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Showing posts with the label Flashback of Indian Movies

रानों पर के नीले दाग

दोपहर आज अपने जिस्म में नहीं थी। घर की बनी रोटी ढ़ाबे पर सख्त आटे से बना तंदूरी रोटी सा लगता रहा जिसे बनने के चार घंटे बाद खा रहा हूं। खाने के कौर खाए नहीं चबाये जा रहे थे। लगता था कुछ शापित सा समय जबड़ों में फंसा था जो छूटता नहीं था। एक एक निवाला नतीजे पर पहुंचने की तलाश में जानबूझ कर ज्यादा चबाया गया था लेकिन फिर भी हलक में अटक जाता। कई बार ऐसा भी लगा जैसे थाली में चूइंगम परोसा हो।  उन ऊबाउ से कुछ घंटों में वक्त ठहर गया था। पहाड़ हो गया था या यों कहें महासागर हो गया था। प्यास बहुत लगती थी और घूंट-घूंट पानी गटकते हुए दीवार और छत के मिलन स्थल को देखा करता रहा। हथेली यूं गीली हो जाती जैसे क्लास से भाग कर सिनेमा हाॅल में बैठे हों और हाथ में साइकिल के पार्किंग का मुड़ा-तुड़ा छोटा सा रसीद हो।  कमरे के इस कोने से उस कोने तक ठीक बीचोंबीच एक रस्सी तनी थी। वो हमारे रिश्तों के तनाव जैसा प्रतीत होता रहा। अगर उंगली रख कर छोड़ दो तो थोड़ी देर कंपन के साथ हिलता रहता। यह तनाव जड़ी रस्सी लोगों के अंदेशों और अंदाजे के बोझ को उठाया करती। कमरे के दोनों दीवारों में धंसे हम उन दो कील जैसे थ...

व्यावसायिक सिनेमा

   स्वतंत्रता आंदोलन के दौड में फिल्मकारों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस आंदोलन को समर्थन देने का प्रयास किया. तब तक देश में सिने दर्शकों का एक परिपक्व वर्ग तैयार हो चुका था. मनोरंजन और संगीत प्रधान फिल्मों के उस दौड में भी देशभक्ति पूर्ण सार्थक फिल्में बनीं.                         स्वतंत्रता के ठीक बाद फिल्मकारों की एक नयी पीढ़ी सामने आई. इसमें राजकपूर, गुरुदत्त, देवानंद, चेतन आनंद एक तरफ तो थे वी. शांताराम, विमल राय, सत्यजीत राय, मृणाल सेन और हृषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार और दूसरे फिल्मकारों का अपना नजरिया था. चेतन आनंद की ‘ नीचा नगर ’ , सत्यजीत राय की ‘ पथेर पांचाली ’ और राजकपूर की ‘ आवारा ’ जैसी फिल्मों की मार्फ़त अलग-अलग धाराएँ भारतीय सिनेमा को समृद्ध  करती रहीं . बंगाल का सिनेमा यथार्थ की धरती पर खड़ा था तो मुंबई और मद्रास का सीधे मनोरंजन प्रधान था. बॉक्स ऑफिस की सफलता मुंबई के फिल्मकारों का पहला ध्येय बना और इसी फेर में उन्होंने सपनों का एक नया संसार ...

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष...

सिनेमा के कार्य-व्यापार का फ्लैशबैक

1910 में , मुम्बई में , अमेरिका-इण्डिया पिक्चर पैलेस में मैंने एक फिल्म ` द लाइफ ऑफ क्राइस्ट ´ ( ईसा मसीह की जीवन गाथा) देखी। इसके पूर्व मैंने कई अवसरों पर अपने मित्रों और परिवार-जनों के साथ फिल्में देखी थीं , लेकिन वह दिन , क्रिसमस के दिनों का वह शनिवार , वही मेरे जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन की शुरूआत का दिन था। वो दिन ही भारत वर्ष में एक उद्योग की स्थापना का स्मृति चिन्ह है कि बड़े-छोटे सभी व्यवसाय जो आज विद्यमान हैं उसमें उसका पांचवां स्थान बन गया है और यह सब मुझ जैसे एक गरीब ब्राह्मण के द्वारा सम्भव हो पाया। ईसा मसीह के जीवन की महान घटनाओं को देखते हुए जब मैं सुध-बुध खोया हुआ ताली बजा रहा था तब मुझे विचित्र अवर्णनीय भाव की अनुभूति हुई। जब ईसा मसीह का जीवन मेरे दृश्य पटल पर तेजी से घुमड़ रहा था , उसी वक्त मैं श्रीकृष्ण भगवान और श्री रामचन्द्र भगवान् को और गोकुल एवं मैंने महसूस किया कि मेरी कल्पना पर्दे पर रूप ग्रहण कर रही है। क्या वास्तव में हो सकता है ? क्या हम भारत-पुत्र पर्दे पर भारतीय बिम्बों को कभी भी देख पाएंगे ? समूची रात इसी मानसिक उहापोह में बीती। उसके बाद के दो म...