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Showing posts from June, 2014

विदाई का रोना

अंजन दीदी उम्र में मुझसे बहुत बड़ी होते हुए भी मेरी पक्की दोस्त थी। सुपारी खाने की शौकीन थी सो इसके बायस उसके दांतों में कस्से लगे हुए थे। हंसती तो चव्वे में लगे कस्से दिखाई देते। हर दो-चार दिन पर सरौते से एक कटोरी सुपारी काटती। मैं कई बार उससे कहता- एकदम ठकुराइन लगती हो। रौबदार जैसी। मेरी मां और उसमें भाभी-ननद का रिश्ता होने से एक दूसरे से छेड़छाड़ और आंचलिक गालियों का लेन देन होता रहता था। खासकर दीदी जो शुरू से गांव में रहने के कारण खांटी पकी हुई थी। वो मेरी मां को दृश्यात्मकता भरे गालियों से नहला देती। गालियां देने के उस मकाम पर मेरी मां भी उसके आगे नतमस्तक हो जाती। उसकी बेसुरी आवाज़ में वे आंचलिक गालियां और भी भद्दी हो जाती। ये मुझे बड़ा नागवार गुज़रता। एक बार मैंने दीदी से कहा भी कि मेरे पिताजी यानि अपने भैया, दादी के सामने तो तुम गाय बनी रहती हो लेकिन अकेले में ऐसी गंदी गंदी गालियां! उसने अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दिया। कुछ पल अपनी लाड़भरी आंखों से मुझे मुस्कुराते हुए घूरा। फिर कहा - शहर में रहने वाले मेरे बहुत पढ़निहार और अच्छे बच्चे! गालियों से उम्र बढ़ती है। सारे संकट टलते ह…

B. last seen yesterday at 10:22 PM

मैं उसके बारे में जितना सोचती हूं उसकी होती जाती हूं। एक उम्र के बाद खूबसूरती मायने नहीं रखती। पहचान वालों की मुस्कुराहट, मोटे लोगों के किसी खास पर उसकी अपनी खास मौलिक प्रतिक्रिया, फलाने का संशय, चिलाने का चिंताग्रस्त होकर घूमना, मीता का अनजाने में सीटी बजा उठना, किसी काले के आंखों की चमक, किसी गोरे की माथे की सिलवट, गंजे का खिखिलाकर हंसना, बूढ़े की भलमनसाहत दिल को भली लगने लगती है। कुछ के सीने के बाल याद रह जाते हैं, कुछ की बेसुरी आवाज़ भी मन को हांट करती है। कुछ के मेकिंग लव के दौरान बने क्षण याद रह जाते हैं। कुछ के जुबान से निकला शब्द सहलाते हुए से लगते हैं, कुछ की आवाज़ ही आराम दे जाती है। 
मुझे उसके प्यार करने का तरीका बहुत पसंद है। यह सच है कि वह मुझे पसंद करता है लेकिन एक स्त्री होने के नाते जाने अनजाने मेरा सिक्थ सेंस मुझे यह भी इंगित करता है कि उसकी यह चाहना मेरे शरीर के कुछ खास अंगों के प्रति ज्यादा है। वह मेरे गोरे रंग को लेकर अक्सर हैरतजदा रहता है। हम जब मिलते हैं, मेरा मतलब हमारा जब कभी भी बाहर मिलना होता है, कनॉट प्लेस के के एफ सी में, हौज खास के बरिस्ता में, ग्रीन पार्क क…

'शीर्ष'क आने तक गया थक

नए कमरे की बाथरूम की दीवार पर बहुत सारी बिंदियां सटी हैं। कंधे तक सीमेंट की पुताई की गई उन दीवारों पर बिंदियों की लड़ी अपने लाल होने के बायस ही उभरती प्रतीत होती हैं। बाथरूम की दीवारें नीम नींद में अधमुंदी आंखों से देखती है। जब नल खुलता है और पानी की धार गिरती है तब सीमेंट की पुताई वाली वे दीवारें सौंधी-सौंधी महकती है। दीवार की तन्द्रा टूटती है। वे सारी बिंदियां कमर की ऊंचाई पर चिपके हैं। जब नहाने बैठता हूं तो वे बिंदियां एकदम सामने पड़ती हैं। कई बार नहाना विलंबित कर उन बिंदियों से मूक संवाद करने लग जाता हूं। वे भी मेरी तरह वहां नहाने बैठती होगी। अपने बदन पर पानी डालने डालने तक उसे ये अपने माथे पर से ये बिंदी जल्दबाजी में हटाई होगी। कई बार तो एक दो मग अपने शरीर पर डालने के बाद चेहरे पर हाथ फेरने के क्रम में उसकी उंगलियों से टकराई होगी तब जाकर उसे इसे हटाने की सूझी होगी। ऐसा हर जगह होता है। गांव में चापाकल के पास बैठकर नहाती औरतें पेटीकोट अपने उभारों के ठीक ऊपर बांधने के बाद चुकुमुकु बैठकर चापाकल पर ही बिंदियां साट देती हैं। नदी में डुबकी लगाती औरतें पास के पत्थर पर इसे साट जैसे अपनी हा…

कोई समझा कर घर ले आए हमको

मैं घर से भागा हुआ वो आदमी हूं जो गुस्से से भागा था। जाते समय के साथ मैं गांव की तरफ और सरकता जा रहा हूं। वहां के रहन सहन सोच पर और हावी होती जा रही है। अपने तरफ की बोली-भाष कान में शहद घोलती है। इस बेरूखी और बनावटी दुनिया में पुकार का सम्बोधन मात्र दिल को झकझोर देता है। जिस दिन वहां से चलने के लिए ट्रेन में बैठता हूं तो एक मायूसी छा जाती है। मन बैठने लगता है। उत्साह मुर्झा जाता है। एक मुर्दानगी छा जाती है। रेलगाड़ी अपने रास्ते पर बढ़ती है और मैं यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि घर छोड़कर ठीक कहां किया? ऐसा क्यों है कि यहीं खुद को पूरा पाता हूं। हम साला लोअर मीडिल क्लास लोगों के लिए समाज में सर्वाइव करना और भी मुश्किल है। बीच के रास्ते ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। ऑटो चला नहीं सकते, कचरा उठा नहीं सकते, पढ़ाई एक बोझ है जिसके लिए मां बाप से पेट काट-काट कर जैसा भी पढ़ाया। अंधविश्वास और प्रगतिशीलता का चंवर डुलाता यह समाज अपने आप ही मुग्ध है। लानत है ऐसे समाज पर जो अब तक पाप-पुण्य और अच्छे बुरे के दलदल में लिथड़े हुए कीड़े की तरह रेंगते हुए विकास के दंभ में जी रहा है। असल में लोअर मीडिल क्लास एक भ…