Skip to main content

Posts

Showing posts from September, 2013

सुषुम पानी से कहाँ बुझती प्यास

वे कैसी मनःस्थितियां हुआ करती थी। समझाना तो बहुत चाहते थे मगर शब्द नहीं मिलते थे। अचानक से हकबका से जाते थे । अंग्रेजी की टीचर हुआ करती थीं। सात बजे सुबह सामुहिक प्रार्थना चल रहा होता था। हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें। और मन विजय नहीं बल्कि परास्त सा हो चुका था। आज सोचता हूं तो अंग्रेजी टीचर देर रात तक पढ़ती होंगी जभी प्रार्थना में जम्हाई ले रही होती थीं। लेकिन तब लगता था कि उनके पति ने उन्हें सोने नहीं दिया होगा। आखिर क्या कुछ करती रही होंगी इतनी रात तक? तब थोड़ी देर के लिए वे हमारे मन में बेवफा सी हो जातीं। दिल करता हाथ पकड़ कर कोने में ले जाऊं और समझाऊं, आपका पति आपसे उम्मीदें रखता है, आपको चूमता है, मैं कुछ नहीं कर पाता। उसके बनिस्पत मेरा प्यार ज्यादा सच्चा है। आप उसे मार नहीं सकतीं। जबकि मुझे अपने घरेलू झगड़े याद करके भी दस छड़ी ज्यादा मार सकती हैं। मैं कुछ हो सा गया है। आपको लेकर मैं रोता हूं, दोस्तों से बचता हूं। जब आप विलियम वर्डस्वर्थ और जाॅन कीट्स की किसी कविता का मर्म समझाती हैं तो शिद्दत से महसूसता हूं कि अभी तो मेरे पास आपकी समझ को छूने की काबिलयित नह…

गौरी, मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे!

गौरी (गौरीशंकर) मन चकरघिन्नी सा नाचे है रे। तू ही बता न ऐसे में मैं क्या करूं। काकी चूं चूं करती है। काकी बक बक करती है। कुत्ता भौं भौं करता है। भाभी की मुनिया भें भें रोती है। खुद भाभी भी घूंघट काढ़े भुन भुन करती रहती है। सचदेवा पिंगिल पढ़ता है। कठफोड़वा टक टक करता है। देहरी पर बंधी बकरी चकर चकर खाती रहती है, टप टप भेनारी गिराती रहती है और में में किए रहती है। अउर ऊ जो गईया है का नाम रखे हैं उसका कक्का दिन भर मों मों किए जाती है। हमको मरने के बाद बैतरनी का का जरूरत ? इसी हर हर कच कच में जिन्दे बैकुंठ है। आदमी तो आदमी जनावर तक सुरियाए रहता है।

भोर हुआ नहीं, पंछी बोला नहीं, अजान पड़ा नहीं, घरिघंट बजा नहीं, रत्ना ओसरा बुहारी नहीं, सुधीर घोड़ा वाला खाना चना गुड़ अंटी में दाब के दौड़ने निकला नहीं कि भर हंडी भात परोस दो बूढ़ा को। भकोस कर हम पर एहसान करेंगे। और उस पर भी मिनट दू मिनट सुई टसका नहीं कि सुनो रमायन। हमारा पेट गुड़ गुड़ करता है। मन हद मद करता है। चित्त थर थर करता है। बैठल ठमा बूढ़ा मौगी जेकां कथय छै।

बीनी से हांक रही गित्तु। गौरिया पर साल पारे गए कटहल के अचार संग गर्म भात मिलाकर…

उससे कहो कि आकर मुझसे लड़े

उसकी कोई खबर नहीं लगती। सूचना प्राद्यौगिकी के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रहने वाली के बारे में अब कहीं कोई जिंदा जानकारी नहीं है। चंद कतरे उसकी आवाज़ के अपनी जिंदगी में इक जगह सकेर रखा है। वहीं उसे थोड़ा बहुत पा लिया करता हूं। एक पोस्टकार्ड है, गहरे आसमानी काग़ज़ पर उसकी बचपने में लिखी कुछ सतरें हैं। एक फिल्म में काम करना भी। उसके अक्षर आंगन में ढुलकते लोटे जैसे लगते हैं। 
उसे कहां कहां नहीं ढूंढ़ता। कनुप्रिया की किताब में, इज़ाडोरा डंकन के जीवन में, आंखों से बोलती किसी म्यूजिकल ब्लैक एंड ह्वाईट फिल्म में जहां दृश्यों के बीच तेज़ पियानो बजता है। मैं उसे खोजता हूं सखुए के पेड़ों के बीच, बदहवाशी के घोंड़ों के बीच, नींद और सपने के जोड़ों के बीच, अपनों से घिरे गैरों के बीच, सेंट ऑफ़ अ वुमेन के डांसिंग सीन के बीच, ज़हन में बॉस से डांट खाते खौफ के रील के बीच, जैसे मुझे अपने शहर का गंगा किनारे बहता गंदला नाला भी पसंद है वह भी मुझे उतनी ही अज़ीज है।
भीड़ भरे हाट से थैला भर सब्जी खरीदने से कभी नहीं ऊबा मैं, शाम ढ़ले काठ की नाव से गंगा में डूबा मैं, दूर रहकर भी वो पड़ोसन की तरह ही लगती, क्या था जो…

टूटता नहीं ये जादू

होंठ उसके जब भी लपकता हूं, गर्दन से गुज़रता हूं
इरादे दरकने लगते हैं, लहू बहकने लगते हैं।
मन जैसा कैसा ऊपर नीचे को होने लगता है।

दिल होता है किसी चील की माफिक चोंच में दबा कर उसे
उड़ जाऊं, इफरात समय निकाल, नितांत अकेलेपन में शिकार करूं
नस नस चटका दूं उसकी, अपनी रीढ़ की हड्डियां तोडूं

नहीं ही पूरा हो पता पक्षियों का सा ये ख्वाब तो
गली के मुहाने पर झपट्टा मार कर पकड़ लेता हूं उसे
निचले होंठ को अपने दांतों से महीन महीन कुतर देता हूं
दोनों गालों पर अनार उगा देता हूं
किसी दुख का बदला लेता हूं
जाने कैसी संगति है मेरी, कैसा मनोविज्ञान है
बिछड़ने से पहले कर डालो सब तकलीफ कम रहा करेगी
वह कहती -
एक मिनट रूको, जाना तो है घर ही वापस
बस ज़रा लिपस्टिक लगा लूं

/एक मिनट का अंतराल, जिसमें-
बारी बारी से ऊपरी और निचले होंठ पर लिपस्टिक फिसलता है (मन होता मेरा मैं ही अपने होंठों से वो लाली मिला दूं)/

क्षण भर में बदल जाती वो
मैं नहीं बदल पाया सदियों में

हर पल में लगती वो खींचती हुई
टूटता नहीं कभी ये भोर का-सा जादू!

तुम्हें भी तो था न प्यार, तुम भी तो कह सकती थी

तकिए पे आहों की अनगिन सिसकियां हैं
कभी तुम्हारा बाल टूट कर छूट जाया करता था जिसपर
हाट ले जाने वाले झोले में अब बेहिसाब जिम्मेदारियां
बैंगन, तोरी, टिंडा, मेथी, अजवाईन, जीरा, परवल
एक ज़रा ध्यान तुम्हारा गया तो सुनीता चमकीं
अरे ! दातुन नहीं लाए।
परिपक्व हो चला अब बनाता हूं फौरी बहाने
नीम का था, आज मिला नहीं
उसे जवाबों ने न कोई लेना
नहीं ही जरूरी भी कोई मेरा जवाब देना
वो न सुनती, मैं न कहता

सांझ ढ़ले लालटेन शौक से जलाती सुनीता
आंखें क्षण भर दिप दिप करती, पलकों पे उसका कन्हैया नाचता
मैं जान रहा होता, मोरनाच करते रोशनी को, उसके प्रेमी को
वो समझ रही होती मैं छूट गया हूं
जल्दबाजी में पोछे गए लिप ग्लाॅस की तरह अपनी प्रेयसी के पास

हम दोनों बिला मतलब झगड़ते
हम दोनों एक दूजे की बेबसी समझते,
हम दोनों परस्पर हमदर्दी रखते
हम दोनों आधी रात अनजाने में करीब आते
हम दोनों किसी बहाने ज़ार ज़ार रोते और मजबूत होते
हम दोनों नहीं होते मौजूद जब संभोग होता

हम दोनों के बच्चे स्कूल जाते हैं, गेहूं पिसवाने को पैसे मांगते हैं।

हम दोनों एक दूजे को अब तक नहीं पहचानते हैं।

नेकलाइन - तीन

हाय ! कैसे हो?

याद को वो पुराना सिलसिला इस प्रश्न से टूटा। मुझे लगा वो मेरे चेहरे पर विछोह के पड़ते फ्लैशेज़ कहीं देख न रही हो, सो जड़ता से लगभग टूटता हुआ मैं बोल पड़ा - हैलो, तुम कैसी हो।

एज़ यूजअल बढि़या। उसने ज़रा और आत्मविश्वास से खड़े होने की कोशिश की। बढि़या शब्द उसके मुंह से काफी माड्यूलेट होकर निकला जो मुस्कुराने और हंसने के बीच की अवस्था में कहीं फंसा था।

हम्मम..... - मैंने उसकी वर्तमान स्थिति से अवगत होते हुए कहा

मुझे कम बोलता देख उसने दूसरा रूख अपनाया जहां से मुझसे कुछ बुलवाया जा सकता था।
और तुम्हारे घर में सब ठीक? मम्मी, बुआ और मामाजी?

हां, वो सब भी बढि़या। दरअसल मैं इस अचानक के मिलने के संयोग को अब तक स्वीकार नहीं पाया था, सो बेहद सर्तकता से अपने शब्दों को चुन रहा था।

और मीता ? उसका क्या हाल है, इंटर में एडमिशन हो गया उसका?
आं... हां। हो गया।

सब्जेक्ट्स क्या लिए हैं उसने? - मैं हकबका गया। उसके अंदर अब भी उगलवाने की कला मौजूद थी। उसने भांप लिया था कि मैं बोलना नहीं चाहता। बरसों बाद कुछ खास किस्म के रिश्तों से जब हम टकरा ही जाते हैं तो उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं…

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।
कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।
वो आज भी उतनी ही साहसी है। जिन जिंदा सवालों के साथ वो मुझे घूरे जा रही थी उससे तो भीड़ में स…