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Showing posts from December, 2011

सांस भर भर कर निकालो मुझसे के जैसे समंदर में डूबते बचाया हो

बाबा, मेरी कतई ईच्छा नहीं थी। हम तो धुंध में गुम रेल की पटरियां देख रहे थे। उस पर काम करते ग्रुप- डी के गैंगमैन से बातें कर रहे थे। फिर वो बताने लगा कि 'सर ठंड में ना सुबह-सुबह काम पर जाना होता है।' एक ने बताया कि 'मैं बी. ए. पास हूं और डिपार्टमेंटल एक्जाम देकर आगे बढ़ जाऊंगा। पिछले दिसंबर में ही चार साथी ट्रैक पर कोहरे में काम कर रहे थे, गाड़ी कब उनको काट कर चली गई, पता नहीं चला सर। हम ठीक आधे किलोमीटर दूर पर काम कर रहे थे लेकिन जब सीटी मारने पर कोई जवाब नहीं आया तो जाकर देखा। ... तो चारों आठ टुकड़ों में यहां वहां बिखरे थे।'
अब बताईए हम किसी दृश्य में इतना अंदर तक घुसे हुए थे और वो आई। वो आई और पता नहीं कैसे तो एहसास दिलाया। हम जो कि खुद पापा हुआ करते थे और मेरे बच्चे से दिन रात कोई ना कोई जि़द बांधे रहते थे, तो मैं उसे समझदार आदमी की तरह इस काम से सुनता और उस कान से निकालता रहता था, आज खुद बच्चा बन उसकी जि़द पकड़ कर बैठ गया हूं। 
कोई डर है क्या कि जिस बोतल से दूध पीने से मना किया था वही उठा बैठा हूं ? 
होठों पर ज़हर लगाकर उसने मुझे चूमा। और मेरे पैरों के अंगूठे तक सुलग …

ताप

"गहरे दुख में स्त्री देह एक शरण है। चूल्हे की आंच में जैसे कोई कच्ची चीज परिपक्व होती है उसी तरह पुरुष के क्षत- . विक्षत खंडित अस्तित्व को वह देह संभालती है धीरे . धीरे अपनी आंच में फिर से पका कर जीवन देती है। स्त्री देह कितनी ही बार चुपचाप कितनी ही तरह से पुरुष को जीवन देती है पुरुष को नहीं पता होता।"    --- दर्शक, प्रियंवद.
लैम्पपोस्ट के नीचे बैठा हूं। नोयडा में विजि़बिलिटी शून्य है। डेढ़ सिगरेट पी जा चुकी है। आधी बचा कर रखी है। जेब में मेरे अरमानों की तरह मुड़ा तुड़ा कहीं पड़ा होगा। वही असमंजस में फंसा, मेरे दिल की तरह छोड़ दिया जाए या फूंक दिया जाए सा। किसी दड़बे में पड़े चिकेन सा जो अपने सारे साथियों को बारी बारी खींचा जाता देख दूर पिंजरे से और सटता जाता है और गला रेते जाने से पहले ही उसकी आंखे कई खून देखकर मर जाती हैं। गौर से देखो तो आज तकरीबन हर आदमी भी इसी तरह जी रहा है कि मेरी बारी नहीं आएगी से बचता हुआ। और इसी भ्रम में मौत से पहले बेमौत मरता हुआ। इस जगह पर पीछे मुड़ कर तुम्हें याद कर रहा हूं और यह किसी सिनेमा का क्लाइमेक्स लग रहा है। क्या वह दुनिया मेरे लिए है जहां तु…

रोना

अपने पिछले दिनों की डायरी पढ़ी, पढ़कर मन में संतोष हुआ कि मन की बातें लिखी हैं। मैं रात में अपने आप से ही किया वादा सुबह होते होते भूल जाता हूं। मेरी जो हालत है वो आज पढ़ी गई 'यारोस्लाव पुतीक'की एक कहानी ‘इतने बड़े धब्बे' से बयां होती है। इसमें नायक को पता नहीं चलता कि क्या हो गया है। वो अचेतावस्था में सारे काम करता है। कोई चीज़ उस पर असर नहीं करती। हालांकि वह सोचता बहुत है पर वह करने से काफी अलग है। सबको खुश रखने के लिए वो पहले ही वे सारे काम कर देता है जो उससे पूछा तक नहीं जाता ताकि लोग वक्त से पहले ही चुप हो जाएं जिससे उसके अंतर्मन में चलने वाला दृश्य या उलझन में खलल ना पड़े। मनोवैज्ञानिक स्तर से यह मेरे काफी करीब है।  मैं बहुत परेशान हूं। रोना आ रहा है। जब सारी उत्तेजना, खून का उबाल, गुस्सा, तनाव, निराशा और अवसाद निकल आता है तब व्यथित होकर आंख से थोड़ा सा आंसू निकलता है। कितना अच्छे वे दिन थे जब दिन-दिन भर आंख से निर्मल आंसू झरते रहते थे। कमरे में, पार्क में, मंदिर-मजिस्द में, आॅफिस में, किताब में... कहीं भी बैठ कर खूब-खूब रोते थे। कोई रोकने वाला नहीं था। आंसू भी तब बड़…