दोपहर आज अपने जिस्म में नहीं थी। घर की बनी रोटी ढ़ाबे पर सख्त आटे से बना तंदूरी रोटी सा लगता रहा जिसे बनने के चार घंटे बाद खा रहा हूं। खाने के कौर खाए नहीं चबाये जा रहे थे। लगता था कुछ शापित सा समय जबड़ों में फंसा था जो छूटता नहीं था। एक एक निवाला नतीजे पर पहुंचने की तलाश में जानबूझ कर ज्यादा चबाया गया था लेकिन फिर भी हलक में अटक जाता। कई बार ऐसा भी लगा जैसे थाली में चूइंगम परोसा हो। उन ऊबाउ से कुछ घंटों में वक्त ठहर गया था। पहाड़ हो गया था या यों कहें महासागर हो गया था। प्यास बहुत लगती थी और घूंट-घूंट पानी गटकते हुए दीवार और छत के मिलन स्थल को देखा करता रहा। हथेली यूं गीली हो जाती जैसे क्लास से भाग कर सिनेमा हाॅल में बैठे हों और हाथ में साइकिल के पार्किंग का मुड़ा-तुड़ा छोटा सा रसीद हो। कमरे के इस कोने से उस कोने तक ठीक बीचोंबीच एक रस्सी तनी थी। वो हमारे रिश्तों के तनाव जैसा प्रतीत होता रहा। अगर उंगली रख कर छोड़ दो तो थोड़ी देर कंपन के साथ हिलता रहता। यह तनाव जड़ी रस्सी लोगों के अंदेशों और अंदाजे के बोझ को उठाया करती। कमरे के दोनों दीवारों में धंसे हम उन दो कील जैसे थ...
I do not expect any level of decency from a brat like you..