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Showing posts from March, 2011

थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोडा सा धुंआ...

जब किसी दिन हम कुछ अच्छा करते हैं तो थोड़ा और बेहतर करने का दिल करने लगता है। इस दिन होता क्या है कि हम जिम जाते हैं और वापसी में जूस पीते और घर पर अखबार आने और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के बावजूद एक अखबार खरीदते आते हैं। थोड़ा सा और पछताते हैं कि काश थोड़ा और पहले उठते तो सुबह का सूर्योदय भी देख लेते कि पिछली बार सूर्योदय ‘शायद‘ (शायद यह बता रहा है कि ठीक ठीक वो समय कब था, यह भी याद नहीं) छठ पूजा के अवसर पर दो साल पहले गांव में देखा था और यहां तो बस पता था कि आज छठ मनाया जा रहा होगा। थोड़ा सा बेहतर और सोचते हैं कि बस अब रूम पर जाकर चाय बना नहा लें फिर घर के पीछे जो मंदिर है वहां शिवलिंग पर जलाभिषेक कर सुबह को उसका सबसे एक्सटेंशन दे मिल जाएगा।
ठीक उसके उलट दो दिन पहले की ही बात है जब सब व्यर्थ लगता था। तब के जवाब आज के लिए फालतू हैं आज के जवाब कल की नज़र में व्यर्थ थे। तब कहते जिम जाने से क्या होता है ? घोड़ा दौड़ता है अठ्ठारह साल जीता है अजगर पड़ा रहता है अस्सी साल जीता है। आज जवाब यूं होता है कि मतलब जीने से नहीं स्वस्थ तरीके की जीवन शैली से है। तब कहते जेब में माल हो नींद पूरी हो बस…

धूप निकली है मुद्दतों के बाद, गीले ज़ज्बे सुखा रहे हैं हम

कभी उससे पूछना कि वो कितना अकेला होता होगा जब तुम उसे छत पर कड़ी धूप में सूखने छोड़ आते होगे। वो सूती साड़ी जो तुम्हारे बदन से लगकर अपने पोर पोर में तुम्हारे होने को अपने में समेट लेता है। कभी उससे पूछना कि वो जब दोपहर के ढ़ाई बजे छत पर कड़कड़ाता है तो कैसी तनहाई घेरती है उसे कि दिखाने के लिए झूलता रहता है। 
आज तुमसे देर तक बात करके देर तक उदास रहे। ऐसी उदासी बरसों से नहीं आई थी। जो आई थी इस दौरान तो वो नौकरी, करियर, आटे दाल की कमी की उदासी थी। तुम्हारे छूने की उदासी नहीं थी। साथ जिंदगी गुजारने की बात यों थी कि बगैर जिंदगी गुजारना। साथ जिंदगी गुजारना महज़ एक हसीन बात थी। अपने आप में खूबसूरत ख्याल और हकीकत उदासी लिए हुए। कितना अजीब होता है कि हम अपने अतीत पर हैरां होते हैं और कई चीज उम्र बीत जाने के बाद मिलती है। भरी जवानी समंदर किनारे घूमने निकले और कुछ न मिला और एक दिन जब फेफड़े में हवा ना रहा ना ही गले में ताकत तो गीले रेत संग पानी में शंख से पैर टकराता है। हम उठाकर देखते हैं, अपने बालों को इधर उधर झटका देते हुए जांच परख करते हैं और फिर यह अधिक से अधिक ड्रांइग रूम में सहेजने के लायक …

आओ आने की करें बात कि तुम आये हो !!

उसके आने की जब खबर महकी थी तो वो उतनी बड़ी नहीं थी जब सच में उसके कदमों की आहट आने लगी क्योंकि उसने आने को कई बार कहा था। ऐसा ही लगा वक्त ने एकदम आंखों के पास माचिस की तीली जलाई हो। इस झूठे आने को कहने पर उसे एकबारगी ऐतबार तो हो ही जाता था। और नहीं भी होता था तो यह एक खूबसूरत छलावा था, मन में घूमने वाला एक काल्पनिक छल्ले की तरह। दिल को अच्छा लगने वाला झूठ। 
झूठ भी दो तरह के होते हैं एक जिसे सुनकर तन बदन में आग लग जाए, आपका तलवा लहर जाए तो दूसरा जिसे सुनने को आपका दिल बार-बार दिल करे। जैसे किसी लड़के की कई प्रेमिकाएं हो और एक नई लड़की जो उसकी दोस्त बनी हो वो भी उससे आई लव यू सुनने की इच्छुक हो। एक संतुष्टि प्रदान करने वाला झूठ मानो बेटा उम्र के एक बड़े मोड़ तक बेरोज़गार रहे और मां को दिलासा देता रहे - अम्मा दो रोटी भी कमाऊंगा न, तो एक- एक खा लेंगे.... और मां इसे सुनकर वारी वारी जाए। 
अपनों के कदमों की आहट अपने आप में एक पुरकशिश कहानी होती है। दिल को धड़काने वाली। करीब आती जाती और पेट में एक मीठा सा दर्द उठाती हुई। जैसे सुहागरात में सेज पर दुल्हन की आंखें बंद हों और पति देर तक कोई हरकत न …

क़िसास. क़िसास. क़िसास.

क्या जरूरी है कि मरने के लिए दौड़ती ट्रेन से टकराया जाए या फिर रबर के गेंद की तरह जमे हुए सीमेंट के बोरे पर सिर को पटका जाए। चलते फिरते भी मरा जा जा सकता है। नमक की तरह पानी में घुला जा सकता है और जनवरी की रात में टंकी में रखे पानी की तरह जमते हुए भारी हुआ जा सकता है।
जिंदगी का डार्क शेड कैसा होता है ? क्या वो भी ब्लैक होल्स की तरह चमकता है। कोई चीज आखिर कितनी बदसूरत हो सकती है ? किस हद तक गुमराह हुआ जा सकता है ? 
यह सच है कि पिछले कुछ दिनों से मुझे संभोग से भी विरक्ति हो गई है। जबान का जायका खराब रहता है, रात भर सो कर उठता हूं और खुद का थका हुआ पाता हूं। मन स्पेनिश सांढ सा नथुने से जोर जोर का सांस मारता हुआ इधर इधर दौड़ता है  और बार बार इसे लिखते हुए यों महसूस होता है जैसे मैं परदेस में रह रहे अपने बेटे को अपनी बीमारियों का जिक्र सिर्फ उसे वापस बुलाने के लिए कर रहा हूं।
सुना हर गरम चीज़ की उमर कम होती है। मशीन ज्यादा गर्म हो तो फूंक जाती है। तवा ज्यादा गर्म हो तो रोटी जला सकती है। और जो पार्क में किसी लैम्प पोस्ट में लगे बिजली की बल्ब की तरह जलते हुए खड़ा है और बारिश की एक बूंद भिगो रही…

अवसाद का गाढ़ा रंग

मांमरगई.जल्दीआजाओ
किया गया तार इतना ही छोटा था। छर्रे जितना छोटा और हृदय में धंसता हुआ। पैर तो एकबारगी उठे ही नहीं थे। यों लगा था जैसे धरती का बोझ बांध दिया गया हो। अब यह बोझ आगे बढ़े तो कैसे... अगला कदम आगे बढ़ाते ही महसूस हुआ दिमाग में कसी गई प्लेट ढीली कर अपने धुरी पर घुमा दी गई है। एक जोरदार झन्नाटा आया और बाएं हाथ पर दो कदम दूर जाकर गिरे। लोग इसे सर में चक्कर आना कहते हैं।
यह शौक अधूरा रह गया कि कमरे के दो अलग अलग कोनों में बैठकर हम रोएं। ऐसा मैंने प्रेम में सोचा था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमारा मूड एक सा हो। कभी मैंने उसके गोलों पर रूका आंसू का वह कतरा पीया था तो कभी वो माथे पर थपकियां देती और मेरी सांसों को अपने उभारों के बीच बसाने की भरसक कोशिश की थी। यह इंसानी फितरत है कि एक रोते हैं तो दूसरा उसे चुप कराने लगता है। मुझे मेरे चाचा की आकस्मिक मौत याद आती है जब एक जवान अकाल मौत हुई थी। आंगन में एक साथ पूरा परिवार बिलख रहा था। सब बिलख रहे थे और दूसरे को चुप करा रहे थे। सबकी आंखे मछली के गलफड़े जैसे ताजे लाल थे। उनमें हारे हुए का बोध था या नहीं मैं नहीं कह सकता। हां चूल्हे में रा…

सची माता गो, आमी जुगे-जुगे होई जनोमो दुखिनी...!

...और जंगल में नदी उतरती जा रही है। उफनती हुई, बड़ी गाढ़ी, मटमैली नदी। वेग से बहना, वेग में बहना, तेज़ हवा के साथ झूमती, पागल, उन्मत्त नदी। पहली नज़र में बरसाती नदी, भादो की नदी, अपने साथ छोटे झाड़ झंखाड़ तो क्या बड़े बड़े पेड़ों को को उखाड़ बहा ले जाने वाली नदी। सबको अपने साथ यूं बहाते लिए चल रही है कि किनारों पर बैठे लागों को बात करने का मौका मिलता है। बातों में अंदेशा है - बरगद होगा ? नहीं, अब इनती भी तेज़ हवा नहीं है कि बरगद जैसे मिट्टी से गूंथे जड़ वाले पेड़ को भी उखाड़ दे। पूरब से पागल हवाएं चल रही हैं। पेड़ों के कान पश्चिम की ओर मुड़ गए हैं। कान का कच्चा होना इसे ही कहते हैं। सभी एक साथ निंदा रस का आनंद ले रहे हैं। एक पूर्णिमा की सांझ समंदर किनारे रेत के घर का नक्शा बनाती है। गुलदाऊदी के फूल खिले हैं, बागों में। तमाम तरह की कई और फूल भी खिले हैं सभ्य से बर्बर फूल तक। हवाएं यूं चल रही हैं जैसे कान में शंख बजते हों और लड़की के बालों को लगातार तंग कर रही है। बाल बुरी तरह से उलझ गए हैं। अब कोशिश इतनी है कि वो आंखों के ठीक आगे न रहे या होंठ से न उलझे। एक आवारा देखता है, कहता है। गुला…