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Showing posts from November, 2011

सूरजमुखी के फूल का एक पत्ता हिलता रहता है... क्या मर्सिया पढता है या चूमने का आमंत्रण देता है.

वक्त हो गया जानम, अब अपने हल्के ऊनी कपड़े उतार कर मुझे दे दो। जो तुमने दिन भर पहन कर इधर उधर भागदौड़ की। तुमने दौड़ कर बस पकड़ी, हमारे भविष्य को सोच सोच कर लिफ्ट में पसीने पसीने हुई। ना ना बाथरूम के शीशे में अपने चेहरे पर जमी इस चिकनाई को धोना मत। मैं दिली तमन्ना थी कि तुम खूब थको। इस दुनिया के तमाम रंगो बू तुममें शामिल हो जाए। हाईवे के किनारे उग कर फैल जाने वाले मालती के फूलों जैसी। बेतरबीब और नैसर्गिक सौंदर्य। जब कभी मैं तुम्हारे तांबाई नीम उरियां गुदाज़ बाहों के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि शराब के बाद का संबल देने वाला बस यही एक हहराती डाल है जो इस वक्त ठहरी है। मैं जनम का प्यासा, नींद में प्यास लिए जब यह ख्याल करता हूं कि तुम्हारे इन बाहों पर दिन पर एक नमकीन नदी तैरी होगी जो अब सूख कर तुम्हें और नमकीन बना चुका है तभी तुम्हारी तुलना खुद से कर सकने में समर्थ होता हूं। इंसानों में क्लास वैसे भी कभी नहीं पसंद आया। इन दिनों दिन भी कैसा लगता है। कुछ चेता और बेसुध सा। जैसे नींद में गला सूख रहा हो। कोई परेशान करने वाला सपना देख रहा होऊं, जिसे तोड़ नहीं पा रहा होऊं और सूखे हलक पर खाली…

आँखों के लाल डोरे में तैरती है शराब. बेजोड़ उदहारण में शराब और नशे का ये वाहियात जोड़ है.

सुबह आंख खुलते ही जो सबसे पहले चीज़ सोची वो यह कि आज पीना है। पीने को लेकर इतना मूड बनाकर नहीं पिया। हमेशा सोचा और पिया। यह बिल्कुल वैसा है जैसे 15 को मेरी शादी हो यह सोच की बात है लेकिन अगर आज 15 ही हो तो आज शादी का काम करना है। अतः आज पीना है। इसके लिए मैं कल रात से ही मूड बना रहा हूं। यह क्या उम्र है कि मुझे हर चीज़ के लिए अब तैयारी करनी पड़ती है। आज की शाम चाहता हूं कि सारी दुनिया शराब में डूब जाए। दिल करता है अखबार में इश्तेहार दे दूं जैसे एनजीओ संस्थाएं आठ से साढ़े आठ लाईट, पंखा बंद करने का आहवान करती हैं। शराब मेरी नस नस में उतर आए। मैं क्या पीयूंगा यह दोस्तों पर छोड़ता हूं लेकिन पीने में मज़ा तभी है जब मैं अपने हलक में थोड़ी थोड़ी देर रोक कर घंूट लूं। जैसे पुराने भोथरे ब्लेड से चेहरे के नीचे शेविंग करते समय कई जगह से खून की धार बह निकले और बहुत इत्मीनान से उस पर फिटकरी लगाई जाए। होता अक्सर ये है कि पी लेने के बाद मैं एक स्त्री में तब्दील हो जाता हूं, एक पतित स्त्री में। नहीं नहीं मीना कुमारी को याद मत कीजिए।
पीना और लिखना बादशादत देती है। कितना भी बूढ़ा हो जाऊं लेकिन शराब और कल…

घंटी

चार बजे स्कूल की घंटी बजती है। इसको बजते बहुत कम बच्चों ने देखा है। कुछ उन बच्चों ने जिन्हें मास्टर जी की क्यास निहायत ऊबाउ लगता है, जो अपनी कक्षा में 92 की वल्र्ड कप के हीरो इमरान खान की बात नहीं करते। कुछ उन बच्चों ने जिन्होंने सबक नहीं बनाया हो, अपना नंबर आता देख 3ः55 पर रोनी सूरत बना कर हाथ की कानी उंगली उठा देता, कुछ उन लड़कों ने जिनके लिए पढ़ाई मायने नहीं रखती, कंठ फूट रहा हो, बगलों पर मुलायम बाल आने शुरू हुए हों और रात को स्वप्नदोष की बातें जब अपने दोस्तों को बताए तो साथी नफरत से पेश आते हुए उसे सही जगह उपयोग करने की राय दे।
स्कूल के पीछे की गली में बहता अविरल पेशाब महकता रहता और कुछ चार चार साल से अपनी ही कक्षा में जमे बच्चे अपनी-अपनी वाली को (जो कि कोई एक हो तय नहीं था) यथा संभव चूम रहे होते। 
वक्त के उन कीमती पलों को आज जिसने भी संजो कर रखा है उस माहौल और उस गंध की तलाश में आज भी मारा मारा फिर रहा है। 
वैसे कई बच्चों ने घंटी को गौर से नहीं देखा था। घंटी उनके लिए एक आनंद की लड़ी थी। बिना देखे वो कल्पना कर लेते कि लोहे का दो मोटा लंबा सा छेद वाला राॅड है जिसमें एक और लोहे का राॅड…

जिस्म एक सपाट पार्क है

वो पार्क वहीं है, और आज मेरा मन भी सुबह से वहीं है। पार्क स्थिर किंतु मैं अस्थिर। पार्क में बदलाव बस इतना हुआ है कि वो आजकल सुबह और शाम धुंध के घेरे में रहती है। यों पार्क का बदन भी देखा जाए तो वो भी तुम्हारे जिस्म सा ही लगता है। बहुत हरा भरा पर खाली। हरी हरी दूब जैसे भरा पूरा तुम्हारा शरीर। पार्क के बीचों बीच एक लंबा लैम्पपोस्ट जैसे तुम्हारे मस्तिष्क रूपी ज्ञानेंद्रिय। थोड़ी थोड़ी दूर पर दो सरमाएदार पेड़ जैसे तुम्हारे उभार। चारों ओर नीम, अशोक, शीशम, गंधराज और रातरानी के पेड जैसे तुम्हारे आंख, नाक, जीभ और त्वचा जैसी ़ सभी इतने संवेदनशील। 
किनारे पर कुछ सीमेंट के टेढ़े बेंच भी बने हैं जहां तुमसे घंटों बातें करते हुए मेरी कमर में दर्द हो उठता था मगर अब उनपर लगातार बैठने वाला कोई नहीं। सभी कुछ क्षणों के खुदगर्ज। रात साढ़े आठ बजे उस पार्क को अक्सर बस से देखता हूं। एक सिनेमाई स्लो मोशन में ज़हन वहां से गुज़रता है। आकाश से शीत बरस रहा है। बीचोंबीच के लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी एक गर्द से भरी है जो तिरछे होकर दूर तक जाती हुई ज़मीन को छूती है। तुम्हारा अक्स बहुत उदास उदास किसी की याद में तिरता…

वक़्त के गर्म बाज़ार में एक हम ही तही-दस्त हैं

आई ओफेन सी यू इन माय बालकनी इन द डिफरेंट पोजेज़ समटाइम्स विद काॅफी मग इन केजुअल समटाइम्स व्हेन यू आर नॉट ओनली यू इवेन नो, डैट इज़ योर इमेजि़ज, नॉटयू बट देयर इज़ समवन इन माय हार्ट  हू डिक्लेयर्ड - यू आर माय हनी आई ओफेन सी यू इन माय बालकनी... ओ.. ओ.. ओ ...
कैसे कैसे बुनती हूं, क्या क्या गुनती हूं। दो कांटों के बीच ऊन का धागा उंगली से झगड़ता रहता है जैसे कोई लम्बी बहस हो या जैसे मेरी ही बेटी हो और यह शिकायत लेकर मायके आई हो कि कैसे घर में मुझे ब्याह दिया। हर फुर्सत में लड़ती हो। मैंने सर्दियों में कई कई स्वेटर बस इसी ख्याल में बुने हैं, तुम्हें सोचते हुए। तुम जो कि एक मसला हो बड़े भी बस ख्याल में ही हुए। तुम्हारे जितना स्वेटर तैयार हो जाता है मगर तुम वही के वही बने रहते हो। 
इन दिनों आसमान मटमैला रहता है और पूरा वातावरण धूल से भरा लगता है मानो परले गली में कोई जोर जोर से झाड़ू लगा रहा हो। नीबूं के पेड़ों पर पत्ते नहीं हैं और वे ठूंठ बन गए है। तुम्हारा राह तकते मेरे पत्थर हो जाती आंखों सी। देखना कोई आधी रात काट ले जाएगा इसे अलाव के वास्ते। 
इसी खिड़की पर बैठे कितने मंज़र तैरते, बहते हैं और छूटे भी ज…

मुलाक़ात

sushant:  Namaste !
Keshav:  ha ji
kaha rehte hai janab
aap

sushant:  yahin rehte hain
farmaayen
sarkaar

Keshav:  yaar tu bata
baal bacha ser pe yere

sushant:  duniya kahan se kahan chali gayi
aap baal par hi hain!!!
hairat hai
maalik

Keshav:  aur Vidya ke saadi mai gaya tha

sushant:  nahi dost
aap bhi gye / padhare?

Sushant:Jai ho !
Keshav:  aur tu bata
tu kab kar raha hai ?