Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2015

प्रेम : साँझ की बेकार चिंता

प्रेम बहुत काॅम्पलीकेटेड विषय बना दिया है हमने। या कि प्रेम जटिल ही है? शायद दिल के लगने से कहीं कोई बड़ा वस्तु है प्रेम। हमारी तो भाषा भी बहुत गरीब है कि हम झट किसी अच्छे लगने वाले एहसास को प्रेम का नाम दे देते हैं। क्या कभी हमारे समझ में आएगा प्रेम? बहुत विरोधाभास है। अगर रोज़ प्रेम को लेकर कुछ नया नया या अलग से एहसास या समझ उपजते रहते हैं तो इस तरह को कभी नहीं समझ सकेंगे कि क्या है प्रेम या रोज़ ही समझते रहेंगे। तो क्या अनपढ़ और जाहिल व्यक्ति नहीं करता प्रेम ? क्या उसके प्रेम करने की योग्यता नहीं है? उसके अंदर उस बुद्धि विशेष का अभाव है? वह कैच नहीं कर पाएगा प्रेम की नित नई परिभाषा को ? अब तो कई बार यह भी लगता है कि हमने प्रेम का सतहीकरण और सरलीकरण कर दिया है। कई बार लगता है प्रेम को हमने दूषित कर दिया है। आम आदमी का रंग देने में, ऊपर ही ऊपर इसे सबकी जिंदगी से जोड़ने में। तो क्या प्रेम संबंधों के इतर भी होता है। हम पहाड़ पर बिना किसी के संपर्क में (यहां तक कि प्रकृति भी) रहकर प्रेम में होने का दावा कर सकते हैं या प्रेम पर भाषण दे सकते हैं। समय के साथ प्रेम बस चर्चा करने, पढ़ने, एक टेबल प…

शापित फसल

उसके बारे में कोई एक सूरत नहीं उभरती। जुदा जुदा से कुछ ख्याल ज़हन में आते हैं। मेरी छोटी सी उम्र में उसी का मौसम रहा करता है।
किसी रात का ख्वाब थी वो। क्षितिज से उतरती सांझ में दरिया पर सुरमई सी बहती हुई। पानी पर किरोसिन की तरह बहने वाली, रंगीन नक्शे बनाती हुए, फिसल जाने वाली..... जिस्म के रोओं पर रेशम सी सरक जाने वाली। झींगुरों के आवाज़ के बीच प्रतीक्षा की रात गहराती है। कई  प्रश्न अनुत्तरित छोड़ जाती है। कई बार लगता है यह क्या है जो मुंह चिढ़ा रहा है। यह क्या है जो मिटता नहीं। यह क्या है जिसकी खरोंचे लगती रहती है। जो कभी खत्म नहीं होता और अपने होने का आततायी एहसास दिलाता रहता है। यह अधूरा होने का एहसास। एक बेकली, एक अंतहीन सूनापन जो अपने खालीपन से भरा हुआ है।
एक व्यग्र सुबह की तरह...किसी स्कूली बच्चे के छुट्टी के इंतज़ार की तरह... जैसे किसी भी पल उससे टकराना होगा।
किसी दोपहर की फुर्सत सी जैसे - टक-टक, टक-टक की आवाज़ के साथ कठफोड़वा गम्हार की डाली पर अपनी चोंच मारता है। छत पर भिगोकर पसारा गया गेहूं सूख जाता है। पूरे बस्ती में मुर्दा वीरानी छाई रहती है। समय की नाड़ी मंद पड़ जाती है। लगता है ज…