे लेटे हुए है। यूं इस तरह सुनहली चेन का बाहर झांकना उनके पावन और विराट रूप को और दिव्य बना रहा है। हल्का पीलापन लिए उनके देह पर कुरता फिसल फिसल जा रहा है। कई बार लगता है कुरता नहीं कोट है और यह पतली देह उसके असहनीय भार को धारण नहीं कर पा रही और अभी अभी शरीर पर पिघलकर तार तार होकर बह उठेगी। कह सकते हैं कि संगीतकार का क्लीवेज दिख रहा है लेकिन न...न... (जीभ काटते हुए) संगीतकार हैं तो ऐसा बोलना पाप होगा।
संगीतकार के चेहरे पर हिन्दी में कहें तो तेज़ है, मुख देदीप्यमान है। आंखों से ज्ञान का प्रकाशपुंज निकल रहा है। इस …

गुलाबी सुबह डिवाईडेड बाई चिलचिलाती धूप

साढ़े चार साल मेरे साथ रहते रहते वो ऊब चुकी थी। अब न प्यार में वो नयापन रहा था, न रोमांच। स्लेट पर ईश्क लिखते लिखते उसकी लकीरें मोटी होकर भद्दी लगने लगी थी। और तो और ई, श् और क आपस में मिलकर गुंथ गए थे। दूर से देखने पर यह शब्द सात बच्चे जन चुकने, तीन के सफाई और फिर से पेट फूली औरत की तरह अब बस एक बेडौल आकृति लगने लगी थी। कूल्हे भारी होकर कमर का साथ कब का छोड़ चुके थे। मगर था तो बदन का हिस्सा ही सो घिसटता जा रहा था। जैसे जीवन नीरस था स्लेट पर लिखा यह शब्द भी।
यह मेरी दूसरी बीवी है जो शुरू से बहुत डोमिनेटिंग रही है। शादी से पहले मुझे इसकी ये आदत अदा लगती थी। मैं इसके इसी खूबी का मुरीद था। आज सोचता हूं तो लगता है पता नहीं मुझे प्यार हुआ था या नहीं मगर तब इसके बोल में मुझे एक प्रेमवश अधिकार लगता था। एक अथाॅरिटी जैसे आपकी गर्लफ्रेंड कहे - खबरदार जो अपने जगह से हिले और आपको उसमें अपनी मां का प्यार भरा गुस्सा नज़र आए या तुतलाती आवाज़ में अपनी बेटी का आदेश महसूस हो आप वहीं के वहीं जड़ होकर खड़े रह जाएं।
मेरी पहली बीवी इसके ठीक उलट थी। इतनी गिरी हुई कि उससे प्यार नहीं पाता था। साली में बगावत …

कन्फेशंस एंड एक्स्टसी

वो बीमार है और इसका ख्याल कर जहां तक मेरी समझ में आता है कि इस वक्त लोग अपने बिस्तर पर पड़े पड़े रिश्तों की सख्त पड़ताल करते हैं। नफा नुकसान सोचते हैं। अंदर ही अंदर अपने अति पर आगे से तौबा करने की ठानते हैं। वो गुस्सा, वो तुनुकमिज़ाजीपना जो आदमी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है और जब वो स्वस्थ होता है तो उसे यदि तब आप उसके व्यवहार की यही गलतियां बताएं तो वो अपने को ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा बेहतर और काबिल समझता है, लेकिन बीमारी में अक्सर लोगों का प्रतिरोध घट जाता है और उसे एहसास होता है कि हां फलां दिन हमने थोड़ी गलती की थी। मैंने यह भी नोटिस किया है कि आदमी इसी को कहते हैं कि अस्पताल के बिस्तर पर भी वो उसी ‘थोड़ी’ में अपने को संतुष्ट पाता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि जब आदमी ठीक हो तब उसे यदि आप साइको कह दें तो वह भड़क उठता है। गुस्से में तमतमाए क्षणों में वह पागल है यह आदमी स्वीकार नहीं कर पाता। लोग लाड़ दुलार के क्षणों में ही, प्यार में ही खुद को अपने पर ही रीझ कर पागल भी लेते हैं या सामने वाले का यह संबोधन बिना किसी ऐतराज़ के स्वीकार कर लेते हैं। और कई बार तो वे अपने अति को अंदर ही अंदर जान…

कफ सीरप की बोतलें अगली बार इस्तेमाल में लाये जाने तक के लिए उदास है

मैं हमेशा से उसके उभारों के बारे में सोचता आया हूं। उससे संबंधित बहुत सारी कल्पनाएं की हैं। मैं सोचता रहा कि आईने के सामने जब वह अनावृत होकर आती होगी तो कैसी लगती होगी। उसके ये वक्ष कभी बासी और अलसाए हुए नीम नींद में होते होंगे कभी ताज़े और जागे हुए सर्तक। स्वस्थ, लगभग गोल, गुदगुदे, सख्ताई लिए मांसलता। कभी कभी जब जागे हुए मैं उन्हें अपने हथेलियों में थामता तो बड़ा मुतमइन हो जाता। ज़िंदगी की चक्की  में बीमा सुरक्षा, किराए का कमरा, परचुन की दुकान से उधारी खाते पर रोज़ का आटा, दाल, चावल की कमी से मुक्त महसूस करता। कुल मिलाकर कहूं तो मानसिक असुरक्षा से निकल आता। मुझे लगता कि मैं किसी ऊंचे टीले पर बैठा हूं, तब ज़िंदगी एक किसी गोल्फ कोर्स के हरे भरे मैदान सा लगता जिसमें पानी की चक्की से यहां वहां सिंचाई चल रही हो। यह वैसा ही लगता जैसे आप पैंतीस से चालीस के उमर में हों, करियर और जवानी अपनी पीक पर हो, बच्चे स्कूल जा रहे हों, घर की दीवारें हर दीवाली पर पेंट हो जाती हों, साल-छह महीने में एक ड्राइंग रूम में कोई न कोई फर्नीचर लग जाता हो, आनंद के लिए मार्केट में नई लांच हुई कंडोम फ्ल…

चार शब्द

"मैं मर रहा हूं। और मरने से पहले मुझे किसी का इंतज़ार है।" चेहरे पर शेविंग क्रीम लगाए हुए स्टील वाली रेज़र को भिगोते हुए उसने कहा।
उसकी पलकें झपकी हुई थी। लगता था जैसे उसके और उसकी नींद के बीच कोई है जो दीवार बन कर खड़ी हो गई है। इधर कुछ दिनों से वह बात करते करते या यूं ही चुपचाप रहते हुए वह अनाचक से कह उठता - 'तुम्हें कुछ सुनाई दे रहा है?'
'क्या' - मैं बीड़ी के होंठ को माचिस छुआते हुए उससे पूछता।
"यही.... खट खट की आवाज़..... लगता है जैसे ज़मीन के नीचे खुदाई चल रही हो.... या फिर यहीं मेरे पैर के नीचे ही किसी झरने का पत्थर पर लगातार गिरने का शोर..... "
मैं कहता ‘नहीं’ तब वह चुप हो जाता।
मुझे लगता है वो अब तुमसे कोई कान्टेक्ट नहीं रखना चाहती। आईने में ही उसके चेहरे को एक टुक नज़र डालते हुए मैंने लापरवाही से कहा।
यह सुनकर वह पलटा। उसके रूम पर आने के करीब चालीस मिनट बाद हमारी नज़रें आपस में टकराई। मैंने उसका चेहरा गौर से देखा, खिचड़ी दाढ़ी पर यहां वहां झाग लगे चेहरे में वह ईश्वर सरीखा महसूस हुआ। तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि वह सचमुच मर रहा है।
कोई जब भी मुझे इ…