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Showing posts from March, 2010

सिनेमा के कार्य-व्यापार का फ्लैशबैक

1910 में, मुम्बई में, अमेरिका-इण्डिया पिक्चर पैलेस में मैंने एक फिल्म`द लाइफ ऑफ क्राइस्ट´ (ईसा मसीह की जीवन गाथा) देखी। इसके पूर्व मैंने कई अवसरों पर अपने मित्रों और परिवार-जनों के साथ फिल्में देखी थीं, लेकिन वह दिन, क्रिसमस के दिनों का वह शनिवार, वही मेरे जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन की शुरूआत का दिन था। वो दिन ही भारत वर्ष में एक उद्योग की स्थापना का स्मृति चिन्ह है कि बड़े-छोटे सभी व्यवसाय जो आज विद्यमान हैं उसमें उसका पांचवां स्थान बन गया है और यह सब मुझ जैसे एक गरीब ब्राह्मण के द्वारा सम्भव हो पाया। ईसा मसीह के जीवन की महान घटनाओं को देखते हुए जब मैं सुध-बुध खोया हुआ ताली बजा रहा था तब मुझे विचित्र अवर्णनीय भाव की अनुभूति हुई। जब ईसा मसीह का जीवन मेरे दृश्य पटल पर तेजी से घुमड़ रहा था, उसी वक्त मैं श्रीकृष्ण भगवान और श्री रामचन्द्र भगवान् को और गोकुल एवं मैंने महसूस किया कि मेरी कल्पना पर्दे पर रूप ग्रहण कर रही है। क्या वास्तव में हो सकता है? क्या हम भारत-पुत्र पर्दे पर भारतीय बिम्बों को कभी भी देख पाएंगे? समूची रात इसी मानसिक उहापोह में बीती। उसके बाद के दो महीनों तक मैं बिल्क…

तुम आये

अरे, क्यों रूठेहो ? क्या हुआ ? चलो हंस दो. अच्छा चलो मुस्कुरा ही दो. गुदगुदी लगाऊ क्या ? देखो ! पेड़ की छालों से उसका चोकलेटी रंग कैसे उतर रहा है तुम्हारे लिए. तुम जब नहीं थे मेरे आसपास तुम्हारी याद छत पर पसारे हुए रंगीन कपड़ों की तरह उडती थी. अच्छा! मैं तुम्हारे लिए नृत्य कि कुछ मुद्राएँ बनाती हूँ.? कुछ और उपाय करूँ. एक अनजान सुने धरती के आखिरी कोने तक दौड के बादल पुकार दूँ ? या आनंदातिरेक होकर थिरकते हुए अपने एडियों से बात कर लूँ ? तुम्हारी कुछ अदाओं की नक़ल करूँ ? अपने चेहरे की जमीं सर्द मत करो, कहो तो हथेली रगड कर तुम्हारे मसामों पर रख दूँ... बची हुई गर्मी इन वादियों में घोल देना, धूप का पीलापन मैं इन बादल से घिरी फिजाओं में भी घोलना चाहती हूँ...हाथ रखो ना मेरे सीने पर... तुम्हें पता चलेगा कि दिल कि मानचित्र पर धडकनें चारो दिशाओं के उच्चतम बिंदुओं पर जा पहुचे हैं... ना-ना, वहाँ हाथ मत रखना तब आखिर में गिर पड़ेंगी वहाँ से... वहाँ से नीचे बड़ी गहरी खाई है... और इतने ऊंचाई पर बड़े दिनों बाद पहुंची हूँ... डर है, कहीं ऑक्सीजन की कमी ना हो जाये... हाय ! मुझे तो अपने कपड़ों का भी …

मनहूस लम्हा...

मैं इसे अवसाद क्यों कहूँ ... इसमें रहने कि लत लग गयी है अब और बेशर्मी से कबूलता हूँ कि अच्छा भी लग रहा है. चौथा दिन है आज, कहने को कुछ भी नहीं बच रहा है. इन सारे पलों में सिर में एक दर्द तारी रहा. जितनी पी सकता था उस हद तक पी पर नशा हावी नहीं हो सका.मैं कहाँ गया, जा रहा हूँ या जाऊंगा अब यह सब कुछ मायने नहीं रखता. दिमाग में गुंथी हुई मेरी सारी नसें झनझनाती हुई कुछ भी तो नहीं कह रही है.वो जो मेरे अंदर शायर था इन्हीं गलियों में खो गया है. हाथ में अब बस एक खाली गिलास बची है और देर से सरकती हुई आखिरी बूँद अपनी जीभ पर लेने को आतुर हूँ.हाथ की लकीरें अब यहाँ से आगे नहीं दिखती. साथ निकली सारी रेखाएं मुख्तलिफ हिस्सों में अकेले-अकेले बढ़ कर तनहा खत्म हो गए. जिन सवालों को लिए आज मैं मरने वाला हूँ वो परसों भी जिंदा रहेंगी और कल तलक तुम या तो उनका जवाब खोजते रहोगे या फिर तगाफुल ही बेहतर रास्ता होगा.ओ री दुनिया ! तुम्हें मैं कोई रास्ता बताते नहीं जा रहा हूँ. अपनेमुताल्लिक मैंने तुम्हारा मुस्तकबिल जान लिया है. लोगों ने तो एक शब्द खोज लिया था पलायनवाद पर इसके सिवा रास्ता भी क्या था. मैं कोई बहस नहीं प…

बुझता नहीं धुआँ

प्रस्तुतकर्ता सागर पर Tuesday, March, 16, 2010

चोर नज़र

घर की देहरी पर बच्चा माँ की गोद में घुसा जा रहा था...दिन भर धूप में खेल कर लाल हो गया है बच्चा. शाम को माँ को देखते ही अचानक प्यार उमड़ पड़ा है बच्चे का. वो जानता है यहाँ शरण मिल गयी तो घर में भी मिल जायेगी और खाना भी मिल जायेगा. आसपास की औरतों से घिरी माँ ने तो दिन भर बहुत कुछ सोच रखा था की घर नहीं घुसने दूंगी, भूखा रखूंगी ... नज़ारा बिलकुल उलट था... माँ महसूस करती है भूखी तो मैं हूँ.बच्चा माँ के साडी से बार बार उलझ जाता है. वो तो बस कलेजे में घुस जाना चाहता है... अपने पीछे दिन भर की हार-जीत को वो कोसों छोड़ आया है... माँ नाक पे गुस्सा लेकर बैठी अपनी सहेलियों को सुना रही है... सहेलियों को सांत्वना देने के लिए वो बच्चे की हर कोशिश को नाकाम कर रही है... उसका क्रोध पहले चिल्लाने में टूटता है फिर बार-बार अपने हाथ से उसे वो झटक देती है. एकबारगी बच्चे की सूरत में उसे अपना मर्द दिखाई देने लगता है... पर माँ नाम से संबोधन में उसके प्रतिकार का वेग उत्तरोत्तर कम होता जाता है. बच्चा मर कर पनाह चाहता है... ताकि कल खेलने जा जाना पड़े, वो हार-जीत के बंधन से मुक्त हो जाये... माँ हर बार उसे खेलने के …

एक दृश्य !!!!!

रवि भरपूर नींद सो कर उठा है. बीती रात वो बहुत तनाव में सोया था, ढेर सारी बातें अपने मन में लिए. उसे उम्मीद थी की आज उसे नींद नहीं आएगी... यों वो पहले एक आध फिल्म देख कर सोना चाहता था पर ऐसा हो ना सका... रात ग्यारह बजे से सुबह के दस बजे तक सोता रहा. उठते ही पिछली रात को याद किया... उफ्फ्फ्फ़ पूरे ग्यारह घंटे....
लेकिन अब एक अजीब शांति है. मन में कोई बात नहीं और किसी चीज़ को वो ना सोच काफी चुप-चुप सा अच्छा महसूस कर रहा है.
उसने फैसला किया है आज कोई काम नहीं करेगा... वो टहलने मरीन ड्राइव पर निकल जाता है. घडी की सुइयों की आवाज़ उसे अभी भी सुनाई दे रही है. लग रहा है उसने अपनी जिंदगी को दो हिस्सों में बाँट दिया है. एक, आज का दिन जो शांत है, निर्विकार है और जिसे योगीजन परम ध्यानमग्न अवस्था का नाम देते हैं और एक भीड़-भाड़ और शोर-गुल वाली आम दिन वाली जिंदगी.शाम होने को आई पर उसके ब्रह्मांड में एक शून्य घूम रहा है, नहीं, आज तो पछताने की भी मूड में नहीं है. वो अभी तक एकांत में ही है... लगता है यह बादल आज बरसेंगे. वो नंगे पांव पत्थरों पर चलते-चलते काफी दूर चला आया है. अंधरे में सारी धरती हिल रही है.…

सन्नाटे... बोलते हैं

सीने के दोनों दरवाजे खुलते हैं, वो 16 x 12 का एक कमरा होता है... लेकिन खाली. वहां कोई सेट लगा है, किनारे सीढियाँ हैं वो कहाँ तक जाती हैं, नहीं मालूम. मैं उस स्टेज पर अकेला खड़ा परफोर्म कर रहा हूँ. या तो वो बिलकुल खोखला है इतना की मुझे पलकें झपकने तक की आवाज़ सुनाई देती है और संवाद बोलने के लिए खोले गए होंठ की भी (ऐसा मेरा भ्रम है) . मुझे हमेशा लगता है की अब उस सीढ़ी से कोई उतरेगा और मेरा साथ देगा या कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा. मैं निरुद्देश्य...इस कोने से उस कोने तक घूमता हूँ. दरअसल मैं इन दिनों एक बीमारी का शिकार हो गया हूँ. मेरा अंदेशा इतना मजबूत हो चला है की मुझे सीढियों के मध्य हर 2-3 मिनट बाद देखने की आदत हो गयी है. डॉक्टर इसे एहसास या ज़ज्बात जैसी किसी मनोविज्ञान से जोड़ देते हैं.इसका मतलब मैं थोडा-थोडा पागल हो रहा हूँ. मेरी ऐसी आदतों के कारण मैं किसी चीज़ पर एकाग्र नहीं हो पा रहा. मैं थोड़ी-थोड़ी देर बाद स्टेज पर टहलता हुए कुछ सोचता रहता हूँ. असल में इन दिनों मैं सिर्फ सोचता हूँ और 24 घंटे के दौरान सिर्फ सोच कर थक जाता हूँ. सोचते-सोचते मुझे गर्मी लगने लगती है. मुझे लगता है मैंने …

एग्रीमेंट

जीने के लिए वो उतनी ही जरुरी थी, जितनी असफलता ग़ालिब के जीवन में थी. हम इसे जीवन के प्रति वितृष्णा किसी कीमत पर नहीं कह सकते बल्कि यूँ कहें की यह एक जिजीविषा थी उसे चाहने की. पाने जैसी तो कोई शर्त ही नहीं थी यहाँ... आसमानी मुहब्बत थी मानो ज़ज्बाती नहीं, रूहानी लगाव था.उसे खूब देखने का मन करता, भूख प्यास तज के देखता रहता... अगर अध्यात्म नाम का कोई रास्ता भरी जवानी में होता था तो वो भी वहीँ से होकर जाता. उसे देखने की कोई शर्त नहीं थी बस देखते रहना शर्त था... एक अलिखित समझौता, पर ट्विस्ट यह की हस्ताक्षर के बाद निब तोड़ने के बजाय संभाल कर रख ली गयी थी.उसके आने की आहट दिमाग की सीढियों पर उतरती तो लगता किसी झील के तल में कुछ दिए जल उठे हो. वो पाँव डुबाती ना थी बस शांत पानी को छेड दिया करती वो जानती थी- झील इतने से ही असंयत हो उठता है.वो उस हद तक खूबसूरत थी जहाँ से बस यह कमजोरी निकाली जा सकती थी की वो अद्भुत है... सलीका उसके कंधे में था, अदब पलकों में, पीठ थोड़ी सी अल्हड थी और ऊपर और नीचे के होंठ शोला और शबनम नाम से शब्दों के अर्थ लिए बंटे हुए थे. वह जो चिकनी सतह थी वो बात करने से पहले चेता…