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Showing posts from July, 2013

गले की नस पर चाक़ू के धार की जांच

इ एम आई

मानो जिंदगी एक पज्ज़ल हो, बहुत तनहा हो, और जिम्मेवारी से भार से लदी फदी भी। ऐसे में वह अपने अपने अंतरतम से कनेक्ट हो गया हो। दुनिया के अंदरूनी सतह पर एक दुनिया और चलती है जिससे वह जुड़ गया हो। जहां खामोशी ही प्रश्न हो, चुप्पी ही उत्तर, मौन की बेचैनी हो। खामोशी ही वाक्य विन्यास हो, यही व्याकरण हो। मास्टर ने नंगी पीठ पर कच्चे बांस की लिजलिजाती करची से सटाक दे मारा हो और शर्त यह हो कि उस जगह जहां तिलमिलाते हुए हाथ न पहुंचे वहां नहीं सहलाना हो। 
वह लगातार फोन कर रहा है। मजाज़ का शेर चरितार्थ हो बहुत मुश्किल है उस दुनिया को संवरना, तेरी जुल्फों का पेंचो खम नहीं है। रिवाॅलविंग चेयर पर एक कान से फोन का रिसीवर चिपका हो और दूसरा हाथ हवा में जाने क्या सुलझा रही हो। जीने के कितने पेचीदा गुत्थी हो, मसले रक्तबीज हैं। अपने मसाइल सुझल नहीं रहे, ग्राहकों की वित्तीय समस्या सुलझाई जा रही है।
कि अचानक एक अधिकारी आवाज़ देकर बाॅस के चेंबर में बुलाता है। बाॅस का केबिन? प्राइवेट नौकरी यानि चैबीस घंटे गर्दन पर लटकती सलीब। दिखावे से शरीर से आॅफिस में उपस्थिति के बारह घंटे। प्राईवेट नौकरी की जैसी अपनी एक सरहद…