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Showing posts from August, 2011

शहनाई की छोटी-छोटी, तीखी धुनें-1

लौटना पहले भी हुआ था जब उसका पीछा करते करते उसके घर पहुंचा था, ग्रिल को पकड के उसे एक मौन आवाज़ दी थी. लड़की तब भी नहीं पलटी थी. करना तो प्यार था, लेकिन शुरुआत दोस्ती से भी हो जाए तो क्या बुरा है. मगर ये कहने में ही चेहरा लाल हो आया. भरे बाज़ार जब हाथ में एक कागज़ ले कर यह कहा तो चेहरे पर की आग से हाथ के कागज़ पिघल गए. हाथ के कागज़ प्यार के ख़त थे लेकिन इस वक्त किसी थर्ड क्लास सिनेमाघर की बेहद सस्ती सी टिकट लग रहे थे जो हथेली के पसीने में ही गल जाते हैं. 
सबसे महान प्रेम सबसे सस्ते

दीवार से टकराकर मछली लौट जाती है

गर्मियों के दौरान स्कूल के मेन गेट पर बाईं तरफ एक खोमचे वाला खड़ा रहता। ब्लू चेक वाले लंुगी और हाफ सूती शर्ट में, बाल बड़े सलीके से झाड़े एक सभ्य, सौम्य बंदा। देखने से लगता शिक्षा अच्छी लिया हुआ अधेड़ युवक लेकिन मजबूरी (बहुत हद तक पैसे की कमी) के कारण आगे पढ़ने से वंचित वो सांवला आदमी जो देखने में बंटी के पापा जैसा लगता, एक सभ्य इंजीनियर जैसा। ये डाॅक्टरों और इंजीनियरों की पर्सनाल्टी क्या पढ़ते-पढ़ते या प्रैक्टिस में ही बन जाती है? खैर... वो एक बड़े आकार वाले डमरू के लकड़ी के स्टैण्ड पर एक चैड़ी सी टेबल लिए खड़ा रहता। क्या-क्या है उसमें ?
कागज़ के कुछ मोटे गत्ते। किरासन तेल वाला शीशी जो अंधेरे में डिबिया का काम करता है। कफ सीरप वाली शीशी जिसमें सरसों का तेल है, एक ठोंगे में कटे हुए महीन प्याज, एक बड़ी शराब के बोलत में लाल चटनी जिसके ढ़क्कन पर कांटी से छेद किया हुआ है ताकि जोर दे कर उझलने पर थोड़ा थोड़ा बाहर गिरे। कुछ प्लास्टिक के पारदर्शी डब्बे जिसमें फरही (मूढ़ी), चना, हरी चना, चूरा, बादाम वगैरह रखे हैं। एक पन्नी में आधे आधे कटे हुए नींबू, एक में इमली, एक छोटे डब्बे में लाल मिर्च का प…

सूखे लकड़ी चूल्हे में डालती रहना

मुझको देखे बिना करार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है

ठीक है, ठीक है आपने उसका गर्दन चूमा था और खुद को वहीं छोड़ आए हुए चार साल होने हो आए। लेकिन उससे क्या ? इस दौरान अड़तालीस महीने गुज़र चुके, कई मौसम गुज़र गए। आसमान में बादलों ने यहां से वहां तक और मुहल्ले के बच्चों ने इस छोड़ से उस कोने तक रेस लगाई। दुनिया में मंदी आई फिर इससे उबरते हुए फिर से मंदी की कगार पर खड़ी है। कई पड़ोस की लड़कियां भागी और गर्भवती होकर अपने घर को लौट आई। कईयों की रातों रात शादी हो गई। निषेध आज्ञा वाली ज़मीन पर घर उठ गए उनमें किराए लग गए। और आप प्यार का रोना रो रहे हैं ? लानत है आप पर ! छि:
आप कहेंगे लेकिन इस दौरान रेलवे ट्रैक पर बारिश होकर बह गई। कितनी ही गाडि़यां अपनी पटरी से उतर गई। दुनिया आखिर फिर से अपने पुराने खेमे में ही है न। लड़की किसी ने किसी से साथ ही है न। गिने हुए विकल्पों में आदमी जी या फिर मर ही तो रहा है न। लोग या तो कुंवारे या शादीशुदा ही तो हैं न। मौसम में जाड़ा, गर्मी, बरसात ही तो आई न और सबसे सबसे बड़ी बात प्यार करने के दौरान आप भी तो होंठ से पैर की उंगलियों तक होते हुए पुनः होंठ पर ही पर ही हो लौटे न। आपने कौन सी नई जगह ईज़ाद कर ली? 
मैं आपकी …

गीत हमारे प्यार की दोहराएंगी जवानियाँ

एक एरा जीने का मन होता है। कि जैसे उन्नीस की उम्र में श्री 420 देखे हफ्ता ही हुआ हो और बारिश से रिलेटेड कुछ फिल्मी और कुछ अपनी इल्मी दृश्य गंुथ रहे हों। मन निर्देशक और नायक दोनों हो चला हो। रही पटकथा लेखक की भूमिका तो वो बीत जाने के बाद किसी घोर विरह में निभाई जाएगी (जैसे कि अभी निभाई जा रही है)

तो बारिश ऐसी है कि हवा किधर से आ रही है आज अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। पहले अंधड़ उठा, धूप छांव में बदला, फिर अंधेरा में, नारियल और ताड़ के पेड़ बड़े भोंपू की शक्ल में तब्दील हो गए। सड़क पर हवा के गोल गोल डरावने भंवर बनने लगे और लाइब्रेरी जाने के रास्ते में उस भंवर में सिमटते चले गए। लाइब्रेरी में कुछ खास नहीं करना था। कोर्स की किताबों को दरकिनार करते हुए आषाढ़ का एक दिन और धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए दो यादगार प्रेम पत्र लिखने थे। प्रेमिका को इस सदी की सबसे महान और खूबसूरत खोज बताते हुए कुछ मौलिक इन्सीडेंट्स की याद दिलानी थी। परवाहों को किनारे रख कर अमर प्रेम करना था। पत्र में कुछ दृश्य यूं साकार कर देने थे कि लड़की अपना घर बार और हकीकत को भूल बैठे, हमारे पैरों की हवाई चप्पल तलवे पर कैसे घिसती जा…

जिंदगी: पृष्ट संख्या __ पैरा संख्या__.

ऐसे ही नहीं बनी जिंदगी। परिशिष्ट मिला कर 159 पृष्ठ। उसी में भूमिका भी। प्रकाशक और अनुवादक की ओर से कहा गया भी। विषयवार क्रम भी। फलाना आॅफसेट छपाई सेंटर, शहादरा, नई दिल्ली वाला पेज भी। इत्ता ही नहीं गुज़रा था जीवन। 159 पृष्ठों जितना। साॅरी 140 पृष्ठों जितना। 
कई बार संभोग के बाद पैदा करने का ख्याल आया था। फिर बहुत कम तो आठ महीने लगे ही होंगे धरती पर आने में। इस दौरान कितने जागते सोते सपने ! प्रसव पीड़ा के बाद हफ्ते दस दिन तक तो मां के शरीर में जान ही नहीं। पीली पड़ गई थी। कैसी बिस्तर पर पड़ी पड़ी थकी रहती थी। फिर भी खुश ? काहे भाई ? तो बगल के पालने में एक संतोष लेटा है। और बहुत सारी संतुष्टि होंठो पर एक ढीली किंतु मुस्कान खींच लाने में सफल हो ही जाती थी। हर बार पालना डोलता तो कतरा कतरा बढ़ना होता। फिर भी यह गौण हो गया। 
एक अरब दुःख सहे तो कुछ एक पैराग्राफ लिखा गया। कई साल गुज़रे तो उसे एक हाइकू में तब्दील कर दिया गया। कुछ अपने लिए जुटा कर रखा गया तो दिलदारी इतनी कि उसे दूसरों को याद करते हुए कुर्बान कर दिया।
जैसे बड़ा लज़ीज़ व्यंजन था। मौर्या लोक पे एक अलग अलग शहरों से कामगार दोस्त एक करव…

पाषाणकालीन औजार हुआ करता, भिड़ता फिर जा कर घड़े की खास मिट्टी बनता

दृश्य बिल्कुल वैसा ही होता है, रात भर के जागे होते हैं, गोली लगी छाती का उपचार गर्म चाकू से करते हैं, सुबह आठ बजे तक पीठ और सीने को पट्टियों से कस कर बांधते हैं और दस बजे उजली शर्ट पर कस कर टाई बांधकर एक हाथ में बैग लिए दूसरे में घड़ी जो कि सीढि़यों से उतरते हुए पहनी जानी है, पैर पटक कर उतर गए।  पैर पटक कर यों उतरे कि रात भर जिन ख्याल और खुद से बहस में उलझे रहे जो जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा तो क्रूर होकर हिंसा पर उतर आए। एकबारगी लगे कि इन्हीं सीढि़यों पर सांप की तरह वो समस्याएं रेंग रही हैं और अगर हम हौले से उतरे तो वो पैर से लिपट जाएगी। ऐसे में बेहतर है उन्हें निर्ममता से कुचलते हुए निकल जाओ। क्योंकि यहां से जो दिन शुरू होता होता है वह आपका नहीं है। 
आप इसे अच्छी तरह अपने दिमाग के अंतिम नसों तक रेंगने दें कि वह किसी और की अमानत है। अब आप बहस करेंगे कि रात भर भी तो किसी न किसी उधेड़बुन और समस्याओं में ही रहा वो समय तो आपका था आपको अपने लिए जीना था वो आपको क्यों नहीं मिला ? जब आप यह दलील रखते हैं तो रतजगे छिपाने के लिए और ताजगी के लिए बनाया गए शेव की आड़ से आपके चेहरे की निरीहता झलकने…

लरजता दुपट्टा और बिना संगीत चुम्बक लगा लय पकड़ता, भूलता फिर थिरकता गीत

तुम कोई गीत गाओ। तुम कोई गीत गाओ ना। तुम गाओ ना कोई गीत, प्लीज़। मुझे बहुत बेचैनी हो रही है। शायद बिस्तर पर कराहते ये अंतिम दोपहर हो। मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस इतना सा संतोष कि तुम हो आसपास ही कहीं। तुम दिखो भी मत लेकिन बस इतना कि मैं मन लगाने के लिए कोई सिनेमा देखता रहूं तो सीफलएल बल्ब की रोशनी में तुम्हारी परछाई किचन में हरकत करती दिखे। परदेदारी का घर ही हो जाए। हमारा रिश्ता लक्ष्मण सीता सा ही हो जाए कि चेहरा देखे बिना जब भी पैर छूने झूकूं तो पायल की बनावट  से तुम्हें पहचान सकूं। 
इन दिनों आंखों में अदृश्य से आंसू आते हैं। कमी महसूस होते होते यूं भी लगता है कि आंसू चल निकले हों लेकिन हाथ फेरो तो गाल सूखे मिलते हैं। ऐसा भी लगता है कि बड़े से टेबल पर नंगे बदन लिटा कर मेरे छाती पर सुलगते कोयले पर धिपा हुआ आयरन रख दिया गया हो।
एक अरसा हुआ मेरे बदन के कपड़ों ने कल कल बहती पानी की धार नहीं रोकी और जो फुर्सत इन दिनों बगल से होकर निकल जाती है के जिसका चेहरा पहचाना हुआ तो है लेकिन जिसकी आंखों में इन दिनों ऐड़ी उचका कर नहीं झांक पा रहा हूं। ये बिस्तर ही मेरी जान ले लेगी जहां सदियों से बुखा…