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Showing posts from January, 2011

लो जानां, तुम्हारे लिए कुछ भी...

पानी, एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन पदार्थ है.  पानी को जिस बर्तन भी बर्तन में रख दो, उसका आकार ले लेता है. पानी निकाल दो, हवा उसका जगह ले लेता है. मौसम भी पानी जैसा होता है. नहीं मौसम पूरी तरह से पानी जैसा नहीं होता. यह आयतन के मामले में पानी जैसा होता है. मौसम से हमारा वातावरण कभी खाली नहीं होता. एक जाता है तो दूसरा डेरा जमा लेता है. मौसम के रंग होते है, गंध होते हैं और स्वाद भी होते हैं. और जब मौसम में रंग, गंध और स्वाद नहीं होते तो यह पानी जैसा हो जाता है. तब मौसम बेरंग, और बेस्वादी हो जाता है. बहना - बिना किसी मकसद के, फर्क के. शहर के शोर में टूटा हुआ एक दिल जैसा, बस काम काम और काम की धुन, बस चलना, चलना और चलने की जिद जैसा, पुराने किले के सर पर पीछे से पड़ता चाँद के प्रकाश जैसा जिसके आगे किले लम्बाई से अँधेरा हो. एक विरोधाभास जैसा. हम सभी अल्लाह की संतान हैं पर उंच नीच का स्थाई स्वाभाव जैसा. वैसा.
ज़हर, अमृत, विरासत, फकीरी, दुःख, सुख, ज्ञान, अँधेरा, रास्ता और रुकावटें. सभी कुछ ना कुछ छोड़ रहे हैं, कारखाना धुंआ छोड़ रही है. ... और मैं अपनी गर्ल फ्रेंड को छोड़ने एयरपोर्ट जा रहा हूँ.…

सातवां फेरा

कैमरापर्सन  : रोल कैमरा ! (थोड़े अंतराल के बाद)  एक्शन ! (शब्दों के शुद्ध उच्चारण उपयुक्त स्थान पर विराम और बलाघात* के साथ)
"बिहार का मौसम इस बार राजनितिक रंग के साथ मिलकर एक हो गया है. गर्मी जम कर कहर ढा रही है. मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे ! तमाम पटनावासियों की फिलहाल यही आरज़ू है. मेरे पृष्ठभूमि में गांधी मैदान उजाड़ और निचाट अकेला है. गर्म हवा के थपेड़े गालों को झुलसा रहे रहे हैं. आसमान में बादलों का पुलिंदा तो नज़र आता है लेकिन बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं. भले ही विज्ञान ने कई चीजों में अपनी दखल दे रही हो  लेकिन अभी भी कुदरत की इस नेमत का कोई सानी नहीं. लोग पसीने से बेहाल हैं. जहाँ कोल्ड ड्रिंक वाले चादी काट रहे हैं वही लोगों की जेब ढीली हो रही है. गंगा, घाट से साढ़े तीन किलोमीटर पीछे चली गयी है और इस बार छठ पूजा में श्रद्धालुओं को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग से कोई शहर अछूता नहीं रहेगा."
----कैमरामैन कामिनी के साथ सागर शेख, मग्निफिशेंट न्यूज़ , पटना. 
- यही कहा था ना तुमने पहली बार पी टी सी (PTC) देते हुए ...  - हाँ, बिलकुल ! पूरे ग्रुप में सबसे अच्छ…

शम्म-ए-फरोज़ा

"मौज-सी पानी में इक पैदा हुई, बह गयी, जैसे इक झोंका हवा का पास से होकर निकल जाए कहीं चंद रोज़ा आरज़ुओं का चिराग़ झिलमिलाकर बुझ गया"  - सआदत हसन मंटो
***** 

(शादी से पहले दो मुलाकात)  - एक - राशिद :चार दिनों से सूरज नहीं निकला, रूई के फाहे में लिपटे यह दिन देखना जरूर किसी दिन अचानक ज़ख्म पर लगे पट्टी की तरह फिसल कर गिर पड़ेगा. 
सुधा : और गिरेगा तो हैरान होने को जब बैठेगे तब तक पसीने वाले दिन आ जायेंगे. वक्त यूँ तेज़ी से कटा करता है, वक्त यूँ तेज़ी से कटा....
राशिद : भीड़ में तुम्हारी  पहचानी गंध हो जैसे.
सुधा : फ़र्ज़ करो कि यह लगभग खाली खोली, कुछ सस्ती शराब की बोतलें, एक गलीज़ रजाई, तार पर टंगे दो दिनों के गीले कपडे... 
राशिद : गीले कपड़ों में क्या ?
सुधा : ज़ाहिर है मेरा पेटीकोट, और थोडा खुराफात सोचने के लिए तुम्हारे दोस्तों के अंडरवियर 
राशिद : एक ही तार पर  ?
सुधा : एक ही ग्रह पर बोलो 
राशिद : और एक बड़ी मुख्तलिफ किस्म की बू, जिससे कलेजे में नफरत जगे और छोड़ कर जाया ना जाए 
सुधा : हाँ ठीक... जैसे बेरोज़गारी का आलम में यह एहसास कि रोज़गार के दरम्यान ऐसे एहसासात से फिर रु-ब-रु ना हो पाएंगे...…